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अमेरिका में खाने के लाले और रेंट का टेंशन! कंगाल हो रहा है दुनिया का सबसे अमीर देश?

AOC vs Trump: अमेरिकी सेंसस ब्यूरो के मुताबिक, साल 2024-25 के दौरान अमेरिका में लगभग 11 से 12 परसेंट आबादी गरीबी रेखा के नीचे थी. सुनने में यह छोटा लग सकता है, लेकिन अगर संख्या में देखें तो यह करीब 4 करोड़ लोग होते हैं.

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क्या कंगाल हो रहा है दुनिया का सबसे अमीर देश? (फोटो- AFP)

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो और कुछ बयान जमकर वायरल हो रहे हैं. अमेरिकी सांसद एलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज (AOC) ने सीधे डॉनल्ड ट्रंप (Donald Trump) प्रशासन पर हमला बोला है. उन्होंने कहा है कि एक तरफ वाइट हाउस के नए बॉलरूम और नेशनल मॉल के सौंदर्यीकरण पर करोड़ों डॉलर बहाए जा रहे हैं, और दूसरी तरफ आम अमेरिकी के पास अपनी ईएमआई (Mortgage) भरने, घर का किराया देने और यहां तक कि पेट भर खाना खाने के पैसे नहीं बचे हैं.

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यह सुनकर थोड़ा अजीब लगता है ना? वही अमेरिका जिसे हम 'सपनों का देश' कहते हैं, जहां जाने के लिए लोग अपनी जमीन-जायदाद बेच देते हैं, क्या वहां वाकई लोग दाने-दाने को मोहताज हैं? क्या सुपरपावर की चमक के पीछे अंधेरा गहरा गया है? आज के इस मेगा एक्सप्लेनर में हम आंकड़ों की खाल उधेड़ेंगे और समझेंगे कि क्या अमेरिका वाकई आर्थिक इमरजेंसी के मुहाने पर खड़ा है. हम बेरोजगारी, गरीबी, होमलेसनेस और अमीर-गरीब के बीच की उस खाई की बात करेंगे जो अब खाई नहीं, समंदर बन चुकी है.

आगे बढ़ने से पहले आप खुद सुन लीजिए कि अमेरिकी सांसद एलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज (AOC) ने आखिर कहा क्या,

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क्या है पूरा मामला और AOC के गुस्से की वजह

मामला शुरू होता है वाइट हाउस के उन खर्चों से जो विलासिता (Luxury) की कैटेगरी में आते हैं. ट्रंप प्रशासन ने नेशनल मॉल के रिफ्लेक्टिंग पूल और वाइट हाउस में एक भव्य बॉलरूम बनाने की योजना पेश की. विपक्ष की फायरब्रांड नेता AOC ने इसे 'आम जनता का अपमान' करार दिया. उनका तर्क सीधा है,

जब देश का मिडिल क्लास और गरीब तबका महंगाई की चक्की में पिस रहा हो, तब सरकार का झूमर और पूल पर पैसा खर्च करना संवेदनहीनता है.

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लेकिन क्या यह सिर्फ राजनीति है? नहीं. ‘फॉक्स न्यूज’ के मुताबिक आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि अमेरिका में रहने की लागत (Cost of Living) पिछले कुछ सालों में रॉकेट की रफ्तार से बढ़ी है. रेंट की कीमतें आसमान छू रही हैं और राशन की दुकानों पर मिलने वाले सामान की कीमतें आम आदमी के बजट से बाहर हो गई हैं. अमेरिका में 'फूड इनसिक्योरिटी' यानी खाद्य असुरक्षा एक ऐसी सच्चाई है जिसे अक्सर हेडलाइंस में जगह नहीं मिलती.

अमेरिका में गरीबी का असली चेहरा, सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं

अमेरिका में गरीबी को मापने का तरीका थोड़ा अलग है. वहां एक 'पावर्टी थ्रेशोल्ड' तय है. अमेरिकी सेंसस ब्यूरो के मुताबिक, साल 2024-25 के दौरान अमेरिका में गरीबी दर में उछाल देखा गया है. आधिकारिक आंकड़ों की मानें तो लगभग 11 से 12 परसेंट आबादी गरीबी रेखा के नीचे है. सुनने में यह छोटा लग सकता है, लेकिन अगर संख्या में देखें तो यह करीब 4 करोड़ लोग होते हैं.

