आजाद भारत की कुछ सबसे बड़ी घटनाओं से जुड़े थे राजेश्वर 14 जनवरी, 2018 को 91 साल के राजेश्वर गुजर गए. बहुत लंबे वक्त से बीमार चल रहे थे. दिल्ली में एक जगह है- खेल गांव. यहीं घर था उनका. इसी घर में आखिरी सांस ली उन्होंने. जिस दिल्ली में उनकी कहानी खत्म हुई, उसी दिल्ली ने उनकी कहानी बनाई भी थी. 28 अगस्त, 1926 को तमिलनाडु के सालेम में पैदा होने वाला ये शख्स आजाद भारत के कुछ सबसे तंगहाल और उथल-पुथल वाले वाकयों में एक भागीदार बना. इंदिरा का आपातकाल. जनता पार्टी के रूप में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार की पैदाइश. पंजाब में आतंकवाद का उभार. ऑपरेशन ब्लू स्टार. इन सब घटनाओं को जो लोग बेहद करीब से देख रहे थे, उनमें एक जोड़ी आंखें इस शख्स की भी थीं.

राजेश्वर का कहना था कि इंदिरा को मालूम था कि इमर्जेंसी उन्हें बहुत महंगी पड़ सकती है. वो जानती थीं कि उनके खिलाफ माहौल जोर पकड़ रहा है.
इंदिरा से कहा था: इमर्जेंसी खत्म कर दीजिए इमर्जेंसी के जिस वाकये का ऊपर जिक्र किया, वो इंदिरा के लिए न भूलने वाले अनुभवों में से एक था. कुछ ऐसा, जिसका गणित समझने में इंदिरा जैसी खिलाड़ी भी मात खा गईं. बिना इमर्जेंसी लगाए इंदिरा का जो बिगड़ता, उससे कई गुना ज्यादा इमर्जेंसी के बाद बिगड़ रहा था. इंदिरा के खिलाफ हवा बिगड़ रही थी. खुफिया विभाग वालों के जिम्मे ये काम भी होता है. कि सरकार की देखभाल करे. आंख-कान खोले रखे. पता लगाए कि लोगों के बीच सरकार के लिए माहौल कैसा है. तो इस काम के लिए इमर्जेंसी के करीब छह महीने बाद IB ने एक खास टीम बनाई. इसमें राजेश्वर भी थे. ये टीम जनता और विरोधी पार्टियों के मिजाज का थर्मामीटर चेक कर रही थी. इसी के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार की गई. ये रिपोर्ट इंदिरा के लिए चेतावनी थी. राजेश्वर ऐंड टीम ने इंदिरा को आगाह किया कि कंट्रोल उनके हाथ से खिसक रहा है. चेतावनी में सबसे बड़ा अलार्म संजय गांधी की हरकतों पर बजाया गया था. राजेश्वर ने इंदिरा से दो-टूक कहा. कि संजय गांधी की ज्यादतियां बहुत बढ़ गई हैं. ये भी बताया कि संजय की सख्ती मैडम प्राइमिनिस्टर को भारी पड़ सकती हैं. कि इसके कारण जनता में इंदिरा के लिए नाराजगी बढ़ती जा रही है. और ये भी कि उन्हें इमर्जेंसी खत्म कर देनी चाहिए.

