हमारे एक मित्र हैं. अशफाक अहमद. लखनऊ में रहते हैं. भले आदमी. ज़िंदगी में तर्क को वरीयता देने पर अड़े हुए शख्स. हर बात में लॉजिक खोजने की आदत होने की वजह से कई बार धर्म की मान्यताओं पर सवाल खड़े कर देते हैं. संजीदा लहज़े में संजीदा बातें करने वाला आदमी. इवाॅल्यूशन वाले करंट मसले पर उनका ये लेख हम आप सबको पढ़ाना चाहते हैं. धर्म कैसे एक ही वक़्त में भयानक व्यावहारिक और भीषण अतार्किक हो सकता है इसका खांका खींचा है उन्होंने. पढ़कर देखिए आपको क्या लगता है!
इस्लाम और हिंदुइज्म के सच्चे मानने वाले कैसे वक्त पड़ने पर जरूरत के हिसाब से झूठ बोल लेते हैं, इसे समझने के लिये डार्विन की इवाॅल्यूशन थ्योरी से ज्यादा सटीक उदाहरण दूसरा नहीं मिलेगा. अब जिनकी पुख्ता मान्यता है कि आधुनिक मानव की शुरुआत ही एडम/आदम/मनु के रूप में पहले कदम पे ही आधुनिक मानव से हुई हो, वह स्कूल कालेज की पढ़ाई या प्रतियोगी परीक्षाओं में कैसे यह लिख सकता है कि वर्तमान मानव क्रमिक विकास के सहारे यहां तक पंहुचा है? झूठ ही तो लिखना पड़ता है आखिर वहां. सिर्फ यही नहीं, और भी कई वैज्ञानिक तथ्य हैं, जहां धर्म का जबरन दमन करना पड़ता है.
अब जरा सोचिए कि विज्ञान कहता है रोशनी की गति से तेज कोई चीज नहीं चल सकती. चली तो वह ऊर्जा में बदल जायेगी. लेकिन एक सच्चा मुसलमान जानता है कि बुर्राक ने यह कारनामा कर के दिखाया था, पर परीक्षा में यह सच लिख नहीं पाता. उल्टे झूठ का साथ देता है कि हां, रोशनी की गति से तेज कोई चीज नहीं चल सकती. भला बताइए! सच्चा हिंदू जितना राम को मानता है, उतना ही रामायण को. रामायण में तो विज्ञान का गला हर मोड़ पर दबाया गया है. फिर भी स्कूल कॉलेज की पढ़ाई के दौरान, नौकरी के लिये दी गई परीक्षाओं के दौरान, वह पूरी कुटिलता से झूठ का साथ देता है और उस सच को ठुकरा देता है, जो बाद में जीवन की आखिरी सांस तक उसके साथ बने रहते हैं.
एक बंदा तो यह तक मान लेता है कि स्पेस में फलां भाई-बहन ने अज़ान सुनी और इस्लाम पे ईमान ले आया. भले उसने पढ़ाई की हो कि आवाज हवा के सहारे यात्रा करती है और जब स्पेस में हवा ही नहीं तो अज़ान कहां से सुन ली? वह चांद के टूटने पे यकीन बनाए रखता है, किताबों में पढ़ने के बावजूद कि इस तरह कोई टूटा पिंड वापस नहीं जुड़ सकता और चांद टूट गया तो पृथ्वी का वातावरण भी छिन्न-भिन्न हो जायेगा, जो चांद पर डिपेंड है. दूसरा बंदा धूमधाम से गणेश भगवान को मानता है, गणपति मंदिर में हाज़िरी लगाता है, डेढ़ से नौ दिन घर पे बिठा के, नाचते गाते विसर्जन करने ले जाता है और स्कूल कालेज से यह ज्ञान भी प्राप्त करता रहता है कि हाथी और मनुष्य की गर्दन की धमनियों, मांसपेशियों और व्यास में बड़ा फर्क होता है. किसी भी तरह किसी मनुष्य के धड़ पर हाथी का सर नहीं जोड़ा जा सकता.
विज्ञान लाख चीखे-चिल्लाए कि बिना ऑक्सीजन इंसान ज़िंदा नहीं रह सकता. लेकिन सच यह है कि मकरध्वज हो या हजरत यूनुस अलैस्सलाम. वे मछलियों के पेट में भी ज़िंदा रह लेते हैं. पानी में भी आखिर ऑक्सीजन होती ही है, वहां से ली जा सकती है. पता नहीं इंसान पानी में डूब के क्यों मर जाता है? बहरहाल यह विज्ञान आधारित पढ़ाई धर्म विरोधी है. यह सच्चे धार्मिकों को झूठ पढ़ने, लिखने और बोलने पर मजबूर करके ईमान को मलिन कर देती है. सभी सच्चे धार्मिकों को चाहिए कि वे इस पढ़ाई का बहिष्कार करें और संकल्प लें कि अपने बच्चों को भी इससे दूर रखेंगे.
असली ज्ञान तो धार्मिक किताबें देती हैं. अगर धर्म की हानि नहीं करनी तो शिक्षा वहीं से लेनी चाहिए और विज्ञान आधारित शिक्षा हम जैसे करमजले मुनाफिकों, काफिरों, नास्तिकों के लिये छोड़ देनी चाहिए. खुदा और ईश्वर आप पर कृपा करेगा और अपनी असीम अनुकम्पा बनाये रखेगा.
ये भी पढ़ें:
सड़क पर नमाज़ पढ़ने के खिलाफ लिखी ये फेसबुक पोस्ट क्यों वायरल हो रही है? खुद को ‘हिन्दू धर्म का रक्षक’ बताने वाला ये मूर्ख अब ‘हिन्दुओं’ से क्या कहेगा? मुसलमानों के उस वीडियो का सच जिसका दुनिया भर में मज़ाक उड़ाया जाता है दुनियाभर के शिया-सुन्नी एक दूसरे से नफरत क्यों करते हैं?