दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह फिल्म बाजीराव मस्तानी में. दोनों पद्मावती में भी लीड रोल्स में हैं.
संजय लीला भंसाली उन निर्माता-निर्देशकों में से हैं जिनकी हर फिल्म बनने के दौरान ही चर्चा में आ जाती है. भंसाली की अगली फिल्म 'पद्मावती' भी चर्चा में आ चुकी है. मगर इस बार वजह सबसे अलग और गलत हैं. शूटिंग के दौरान ही भंसाली से मारपीट की गई जिसके बाद हर जगह संजय भंसाली की फिल्म और रानी पद्मावती के इतिहास की चर्चा होने लगी है. इस बीच में बड़ा सवाल ये है कि जिस पद्मावती को लेकर इतना विवाद है, इतिहास में वो कहीं थी भी क्या?
एेतिहासिकता, काल्पनिकता और आलोचना का ऑप्शन
भंसाली ने इससे पहले 'बाजीराव मस्तानी' बनाई थी. दो ऐतिहासिक किरदारों के नाम वाली इस फिल्म की कहानी का बड़ा हिस्सा कल्पना पर आधारित था. भंसाली ने फिल्म से पहले इस बारे में डिस्क्लेमर भी दे दिया था कि उनकी फिल्म ऐतिहासिक किरदारों में गढ़ी गई एक काल्पनिक कहानी है. जब फिल्ममेकर ये बात पहले ही हमें बता देता है तो फिर किसी ऐतिहासिक किरदार को लेकर हमें आपत्ति क्यों होनी चाहिए? मान लीजिए कि आपत्ति है, और आप परेशान हैं तो फिल्म बनने के बाद भी जमकर उसकी आलोचना करिए. लिखकर या बोलकर एेसा करने के हमारे पास कई मौके होते हैं.
भंसाली का मौलिक विचार नहीं है ये प्रेम कथा
सोशल मीडिया पर एक बड़ा वर्ग भंसाली पर क्रिएटिव फ्रीडम के नाम पर इतिहास से छेड़छाड़ करने का आरोप लगा रहा है. लोगों को शायद याद नहीं है कि कुछ महीने पहले ही राजस्थान सरकार के टूरिज़्म डिपार्टमेंट ने खुद अलाउद्दीन खिलजी को पद्मावती का प्रेमी बताते हुए ट्वीट किया था. इस पर विवाद हुआ तो इस ट्वीट को हटा लिया गया. आप खुद इसका स्क्रीनशॉट देखिए.
पद्ममिनी को कर्णावती से कंफ्यूज मत करिए चित्तौड़ में एक ही जौहर नहीं हुआ है. कई लोग रानी कर्णावती और उनके हुमायूं को राखी भेजने की कहानी को भी पद्मिनी से जोड़ रहे हैं. दोनों कहानियां अलग हैं कन्फ्यूज़ न हों.
अलाउद्दीन खिलजी के बारे में भी जान लें
अलाउद्दीन खिलजी का साम्राज्य हिंदुस्तान के इतिहास के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक है. इसे उसके सेनापति मलिक काफूर ने फैलाया. मलिक काफूर को खिलजी ने हज़ार दीनारों के बदले में खरीदा था. इतिहास में कई जगह ये ज़िक्र मिलता है कि खिलजी और काफूर का रिश्ता काफी अंतरंग था. कुछ इतिहासकार इनके होमोसेक्सुअल होने की बात काफी पुख्ता ढंग से कहते हैं. प्रोफेसर वेनेथा रूथ कि किताब 'सेम सेक्स लव इन इंडिया : अ लिटररी हिस्ट्री' के साथ-साथ इस बात का ज़िक्र कई जगह मिलता है.
कल्पना है पद्मावती!
इतिहासकार नज़फ़ हैदर काफी ज़ोरदार ढंग से पद्मावती को एक काल्पनिक किरदार बताते हैं. जबकी पद्मावती (कई जगहों पर पद्मिनी) को इतिहास का हिस्सा बताने वाले लोग मलिक मोहम्मद जायसी के ग्रंथ 'पद्मावत' का हवाला देते हैं. अब पद्मावत की बात करने के लिए पद्मावत और उसके लेखक जायसी के बारे में भी जान लेना चाहिए. जायसी एक सूफी कवि थे जिन्होंने अवधी में ईश्वरीय प्रेम को दिखाती हुई रचना पद्मावत लिखी. जायसी की किताब में पद्मावती सिंहल द्वीप (श्रीलंका) की राजकुमारी है. 14वीं शताब्दी में राजस्थान की किसी रियासत से, श्रीलंका की राजकुमारी से, तोते के माध्यम से प्रेम होना आपको इतिहास की कसौटी पर थोड़ा... आगे खुद समझ लीजिए.