टी वी राजेश्वर को जब राज्यपाल बनाया गया, तब कांग्रेस की काफी आलोचना हुई. लोग कह रहे थे कि इंदिरा ने राजेश्वर को उनकी वफादारी का इनाम दिया है. इंदिरा के बाद भी कांग्रेस आलाकमान के साथ राजेश्वर के करीबी रिश्ते रहे.
राजेश्वर की चेतावनी नजरंदाज करना भारी पड़ा इंदिरा को इंदिरा बहुत पकी हुई नेता थीं. उनको पता था कि जनता का माथा कैसे फिरता है. वो जानती थीं कि इमर्जेंसी में क्या-क्या हो रहा है. कहते हैं, आपातकाल हटाना भी चाहती थीं. मगर पुत्रमोह कह लीजिए या कुछ और, इंदिरा ने इस चेतावनी को नजरंदाज कर दिया. इसका खामियाजा भी भुगता उन्होंने. 19 महीने बाद इमर्जेंसी हटी. चुनाव हुए. जनता पार्टी जीतकर सत्ता में आई. इंदिरा के खिलाफ माहौल कितना जबर्दस्त था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाइए कि वो रायबरेली की अपनी पारंपरिक सीट भी नहीं बचा सकीं. 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद जिस इंदिरा गांधी में लोगों को 'दुर्गा' का अवतार दिखता था, वो इंदिरा अब हारी हुई खिलाड़ी थीं. लेकिन जैसे जीत स्थायी नहीं होती, वैसे बुरा वक्त भी टिककर नहीं रुकता. जनता पार्टी पहाड़ की चोटी पर पहुंची तो, लेकिन फिर जल्दी ही ढलान पर लुढ़कने भी लगी. जनता पार्टी के शूरमा नेता आपस में ही एक-दूसरे को लंगड़ी मारने पर तुले थे. मार भी रहे थे. उनके बीच की बंदरबांट जनता को भी दिख रही थी. उन्हें लग रहा था कि जनता पार्टी को चुनकर गलती की. कि इंदिरा जैसी भी हों, बाकी सबसे बेहतर हैं. फिर क्या हुआ? इंदिरा जीतीं और फिर सत्ता में पहुंच गईं.

अपनी किताब 'द क्रूशियर ईयर्स' में राजेश्वर ने कई विवादित चीजें लिखीं. उन्होंने लिखा कि इमर्जेंसी के बाद हुए चुनाव में संघ ने इंदिरा को समर्थन देने कि पेशकश की थी. ऑपरेशन ब्लू स्टार को लेकर भी उन्होंने कई सनसनीखेज बातें लिखीं.
खरी बात कहकर इंदिरा का भरोसा जीत लिया कहावत है कि कोई कड़वी, लेकिन सच्ची बात कहे तो उसको गले से लगाओ. क्योंकि मुरब्बे की उल्टी करने वाले चापलूस आपको गर्त में गिराते हैं. इंदिरा ने भी सबक सीख लिया था. जब दोबारा सत्ता में आईं, तो ठोक-बजाकर चुने लोगों को नियुक्त किया. इनमें सबसे पहला नाम टी वी राजेश्वर का था. इंदिरा ने राजेश्वर को IB का प्रमुख बना दिया. जिस दौर में कोई भी सच बोलने का साहस नहीं करता था, उस दौर में सच्ची बात करके राजेश्वर ने इंदिरा का भरोसा जीत लिया था. 1983 में राजेश्वर रिटायर हो गए. फिर इंदिरा ने उन्हें अरुणाचल प्रदेश का लेफ्टिनेंट गर्वनर बना दिया. किसी संवैधानिक पद पर नियुक्त होने वाले पहले IPS अधिकारी (रिटायर्ड) बन गए राजेश्वर. विरोधियों ने आलोचना की. पूछा, इंदिरा के लिए वफादारी के अलावा ऐसी क्या योग्यता थी उनमें कि राज्यपाल बना दिए गए. आलोचनाओं से न कांग्रेस को फर्क पड़ा, न राजेश्वर को. अरुणाचल के बाद वो उत्तर प्रदेश और सिक्किम के भी राज्यपाल बनाए गए.
2012 में मनमोहन सिंह सरकार ने राजेश्वर को पद्म विभूषण दिया. ये भी शायद एक किस्म का पेबैक ही था. इंदिरा के आखिरी बचे वफादारों में से एक को थमाए गए थैंक्यू जैसा कुछ.