दिक्कत यह है कि अमेरिका में 'वर्किंग पुअर' (Working Poor) की एक बड़ी जमात तैयार हो गई है. ये वो लोग हैं जो दिन-रात काम तो करते हैं, लेकिन उनकी सैलरी इतनी कम है कि वे गरीबी के जाल से बाहर नहीं निकल पा रहे. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिका का 'पवर्टी मेजरमेंट' पुराना हो चुका है क्योंकि यह आज के रेंट और हेल्थकेयर खर्चों को सही से नहीं जोड़ता. अगर इन खर्चों को जोड़ा जाए, तो गरीबी का आंकड़ा कहीं ज्यादा भयावह नजर आता है.

खाने के लाले, क्यों भूखा सो रहा है अमेरिका?

AOC का यह कहना कि 'लोग खुद को खिला नहीं पा रहे हैं' (People can’t feed themselves), कोई अतिशयोक्ति नहीं है. यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर (USDA) की रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका में हर 8 में से 1 परिवार खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहा है. इसका मतलब है कि उनके पास इतना पैसा नहीं है कि वे महीने भर के लिए पौष्टिक भोजन खरीद सकें.

अमेरिका में 'फूड स्टैम्प' (SNAP) नाम की एक योजना चलती है, जिससे करोड़ों लोग जुड़े हैं. लेकिन महंगाई इतनी बढ़ गई है कि फूड स्टैम्प की राशि महीने के बीच में ही खत्म हो जाती है. वहां 'फूड बैंक्स' के बाहर लंबी कतारें दिखना अब आम बात हो गई है. मिडिल क्लास परिवार जो पहले अच्छी ग्रॉसरी खरीदते थे, अब वे सस्ते और कम पौष्टिक विकल्पों पर शिफ्ट हो रहे हैं क्योंकि अंडे, दूध और मीट की कीमतें 20 से 30 परसेंट तक बढ़ गई हैं.

रेंट और ईएमआई का संकट, सिर पर छत रहना भी हुआ मुश्किल

नेशनल लो इनकम हाउसिंग कोएलिशन (Nation Low Income Housing Coalition) यानी NLIHC के मुताबिक अमेरिका में घर खरीदना तो दूर, अब किराया देना भी एक लग्जरी बनता जा रहा है. 

टेक्सस में रहने वाले भारतीय मूल के अमेरिकी आर्थिक एक्सपर्ट्स अमन अरोड़ा कहते हैं कि 

अगर आप अपनी इनकम का 30 परसेंट से ज्यादा रेंट में दे रहे हैं, तो आप 'रेंट बर्डन' में हैं. अमेरिका में लगभग आधे किराएदार इस कैटेगरी में हैं. न्यूयॉर्क, सैन फ्रांसिस्को और लॉस एंजिल्स जैसे शहरों में तो हालात ये हैं कि लोग अपनी सैलरी का 50 से 60 परसेंट हिस्सा सिर्फ रेंट में दे देते हैं.

जब रेंट इतना ज्यादा होगा, तो खाने और हेल्थकेयर के लिए पैसा कहां से बचेगा? यही वजह है कि 'एविक्शन' (Eviction) यानी घर से निकाले जाने के मामले बढ़ रहे हैं. कोर्ट में हजारों केस पेंडिंग हैं जहां मकान मालिकों ने किराया न दे पाने के कारण किरायेदारों को बाहर निकालने की अर्जी दी है. मोर्टगेज यानी होम लोन की किस्तें (EMI) भी ब्याज दरें बढ़ने के कारण महंगी हो गई हैं, जिससे जो लोग घर खरीद चुके थे, वे भी अब उसे खोने के डर में जी रहे हैं.

सड़कों पर सोता 'सुपरपावर'

अमेरिका की सड़कों पर घूमते हुए आपको जो सबसे डरावनी चीज दिखेगी, वो है 'टेंट सिटीज'. वाशिंगटन डीसी से लेकर कैलिफोर्निया तक, पार्कों और फुटपाथों पर हजारों लोग तंबू लगाकर रह रहे हैं. अमेरिका के ‘ऑफिस ऑफ पॉलिसी डेवलपमेंट एंड रिसर्च’ के आंकड़ों की माने तो देश में होमलेस लोगों की संख्या 6 लाख के पार पहुंच गई है. इसमें सिर्फ नशे के आदी या बेरोजगार लोग नहीं हैं, बल्कि ऐसे लोग भी हैं जिनके पास नौकरी है लेकिन घर का किराया देने की औकात नहीं है.

