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भारतीय नौसेना के दो राजपूतों की कहानी

INS राजपूत को उसका नाम पुराने INS राजपूत से मिला था, जो कि उसी की तरह एक गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर था. और उस राजपूत की कहानी कहीं ज़्यादा रोमांचक और दिलचस्प है.

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भारतीय नौसेना का गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर INS राजपूत (D 51), [1980 - 2021] फ़ाइल फ़ोटो
INS राजपूत (INS Rajput) 21 मई 2021 को सेवानिवृत्त हो गया. भारतीय नौसेना का एक गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर. या सिर्फ डिस्ट्रॉयर. एक डिस्ट्रॉयर का मुख्य काम नौसैनिक बेड़े को सुरक्षा देना होता है. आपने विमानवाहक पोतों की वो तस्वीरें देखी होंगी, जिनमें वो एक बेड़े के साथ चलते हैं. डिस्ट्रॉयर अनिवार्यतः ऐसे बेड़ों में तैनात किए जाते हैं. डिस्ट्रॉयर के क्रू को ये सुनिश्चित करना होता है कि दुश्मन किसी कीमत पर बेड़े के करीब न पहुंचने पाए, ताकि बेड़े के बड़े जहाज़ पूरा ध्यान अपने मिशन पर लगा सकें. और अगर ऐसा हो जाए, तो डिस्ट्रॉयर को दुश्मन और बेड़े के बीच दीवार बनना होता है. इसीलिए डिस्ट्रॉयर फुर्तीले होते हैं. रफ्तार से तो चलते ही हैं, साथ में तेज़ी से दिशा भी बदल सकते हैं. गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर, जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, अपने साथ गाइडेड मिसाइल लेकर चलते हैं. INS राजपूत, भारतीय नौसेना का पहला गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर था. सोवियत संघ से आया 'राजपूत' वैसे INS राजपूत इस जहाज़ का पहला नाम था नहीं. इसका नाम था नदेज़नी. माने उम्मीद. सितंबर 1976 में सोवियत संघ ने इसे निकोलाएव के 61 कम्यूनार्ड्स शिपयार्ड में बनाना शुरू किया था. आज निकोलाएव यूक्रेन में पड़ता है. एक साल में जहाज़ बनकर तैयार हो गया. सोवियत संघ 1960 के दशक से अपने लिए कशिन क्लास के जहाज़ बना रहा था. इसमें कुछ बदलाव किए गए, और भारत की ज़रूरत के मुताबिक एक डिज़ाइन तैयार हुआ. इस डिज़ाइन के मुताबिक बना पहला जहाज़ था नदेज़नी. तीन साल बाद जहाज़ आधिकारिक तौर पर भारतीय नौसेना में शामिल हुआ. तारीख थी - 4 मई 1980. इंद्र कुमार गुजराल उन दिनों सोवियत संघ में भारत के राजदूत होते थे. तो कमीशनिंग उन्हीं के हस्ते हुई. और जहाज़ के पहले सीओ बने कैप्टन गुलाब मोहनलाल हीरानंदानी. भारतीय नौसेना ने अपने नए नवेले जहाज़ को नया नाम दिया - INS राजपूत (D 51).
INS राजपूत के डिज़ाइन वाले चार और डिस्ट्रॉयर सोवियत संघ से भारत आए -
  • INS राणा (D 52)
  • INS रंजीत (D 53)
  • INS रणवीर (D 54)
  • INS रणविजय (D 55)
ये सब 'राजपूत क्लास डिस्ट्रॉयर' कहलाए. INS राजपूत - राजपूत रेजिमेंट INS राजपूत अपनी क्लास का लीड शिप होने के साथ-साथ एक और मामले में पहला था. INS राजपूत के आने के बाद ही पहली बार नौसेना के किसी जहाज़ को सेना की किसी रेजिमेंट के साथ संबद्ध किया गया. INS राजपूत का धागा जोड़ा गया राजपूत रेजिमेंट के साथ. फौज में इसके लिए शब्द है 'अफीलिएशन'. सेना के तीनों अंगों की टुकड़ियों को आपस में 'अफीलिएट' किया जाता है. ताकि वो एक दूसरे को समझें और सीखें. और ये अनुभव लड़ाई के वक्त साथ काम करने में मददगार हो.