राजनीति में किस्सों के पनपने और बड़े होने की बड़ी उपजाऊ जमीन होती है. ऐसे ही ये भी किस्सा है कि इंदिरा गांधी राजेश्वर की साफ-सीधी बात कहने की मुरीद हो गई थीं.
'इंदिरा और संजय गांधी के समर्थन में था RSS' राजेश्वर का एक और चर्चा भी है वैसे. 2015 में इनकी एक किताब आई- द क्रूसियल ईयर्स. इसी किताब के सिलसिले में उन्होंने इंडिया टुडे को एक इंटरव्यू दिया था. इसमें उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) इमर्जेंसी के समर्थन में था. राजेश्वर के मुताबिक, उस समय के सरसंघचालक बालासाहेब देवरा ने तो इंदिरा गांधी से संपर्क साधने की भी कोशिश की थी. मगर इंदिरा नहीं मिलीं. क्योंकि वो नहीं चाहती थीं कि कोई उन्हें संघ के करीब समझे. कहा तो राजेश्वर ने ये भी कि इमर्जेंसी के बाद हुए चुनाव में संघ इंदिरा के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी को समर्थन देने की पेशकश कर रहा था. मगर इंदिरा ने इसे भी मंजूर नहीं किया. इमर्जेंसी लगाने के छह महीने बाद ही इंदिरा को गलती महसूस हो गई थी और वो इसे खत्म करना चाहती थीं. मगर संजय गांधी इसके खिलाफ थे और इंदिरा बेटे की मुखालफत नहीं कर सकीं.

2015 में आई थी राजेश्वर की किताब. जिन क्रूसियल ईयर्स का उन्होंने जिक्र किया, उनका ज्यादातर हिस्सा इंदिरा गांधी से जुड़ा है.
'इंदिरा रोक सकती थीं ऑपरेशन ब्लू स्टार' राजेश्वर ने अपनी आत्मकथा 'द क्रूसियल ईयर्स' में ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में भी बड़ा सनसनीखेज दावा किया था. उनके मुताबिक, इंदिरा गांधी चाहतीं तो ऑपरेशन ब्लू स्टार टाल सकती थीं. उन्होंने लिखा:
अकाली दल के एक वरिष्ठ नेता ने इंदिरा गांधी के सामने प्रस्ताव रखा था. कि वो पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबार सिंह को कुर्सी छोड़ने के लिए कहें और पंजाब में एक गठबंधन सरकार बनाएं. इस सरकार में मुख्यमंत्री का पद किसी अकाली नेता को दिया जाए. इंदिरा से कहा गया कि ऐसा करने पर जरनैल सिंह भिंडरावाले को किनारे किया जा सकेगा.ऑपरेशन ब्लू स्टार के समय राजेश्वर IB के मुखिया थे. अपनी किताब में राजेश्वर ने लिखा- मैंने चार पन्नों का एक नोट तैयार किया और अकाली दल के इस प्रस्ताव के बारे में इंदिरा गांधी को जानकारी दी. ये भी बताया कि ये प्रस्ताव पूरी गंभीरता से दिया गया है. मगर इंदिरा ने ये ऑफर मंजूर नहीं था. राजेश्वर की कही इस बात पर काफी विवाद हुआ. कइयों ने कहा कि दी गई जानकारी सही नहीं है. ये सच है कि अकाली दल के कुछ सीनियर नेताओं ने इंदिरा गांधी को प्रपोजल भेजा था. रॉ के एक तत्कालीन अधिकारी ने बताया कि इंदिरा ने इस प्रस्ताव पर बात भी की थी, लेकिन बात नहीं पाई. किसकी कही बात सही है, पक्का तो मालूम नहीं. एक बात पक्की है मगर. कि राजेश्वर के जिक्र से इंदिरा का जिक्र जुड़ा है. इंदिरा के बिना उनका शायद कोई जिक्र ही नहीं.
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