संत रविदास जयंती पर नेताओं की लगी मंदिर दौड़ लेकिन देश में दलितों का हाल क्या?
पंजाब में दलितों का हाल क्या?
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पंजाब में दलितों का हाल क्या?(फोटो इंडिया टुडे)
देशभर में आज संत रविदास की जयंती मनाई जा रही है. भक्तिकाल के वो कवि जिन्हें संत का दर्जा मिला. जिन्होंने जाति-धर्म, छुआछूत की व्यवस्था पर अपने कथन, अपने दोहों के जरिए चोट की. वो कहते थे. रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच. नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच. मतलब मात्र जन्म के कारण कोई नीच नहीं बन जाता हैं. मनुष्य को वास्तव में नीच केवल उसके कर्म बनाते हैं. यूं तो माघ पूर्णिमा के दिन हर साल संत रविसाद की जयंती मनाई जाती है. उनको मानने वालों में हर साल यही उत्साह देखने को मिलता है. वाराणसी उनकी जन्मस्थली है तो हर साल लाखों का जमावड़ा होता है. पूरे 1 हफ्ते मेला लगता है. आप इसके महत्व को सिर्फ इस बात से समझ सकते हैं कि पंजाब का चुनाव रविदास जयंती की वजह से टाल दिया गया. आमतौर पर कुछ भी हो जाए चुनाव नहीं टलते. मगर 14 फरवरी को हो जाने वाला पंजाब चुनाव 20 फरवरी को होना है. वजह यही है कि रविदास जयंती के मौके पर पंजाब के लाखों श्रद्धालु वाराणसी में इकट्ठा हुए हैं. जो SC समुदाय से तालुक रखते हैं. मगर इस पर आम लोगों से ज्यादा उत्साह नेताओं के बीच है. हर पार्टी रविदास जयंती को अपने-अपने तरीके से मना रही है. बढ़कर चढ़कर भागीदारी दिखाने की कोशिश है. कई लोग कह रहे हैं इसके पीछे एक राजनीति है. पंजाब और यूपी के चुनाव से जुड़ी राजनीति. जहां दलित वोटर बड़ी संख्या हैं और कई सीटों पर जीत हार तय करने का माद्दा रखते हैं. क्या है पूरा गुणा-गणित? आज एक तस्वीर की सबसे ज्यादा चर्चा है. वो प्रधानमंत्री मोदी की है, जिसमें वो महिलाओं के कीर्तन के बीच मंजीरा बजाते नजर आए. तस्वीर वायरल है. लोग सोशल मीडिया पर अपने-अपने तरह से इस पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं. सुबह-सुबह प्रधानमंत्री दिल्ली के करोल बाग में रविदास विश्राम धाम पहुंचे. पूजा-अर्चना की. यहां पर एक दिलचस्प वाक्या हुआ. पीएम ने पूछा- कहां के रहने वाले हैं.पंडित जी बोले-श्रावस्ती,यूपी का.पीएम ने पूछा-बच्चे पढ़ रहे हैं ना. पंडित जी बोले-बच्चे का सरकारी स्कूल में एडमिशन कराना है,श्रावस्ती के बीएसपी सांसद से दो बार कहा, लेकिन हो नहीं पाया. पुजारी की बात सुनकर प्रधानमंत्री तुरंत दरवाजे की तरफ बढ़े. दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष आदेश गुप्ता को आवाज लगाई. प्रधानमंत्री ने दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष को तुरंत इस समस्या का समाधान कराने के लिए कहा. कुल 17 मिनट प्रधानमंत्री इस मंदिर में रहे. एक तस्वीर दिल्ली से आई तो कई तस्वीरें वाराणसी से भी आईं. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी भी संत रविदास के दर पर मत्था टेकने पहुंचे. लंगर भी छका. और खुद लंगर में खाना परोसते भी नजर आए. पंजाब के सीएम चरणजीत सिंह चन्नी, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और आम आदमी पार्टी की तरफ से सांसद संजय सिंह भी वाराणसी दर्शन के लिए पहुंचे. बीएसपी अध्यक्ष मायावती और सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव की तरफ से भी ट्वीट के जरिए शुभकामनाएं आईं मगर दिनभर चले इस धार्मिक दर्शन के पीछे एक सियासी दर्शन भी था. पंजाब में 32% दलित वोटर हैं. वो भी दो तरह के एक हिंदू दलित, दूसरे सिख दलित. जबकि जट सिख वोटरों की तादात 25% है. मांझा के इलाकों में कई सीटों पर जीत हार तय करते हैं यूपी में भीदलितों की आबादी 21 फीसदी के करीब है. यहां विधानसभा में दलितों के लिए 84 सीट आरक्षित हैं और पिछले चुनावों के नतीजे तो यही कहते हैं कि जो दो तिहाई आरक्षित सीटें जीत लेता है, यूपी में उसी की पूर्ण बहुत सरकार बनती है. और सरकार तो हर कोई बनाना चाहता है. वोटर भी ये बखूबी समझ रहे हैं कि नेताओं के मंदिर दर्शन का मतलब क्या है ? लोगों की माने तो वो कहते हैं नेता वोट के लिए मंदिर आते हैं. दलितों के नाम पर देश में राजनीति तो खूब हो रही है. कोई नया नहीं है. आजादी के बाद से होती आई है. उनका वोट हर कोई चाहता है, मगर उनका आर्थिक और सामाजिक उत्थान कौन करेगा ? ये सवाल आजादी के 75 साल बाद भी बना हुआ है. क्योंकि दलितों की स्थिति इस देश में है क्या ? ये किसी से छिपा नहीं है. मगर फिर दिमागी तस्दीक के लिए कुछ आंकड़े बता देते हैं. आखिरी बार जनगणना 2011 में हुई थी, रिपोर्ट 2015 में आई तो अंतिम आंकड़े भी वही है. 