होमलेसनेस बढ़ने का सबसे बड़ा कारण है 'अफोर्डेबल हाउसिंग' की कमी. सरकार ने नए घर बनाने पर उतना ध्यान नहीं दिया जितना जरूरी था. इसके अलावा, मेंटल हेल्थ और इलाज का महंगा होना भी लोगों को सड़कों पर ले आता है. जब एक इंसान बीमार पड़ता है और उसके पास इंश्योरेंस नहीं होता, तो अस्पताल का बिल उसे पूरी तरह कंगाल कर देता है और अंततः वह सड़क पर आ जाता है.

बेरोजगारी और अंडर-एम्प्लॉयमेंट का खेल

कागजों पर अमेरिका में बेरोजगारी दर कम दिख सकती है, लेकिन इसके पीछे की कहानी 'अंडर-एम्प्लॉयमेंट' की है. लोग एक के बजाय दो-दो, तीन-तीन नौकरियां (Gig Economy) कर रहे हैं ताकि अपना खर्च चला सकें. उबेर चलाना, डिलीवरी बॉय का काम करना या पार्ट-टाइम वेट्रेस बनना मजबूरी बन गया है.

इन नौकरियों में न तो हेल्थ इंश्योरेंस मिलता है और न ही रिटायरमेंट के फायदे. जब सरकार कहती है कि बेरोजगारी कम है, तो वह यह नहीं बताती कि जो नौकरियां मिली हैं, क्या उनसे घर का खर्च चल रहा है? 'लिविंग वेज' और 'मिनिमम वेज' के बीच का फासला बहुत बढ़ गया है. ‘यूएस ब्यूरो ऑफ लेबर स्टेटिक्स’ के मुताबिक मिनिमम वेज कई राज्यों में अभी भी 7 से 10 डॉलर के आसपास है, जबकि महंगाई के हिसाब से जीने के लिए कम से कम 20 से 25 डॉलर प्रति घंटा चाहिए.

प्रति व्यक्ति आय बनाम बढ़ती महंगाई

अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) दुनिया के कई देशों से बहुत ज्यादा है, लेकिन यहाँ एक पेंच है. औसत आय (Average Income) हमेशा सही तस्वीर नहीं दिखाती क्योंकि इसमें एलन मस्क और जेफ बेजोस की कमाई भी जुड़ जाती है. असली तस्वीर 'मीडियन इनकम' (Median Income) से पता चलती है.

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के मुताबिक पिछले दो सालों में औसत अमेरिकी की आय में उतनी बढ़ोतरी नहीं हुई जितनी महंगाई (Inflation) में हुई. इसे 'रियल वेज डिक्लाइन' कहते हैं. यानी अगर आपकी सैलरी 5 परसेंट बढ़ी और महंगाई 8 परसेंट, तो असल में आप पहले से ज्यादा गरीब हो गए हैं. यही वजह है कि अमेरिकी लोगों की सेविंग्स खत्म हो रही हैं और वे क्रेडिट कार्ड के कर्ज में डूब रहे हैं. अमेरिका में क्रेडिट कार्ड डेट अब तक के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है.

अमीर और गरीब के बीच की गहरी खाई (Wealth Gap)

अमेरिका में 'इकोनॉमिक इनइक्वालिटी' यानी आर्थिक असमानता अपने चरम पर है. वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक टॉप 1 परसेंट लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा है, जबकि नीचे के 50 परसेंट लोगों के पास न के बराबर संपत्ति है. यह गैप पिछले 40 सालों में लगातार बढ़ा है.

अमीर लोग टैक्स छूट और स्टॉक मार्केट से और अमीर होते जा रहे हैं, जबकि आम आदमी टैक्स और महंगाई के बोझ तले दबा है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर यह असमानता इसी तरह बढ़ती रही, तो अमेरिका में सोशल अनरेस्ट (सामाजिक अशांति) बढ़ सकती है. AOC जैसे नेताओं का गुस्सा इसी असमानता का नतीजा है, जहां सरकार अमीरों के लिए बॉलरूम बनवा रही है और गरीब खाने को तरस रहा है.

इंडिया के लिए क्या सबक है?

जब हम अमेरिका की हालत देखते हैं, तो भारत के संदर्भ में भी कई बातें समझ आती हैं. भारत में भी 'कॉस्ट ऑफ लिविंग' बढ़ रही है, लेकिन हमारे पास सोशल सपोर्ट सिस्टम (जैसे राशन कार्ड, मनरेगा) का एक अलग ढांचा है. हालांकि, भारत में भी मिडिल क्लास पर महंगाई की मार वैसी ही है जैसी अमेरिका में.

