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कंधार हाईजैक: किस्सा लाल बैग का जिसका सीक्रेट 'दी एंड' के बाद खुला

ये पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह की उस किताब का हिस्सा है जिसमें 1999 के प्लेन हाईजैक की कहानी दर्ज है. 

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ये वो दौर था जब अफ़गानिस्तान में तालिबान की सरकार थी (फोटो सोर्स- getty, आज तक)

‘खतरा वाकई था, इससे इंकार नहीं किया जा सकता था. अगर हवाई जहाज में विस्फोट हो गया तो क्या होगा? इंटेलिजेंस की पुख्ता सूचना थी कि अगर कोई समाधान नहीं हुआ तो हाईजैकर्स खुद के साथ जहाज को हवा में उड़ा देंगे. साल 2000 का स्वागत वो इसी तरह करने वाले थे. 31 दिसंबर की आधी रात को 21वीं सदी की शुरुआत के मौके पर मैं किसी भी कीमत पर, 166 मासूम लोगों और एक बच्चे को (जिनमें से कुछ विदेशी भी थे,) विस्फोट में उड़ा दिए जाने की ज़िम्मेदारी नहीं ले सकता था. पहले तो मैं किसी भी समझौते के खिलाफ था, फिर जैसे-जैसे वक़्त बीता मैं बदलने लगा.’

ये पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह की उस किताब का हिस्सा है जिसमें 1999 के प्लेन हाईजैक की कहानी दर्ज है. आज 24 दिसंबर है. और आज की तारीख़ का संबंध है बीसवीं सदी के आख़िरी हफ्ते की उस कहानी से, जब तीन आतंकियों को छुड़ाने के लिए एक भारतीय हवाई जहाज IC 814 को 7 दिन के लिए हाईजैक कर लिया गया था.

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#हाईजैक-

तारीख 24 दिसंबर 1999. कंधार विमान अपहरण की तारीख़. इस तारीख़ ने तमाम राजनीतिक सवाल खड़े किए थे, तालिबान का चेहरा दुनिया के सामने आया था. देश की फजीहत भी हुई थी. 24 दिसंबर की शाम, दिन शुक्रवार. घड़ी में साढ़े चार बजने वाले थे. काठमांडू के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट से इंडियन एयरलाइंस की फ़्लाइट संख्या आईसी 814 नई दिल्ली के लिए उड़ान भरने को तैयार थी. नेपाल के इस एयरपोर्ट की सुरक्षा व्यवस्था भारत के किसी कस्बे के बस अड्डे जितनी भी नहीं थी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ कुछ ही दिन पहले इसी एयरपोर्ट पर एक विक्षिप्त आदमी थाई एयरवेज़ के एक विमान के कॉकपिट तक पहुंच गया था.
आईसी 814 में कुछ विदेशी यात्रियों सहित कुल 187 पैसेंजर्स और क्रू-मेंबर सवार हुए और फ्लाइंग कमांडर कैप्टन देवीशरण ने इंदिरा गांधी एयरपोर्ट दिल्ली के लिए उड़ान भर दी. कॉकपिट में उनके साथ थे फ्लाइट इंजीनियर अनिल जागिया और को-पायलट राजेंद्र कुमार. शाम करीब पांच बजे जैसे ही आईसी 814 इंडियन एयर स्पेस में दाखिल हुआ. पांच नकाबपोश हथियारबंद लोग प्लेन पर अपना कंट्रोल ले चुके थे. इनमें से एक चीफ़ उर्फ़ इब्राहिम अख्तर पिस्टल लेकर कॉकपिट में घुसा और कैप्टन देवी शरण को गनपॉइंट पर ले लिया, बाकी चार ने यात्रियों को धमकाना और मारना शुरु कर दिया था. देवी शरण ने चीफ़ हाईजैकर से पूछा, आप लोग क्या चाहते हो? जवाब में हुक्म मिला, जहाज को लखनऊ के रास्ते लाहौर ले चलो. कैप्टन देवीशरण ने समझाने की कोशिश की, बताया कि प्लेन में लाहौर तक का तेल नहीं है, जानबूझकर विमान की रफ़्तार भी कम कर दी. लेकिन बदले में जिद और धमकी मिली, जहाज को उड़ा देने की धमकी.
देवीशरण के पास प्लेन का रुख लाहौर की तरफ़ मोड़ने के सिवा कोई रास्ता नहीं था. लेकिन लाहौर की तरफ़ से साफ़ कह दिया गया कि आप पाकिस्तान एयरस्पेस में नहीं घुस सकते. यात्री डरे हुए थे, आगे क्या होने वाला है किसी को कोई अंदाजा नहीं था, बस बार बार प्लेन को उड़ा देने की धमकी दी जा रही थी. अब तक देश को औपचारिक तौर पर कुछ नहीं पता था, शाम 6 बजकर 4 मिनट पर देवी शरण का मैसेज सरकार तक पहुंचा,