2011 की सेंसेस रिपोर्ट के मुताबिक देश में 20.14 करोड़ दलित हैं. जो देश की कुल आबादी का 16.63% हिस्सा हैं. आबादी में बड़ी भागीदारी है, मगर संसाधनों में भागीदारी कितनी है, Socio Economic and Caste Census, 2011 की रिपोर्ट कहती है दयनीय है. देश का हर तीसरा दलित व्यक्ति आज भी गरीब है 5.83 करोड़ अनुसूचित जाति के लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं. 55% के पास अपनी कोई जमीन नहीं है, मजदूरी कर परिवार का पेट पालते हैं. 83.55 फीसदी दलितों के परिवार में मुख्य कमाने वाले की आय 5000 से कम. कल्पना कीजिए 5000 रुपये एक परिवार के लिए आज की तारीख में क्या होते हैं. सरकारी नौकरी में भागीदारी का आलम तो और बुरा है. सिर्फ 3.95%. राउंड फिगर में कहें तो 4 फीसदी दलितों के पास सरकारी नौकरी है. ये आलम तब है, जब आरक्षण मिलता है. और उस आरक्षण पर अलग-अलग तरह की बहसें हैं. प्राइवेट कंपनियों में भी दलितों की हिस्सेदारी बहुत कम है. सिर्फ 2% के पास प्राइवेट नौकरी है ये स्थिति है इस देश के बड़ी वोटर आबादी की, जिसको लुभाने के लिए चुनाव के वक्त हर पार्टी आगे खड़ी नजर आती है. मगर उनकी दुर्दशा बताते आंकड़ों को सरकार बनने के बाद भी बदल नहीं पाती. दलितों की आर्थिक स्थिति ये है तो सामाजिक स्थिति में बहुत अच्छी नहीं है. कहने को तो छुआ-छूत की प्रथा कब की खत्म हो गई लेकिन एक सामाजिक विभेद आज भी बरकरार है. पंजाब के दलित वोटों पर ज्यादा जोर है. कांग्रेस ने तो पहले दलित सीएम का दांव भी चला है. चुनाव में दलितों के उत्थान के लिए बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं. वोटों की आस के लिए जय रविदास किया जाता है. मगर चुनाव बाद सब भूल जाते हैं. नतीजा ढाक के तीन पात ही रहता है. अनुसूचित जाति के लोगों की आर्थिक और सामाजिक हालत समझ ली. अब कानूनी पहलू पर भी गौर कीजिए. जो सियासी उत्थान के वादे से इतर बढ़ते उत्पीड़न की कहानी बताते हैं. देश में लगातार दलित उत्पीड़न के मामले बढ़ रहे हैं. कभी दूल्हे को घोड़ी से उतार दिया जाता है तो कभी जातीय दंभ में पीटा जाता है. NRCB की रिपोर्ट कहती है कि 2018 के बरस 42747 SC उत्पीड़न के मामले दर्ज हुए. 2019 में मामले और बढ़े. इस बार 45876 केस सामने आए. 2020 में आंकड़ा 50 हजार के पार पहुंच गए. मगर सजा कितनों को मिली. 2018 में 499 मामलों में सजा हुई. कनविक्शन रेट मात्र 1.16%, 2019 में 3583 केस में सजा हुई. सजा की दर 7.8%. 2020 में 2613 SC उत्पीड़न मामलों में सजा हुई. कन्विक्शन रेट मात्र 5.2%. और इनमें हजारों वो मामले थे, जो सालों से चले आ रहे हैं. नए केसों का निपटारा कब होगा, कोई नहीं कह सकता. देश में आज भी 1 लाख 47 हजार से ज्यादा SC उत्पीड़न के मामले कोर्ट में पेंडिग हैं. ना तो धनबल है, ना ही बाहुबल. केस अपनी गति से चलता रहेगा. कई SCST एक्ट के दुरुपयोग के मामले भी सामने आते हैं, मगर उससे ज्यादा मामले तो वो विरोधी पक्ष के डर के मारे दर्ज तक नहीं करा पाते. यूपी और पंजाब में चुनाव है तो वहां की स्पेसफिक बात भी कर लेते हैं. पूरे देश में संख्या के लिहाज से यूपी में दलितों के उत्पीड़न के मामले सबसे ज्यादा हैं. साल 2018 में 11924 मामले सामने आए 2019 में 11829 और 2020 में बढ़कर ये संख्या 12714 एक अच्छी बात बस ये है कि यूपी पुलिस ने 2020 के 84.3% की चार्जशीट दाखिल कर दी. अब पंजाब के भी आंकड़े देख लीजिए. बड़े राज्यों में यहां बाकियों के मुकाबले दलितों का उत्पीड़न कम है. 2018 में 168 मामले सामने आए तो 2019 में 166 और 2020 में 165. मगर यहां की चार्जशीट रेट यूपी से कम है. पंजाब पुलिस 2020 में 65% मामलों में ही चार्जशीट दाखिल कर पाई. ये सारे आंकड़े हम इसलिए बता रहे हैं ताकि जिनके वोटों के लिए नेतानगरी चारों तरफ दौड़ लगा रही है. उनकी भलाई की दिशा में काम हो. क्योंकि दलित सिर्फ वोट बैंक ही नहीं है. इस देश आम नागरिक हैं और उन्हें बाकियों जितना सुविधाएं और संसाधन मिलने का पूरा हक है. उन्हें सिर्फ चुनाव के वक्त नहीं याद किया जाना चाहिए. रविदास जी कहते थे मन चंगा तो कठौती में गंठा. तो प्रतीकों की राजनीति से आगे बढ़कर चंगे मन से इनके लिए काम करना होगा.
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