भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के विक्रम लैंडर की एक छोटी सी छलांग ने चांद की मिट्टी से जुड़ा बड़ा अपडेट दिया है. चंद्रयान-3 मिशन से पता चला है कि चांद की सतह एक समान धूल का ढेर नहीं है, बल्कि दो अलग-अलग परतें हैं. बिल्कुल किसी केक की तरह. मतलब ऊपरी परत सिर्फ कुछ सेंटीमीटर मोटी है, जबकि उसके नीचे की परत ज्यादा सख्त और घनी है, जिसके थर्मल और मैकेनिकल प्रॉपर्टी बिल्कुल अलग हैं.
ISRO के विक्रम लैंडर की छोटी छलांग का बड़ा कमाल, चांद पर वो मिला जो आजतक नहीं दिखा था
Chandrayaan 3 moon surface two layer update: विक्रम लैंडर में अब भी कुछ फ्यूल बचा था. जिसका इस्तेमाल इंजीनियरों ने 'हॉप एक्सपेरिमेंट' (छलांग लगाना) के लिए किया. इंजीनियरों ने चांद की सतह से एक नियंत्रित उड़ान भरने की कोशिश करने का फैसला किया.


चंद्रयान-3 के विक्रम ने 23 अगस्त 2023 को चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास सफल लैंडिंग की थी. इसे 14 दिनों तक काम करने के लिए तैयार किया गया था. लैंडर में लगे 'चंद्र सरफेस थर्मोफिजिकल एक्सपेरिमेंट' (ChaSTE) जैसे उपकरणों ने चांद की मिट्टी (लूनर रेगोलिथ) के थर्मल और फिजिकल प्रोपर्टीज की जांच शुरू की. जैसे-जैसे दिन बीतते गए, वैसे-वैसे लंबी व बेहद ठंडी चांद की रात करीब आ रही थी. ऐसे में 4 सितंबर 2023 को चंद्रमा की रात से बचने के लिए हाइबरनेशन में जाने से ठीक पहले लैंडर से एक छोटी छलांग लगवाई गई.
बचे फ्यूल से 'हॉप एक्सपेरिमेंट'NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, विक्रम लैंडर में अब भी कुछ फ्यूल बचा था. जिसका इस्तेमाल इंजीनियरों ने 'हॉप एक्सपेरिमेंट' (छलांग लगाना) के लिए किया. इंजीनियरों ने चांद की सतह से एक नियंत्रित उड़ान भरने की कोशिश करने का फैसला किया. जिसमें लैंडर ने अपना इंजन चालू किया, खुद को लगभग 40 से 50 सेंटीमीटर ऊपर उठाया और अपनी मूल जगह से थोड़ी दूर पर फिर उतर गया.
इंजन चालू करने से निकली गैसों ने सतह की ऊपरी ढीली रेगोलिथ परत (मिट्टी) को उड़ा दिया, जिससे 3 सेंटीमीटर गहराई तक की परत हट गई. इससे नीचे की परत तक पहुंच मिली, जो पहले कभी भी सीधे तौर पर दुनिया के सामने नहीं आई थी. इस तरह इस ‘हॉप एक्सपेरिमेंट’ ने वैज्ञानिकों को दो अलग-अलग गुणों वाली परतों से अवगत कराया.

दोनों परतों के बीच अंतर
ऊपरी परत: सिर्फ 3-4 सेंटीमीटर मोटी, बहुत ढीली और हल्की धूल.
नीचे की परत: 6.5 सेंटीमीटर की गहराई पर यह परत ऊपरी परत से दोगुनी घनी और पांच गुना ज्यादा चिपकने वाली पाई गई.
आजतक की रिपोर्ट में बताया गया कि फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) अहमदाबाद के वैज्ञानिकों ने डेटा की जांच में पाया कि चांद की सतह पर लगातार छोटे-छोटे उल्कापिंडों के टकराने से ऊपरी परत बारीक और ढीली हो गई है.
क्यों अहम है मिट्टी की खोज?
कहा जा रहा है कि चांद की सतह की ये नई खोज NASA के आर्टेमिस मिशन और चांद की सतह पर एक स्थायी बेस बनाने के लिए उपयोगी साबित हो सकती है. इस डेटा से वैज्ञानिकों को फ्यूचर में चांद पर निर्माण कार्य करने, उपकरण लगाने और मानव बस्ती बसाने की योजना में मदद मिल सकती है.
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