प्लेन हाईजैक हो चुका है, और हमारे पास सिर्फ आधे घंटे का फ्यूल बचा है, कृपया हमें लाहौर उतरने की अनुमति दिलाएं, वे हमें मार डालेंगे.’

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अटल की सरकार में तब के सिविल एविएशन मिस्निस्टर शरद यादव ने मीडिया से कहा,

‘वो सब आसमान में हैं, और पायलट के सिवा कोई कम्युनिकेशन नहीं है, आतंकियों के पास AK-47 है या पिस्टल है कुछ भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है.’ मैं कोई अंदाजा नहीं लगा सकता, फ्लाइट में जो यात्री हैं, उनकी सुरक्षा हमारी पहली प्राथमिकता है.’

तत्कालीन एविएशन मिनिस्टर शरद यादव (फोटो सोर्स- आज तक)
तत्कालीन एविएशन मिनिस्टर शरद यादव (फोटो सोर्स- आज तक)

 

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#अमृतसर-

शाम 6:30 पर इस्लामाबाद में भारतीय हाईकमीशन ने विमान को लाहौर में उतारने की अनुमति मांगी, लेकिन इस बार भी साफ़ मना कर दिया गया. लेकिन अब तक देवी शरण हाईजैकर्स को विमान अमृतसर में लैंड कराने के लिए राजी कर चुके थे. प्लेन काफ़ी देर अमृतसर एयरपोर्ट के ऊपर मंडराता रहा और आखिरकार करीब 7 बजकर 1 मिनट पर लैंड हुआ. इधर सरकार चाहती थी कि प्लेन ज्यादा से ज्यादा देर अमृतसर एयरपोर्ट पर खड़ा रहे ताकि कुछ प्लान करने का वक़्त मिल जाए, प्लेन के टायर पंक्चर किए जाने की सोची गई. अमृतसर पुलिस तैनात की गई. आतंकवादी पायलट्स को बार बार टेकऑफ के लिए कह रहे थे और पायलट्स एयर ट्रैफिक कंट्रोल से ईंधन की गुहार लगा रहे थे. लेकिन दिल्ली से निर्देश थे कि प्लेन को किसी भी तरह अमृतसर में खड़ा रखा जाए. इसके बाद ये तय किया गया कि ईंधन का एक टैंकर इस तरह खड़ा कर दिया जाए कि प्लेन को टेकऑफ का रास्ता न मिले. ये टैंकर रवाना हुआ, लेकिन ड्राइवर बहुत तेज़ी से टैंकर ले जा रहा था. एटीसी ने ड्राइवर से ट्रैंकर धीमे करने को कहा. लेकिन ड्राइवर ने ज़ोर से ब्रेक मारा और टैंकर खड़ा ही हो गया. कॉकपिट से आतंकवादियों को ये दिखा कि एक तेज़ रफ्तार ट्रक एयरक्राफ्ट की तरफ आते आते अचानक रुक गया. इसके बाद उन्होंने अनिल जागिया के सिर पर पिस्टल रखकर उल्टी गिनती शुरू कर दी और कैप्टन देवीशरण से टेकऑफ करने को कहा. आख़िरकार बिना फ्यूल लिए जहाज एक बार फिर उड़ान भर चुका था. वक़्त शाम 7 बजकर 50 मिनट. टेकऑफ के वक़्त जहाज की टैंकर से टक्कर होते होते बची थी.
कुछ ही देर बाद जहाज लाहौर के आसमान में था, लाहौर एयरपोर्ट की बत्तियां बुझा दी गई थीं, अनुमति अभी भी नहीं थी. लेकिन कैप्टन देवीशरण के पास कोई रास्ता नहीं था. सिवाय जहाज उतारने के. तेल अब वाकई में कुछ ही मिनट का था. आखिरकार लाहौर ‘एयर ट्रैफिक कंट्रोल’ से परमीशन मिल गई. लेकिन सिर्फ फ्यूल लेने के लिए. रात साढ़े दस बजे आईसी 814 को दोबारा टेक ऑफ करना पड़ा.
