
सोमप्रभ कभी कविता लिखते थे. इन दिनों भारत के सीमावर्ती जिले में कस्बाई जीवन जी रहे हैं. मन करने पर साइकिल से मीलों नापते हैं और जो दृश्य देखते-दिखाते हैं उन्हें स्मृतियों में संजो लेते हैं. उनके मुताबिक़ दृश्य इतने हैं कि वह कहानी, उपन्यास, कविताओं में अट नहीं सकते. लेकिन जब सबको अच्छा लगता है, तब बार-बार ऐसे दृश्यों को दर्ज करने का अपना उत्साह और बढ़ा पाते हैं. उन्हें लगता है कि इससे सुंदर दृश्यों के न खत्म होने का भ्रम बचा रहता है. या क्या पता कि वह बच भी जाता हो! इस बार की घुमक्कड़ी में दो बहनों से मुठभेड़ हो गई उनकी. जो उन्होंने महसूसा, हम आपके लिए लाए हैं.
दो बहनें
दो बहनें दीवाली पर नैहर लौटीं हैं. नैहर में उनके कोई न बचा है अब. आंगन में भांग उग आई थी. वेदी उखड़ गई थी. जिस पर उनका ब्याह हुआ. जिस पर मचिया रख सर्दियों की धूप वे खाती थीं और मां उसी पर बैठ चावल फटकती थीं. पिता भी नहीं रह गया गए. शरीफे अब भी फल रहे हैं. वे लौटीं कि इस साल आंगन बुहारेंगी. पानी की छींट मारेंगी. घास-पात साफ करेंगी. कीट, पतंगों और सांप का वास हो गया है घर.
सुबेराती ने चूना भिगाते हुए कहा, बहिनी अब के लगवावत है गेरू. लेकिन उन्होंने पिता की तरह चूने और गेरू से ही पुतवाया है घर. डिस्टेंपर से न जाने क्यों चिढ़ थी पिता को. और दीवार के भीतर बनी एक गहरी जगह में शरीफे पकने के लिए रख दिए हैं. जैसे बचपन में रखतीं थी, ढ़ेंपी में चूने लगाकर.
वे शाम बाजार गयीं और लौटीं. बड़ी बहन आगे-आगे और छोटी पीछे. ‘जिज्जी धीम चलव.’ धीमे से कहती हैं छोटी. ‘संझा होत है. दिया-बाती कय समय होयगा.’ बड़ी चिंता से कहती हैं. छोटी बहन को जिज्जी में अम्मा दिखती हैं. वह बड़ी के कंधे पर हाथ रख कर कहती है, जिज्जी तुम अब बिलकुल अम्मा की तरह बोलती हो. जिज्जी तुम्हारे हाथों में मोर पंख, अम्मा के हाथों का मोर पंख है. तेज-तेज चलते हुए वे चिंता में दुहरातीं हैं. ‘जल्दी जल्दी चलव बहिनी. संझा होत है.’ छोटी बहिन देखती है कि जिज्जी की चिंता का रंग शाम का नहीं है, बिलकुल अम्मा के रंग का है. और शाम उनसे दूर नहीं है, आस-पास है.

तस्वीर सोमप्रभ ने खुद खींची है.
(इसमें कस्बे के ऐसे ही परिवारों का समय में बिला जाने का प्रसंग भी अनायास शामिल हो गया है. उनके उजड़ने-बसने की कहानी भी. दीवाली के बाजार में दो ऐसी बहनों को देखा. उम्र तकरीबन पचास और चालीस या पैंतीस. बहुत भला सा दृश्य था. बड़ी सच के दृश्य में भी मोरपंख लिए जा रही थीं. और छोटी पीछे- पीछे. दृश्य का रंग इतना गाढ़ा था कि बहुत ही सजा हुआ बाजार भी फीका लग रहा था. बाहर के दृश्य पर दूसरे रंग के दृश्य आते और गायब होते रहे. भीतर के रास्ते पर दो बहने हाथों में धीमे-धीमे हिलता हुआ मोरपंख लिए चली जा रही थीं.












