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एनडी तिवारी का निधन: यूपी में इनसे विवादित मुख्यमंत्री न जन्मा है और न जन्मेगा

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आज यूपी के उस मुख्यमंत्री के बारे में बताएंगे, जिसका हर काम हमेशा चर्चा में ही रहा. मुख्यमंत्री पद लिया तब भी, फिर रिजाइन किया तब  और रिजाइन करके भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार बने रहे तब भी. बात नारायण दत्त तिवारी की. नाम तो सुना होगा. आज जब भाजपा अपने बूढ़े नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में बहुत पहले से डाल चुकी है, तब 92 साल के इस नेता को अपनी पार्टी में शामिल करने पर उत्साह में है. इनका नाम सुनते ही लोगों के चेहरे पर चुटीली सी लेकिन छद्म मुस्कान आ जाती है. तिवारी ब्लैक एंड वाइट टीवी युग से ट्विटर युग तक पर छाए रहे.


शुरुआती जिंदगीः एनडी तिवारी 18 अक्टूबर, 1925 को नैनीताल के बलूती गांव में पैदा हुए. पिता पूर्णानंद तिवारी वन विभाग में अफसर थे, जिन्होंने असहयोग आंदोलन के दौरान नौकरी छोड़ दी थी. तिवारी हलद्वानी, बरेली और नैनीताल के अलग-अलग स्कूल-कॉलेजों में पढ़े. तिवारी राजनीति में स्वतंत्रता आंदोलन के जरिए आए. ब्रिटिश-विरोधी चिट्ठियां लिखने की वजह से 14 दिसंबर 1942 को अरेस्ट हुए और नैनीताल की उसी जेल में भेजे गए, जहां उनके पिता पहले से बंद थे. 15 महीने बाद रिहा हुए, तो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी पहुंचे, जहां से आगे की पढ़ाई जारी रखी. 1947 में स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष बने. 1945-49 के बीच ऑल इंडिया स्टूडेंट कांग्रेस के सेक्रेटरी रहे.

पर्सनल लाइफः 1954 में सुशीला तिवारी से शादी की. 14 मई, 2014 को उज्ज्वला शर्मा से शादी की, जिनसे लंबे समय से उनका रिश्ता था और जिनके बायोलॉजिकल बेटे रोहित शेखर के वो पिता थे. 1987 में काशी विद्यापीठ यूनिवर्सिटी ने डी.लिट की मानद उपाधि दी थी.

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रोहित शेखर को अपने बेटे के रूप में स्वीकार करते हुए तिवारी. साथ है रोहित की मां.

उज्ज्वला प्रोफेसर शेर सिंह की बेटी थीं, जो जनता पार्टी की सरकार में मंत्री थे. ये वो दौर था 70 के आखिर का, जब कांग्रेस सत्ता से बाहर थी. तब उज्ज्वला को तिवारी से प्यार हुआ था. तब तक तिवारी की शादी हो चुकी थी और उज्ज्वला की भी. बताते हैं कि संतान न होने की वजह से दोनों करीब आ गए थे.

राजनीतिक करियरः आजादी के बाद यूपी में 1952 में हुए पहले इलेक्शन में नैनीताल से जीतकर विधायक बने प्रजा समाजवादी पार्टी के टिकट पर. 1957 में नैनीताल से जीते और असेंबली में विपक्ष के नेता बने. 1963 में कांग्रेस जॉइन की, काशीपुर से विधायक बने और यूपी सरकार में मंत्री बने. 1968 में नेहरू युवा केंद्र की स्थापना की, जो एक वॉलंटरी ऑर्गनाइजेशन है. 1969 से 1971 के बीच इंडियन यूथ कांग्रेस के पहले अध्यक्ष रहे.

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एनडी तिवारी तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री (1976-77, 1985-85, 1988-89) रहे और एक बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री (2002-2007) रहे. 1979 से 1980 के बीच चौधरी चरण सिंह की सरकार में वित्त और संसदीय कार्य मंत्री रहे. 1980 के बाद योजना आयोग के डिप्टी चेयरमैन रहे. 1985-88 में राज्यसभा सांसद रहे. 1985 में उद्योग मंत्री भी रहे. 1986 से 1987 के बीच तिवारी प्रधानमंत्री राजीव गांधी की कैबिनेट में विदेश-मंत्री रहे. 87 से 88 फाइनेंस और कॉमर्स मंत्री भी रहे. 2007 से 2009 के बीच वो आंध्र प्रदेश के गवर्नर रहे, लेकिन एक कथित सेक्स स्कैंडल में फंसने की वजह से उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा. हालांकि, इस्तीफा स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर दिया और देहरादून शिफ्ट हो गए.