सीखने वाली बात यह है कि केवल जीडीपी का बढ़ना काफी नहीं है. अगर जीडीपी बढ़ रही है लेकिन आम आदमी की क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम हो रही है, तो वह ग्रोथ खोखली है. नीति आयोग और आरबीआई जैसी संस्थाएं भारत में महंगाई को कंट्रोल करने के लिए रेपो रेट के साथ जो खेल करती हैं, उसका सीधा असर आम आदमी की ईएमआई पर पड़ता है, ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका में फेडरल रिजर्व के फैसलों का होता है. अमेरिका का संकट हमें बताता है कि अर्बनाइजेशन (शहरीकरण) के साथ-साथ अफोर्डेबल हाउसिंग पर ध्यान देना कितना जरूरी है.

क्या सोच रहा है अमेरिकी युवा?

आर्थिक तंगी का असर सिर्फ जेब पर नहीं, दिमाग पर भी पड़ता है. अमेरिकी युवाओं (Gen Z और Millennials) में इस बात को लेकर भारी हताशा है कि वे कभी अपना घर नहीं खरीद पाएंगे. इसे 'डूमेरिज्म' (Doomerism) कहा जा रहा है, जहां युवाओं को लगता है कि भविष्य अंधकारमय है.

शादियों में देरी, बच्चे पैदा न करना और मानसिक तनाव के बढ़ते मामले इसी आर्थिक असुरक्षा से जुड़े हैं. जब एक इंसान को पता होता है कि एक छोटी सी बीमारी उसे सड़क पर ला सकती है, तो वह रिस्क लेना बंद कर देता है. इससे देश की इनोवेशन और एंटरप्रेन्योरशिप पर भी बुरा असर पड़ता है.

क्या कहते हैं अर्थशास्त्री?

शिकागो में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाली मरियम का मानना है कि अमेरिका एक 'स्ट्रक्चरल क्राइसिस' से गुजर रहा है. वो कहती हैं,

यह सिर्फ महंगाई का दौर नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की विफलता है जो केवल प्रॉफिट पर केंद्रित है. जब हेल्थकेयर और घर जैसी बुनियादी जरूरतें व्यापार बन जाती हैं, तो आम आदमी का पतन निश्चित है.

एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि सरकार को विलासिता के खर्चों के बजाय 'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' या कम से कम 'यूनिवर्सल हेल्थकेयर' की दिशा में सोचना चाहिए. टैक्स रिफॉर्म्स की भी सख्त जरूरत है ताकि अमीरों से ज्यादा टैक्स लेकर उसे बुनियादी ढांचे और गरीबी उन्मूलन में लगाया जा सके.

समाधान और भविष्य की राह

क्या अमेरिका इस संकट से उबर पाएगा? इसका जवाब राजनीति और पॉलिसी में छिपा है.

1. अफोर्डेबल हाउसिंग: सरकार को बड़े पैमाने पर सस्ते घर बनाने होंगे.

2. वेज हाइक: मिनिमम वेज को महंगाई के साथ जोड़ना होगा.

3. टैक्स रिफॉर्म: अमीरों पर 'वेल्थ टैक्स' लगाने की बहस अब तेज होनी चाहिए.

4. हेल्थकेयर सुधार: इलाज इतना सस्ता होना चाहिए कि वह किसी को कर्जदार न बनाए.

अगर ट्रंप या भविष्य की कोई भी सरकार इन बुनियादी मुद्दों को छोड़कर सिर्फ प्रतीकों (जैसे बॉलरूम या स्टैच्यू) पर पैसा खर्च करेगी, तो जनता का आक्रोश और बढ़ेगा.

क्या वाकई सपना टूट गया है?

अमेरिका पूरी तरह कंगाल नहीं हुआ है, लेकिन उसकी चमक के पीछे का सच काफी कड़वा है. दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद अपने नागरिकों को खाना और छत न दे पाना एक बड़ी विफलता है. AOC का बयान इसी सच्चाई का आईना है. अमेरिका को अब अपनी प्राथमिकताओं पर फिर से विचार करने की जरूरत है.

एक आम आदमी के लिए 'सुपरपावर' होने का कोई मतलब नहीं है अगर वह रात को चैन की नींद न सो सके और उसे अगले दिन के नाश्ते की चिंता सताए. यह संकट केवल अमेरिका का नहीं है, यह पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है कि विकास ऐसा होना चाहिए जो सबको साथ लेकर चले, न कि सिर्फ मुट्ठी भर लोगों की तिजोरियां भरे.

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