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400 करोड़ का चंदा हड़पने की ये कहानी आपको हैरान कर देगी

सेशेल्स में हुए भ्रष्टाचार की कहानी जानिए

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सेशेल्स में हुए भ्रष्टाचार की कहानी जानिए
सबसे पहले ये नक़्शा देखिए,
Seychelles Map
Seychelles Map

हिंद महासागर में पूर्वी अफ़्रीका के पास कुछ बिंदियां नज़र आ रहीं है. बहुत ज़ूम करने के बाद पता चलता है कि ये सौ से ज़्यादा द्वीपों का समूह है. जब मैप को किनारे कर धरातल पर जाएंगे तो वे द्वीपसमूह मिलकर एक देश का निर्माण करते हैं. नाम है, सेशेल्स.
इस देश का नाम आप पनामा पेपर्स या पैराडाइज़ पेपर्स लीक के वक़्त सुन चुके होंगे. ऑफ़शोर कंपनियां बनाकर पैसे की घपलेबाजी के इस खेल के बारे में हम पहले दुनियादारी में बता चुके हैं. आपको उनका लिंक डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा.
सेशेल्स जैसे देशों में कंपनी बनाना आसान है. वहां मालिक की पहचान छिपाकर रखी जा सकती है. इस विधि से टैक्स बचाने या काला धन छिपाने में मदद मिलती है. इस खेल के अधिकतर खिलाड़ी दूसरे देशों के होते हैं.
आज की कहानी का सूत्रधार भी पैसा ही है. और, मजमून घोटाला. अंतर बस इतना है कि आज का क़िस्सा सेशेल्स के आंतरिक मसले से जुड़ा है. इस भ्रष्टाचार में पूर्व राष्ट्रपति से लेकर आर्मी कर्नल तक का नाम आया है.
सेशेल्स का इतिहास क्या है? इस इतिहास के सबसे बड़े करप्शन स्कैंडल की कहानी क्या है? और, पूरे मामले में एक पादरी की क्या भूमिका रही है? पहले इतिहास की बात. आज का सेशेल्स एक समय तक गुमनाम द्वीपों का समूह हुआ करता था. इतिहासकारों का मानना है कि अरब नाविकों को इन द्वीपों के बारे में सातवीं-आठवीं शताब्दी में ही पता चल चुका था. हालांकि, उन्होंने कभी इसे एक्सप्लोर नहीं किया. 15वीं शताब्दी में यूरोप में ऐज ऑफ़ डिस्कवरी का युग शुरू हुआ. यूरोप के देश नई ज़मीनें तलाशने निकले. 1498 में पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा भारत पहुंचा. वो भारत तक पहुंचने वाला पहला यूरोपियन बना. भारत की खोज के बाद यूरोप से व्यापार का सिलसिला शुरू हो गया.
वास्कोडिगामा कई बार भारत आया. ऐसी ही एक यात्रा के दौरान उसे हिंद महासागर में ये द्वीप दिखे. लेकिन उसे इन पर क़ब्ज़ा करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी.
वास्कोडिगामा के निकलने के लगभग सौ बरस बाद ब्रिटेन का आगमन हुआ. 1609 में एक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का एक जहाज कुछ समय के लिए ठहरा था. हालांकि, वे भी इसे नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ गए.
गुमनामी का ये सिलसिला 1742 तक चला. उस साल फ़्रेंच नाविक लज़ारे पिकॉल्ट के कदम एक द्वीप पर पड़े. वो यहां की ख़ूबसूरती देखकर अवाक रह गया. उसके मुंह से निकला, अद्भुत. पिकॉल्ट ने अपने संरक्षक और मॉरिशस के गवर्नर माहे डे ला बदूने के नाम पर द्वीप को माहे का नाम दिया. 1756 में ये नाम बदल दिया गया. उस समय फ़्रांस में लुई पंद्रहवें का शासन चल रहा था. उसके दरबार में वित्त मंत्री था, जीन मोर डे सेशेल्स. उसके सम्मान में द्वीप को आइल डे सेशेल्स कहा गया. यही आगे चलकर सेशेल्स बना.
फ़्रांस ने 1770 में पहली कॉलोनी बसाई. वो 15 गोरों, आठ अफ़्रीकन और पांच भारतीयों को लेकर पहुंचा था. फ़्रांस सेशेल्स में मसालों की खेती करना चाहता था. इसके लिए उन्होंने अफ़्रीकी महाद्वीप से ग़ुलामों का आयात किया.
