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पढ़िए वेद माथुर की किताब 'बैंक ऑफ़ पोलमपुर' का अंश.

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बैंक एक ऐसी संस्था है जो आपको तभी ऋण देगी जब आप यह सिद्ध कर दें कि आपको इसकी आवश्यकता नहीं है. (सांकेतिक फ़ोटो)

लेखक परिचय वेद माथुर

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सफरनामा: वेद माथुर हाल ही पंजाब नेशनल बैंक में अपना लगभग 40 साल का बैंकिंग सफर पूरा कर महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं. अजमेर से प्रकाशित समाचार पत्र ‘दैनिक न्याय’ से अपना कैरियर शुरू करने वाले वेद माथुर जर्नलिज्म छोड़कर बैंक की सेवा में आ गए लेकिन लेखन से निरंतर जुड़े रहे और उनकी सैकड़ों रचनाएं देश के सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई. ‘दैनिक न्याय’ में उन्होंने सालों तक हास्य स्तंभ ‘चकरम’ लिखा. दैनिक भास्कर, के अजमेर संस्करण में सामाजिक विषयों पर ‘बारादरी’ स्तंभ का वर्षों तक लेखन किया. प्रिंट मिडिया के अलावा वे आकाशवाणी एवं विजुअल मीडिया से जुड़े रहें. उनकी दो पुस्तकें ‘सामने है सफलता’ और ‘Matras to success’ प्रकशित हो चुकी हैं. एक बैंकर के भेष में इस लेखक ने बैंकिंग के सभी लोकों की यात्रा कर ‘बैंक ऑफ़ पोलमपुर’ का आंखों देखा हाल प्रस्तुत किया है. यह मनगढ़ंत है अथवा वास्तविक? अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा.


वेद माथुर
वेद माथुर



 

बैंकिंग को लेकर कुछ ऐसी लोकोक्तियां प्रचलित हैं जिन्हें हमारे बैंकर मनचलों की छेड़छाड़ बताते हैं. ‘बैंक ऑफ़ पोलमपुर’ की दास्तान आपको इन कथनों की सत्यता परखने में सहयोग करेगी. चंद लोकोक्तियां प्रस्तुत हैं : -

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- बैंक एक ऐसी संस्था है जो आपको तभी ऋण देगी जब आप यह सिद्ध कर दें कि आपको इसकी आवश्यकता नहीं है.- बॉब होप - यदि आपने अपने बैंक से पचास हज़ार रूपए का ऋण ले रखा है तो यह आपकी चिंता और समस्या है लेकिन यदि आपने सौ करोड़ रूपए का ऋण ले रखा है तो यह बैंक का सिर दर्द है. - जे. पॉल गेट्टी - तीन जगह ‘क्रॉस सेलिंग’ से आप को चूना लगाने में उस्ताद बैठे हैं-

1. नाई की दुकान 2. दंत चिकित्सा क्लिनिक 3. बैंक (अतः इन से सावधान रहें)

– निम्बारगू रूसो

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- बैंकिंग एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें बड़े औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए अपने ही रिटेलर कस्टमर्स (छोटे ग्राहकों) को ठगता है. - पद्म भूषण चंदा कोचर (मुख्य कार्यकारी अधिकारी,आईसीआईसी बैंक का एक निंदक) - यदि कोई व्यक्ति अय्याश राजाओं जैसा जीवन व्यतीत कर रहा है तो इस बात की पूरी आशंका है कि उसने भारतीय बैंकों से अरबों रूपए ऋण लेकर हजम कर लिया है अथवा निकट भविष्य में ऐसा करने वाला है. - बैंक ऋण नहीं मिलने से आहत और कुंठित एक लेखक


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प्रबंधन के नए सिद्धांत

 

पिल्लई साहब के विदा होते ही ‘बैंक ऑफ़ पोलमपुर’ का नेतृत्व अस्थायी रूप से बैंक के कार्यकारी निदेशक दयालदास गुप्ता के पास आ गया. दयाल दास जी विनोदप्रिय व्यक्ति थे और उनकी कार्यशैली अद्भुत थी. उनके जीवन का पहला सिद्धांत था - जियो और जीने दो. अर्थात जहां मौका लगे कमा लो तथा कोई अन्य व्यक्ति कमा रहा हो तो उसकी कमाई में व्यवधान नहीं डालो . जब तक आप दूसरों के आनंद और आराम में व्यवधान नहीं डालेंगे, कोई अन्य आप के मार्ग में बाधा नहीं डालेगा.