जहाज में 25 साल के रुपन कात्याल थे, अपनी पत्नी रचना सहगल के साथ हनीमून से वापस दिल्ली लौट रहे थे. प्लेन हाईजैक होने के कुछ ही घंटे बाद उन्हें चाकुओं के वार करके मार दिया गया. सिर्फ इसलिए कि उन्होंने बाथरूम जाने की परमीशन मांगी थी.
लाहौर से टेक ऑफ करने के बाद विमान काबुल होते हुए मस्कट और फिर ओमान तक गया, लेकिन कहीं लैंड करने की परमीशन नहीं मिली. आखिरकार 25 दिसंबर की सुबह करीब 3 बजे विमान दुबई में लैंड हुआ. यहां ईंधन भरे जाने के एवज में 26 यात्रियों को रिहा करने पर समझौता हुआ. रिहा हुए ज्यादा यात्री बीमार, वृद्ध लोग एवं औरतें और बच्चे थे. यात्रियों को लाने मंत्री शरद यादव खुद उसी दिन दुबई पहुंचे. साथ में रुपन कात्याल का पार्थिव शरीर भी दुबई में उतारा गया.
इसके बाद विमान ने अफगानिस्तान में काबुल की तरफ़ उड़ान भरी. लेकिन काबुल एयरपोर्ट की तरफ़ से विमान को कंधार ले जाने को कहा गया. 26 दिसंबर की ही सुबह करीब 8 बजे विमान कंधार हवाई अड्डे पर लैंड कर चुका था. इसके बाद आईसी 814 विमान पूरे 6 दिनों यात्रियों की जेल बना रहा.  इंडियन एयरलाइंस के विमान को अगवा करने वाले आतंवादियों ने अपनी सुरक्षा की गारंटी के तौर पर एक तालिबान ऑफिसर को भी अपनी हिरासत में रखा था. ऐसा कहा जाता है.

# दिल्ली के हालात-

देश कुछ दिन पहले ही कारगिल युद्ध से उबरा था. विपक्ष और जनता तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहरा रहे थे. ऐसे में दिल्ली में तमाम मुलाकातों और बैठकों का सिलसिला चल रहा था. पत्रकार विजय त्रिवेदी ने अपनी किताब ‘हार नहीं मानूंगा’ में इस सिलसिले का काफी अच्छे से ज़िक्र किया है.
वाजपेयी ने विमान में बंधक बने यात्रियों के रिश्तेदारों को प्रधानमंत्री आवास पर अंदर बुलाने और उन्हें सरकारी कोशिशें बताने के लिए कहा, तब तक समझौते की बातचीत शुरु हो गई थी. उस वक़्त अफ़गानिस्तान में तालिबान सरकार थी. ‘मुल्ला उमर’ और उनके विदेश मंत्री ‘वकील अहमद मुत्तवकिल’ बातचीत कर रहे थे. शुरुआत में बंधक यात्रियों की रिहाई के बदले देश की अलग- अलग जेलों में बंद 36 आतंकवादियों को छोड़ने, एक आतंकवादी सज्जाद अफगानी की लाश सौंपने और 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर की रकम बतौर फिरौती देने की मांग की गई थी. मांग रखने वाला था मौलाना मसूद का छोटा भाई.
इधर दिल्ली में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी का कोई वरिष्ठ मंत्री रिश्तेदारों से मिलने को तैयार नहीं था, तब तत्कालीन विदेश और रक्षा मंत्री जसवंत सिंह आगे आए. कंचन गुप्ता को साथ लेकर जसवंत सिंह पहुंचे तो भीड़ ने घेर लिया, कोई उनकी सुनने को तैयार नहीं था.
तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी और विदेश मंत्री जसवंत सिंह (फोटो साभार- gettyimages)
तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी और विदेश मंत्री जसवंत सिंह (फोटो साभार- gettyimages)


