विनीत दी लल्लनटॉप के रीडर और पक्के वाले दोस्त हैं. बलिया से हैं. जहां से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे. उन्हीं ने देवस्थली विद्यापीठ स्कूल खोला था जिस स्कूल में पढ़े हैं विनीत. आजकल मुंबई में रहते हैं और वहीं से दुनिया देख रहे हैं. अपने देखे सुने का तमाम एक्सपीरिएंस लल्लन के साथ भी बांटते हैं. अपने दोस्त मकालू से परेशान रहते हैं, उसके किस्से भेजते हैं. आप भी पढ़िए.

मेरा यकीन मानिए, मेरे दोस्त मकालू के बाद इस दुनिया में अगर कोई चीज मुझे सबसे ज्यादा नापसंद है तो वो है राजनीति. मतलब शुरू से ही बिल्कुल पसंद नहीं है मुझे, क्योंकि मुझे लगता है कि नेता बिल्कुल बिना सिर पैर की बातें करते है. कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं. उनके कहे और किए में कोई तालमेल नहीं होता है. उनकी बातों से जनता के सरोकार का कोई लेना-देना नहीं होता है. इसलिए मैं इस बिरादरी से दूर ही रहता हूं. लेकिन दुर्भाग्यवश एक दूसरी बिरादरी ने नेताओं को भी पीछे छोड़ दिया है. और दिक्कत ये है कि आप उनसे पीछा भी नहीं छुड़ा सकते, क्योंकि वो रोज सूट बूट पहन कर हमारे घरों में घुस जाते हैं. हैरान होने की जरूरत नहीं है, दरअसल मैं टीवी एंकर्स की बात कर रहा हूं. मुझे ऐसा लगता है कि इनका रोल अब राक्षसों के कुल गुरु शुक्राचार्य जैसा हो गया है. ये रोज अपने चारों तरफ नेताओं को बिठा कर अपनी नैतिक शिक्षा की पाठशाला सजा लेते हैं. स्वयं बीच में बैठ कर गुरु घंटाल की तरह बीच बीच में अपना ज्ञान ठेलते रहते हैं. पत्रकार का काम सवाल पूछना होता है. लेकिन ये सवाल कम पूछते हैं. बल्कि जवाब ज्यादा देते हैं. मतलब प्रश्न पत्र भी खुद ही सेट करते हैं, जवाब भी खुद ही देते हैं और खुद ही कापी भी चेक कर लेते हैं. और अगले एक घंटे की बहस उनकी बातों को वेरिफाई करने के लिए चलती है. और अगर किसी सफेद पोशाक धारी छात्र ने असहमति में मुंह खोल दिया तो उसे गुरु जी - Leave my class की तर्ज पर Leave my debate बोल कर माईक कैमरा सब छीन लेते हैं. खैर. बात मुझे कुछ और कहनी थी और मैं कुछ और ही जोते पड़ा हूं. दरअसल आज सुबह जब मैं "सुबह वाली सैर" के लिए पार्क जा रहा था कि तभी मेरा सामना मेरे सबसे वाहियात दोस्त मकालू से हो गया. मैं बहुत दूर ही रहता हूं उससे. लेकिन वो शनि की साढ़ेसाती कि तरह मेरी कुंडली में घुस गया है. आलरेडी लाइफ में कम उलझन है जो उपर से मकालू को भी झेलूं, मनहूस जब भी मिलता है मुझे और भी ज्यादा कन्फ्यूज कर देता है. लेकिन सब कुछ मेरी स्वेच्छा से तो होने से रहा, इसलिए अक्सर मकालू को भी झेलना ही पड़ता है. मिलते ही बोला - गुरु आज का अखबार पढ़ा? मैंने कहा - नहीं! टीवी तो देखा होगा? नहीं! सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुआ है. व्हाटसऐप - फेसबुक पर तो देखा होगा? देखो मकालू न मेरे पास स्मार्टफोन है और न ही मेरे पास तुम्हारी तरह JIO का सिम है, अब तुम खबर बताओ- मैं थोड़ा इरिटेट हो रहा था. गुरु क्या बात कर रहे हो? अख़बार भी नहीं पढ़ते, टीवी भी नहीं देखते और सोशल मीडिया के बिना भी रह लेते हो. गुरु सब ठीक तो है न? सब ठीक है. दरअसल मुझे टीवी एंकर्स पसंद नहीं. क्योंकि अक्सर वो बहुत बायस्ड होते हैं. और समाचार पत्रों का भी लगभग यही हाल है. वहां खबरों से ज्यादा इश्तेहार होते हैं. और सबसे बड़ी बात मैं फिर दोहरा दूं कि मुझे राजनीति में कोई भी दिलचस्पी नहीं है, इसलिए मुझे कोई जरूरत नहीं पड़ती इन चीजों की- मैंने मकालू को धैर्य से समझाने की कोशिश की. मकालू मुझसे नाराज़ हो गया- गुरु ये ठीक बात नहीं है. क्या तुम्हें अपने स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा, और इस देश के भविष्य में कोई दिलचस्पी नहीं है. देश दुनिया में घट रही घटनाओं में कोई दिलचस्पी नहीं है. क्या तुम्हारे पड़ोस में दंगा हो जाएगा तो तुम्हें नुकसान नहीं होगा? पड़ोस के अस्पताल में डॉक्टर नहीं होगा तो इलाज कहां कराओगे? इस बार मैं नाराज था- मकालू कैसी बेतुकी बातें कर रहे हो. मैंने बस इतना कहा कि मुझे ये राजनीति पसंद नहीं. और आजकल खबरों के नाम पर अफवाह, झूठ और नफ़रत बेची जा रही है. पत्रकार अब दरबारी कवि बन गए हैं. और सिर्फ अपने निजी स्वार्थ की बातें करने वाले नेताओं की क्या बात सुनें और क्या उनके बारे में पढ़ा जाए. अपने जीवन में कम मुसीबत है जो इतनी टेंशन और पाल लें? मकालू लगभग चिल्लाते हुए बोला- गुरु तुम कायर हो. राजनीति में इन्ट्रेस्ट नहीं है इसका मतलब है कि तुमको अपने भविष्य में इंन्ट्रेस्ट नहीं है. मैं तो कहता हूं कि जिस समाचार पत्र और न्यूज एंकर को तुम पसंद नहीं करते, उसे जरुर पढ़ा और सुना करो ताकि तुम्हें खबर रहे कि देश को क्या सही और और क्या ग़लत खबर दिखाकर बरगलाया जा रहा है. सारे अच्छे बुरे नेताओं की खबर रखो ताकि वो किसी से झूठ ना बोल सकें. और सोशल मीडिया पर भी इसीलिए रहो ताकि कभी कहीं अफवाहों के बदौलत कोई दंगा ना भड़का पाए. वैसे तो मैं खुद को प्रबुद्ध समझता हूं, मेरा मानना रहा है कि अपनी दाल रोटी की चिंता ही ज्यादा महत्वपूर्ण है लेकिन मकालू की आखिरी वाली लाइन ने मुझे बेचैन कर दिया है. मैंने सोच लिया है. आज ही फोन भी लूंगा, अख़बार भी पढूंगा और शुक्राचार्य के साथ साथ उनके चेलों कि भी खबर लूंगा.
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