जब तक फ़्रांस वहां सेटल हो पाता, उसके घर में आग लग चुकी थी. पहले फ़्रेंच क्रांति और फिर नेपोलियन युद्ध ने उसकी कमर तोड़ दी थी. हिंद महासागर में ब्रिटेन की दिलचस्पी भी बढ़ चुकी थी. 1794 में उसने सेशेल्स पर नियंत्रण कर लिया. नेपोलियन युद्ध खत्म होने के बाद 1814 में पेरिस की संधि हुई. इसके तहत, फ़्रांस ने सेशेल्स को आधिकारिक तौर पर ब्रिटेन के हवाले कर दिया.
1835 में ब्रिटेन ने अपनी सभी कॉलोनियों में दासप्रथा पर रोक लगा दी. इसके बाद हज़ारों की संख्या में अश्वेत सेशेल्स पहुंचने लगे. ब्रिटिश शासन के दौरान सेशेल्स राजनीतिक क़ैदियों का जेलखाना बना. ब्रिटेन ने अपने नियंत्रण वाली कॉलोनियों से हज़ारों क़ैदियों को सेशेल्स में निर्वासित किया. ये लोग अपने साथ अपनी संस्कृति लेकर आए थे. इसने सेशेल्स को विविधता दी. सेकंड वर्ल्ड वॉर तक ब्रिटेन ने दुनिया के अधिकतर हिस्सों में अपनी कॉलोनी स्थापित कर ली थी.
वर्ल्ड वॉर खत्म होने के बाद ये स्थिति बदलने लगी. कॉलोनियां में आज़ादी की मांग तेज़ होने लगी थी. सेशेल्स भी इससे अछूता नहीं रहा.
1964 के साल में सेशेल्स में दो राजनीतिक पार्टियां बनीं. पहली पार्टी थी, सेशेल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (SDP). SDP के फ़ाउंडर थे, जेम्स मचाम. वो पूंजीपतियों के समर्थक थे. उन्हें ब्रिटेन के साथ बने रहना था.
दूसरी पार्टी बनी, सेशेल्स पीपुल्स यूनाइडेट पार्टी (SPUP). इसके फ़ाउंडर थे, फ़्रांस अल्बर्ट रेन. वो ब्रिटेन से पूर्ण आज़ादी मांग रहे थे.
बाद में दोनों पार्टियों ने मिलकर ब्रिटेन से अलग होने की मांग शुरू की. अंतत:, 29 जून 1976 को सेशेल्स ब्रिटेन से आज़ाद हो गया. SDP के जेम्स मचाम राष्ट्रपति बने. जबकि SPUP के अल्बर्ट रेन को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई. हालांकि, रेन इससे संतुष्ट नहीं थे.
शपथग्रहण के एक बरस बाद की बात है. पांच जून 1977. तत्कालीन राष्ट्रपति मचाम लंदन की यात्रा पर गए थे. इधर उनकी कुर्सी पलट दी गई. ये तख़्तापलट काफ़ी हद तक शांतिपूर्ण रहा था. पूरे प्रोसेस में सिर्फ़ तीन लोगों की मौत हुई थी और सत्ता बदल गई. अल्बर्ट रेन प्रधानमंत्री थे. उन्होंने कहा कि उन्हें तख़्तापलट की कोई जानकारी नहीं है. हालांकि, उसी दिन उन्होंने राष्ट्रपति पद की शपथ ले ली. विरोधी नेता या तो सेशेल्स छोड़कर भाग गए या उन्हें ठिकाने लगा दिया गया.
राष्ट्रपति बनने के बाद रेन ने दो बड़े बदलाव किए. उन्होंने पहले अपनी पार्टी का नाम बदला. SPUP अब सेशेल्स पीपुल्स प्रोग्रेसिव फ़्रंट (SPFF) बन गई. रेन समाजवादी विचारधारा के थे. 1979 में उन्होंने सेशेल्स में वन-पार्टी सिस्टम लागू कर दिया. सिर्फ़ SPFF को ही मान्यता मिली थी. मतलब ये कि सिर्फ़ रेन की पार्टी चुनाव में खड़ी होती थी और 95 फीसदी से अधिक वोट पाकर जीत भी जाती थी.