लोग चिल्ला रहे थे–

‘हमें हमारे रिश्तेदार चाहिए. हमें कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसके बदले में क्या देना पड़ेगा. यदि कश्मीर देना है तो दे दो. कुछ भी दे दो, हमारे लोगों को घर वापस लाओ.'

अचानक ‘मेरा बेटा है– मेरा बेटा है’, चीखते चीखते कोई बेहोश होकर गिर पड़ा, कोई चीख रहा था, कोई दहाड़ें मार कर रो रहा था.
विपक्ष भी सरकार पर हमलावर था, भीड़ उन्माद में थी ही. जसवंत सिंह अपनी किताब, A Call to Honour: In Service Of Emergent India में लिखते हैं,

‘आज भी जब मैं याद करता हूं तो मुझे शर्मिंदगी होती है, शुरुआत में तो शायद अचानक ही लेकिन उसके बाद सरकार कों शर्मिन्दा करने की किसी प्रायोजित योजना की तरह राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भीड़ को तैयार किया गया, सडकें ब्लॉक करने, प्रेस ब्रीफिंग को बाधित करने और सड़क पर शर्मनाक तरीके से उन्माद फैलाने के लिए. मुझे अभी भी नहीं पता है कि वो इस अपमानजनक व्यवहार से क्या दिखाना चाह रहे थे. लेकिन ये निश्चित रूप से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नजर में भारत को नीचा दिखाने में सफ़ल रहा.’