इसके अलावा जायसी ने पद्मावत के आखिर में खुद लिखा है कि ये सारी कहानी और उसके पात्र सिर्फ एक प्रतीक मात्र हैं, जिनके ज़रिए उन्होंने आत्मा और परमात्मा के प्रेम को दिखाया है.
खुद उनका लिखा पढ़िए.
''तन चितउर, मन राजा कीन्हा । हिय सिंघल, बुधि पदमिनि चीन्हा
गुरू सुआ जेइ पंथ देखावा । बिनु गुरु जगत को निरगुन पावा?''
मतलबः आदमी का तन
चित्तौड़ है और मन राजा रत्नसेन
हृदय सिंघल द्वीप है और बुद्धि पद्मिनी
तोता गुरू है जो रास्ता दिखाता है
बिना गुरू के संसार में संसार में किसे परमात्मा मिलता है.
वैसे जायसी अपने ग्रंथ में कहानी कहने वाले का कभी नाम नहीं लेते. हर जगह वो ज़िक्र करते हैं कि एक राजा था, दिल्ली के बादशाह ने कूच किया. तोते ने आकर बताया.
फिर गड़बड़ कहां है?
चित्तौड़ पर खिलजी ने चढ़ाई की थी. अमीर खुसरो ने भी इस सैन्य कारवाई का ज़िक्र किया है मगर उसमें ये प्रेम कहानी नहीं है. सबसे बड़ा तथ्य ये है कि जायसी ने पद्मावत 1520 में लिखा और अलाउद्दीन खिलजी का शासनकाल सन् 1316 में खत्म हो जाता है. जायसी के बाद अबुल फजल ने आईना-ए-अकबरी लिखा. जिसमें चित्तौड़ के राजा रत्नसेन का ज़िक्र आता है. इतिहासकारों के मुताबिक इतिहास में राजा रत्नसेन हुए हैं. मगर जायसी ने जब उनके नाम से एक काल्पनिक कथा लिखी तो कंफ्यूजन पैदा हुआ. ये कथा चारणों के मुताबिक थी तो इसका खूब प्रचार हुआ. बाद में अंग्रेज अधिकारी ने भारत के इतिहास पर काम करते हुए टॉड ने इस कहानी को भी अपने काम में शामिल कर लिया.
इसके अलावा जायसी की इस कालजयी रचना का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ जिनमें धीरे-धीरे इससे किस्से और हकीकत के फर्क एक-एक करके कम होते चले गए. इतिहास के सारे विवादों को परे रखते हुए अंत में एक बार फिर फिल्म की बात करते हैं. किसी भी चीज़ के बनने से पहले ही उसपर विवाद खड़ा करना गलत है. वैसे इसी फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी का रोल कर रहे रणवीर सिंह और पद्मावती के पति रतन सिंह / रत्नसेन की भूमिका कर रहे शाहिद कपूर ने जो ट्वीट किए हैं उनको पढ़कर समझा जा सकता है कि संजय भंसाली की कहानी को जाने बिना ही लोग बम फोड़ रहे हैं.
रणवीर सिंह ने लिखाः
# जो हुआ है (भंसाली से हिंसा) वो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. हमें उम्मीद है कि राजस्थान के लोग समझेंगे और हमारे इरादों के साथ सहानुभूति रखेंगे और हमें अपना समर्थन देंगे. # संजय सर भारत के सबसे काबिल और मौलिक फिल्मकारों में से एक हैं. और वो कभी भी कुछ एेसा नहीं करेंगे जिससे किसी की भावनाओं को चोट पहुंचे. # एक टीम के तौर पर हम 'पद्मावती' को बना रहे हैं तो राजस्थान और राजपूत समुदाय के लोगों के इमोशंस को ध्यान में रखते हुए.
शाहिद कपूर ने भी ट्वीट्स में कहाः
# संजय भंसाली एक एेसे फिल्ममेकर हैं जिस पर इस देश को नाज़ होना चाहिए. वो इस फिल्म में कितनी गरिमा लेकर आने वाले हैं ये आपको तभी पता चलेगा जब आप पद्मावती देखेंगे. # और मुझे पछतावा है कि जब ये सब हो रहा था तो मैं उनके साथ नहीं था.
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