ये सिस्टम 1991 तक चला. सोवियत संघ के विघटन के बाद समाजवादी विचारधारा थोड़ी कमज़ोर पड़ चुकी थी. बाहरी दबाव के बीच रेन ने पॉलिटिकल सिस्टम में ढील देने की मांग मान ली. 1993 में सेशेल्स में मल्टी-पार्टी सिस्टम की शुरुआत हुई. हालांकि, इससे रेन के कद पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. वो पहले की तरह सत्ता में बरकरार रहे. रेन 2004 तक राष्ट्रपति पद पर रहे. उनकी पार्टी का दबदबा 2020 तक बना रहा. 2019 में अल्बर्ट रेन की मौत हो गई. वो ताउम्र किंगमेकर की भूमिका में रहे. आज हम ये सब क्यों सुना रहे हैं? दरअसल, अल्बर्ट रेन के शासन में हुए पुराने पाप अब खुलकर सामने आ रहे हैं. 2002 में सेशेल्स भारी आर्थिक संकट का सामना कर रहा था. उसके पास विदेशी मुद्रा भंडार की कमी हो गई थी. इसके चलते बुनियादी चीज़ों का आयात नहीं हो रहा था. जनता भूखों मरने के कगार पर पहुंच चुकी थी. तब यूएई ने सेशेल्स को पांच करोड़ डॉलर्स की मदद भेजी थी. आज के समय में इसे कन्वर्ट किया जाए तो ये रकम लगभग चार सौ करोड़ रुपये होगी.
ये रकम आई थी आम जनता के लिए. मगर कभी उन तक पहुंच नहीं सकी. यूएई ने पैसा सेशेल्स मार्केटिंग बोर्ड (SMB) के खाते में भेजा था. ताकि उससे खाने के सामानों का आयात किया जा सके. उस समय SMB के डायरेक्टर थे, मुकेश वलभजी. मुकेश वलभजी ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर उन पैसों को दूसरे अकाउंट्स में ट्रांसफ़र कर दिया. फिर उन पैसों से विदेश में होटल और लग्ज़री के सामान खरीदे गए.
लंबे समय तक इस घोटाले की बात छिपी रही. फिर एक पादरी और राजनेता वेवल रामकलावन ने इसको चुनावी मुद्दा बनाना शुरू किया. रामकलावन 1998 से राष्ट्रपति चुनाव में खड़े हो रहे थे. लेकिन पांच चुनावों में उनकी लगातार हार हुई. हालांकि, 2017 में उनके ज़ोर देने के बाद सरकार ने चार सौ करोड़ के चंदे की जांच शुरू की.
अक्टूबर 2020 में सेशेल्स में फिर से चुनाव हुए. इस चुनाव में रामकलावन जीत गए. छठे प्रयास में उन्हें सफ़लता मिली थी. उनकी जीत के बाद चंदे वाले मामले की जांच तेज़ हुई.
इस केस में अब तक छह आरोपी बनाए गए हैं.
इनमें अल्बर्ट रेन की पत्नी सारा रेन, आर्थिक सलाहकार रहे मुकेश वलभजी और उनकी पत्नी लारा वलभजी, रेने के बेटे और सेना में लेफ़्टिनेंट कर्नल रहे लेजली बेनोटन, वित्त मंत्रालय में अधिकारी रहीं लेखा नायर और एक पूर्व कैबिनेट मिनिस्टर मॉरिस का नाम है. छापेमारी में मुकेश वलभजी के घर में भारी मात्रा में हथियार भी बरामद हुए थे. इसके चलते उनके ऊपर आतंक से जुड़ी धाराएं भी लगाई गईं है. इस मामले में नया क्या हुआ है? 07 जनवरी 2022 को सेशेल्स की सुप्रीम कोर्ट ने सारा रेन की ज़मानत याचिका खारिज कर दी. सारा ने ज़मानत की रकम घटाने की मांग की थी. सारा के ऊपर मनी लॉन्ड्रिंग और संपत्ति की जानकारी छिपाने के आरोप हैं. ज़मानत के लिए उन्हें 15 करोड़ रुपये भरने के लिए कहा गया है.
कोर्ट ने मुकेश वलभजी और उनकी पत्नी की मेडिकल मदद से जुड़ी याचिका मान ली. उन्होंने जेल के अधिकारियों को उनकी देखभाल का आदेश सुनाया. 07 जनवरी की सुनवाई के दौरान कोर्ट में दो आरोपी ही मौजूद थे. बाकी के चार आरोपी 14 जनवरी को अदालत में पेश होंगे.
सेशेल्स की जनता को उम्मीद है कि चंदे में मिले पैसों का कुछ हिस्सा अभी भी लौट सकता है. जांच अधिकारी भी ये दावा करते हैं. अगर उनका पता चल जाए तो उनका उचित इस्तेमाल किया जा सकता है. 20 बरस बाद क्या न्याय हो पाएगा, देखने वाली बात होगी.

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