अपहरण संकट को निपटाने के लिए कई सख्त और तेज़ तर्रार अफसरों के साथ क्रैक कमांडों का दस्ता चौथे दिन 27 दिसंबर को कंधार एयरपोर्ट पर उतरा. पता चला कि तालिबानी लड़ाके पोजिशन लेकर खड़े हैं. बातचीत के लिए वहां विवेक काटजू, अजीत डोवाल और सीडी सहाय मौजूद थे. काटजू इस ग्रुप की अगुवाई कर रहे थे जो डोवाल से सात-आठ साल जूनियर थे और सीनियर जूनियर का फर्क कई और अफसरों में भी था. क्या इनमें कोई ठीक तालमेल हो सकता था?
हमले की पोजीशन पर तालिबानी थे, समझौते की बातचीत शुरु हुई. तालिबान की तरफ़ से कहा गया कि मौलाना चाहिए. अफसरों को अंदाज़ा ही नहीं था कि मौलाना है कौन? किसकी बात हो रही है. फिर बताया गया -मौलाना मसूद अज़हर,हरकत उल मुजाहिदीन का मुखिया.
मौलाना मसूद अज़हर 1994 से जम्मू जेल में बंद था. उसे 1994 में तब गिरफ्तार किया गया था जब वह अपने संगठन ‘हरकत उल अंसार’ के कुछ अंदरूनी झगड़ों को निपटाने वहां आया था. मसूद अज़हर को छुड़ाने के लिए एक और आतंकवादी संगठन अल-फरान 1995 में खड़ा हो गया था. ‘हरकत–उल-अंसार’ ने फिर अगले साल चार पर्यटकों का अपरहण कर लिया और उन्हें सहारनपुर के एक गांव में छिपा कर रखा. इस अपरहण के पीछे दिमाग था उमर सईद शेख का जो लंदन स्कूल आफ इकनॉमिक्स का छात्र रहा था. जनरल मुशर्रफ ने अपनी किताब ‘लाइन ऑफ फायर’ में लिखा कि ब्रिटिश एमआई 6 ने उमर शेख को तैयार किया था. उमर शेख को पुलिस ने पकड़ लिया और वो तब से दिल्ली की तिहाड़ जेल में था. तीसरा आतंकवादी जिसको छोड़ने की मांग की गई थी वो था मुश्ताक ज़रगर. ज़रगर पर 40 से ज़्यादा हत्याओं का आरोप था. इसमें मारे गए ज़्यादातर लोग कश्मीरी पंडित थे.
समझौता बातचीत में तालिबानी बीच में आए. पांचवां दिन यात्रियों के लिए मुश्किल भरा दिन था. टॉयलेट्स ओवरफ्लो कर रहे थे, चेहरे सिर्फ कहने भर के लिए जिंदा थे, मौत की दहशत गहरे उतर गई थी. दिल्ली में प्रधानमंत्री वाजपेयी के चेहरे पर भी चिंता की लकीरें गहरी होने लगी थी, उऩका दिमाग रास्ता निकालने की उलझन में लगा था.
दिल्ली में उस दिन 28 दिसंबर को शास्त्री भवन में पत्र सूचना कार्यालय में जसवंत सिंह प्रेस कॉ़न्फ्रेंस कर रहे थे. बहुत से रिश्तेदार अचानक घुस आए. वे सभी 35 आतंकवादियों के नाम जानना चाह रहे थे. कोई चीखा,

'जब मुफ्ती मोहम्मद की बेटी रुबइया के लिए आतंकवादियों को छोड़ा गया तो हमारे रिश्तेदारों के लिए क्यों नहीं,जो देना है दे दो, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता.'

कंधार हाईजैक के पहले मुफ़्ती मोहम्मद सईद को गृहमंत्री बने हुए एक हफ़्ता भी नहीं हुआ था जब उनकी बेटी रुबिया सईद को अगवा कर लिया गया था और रुबिया को छुड़ाने के लिए पांच आतंकी छोड़ने पड़े थे (फोटो सोर्स -twitter)
कंधार हाईजैक के पहले मुफ़्ती मोहम्मद सईद को गृहमंत्री बने हुए एक हफ़्ता भी नहीं हुआ था जब उनकी बेटी रुबिया सईद को अगवा कर लिया गया था और रुबिया को छुड़ाने के लिए पांच आतंकी छोड़ने पड़े थे (फोटो सोर्स -twitter)


एक शाम एक सरप्राइज विजिटर प्रधानमंत्री के आवास पर पहुंची, स्कवाड्र्न लीडर अजय आहूजा की पत्नी. आहूजा ने कारगिल युद्ध में अंतिम बलिदान दिया था. उन्होंने बंधक यात्रियों के रिश्तेदारों से कहा कि भारत को अपहरणकर्ताओं के आगे नहीं झुकना चाहिए. भीड़ में कोई चीखा– “वह खुद विधवा है और अब दूसरों को विधवा बनाना चाहती है”. वह कौन होती है भाषण देने वाली? कहां से आई है. जब माहौल ज़्यादा खराब होने लगा तो उन्हें अंदर ले जाया गया. इसी तरह वीरगति को प्राप्त लेफ्टिनेंट विजयंत थापर के पिता कर्नल वीरेन्द्र थापर की अपील भी बेअसर दिख रही थी.
सरकार में बैठकें लगातार हो रही थीं. कंधार से आईबी के मुखिया अजीत डोवाल का फोन था- सर कुछ जल्दी कीजिए. इन का सब्र का बांध टूट रहा है. 28 दिसंबर को डील लगभग हो गई. तीन आतंकवादियों मौलाना मसूद अज़हर, मुश्ताक अहमद ज़रगर और अहमद उमर सईद शेख को छोड़ने पर बात तय हो गई. सीसीएस की बैठकों में प्रधानमंत्री के साथ रक्षा मंत्री, गृह मंत्री, विदेश मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार होते थे. 36 के बजाय तीन आतंकवादियों को छोड़ने का फैसला हुआ था.

