
यह लेख दी लल्लनटॉप के लिये हिमांशु सिंह ने लिखा है. हिमांशु दिल्ली में रहते हैं और सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी हैं और प्रतिष्ठित करेंट अफेयर्स टुडे पत्रिका में वरिष्ठ संपादक रह चुके हैं. समसामयिक मुद्दों के साथ-साथ विविध विषयों पर स्वतंत्र लेखन करते हैं.
हमारा दौर लिव इन रिलेशनशिप और एसिड अटैक जैसी चीजों का दौर है जब प्रेमिकाएं प्रेमियों पर बलात्कार के झूठे आरोप लगा रही हैं और प्रेमी चोरी-छिपे प्रेमिकाओं के अंतरंग पलों का MMS बना रहे हैं. IAS अधिकारी पारिवारिक कलह और प्रेम के अभाव में आत्महत्याएं कर रहे हैं और रिलेशनशिप्स में सेक्स, झूठ और हिंसा से लेकर लालच, दिखावा, जलन और महत्त्वाकांक्षा तक सब कुछ थोक भाव में मौजूद है. प्रेम संबंधों में अगर कुछ नहीं बचा है तो वो है प्रेम.
पर चीजें हमेशा इतनी बुरी नहीं थीं. लोग एक इंसान को प्रेम करते हुए जीवन गुजार दिया करते थे. तब लोग बाकायदा इश्क़ करते थे और जानबूझकर खुद को तबाह कर लेते थे. तब इश्क़ खास हुआ करता था. मैं ऐसे ही एक इंसान को जानता हूं. उसका नाम जावेद खान था. 1857 में जब हिंद का आवाम ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लामबंद था , सिपाही जावेद खान एक साथ इश्क़ और जंग दोनों मोर्चों पर लड़ रहा था. जाहिर है बात उतनी सीधी नहीं थी. पर जावेद तो जावेद था. जिद्दी और जुनूनी.

फिल्म जुनून का पोस्टर.
जावेद खान का अंत उसी दिन तय हो गया था जिस दिन उसने उस अंग्रेजन रूथ को देखा था. वो खानदानी आदमी था, शादीशुदा था, पर लुच्चों की तरह रूथ के बंगले के इर्द-गिर्द मंडराता रहता था. दीन-ईमान वाला आदमी था, वतनपरस्ती सिर चढ़के बोलती थी उसके. पर दुश्मन गोरों की बेटी से इश्क़ हुआ उसे. पूरी उम्मीद थी कि रूथ का अफसर बाप जावेद को सूली चढ़वा देता. पूरी उम्मीद थी कि गिरिजाघर में बागी सिपाहियों के खून-खराबे से बची रूथ और उसकी मां को पनाह देने के बदले बागी सिपाही उसे अपना साथी होने पर भी मार डालते. पर जावेद डरा नहीं. साल भर रूथ को निकाह के लिये मनाया. जबरदस्ती की धमकी दी. पर छुआ नहीं. रूथ की मां ने शर्त रख दी थी .....
दिल्ली तुम्हारी तो रूथ तुम्हारी, नहीं तो कुछ नहींबागी सिपाही दिल्ली हार चुके थे. फिरंगी फौजें शहर में दाखिल हो रही थीं. लोग देहातों की ओर भाग रहे थे. और जावेद.... जावेद को बस एक बार रूथ को देखना था. मौत ऐसे ही तो आती है न! दुनिया फिरंगी फौजों से दूर भाग रही थी , जावेद उनकी जानिब; और पैदल नहीं ..... घोड़े पर. खैर ..... जावेद उस गिरिजाघर पहुंच गया जहां रूथ और उसकी मां छिपकर फिरंगी सेना का इन्तजार कर रहे थे. जावेद दरवाजे पर गिड़गिड़ाया. बस एक बार देखना था रूथ को. रूथ की मां ने दरवाजा खोला. झिड़की दी. जान बचाकर भागने को कहा और दरवाजा बंद कर लिया. जावेद जाने को मुड़ा ही था कि उसकी रूथ दरवाजा खोलकर बाहर आई. पहली बार पूरी शिद्दत से "जावेद" पुकारा. ये उसकी 'हाँ' थी. और जावेद.... उसने नज़र भर देखा उसको. चेहरे पर मुहब्बत छोड़ सारे ज़ज़्बात एक ही बार में आ गए.
मैं जावेद के चेहरे पर ढूंढता रहा. हैरानी, गुस्सा, तकलीफ सब कुछ दिखा पर मुहब्बत की एक झलक तक नहीं दिखी. जावेद मुड़ा और चला गया. जैसा कि तय था, मारा गया. और रूथ ..... वो इसके पचपन साल बाद अपने वतन इंग्लैंड में मरी. अविवाहित. मैं आज भी सोचता हूं कि जावेद रूथ की 'हां' के बाद भी उसे क्यों छोड़ आया?
ये समझने में दरअसल मुझे काफी ज्यादा वक़्त लग गया कि जावेद का जुनून दरअसल रूथ का प्रेम पाने के लिये था, जो उसने पा भी लिया. मसला सिर्फ देह का ही नहीं था. मैं ऐसा कतई नहीं कह रहा कि हालात अच्छे होने पर भी जावेद रूथ की रजामंदी के बाद उससे दूर हो जाता. वो जरूर निकाह करता उससे. उसे रूथ से अपनी औलाद भी तो चाहिये थी! पर वो हालात से वाकिफ था. जानता था अब उन दोनों का भविष्य साथ नहीं है. तो जावेद रूथ को छोड़ गया. और रूथ! अब इश्क़ और जुनून को जीने की बारी उसकी थी. और उसने जिया भी.
(श्याम बेनेगल की फिल्म 'जुनून' से , जो रस्किन बॉण्ड के novella 'अ फ्लाइट ऑफ़ पिजन्स' पर आधारित है. 'जुनून' के लिये श्याम बेनेगल को 1979 में 24वाँ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिया गया था.)
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