90 के दशक की शुरुआत में पीएम पद के दावेदार भी रहे, लेकिन उनकी जगह पीवी नरसिम्हा राव बने. ये वो दौर था, जब ये हाशिए पर पहुंच गए थे. कांग्रेस मुसीबत में थी, जिसकी वजह से इन्हें वापस लाया गया था, लेकिन पीएम न बन पाने का एक बड़ा कारण ये भी था कि अपना संसदीय चुनाव 11,429 वोटों से हार गए थे. 94 में कांग्रेस छोड़कर 95 में खुद की ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (तिवारी) बनाई अर्जुन सिंह के साथ, लेकिन बाद में फिर से सोनिया की कांग्रेस जॉइन कर ली. उम्र का हवाला देते हुए उत्तराखंड का सीएम बनने के दौरान उन्होंने इस्तीफे की पेशकश भी की थी, लेकिन पद बाद में कार्यकाल खत्म होने पर ही छोड़ा था.

विवादों का सिलसिला

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– सेक्स स्कैंडल: ABN आंध्र ज्योति चैनल ने एक वीडियो चलाया था, जिसमें एनडी कथित सेक्स स्कैंडल में फंस गए थे. वीडियो में तिवारी राजभवन में तीन महिलाओं संग लेटे थे. जांच में पता चला कि एक माइनिंग डील टूटने का हिस्सा था वो मामला. तिवारी ने माफी मांगी, लेकिन कहा कि विपक्ष की साजिश, फंसाया गया. आंध्र के अखबारों ने राजभवन को ब्रोथल हाउस नाम दे दिया था.

– पितृत्व मामला: 2008 में रोहित शेखर ने पितृत्व वाद दायर करते हुए दावा किया कि तिवारी उनके जैविक पिता हैं. कोर्ट ने डीएनए टेस्ट का आदेश दिया. दिल्ली हाई कोर्ट में तिवारी के वकील ने कहा था कि उनकी रिपोर्ट सीक्रेट रखी जाए, जिसे खारिज कर दिया गया. डीएनए टेस्ट में पता चला कि तिवारी रोहित के पिता थे. तिवारी ने मीडिया में प्राइवेसी का हवाला देकर कहा कि वो अपनी निजी जिंदगी जैसे जीना चाहें, जी सकते हैं. उनकी प्राइवेसी का ख्याल रखा जाए. मार्च 2014 में रोहित को बेटा माना, उस वक्त रोहित की उम्र 35 साल थी. 14 मई, 2014 को लखनऊ में रोहित की मां उज्ज्वला से शादी की. जब उज्ज्वला से शादी की थी, तब तक बेटा एक हार्ट अटैक झेल चुका था.

उनके 9 किस्से :

– 1991 का जो चुनाव हारे, उसकी बड़ी कसक थी. मानते थे कि दिलीप कुमार के मसले की वजह से हारे थे. कुढ़ते थे कि राव बिना चुनाव लड़े पीएम बन गए. इनकी रैली में दिलीप कुमार प्रचार करने आए थे, लेकिन विरोधियों ने हंगामा कर दिया कि उन्होंने नाम यूसुफ खान से बदलकर दिलीप कुमार क्यों रखा. यही उनके चुनाव की राह में रोड़ा बन गया.

– जितनी एक भारतीय की औसत उम्र है (65 साल), उतना तिवारी राजनीति में सक्रिय रहे. जिस उम्र में खड़े नहीं हो पाते थे और मिक्सी में पिसा खाना खाते थे, उस उम्र में भी राजनीतिक वापसी की. 2002 के बाद से कोई चुनाव नहीं लड़ा था, लेकिन 2012 में कम से कम 7 कैंडिडेट्स को उत्तराखंड में कांग्रेस से चुनाव लड़ाया. रोड शो करके वोट मांगे. हेलिकॉप्टर से घूमे. यूपी में भी उनके प्रचार की डिमांड थी, लेकिन तबीयत खराब थी, तो नहीं आए. उत्तराखंड में प्रचार के दौरान बोले कि जरूरत पड़ी, तो ढाई साल के लिए सीएम बन जाएंगे. ढाई क्यों के सवाल पर बोले कि ढाई के बाद 90 के हो जाएंगे.