#फाइनल डील-

जसवंत सिंह तीनों आतंकवादियों मसूद अजहर, उमर शेख, और मुश्ताक ज़रगर को लेकर खुद कंधार गए, ताकि कोई स्थिति ऐसी बने जिसमें फैसला बदलना हो तो दिल्ली की तरफ़ रुख न करना पड़े.   जसवंत सिंह अपनी किताब में लिखते हैं,

‘मैंने तालिबानियों की सराहना की, उन्होंने जो किया उसके लिए उनका आभार व्यक्त किया, कम से कम उन्होंने समझौते के मुद्दे पर अपहरणकर्ताओं से बातचीत को आगे बढ़ाया था. दो बातों पर सहमति बन चुकी थी, एक कि तीनों आतंकवादियों की पहचान की जायेगी और दूसरा कि उसके बाद सभी बंधक यात्री नीचे उतरेंगे.’

तालिबान का विदेश मंत्री मुत्त्वकिल दाएं (फोटो सोर्स - आज तक)
तालिबान का विदेश मंत्री मुत्त्वकिल दाएं (फोटो सोर्स - आज तक)


तारीख थी 31 दिसंबर यानी आज ही के दिन. पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के लोग उन तीनों आतंकियों के रिश्तेदारों और दोस्तों को लेकर कंधार पहुंचें. उन्होंने तीनों आतंकियों को पहचाना और विमान में मौजूद अपहरणकर्ताओं को बताया गया कि सब ठीक है, हिंदुस्तान ने कोई चाल नहीं चली है. अपहरणकर्ताओं ने हाथ और खुशी के इशारे से यात्रियों को भी बता दिया कि वो कामयाब हुए हैं. इस सूचना के बाद यात्रियों के चेहरे वापस ज़िंदा लगने लगे थे. कुछ देर बाद एक-एक करके विमान से यात्रियों को उतारना शुरू कर दिया गया. किसी को भयंकर चोटें थीं, कोई खून से लथपथ था तो कोई लगातार कई दिनों से भूखा था. लेकिन गनीमत थी कि लोग अब पूरी तरह जिंदा थे.
मसूद अज़हर को छुड़ाने के बाद एयरपोर्ट पर पहले से खड़ी तालिबानी आतंकियों की गाड़ियां रवाना हो गईं बाद की कई आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए
मसूद अज़हर को छुड़ाने के बाद एयरपोर्ट पर पहले से खड़ी तालिबानी आतंकियों की गाड़ियां रवाना हो गईं बाद की कई आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए


जसवंत सिंह की किताब में लिखे मुताबिक,
कंधार में उन्हें पता चला था कि हाईजैकर्स ने विमान में भारत सरकार के लिए 21वीं सदी की शुरुआत के लिए एक गिफ्ट छोड़ा है. जसवंत ने कैप्टन सूरी से कहा कि बेहतर होगा हम विमान को छोड़ दें और लाउन्ज में वापस चलें. असल में ये तोहफा एक लाल बैग था. तालिबानी भी इसी के तलाश में थे. और जब तक ये बैग नहीं मिल गया उन्होंने विमान को वापस जाने की अनुमति नहीं दी. कुछ तालिबानी लोगों ने वो लाल बैग निकाला और एक लाल पजेरो गाड़ी जो कुछ ही देर पहले एयरपोर्ट पर आई थी, उसकी तरफ़ ले गए, गाड़ी के शीशे रंगे हुए थे, अंदर कौन था नहीं पता. बाद में जसवंत सिंह को पता चला कि उस लाल बैग में 5 ग्रेनेड थे.
 

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