
स्किड तो ऐसी गजब की मारते थे कि सड़क पर टायर की ग्रे कलर की घिसन छूट जाती थी, जिसे देखकर लोग बोलते थे, 'बेटा, त्रिपाठी ने मारी है'. वो बात अलग है कि दो-चार बार घुटने पर पैंट भी फट गई. अब कोई पेट से थोड़े न स्किड मारना सीखकर आता है, फट गई पैंट यार. हां तो अब दीनदयाल के सीन पर वापस आ जाते हैं. उस दिन कोचिंग के बाद दीनदयाल के साइकिल स्टैंड के पास दोस्तों के साथ बकर चल रही थी.
तभी एक चिरांद ने लफ्फाजी में कहा, 'गुरू, वहां से कोई कुदा पाएगा साइकल? 10 रुपए मेरी तरफ से'. दरअसल साइकल स्टैंड के एक ओर ग्राउंड था खेलने के लिए और साइकल स्टैंड और ग्राउंड की जमीनों के बीच एक डेढ़ फुट का अंतर था. साइकल स्टैंड उच्चे पर था और ग्राउंड निच्चे पर. दूर से साइकल भगाकर लानी थी और उसी उच्चे से निच्चे में कुदानी थी. वैसे तो तब हमाये लिए 10 रुपए बड़ी चीज हुआ करती थी, लेकिन तब बात 10 रुपए से आगे बढ़ चुकी थी. अरे शान-वान भी कउनो चीज होती है कि नहीं.
कसम से ऐसा जोश भर गया कि फड़क-फड़ककर मन कहने लगा कि भाई, कुदा दे साइकल और दिखा दे लौंडों को कि यहां के तो बादशाह हमइ हैं. फिर क्या था. जवान खून भला रुक सकता था क्या? पीछे से हवाओं ने फड़फड़ाकर माहौल बना दिया बिल्कुल साउथ की किसी पेलम पिच्चर की तरह. पैडल पर धरी लात और जय बजरंग बली बोलकर दौड़ा दी साइकल डेढ़ फुट गहरे गड्ढे की ओर. धुक-धुक तो बहुत हो रही थी, लेकिन शायद अपनी स्टंटबाजी से कुछ ज्यादै इम्प्रेस्ड थे. आव देखा न ताव, दम बांधकर कुदा दी साइकल गड्ढे में और अगले ही पल मेरी साइकल उस पार हो गई.
इतिहास रचा जा चुका था. जो कोई नहीं कर सका था, वो त्रिपाठी ने चुटकी में कर डाला था. अब मैं सातवें आसमान पर चढ़ चुका था. इतना कि एक और लड़के को हौसला देने और कुदाने की ट्रिक बताने के लिए एक और बार साइकल कुदाकर दिखाने की हामी भर दी. इस बार फट नहीं रही थी, बल्कि गुंडई मुस्कान थी चेहरे पर. गए शेर की तरह दहाड़ते हुए, लेकिन अगले ही पल ग्राउंड पर कुत्ता की नामा मिमिया रहे थे. इस बार वो नहीं हुआ, जो पिछली बार हुआ था.
कुछ ज्यादा ही तगड़ी चीज़ हो गई थी. अलगै लेवल की. साइकल जैसे ही नीचे ग्राउंड की जमीन से टकराई, साइकल की कइंची टूट गई और पिछला टायर दो-तीन फुट हवा में उछल गया. हम भी उछलकर गिरे जाकर, घसिलते हुए, दो-तीन मीटर दूर तक. भयंकर मुंह छिल गया था. ये तो कहो चश्मा उछलकर कहीं और गिरा गया था, नहीं तो साला कांच-वांच भी घुस सकता था आंख में. अंधिया ही जाते हम तो. लेकिन बहुत बचे यार. ये देखकर दोस्तों की वैसे ही सिट्टी-पिट्टी गुम हो चुकी थी. फिर हमी उठे, पैंट झाड़ी और कहा, 'चलो बे कुछ नहीं हुआ'.
जल्दी-जल्दी मुंह धोकर बाहर भागे, लेकिन बाहर जाकर पता चला कि चोट गुरू गहरी लगी थी. एक छोटी सी डिस्पेंसरी में जाकर मरहम-पट्टी कराई और घरवालों को बताने के लिए एक मस्त कहानी बना ली कि ऑटोवाले ने पीछे से पेल दिया, आगे सड़क खुदी पड़ी थी, उलर के गिरे जाकर, सब मौरंग-गिट्टी मुंह छेल डालिस. जिसने भी ये कहानी सुनी, ऑटो वालों को गरियाया और हमें 4-5 दिन कोचिंग जाने से आराम मिल गया.
पांच दिन खातिरदारी हुई जमकर. दिनभर टीवी देखने को मिली वो अलग. चलो कुछ तो फायदा हुआ चोट लगने का. कहानी तो सुन ली यार तुमने, लेकिन एक बिनती है. ये कहानी हमाये घर में बता न देना, कुछ भी हो जाए चाहे. काहे से अइसा है न कि उनकी नज़र में कातिल आज भी ऑटो वालै है.
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