– तिवारी राजनीति में कभी अतीत नहीं हुए. कर्नाटक के नेता पॉर्न देखने की वजह से वापसी नहीं कर पाए, लेकिन जिसकी सीडी तक टेलीकास्ट हो गई, तो इतने दिन बरकरार रहा. पीएम पद के बेहद करीब पहुंचे दलित नेता जगजीवन राम बेटे पर लगे स्कैंडल के आरोपों तले दब गए थे, लेकिन तिवारी बैकग्राउंड के दम पर हमेशा वापसी करते रहे. राख में से फिर जल उठना. हालांकि, इसमें रोल पार्टी का भी है. कांग्रेस ने दोबारा प्रचार में उतारकर खुद ही आरोपों को धो दिया.

– तिवारी का दावा 2002 से 2007 के बीच उत्तराखंड का सर्वाधिक विकास हुआ और विरोधी भी ये बात मानते हैं. हां, 2009 के राजभवन कांड को याद नहीं करना चाहते. तिवारी कभी राज्यों के बारे में नहीं, हमेशा देश के बारे में सोचते हैं. इस उम्र में भी अर्थव्यवस्था, ब्लैकबेरी, सैमसंग, सोनी और निकॉन जैसी कंपनियों और दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर भारत के पिछड़ने पर बात करते हैं.

– अप्रैल 2014 में लोकसभा चुनाव से पहले राजनाथ सिंह एनडी से मिलने पहुंचे थे और तिवारी ने उन्हें आशीर्वाद दिया था. 2012 में मुलायम सिंह के लिए प्रेम दिखाया था. अखिलेश के सीएम बनने पर कहा था कि वो राज्य संभालेगा और मुलायम राष्ट्रीय राजनीति में रहेंगे. 2012 में ही जब तिवारी रोहित के पिता घोषित किए गए, तो टीम अन्ना ने चुटकी लेते हुए उन्हें बधाई दी थी.

– 2016 में देहरादून में शहीद स्थल पहुंचने पर तिवारी फूट-फूटकर रो पड़े थे कि राज्य निर्माण में भूमिका निभाने वाले आंदोलनकारियों की सरकार उपेक्षा कर रही है और वो इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे.

– एक किस्सा ये भी है कि 70 के दशक में यूपी के मुख्यमंत्री रहते हुए एनडी तिवारी ने संजय गांधी की चप्पलें उठाई थीं. उस समय कांग्रेस में संजय की तूती बोलती थी और कई कांग्रेसी नेताओं को संजय की चप्पलों के नीचे से ही तरक्की का रास्ता दिखाई देता था.

– वो खुद कांग्रेसी नेताओं की तारीफें करते थे और उन्हें अपनी तारीफें सुनना भी खासा पसंद था. बताते हैं कि तारीफ करने वालों को निहाल किया.

– याद्दाश्त कमजोर थी. नाम भूल जाते थे लोगों के. एक दो लड़कियां-महिलाएं ऐसी थीं, जो उनके ‘आशीर्वाद’ से मंत्री तक बनीं. उत्तराखंड का सीएम रहते हुए का एक किस्सा है कि जिसे सचिव नियुक्त किया, उसे भूल गए. वो अगले दिन फाइलें लेकर आया, तो उसे बिठाया, नाश्ता कराया, घर-परिवार की बातें की. आखिर में पूछा किसी काम से आए थे क्या. उसने फाइलें सामने रख दीं, तो पूछा कि सरकारी फाइलें तुम्हारे पास कैसे? जवाब आया कि आपने ही तो सचिव रखा था. इस वजह से एक आदमी हमेशा उनके पीछे रहता था, जो मिलने वाले के बारे में उन्हें बताता था.


अपने बर्थडे के दिन यानी 18 अक्टूबर, 2018 को एनडी तिवारी नहीं रहे.


वीडियो देखें:

 

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