उनका दूसरा सिद्धांत था - जो दे उसका भला, जो न दे उसका भी भला. उन्हें जो लोग काम के बदले अग्रिम उपहार या नगद देते थे, उसका कार्य तुरंत करवा देते थे, किंतु नहीं देने वालों का कार्य भी हो प्रसन्नतापूर्वक करते थे. इससे बाजार में उनके प्रतिष्ठा बनी रहती थी. किसी चौपाल पर दो व्यक्ति उनके घूसखोर होने की चर्चा करते थे तो चार इसका खंडन भी करते थे .

दयालदास जी का सिद्धांत नंबर तीन था - कोई भी व्यक्ति किसी पद पर सीमित समय के लिए होता है. उल्टी गिनती चल रही होती है . कमाओ खाओ, किसी का भला कर सकते हो तो करो (ना कर सको तो भी कोई बात नहीं) समय नष्ट ना करो, आपकी कुर्सी कामधेनु गाय है जितना दूध निकाल सकते हो निकाल लो .

सामान्यता बैंक में प्रबंध निदेशक एवं कार्यकारी निदेशक कार्य ग्रहण करने के लिए यदि मुख्यालय नहीं पहुंचते हैं तो वह अपनी सीनियरिटी बनाने के लिए बिना अगले दिन का इंतजार किए बैंक की किसी भी शहर के निकटस्थ शाखा या एटीएम में जाकर कार्य ग्रहण कर लेते थे. नवनियुक्त प्रबंध निदेशक सुश्री सुधा नटराजन को आशंका थी की कोई ‘बैंक ऑफ़ पोलमपुर’ के सर्वोच्च पद पर उनकी नियुक्ति के विरुद्ध न्यायालय के स्थगन आदेश नहीं ले ले, अतः वे तत्काल बैंक में अपना ‘कार्यग्रहण’ दर्शाना चाहती थी.

दुर्योग से जिस दिन मैडम के ‘बैंक ऑफ़ पोलमपुर’ में नियुक्ति के आदेश हुए वे उत्तर-पूर्व राज्यों की सैर पर थीं और वहां ‘बैंक ऑफ़ पोलमपुर’ की कोई शाखा तो दूर एटीएम भी नहीं था. कार्मिक मामलों के पुराने विशेषज्ञ (जिन्हें कर्मचारी पुराना पापी कहते थे) गणेश माधवन को इस संकट समाधान का टास्क सौंपा गया. माधव ने सलाह दी कि शिलांग में ‘कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व’ (सीएसआर) के अंतर्गत बैंक में सुलभ शौचालय के लिए पैसा दिया था. यदि नई एमडी सुधा नटराजन उसका दौरा, निरीक्षण या इस्तेमाल कर ले तो इसे उनकी बैंक की जॉइनिंग मान ली जाएगी और उनकी सीनियरिटी शुरू हो जाएगी. आईडिया इतना अच्छा था कि विचार-विमर्श में शामिल सभी कार्यकारी निदेशक एवं महाप्रबंधक पहले तो खुशी से उछल पड़े, फिर युवाओं की तरह एक दूसरे के हाथ पर ताली मारने लगे, कुछ ही क्षण में गणेश माधवन की तकनीकी सलाह के अनुरूप मैडम सुधा नटराजन ने शिलांग में सुलभ शौचालय जाकर ‘बैंक ऑफ़ पोलमपुर’ के प्रबंध निदेशक के रूप में ज्वाइन कर लिया. अपने रिकॉर्ड और सुरक्षा के लिए उन्होंने वहां से पांच रूपए की रसीद लेकर संभाल कर रख ली . ऐसी रसीद वरिष्ठता को लेकर न्यायालय में विवाद होने हो जाने पर महत्वपूर्ण दस्तावेज सिद्ध होती है.

