चलो तुमको बचपन की सैर करा लाएं. हम एकदम सुबह से भावुक हो जाते थे. जैसे ही मम्मी कहतीं "नहाओ-खाओ-स्कूल जाओ." अनवरत आंसू झरते थे. वहां इतने मारू मास्टरों के बीच में दिन भर ऐसे रहना होता था जैसे बत्तीसी के बीच में जीभ. वहां जाकर कोई टीचर होमवर्क दिखाने को कहता. फिर हमारी तरफ लकड़ी का वेल फर्निश्ड पटरा लेकर बढ़ता. उसका पहला कदम उठने से पहले हम भावुक हो जाते थे. लेकिन तब दुनिया ऐसी नहीं थी बंधु. या शायद हमारे सामने कैमरा नहीं था. एक उम्र हमारी भावुकता को हमारा काहिलपना, कांइयांपन, नकारापन और ऐसे ही न जाने कितने पन समझा जाता रहा. किसी ने हमारी भावुकता को वैसे हाथोंहाथ नहीं लिया जैसे पीएम को लिया जाता है.बालपने से युवा हुए. युवा, इस देश का युवा यूज होने का दूसरा नाम है. अगर वो गर्लफ्रेंड के पापा से पैसे लेकर सिलेंडर वाली लाइन में खड़ा होने नहीं जाता तो उसे पॉलिटिकल पार्टियां यूज करती हैं. छोटे से बड़े लेवल तक. छोटी पहुंच वाले युवा पार्टी के छोटे नेता से 10 रुपए का पेट्रोल डलाकर दिन भर रैली करता है. बड़ा युवा माइक थामकर भावुक बयान देता है. इस लेक्चर के लिए माफी चाहता हूं लेकिन भूमिका तो बांधनी पड़ती है न. तो भावुकता ने युवावस्था में भी हमारा साथ नहीं छोड़ा. जब लड़की ने हमारी भावनाओं को रिजेक्ट किया तो एक दिन दारू पीकर घर आ गया. तब पता चला पापा तो बुजुर्ग हैं, लेकिन वो भी भावुक होते हैं. और वो भावुक होकर रोते नहीं हैं. वो भावुक होते हैं तो जूता हाथ में ले लेते हैं. और फिर मम्मी भावुक हो जाती हैं. हां मम्मी भावुक होकर रोती हैं. मम्मी रो रोकर कहती जाती हैं "रहने दो. छोड़ दो. अब मार ही डालोगे क्या इसको?" इससे अंदाजा तो लग ही गया होगा कि हम खानदानी भावुक हैं. घर में सब भावुक हैं. लेकिन जब गांव-घर के बाहर कदम रखा तो पता चला कि हम अकेले भावुक लोग नहीं हैं. भावुकता ऐसे हर शख्स की आंखों से चू रही है जैसे बरसात में कच्चा घर चू रहा होता है. आज जब टीवी पर पीएम को भावुक होते देखा तो आंसू पोंछते हुए हम भी घर से निकले. सारा देश भावुक है जी.
घर से निकलते ही मौसमी का जूस बेचने वाला मिला. वैसे उसके ठेले पर सुबह से भीड़ रहती थी. आज सिर्फ भावुकता खड़ी है. वो आंसू नहीं ला सकता आंखों में. सोच लेता है कि "मेरे अकेले का दुख तो है नहीं. सब लोग तो नहीं रो रहे." अगर वो टीवी देख रहा होता तो उसको पता चलता कि नहीं, कुछ लोग भावुक होकर आंसू भी बहाते हैं. लाइनों में लगे लोग भावुक हैं. पीएम के फैसले से आधे खुश हैं. कहते हैं कि "नोटबंदी का फैसला अच्छा था, बस तैयारी में कच्चा था." लेकिन उनकी भावुकता का कोई खास मोल नहीं है. क्योंकि वो लाइन में हैं. ऑनलाइन नहीं. अगर वो ऑनलाइन होते तो वो ऐप पर जाकर सर्वे में हिस्सा ले सकते थे. और आधा खुश होने की बजाय 93 परसेंट खुश हो सकते थे. इस हिसाब से उसी की भावुकता वेरीफाइड है जो ऑनलाइन है. जो लाइन में है, उसे तो रोने का भी हक नहीं.
भाईसाब भावुक तो पूरा देश है हमारा. एक खोजोगे हजार मिलेंगे. "जा सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी" वाला सीन देखकर भावुक हो जाते हैं हम. फिल्मों के आखिर में जब सब अच्छा हो जाता है तो भावुक होते हैं. लाल बत्ती पर कंधे पर मरियल सा बच्चा चिपकाए भिखारन को देखकर भी भावुक होते हैं. अगर कोई गाड़ी ज्यादा स्पीड पोंकती बगल से निकल जाए तो भावुक होकर गरिया देते हैं. लेकिन इस भावुकता में वो बात नहीं है. इस भावुकता की कोई औकात नहीं है. पहले भावुक होने की योग्यता अर्जित करो. फिर तुम्हारे रोने पर तुमको डिफेंड करने के लिए पीछे भारी भीड़ खड़ी होगी. ये भी पढ़ें: शादी के लिए पैसे निकालना चाहते हो तो तैयार रहो इन शर्तों के लिए! दुनिया को एक करना है तो नोट फूंक दो, सिक्के गला दो















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