INS राजपूत ने कई अभियानों में हिस्सा लिया. 1987 में भारत ने श्रीलंका में शांति सेना भेजी तो नौसेना ने ऑपरेशन अमन शुरू किया. इस ऑपरेशन का मकसद था श्रीलंका में तैनात फौज की मदद करना. श्रीलंका में बखेड़ा चल ही रहा था कि नवंबर 1988 में तमिल उग्रवादियों ने मालदीव की राजधानी को अपने कब्ज़े में ले लिया. राष्ट्रपति गयूम की अपील पर भारत ने ऑपरेशन कैक्टस के तहत मालदीव में पैराट्रूपर उतार दिए. ये सेना के जवान थे, जिन्हें वायुसेना के जहाज़ ले गए थे. इतना हम सब जानते हैं. लेकिन इस ऑपरेशन में नौसेना ने भी हिस्सा लिया था. और जिन जहाज़ों को नौसेना ने तैनात किया था, उनमें से एक था - INS राजपूत.
चूंकि राजपूत गाइडेड मिसाइल चला सकता था, तो ये भारत के मिसाइल प्रोग्राम का हिस्सा भी बना. पृथ्वी मिसाइल का नौसैनिक संस्करण है धनुष. इसे कई बार INS राजपूत से टेस्ट फायर किया गया है. टेस्ट फायर की जानकारी मिसाइल को और बेहतर बनाने में इस्तेमाल की जाती है. राजपूत से ब्रह्मोस मिसाइल के नौसैनिक संस्करण को भी टेस्ट फायर किया गया है.
INS राजपूत का नारा था - राज करेगा राजपूत. और राजपूत ने राज किया, पूरे 41 साल. राजपूत से पहले का राजपूत नौसेना में युद्धपोतों के नाम बरकरार रखने की परंपरा है. जहाज़ पुराने होकर कबाड़ बन जाते हैं, लेकिन उनका नाम ज़िंदा रहता है. जैसे भारत का पहला विमानवाहक पोत था INS विक्रांत. ये 1961 से लेकर 1997 तक सेवा में रहा. अब भारत ने पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत बनाया है, तो उसका नाम भी INS विक्रांत ही है. इसी तरह INS कलवरी एक पनडुब्बी थी, जो 1967 से 1996 तक सेवा में रही. 2017 में पहली स्कॉरपीन क्लास पनडुब्बी नौसेना में शामिल हुई, तो उसे भी INS कलवरी ही कहा गया. नौसेना इस तरह अपने अतीत पर गौरव भी करती है, अपने जहाज़ों की याद को ज़िंदा भी रखती है.
तो क्या राजपूत से पहले भी कोई राजपूत था? जवाब है, हां. INS राजपूत को उसका नाम पुराने INS राजपूत से मिला था, जो कि उसी की तरह एक डिस्ट्रॉयर था. और उस राजपूत की कहानी कहीं ज़्यादा रोमांचक और दिलचस्प है.
हुआ यूं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मित्र देशों को जहाज़ों, तोपों और तमाम दूसरे सैनिक साज़ो-सामान की उतनी ज़रूरत नहीं रह गई. तो लड़ाई के दौरान हुए खर्च की भरपाई के लिए हथियारों की बिक्री शुरू हुई. थर्ड वर्ल्ड कहलाने वाले कई देशों के पास उस दौर में इसी तरह हथियार पहुंचे. भारत उन दिनों नया-नया आज़ाद हुआ था. उसे अपनी नौसेना के लिए एक डिस्ट्रॉयर चाहिए था. सो 1948 में भारत ने ब्रिटेन से HMS रोदरहैम (D 141) को खरीदा. 1949 में HMS रोदरहैम आधिकारिक तौर पर भारतीय नौसेना में शामिल हुआ. इसे नाम मिला - INS राजपूत.
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