 

प्रबंध निदेशक की कार्यशैली

 

नई प्रबंध निदेशक ने पूरे जोर-शोर से कार्य करना शुरू कर दिया था. एक बदलाव बैंक में यह आया कि पुराने प्रबंध निदेशक श्री शिवशंकर पिल्लई जहां अपने घिसे-पिटे सूट पहन कर आते वहीं नई प्रबंध निदेशक रोज नई साड़ी, ज्वेलरी एवं चप्पल पहन कर आतीं थीं. नित नई साड़ियां, गहने और फुटवेयर देखकर लगता था जैसे स्व. जयललिता अपना सारा संग्रहीत सामान सुश्री सुधा नटराजन को सौंप गई हों.


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प्रबंध निदेशक द्वारा पहने जाने वाली साड़ियां और ज्वेलरी महंगी होती थी और कोई ईमानदार सरकारी अधिकारी अपनी पुश्तैनी जायदाद बेचकर भी इन्हें नहीं खरीद सकता था. साल में एक बार ‘विजिलेंस डे’ के अवसर पर वरिष्ठ अधिकारियों के लिए वे विजिलेंस कमिश्नर के मुख्य आतिथ्य में एक सेमीनार करती थीं, उस दिन अवश्य वे साधारण सूती तथा नकली मोती की माला पहन कर आती थी. उस दिन उनके हाथ में गांधी जी की पुस्तक ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ होती थी हालांकि वह हिंदी पुस्तक नहीं पढ़ती थीं. अपने अंतरंग मित्रों में वे कहती भी थी कि वे कभी गांधी जी की पुस्तक नहीं पढ़ती क्योंकि इन्हें पढ़कर इन से सहमत होने का खतरा रहता है प्रबंध निदेशक महिला होने से ‘बैंक ऑफ़ पोलमपुर’ के खर्चे में एक और इजाफा हो गया था. प्रबंध निदेशक एक फाइव स्टार होटल में स्थित ब्यूटी पार्लर में हर चौथे दिन जाती थीं और होटल ब्यूटी पार्लर के बजाय अपने रेस्टोरेंट से बैंक ग्राहकों की ‘बिजनेस मीटिंग’ का बिल बनाकर भेज कर भेज देता था. कार्यकारी निदेशक की पत्नियाँ भी इस सुविधा की मांग करने लगी.

आज मनप्रीत ‘बैंक ऑफ़ पोलमपुर’ की पूरी खोज-खबर लेने के मूड में की थी. उसने अगला सवाल किया, 'आप लोग ऋण देते समय जमीन-जायदाद, घर-बार बंधक रख लेते हैं फिर डिफाल्टर का यह सब नीलाम क्यों नहीं करते?'

'मनप्रीते, घर-बार तो आम आदमी का बंधक रखा जाता है. बड़े लोग कंपनी बना लेते हैं जिसमें अरबों रुपए के ऋण बिना जमानत और बंधक दिए जाते हैं. प्रमोटर कंपनी का डायरेक्टर होता है, जब कंपनी डूबने लगती है तो पर प्रमोटर कंपनी से त्याग पत्र देकर खिसक जाता है और कंपनी के अन्य डायरेक्टर, जो वास्तव में प्रमोटर के माली, धोबी और ड्राइवर होते हैं, बच जाते हैं . प्रमोटर ऋणों के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं होता.' मैंने बताया और मनप्रीत ने हंसकर कहा 'तो आप भी इस नौकरी के बजाय या कंपनी बनाकर सौ दो सौ करोड़ रुपए का ऋण लेकर हजम कर जाते. हम भी इंग्लैंड या अमेरिका भाग जाते.'

'मनप्रीते, बेईमान बनने के लिए निर्लज्ज होना जरूरी है. बैंक ऋण हड़पने के लिए अपनी अंतरात्मा को मारना पड़ता है और इसके लिए दिल-गुर्दे भी मजबूत होने चाहिए. तेरे-मेरे जैसे शरीफ और सीधे लोगों के बस की बात नहीं है कि बैंकों का करोड़ों रुपया बिना डकार लिए हज़म कर जाएं.' मैंने ठंडी आह भरकर कहा




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