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संजीव भट्ट केस: जिसमें 2 बार गुजरात सरकार ने बचाया, उसी में बाद में कैसे उम्रकैद हुई?

क्या ये संयोग है कि जिस दिन भट्ट ने मोदी के खिलाफ बोला, उसी दिन केस खुलवाने की तैयारी हो गई.

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गुजरात के पूर्व IPS संजीव भट्ट को कोर्ट ने 29 साल पुराने मामले में उम्रकैद की सजा दी है.
27 फरवरी2002. गोधरा स्टेशन के ठीक बाहर सिग्नल फालिया पर साबरमती एक्सप्रेस के चार डिब्बों में आग लगी. एक दावा ये भी है कि आग लगाई गई थी. बाहर खड़ी भीड़ ट्रेन पर पथराव कर रही थी. नतीजा - अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद के पूर्णाहुति महायज्ञ में शरीक होकर लौट रहे 59 लोग ज़िंदा जल गए. इसके बाद तीन दिन तक गुजरात बुरी तरह जला. बाद के दिनों में भी सुलगता रहा. इंसानियत को शर्मसार करने वाली हर हरकत हुई. 2002 में हुए सांप्रदायिक दंगों में आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 1,044 जानें गईं. आलोचना हुई तो सूबे की नरेंद्र मोदी सरकार ने कहा कि उसने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी थी. फिर भी आरोप लगे कि गुजरात सरकार ने दंगों को काबू करने में जानबूझकर ढिलाई बरती. 9 साल तक ये बहस चलती रही. फिर सुप्रीम कोर्ट में  एक हलफनामा सामने आया. 14 अप्रैल2011 में गुजरात में तैनात एक पुलिस अफसर ने कहा कि गोधरा कांड की शाम मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के घर एक मीटिंग हुई थी. इसमें कथित तौर पर मोदी ने कहा था -
 ''हिंदुओं को अपना गुस्सा निकालने दो''
गोधरा दंगे में मोदी के खिलाफ बोलने वाले पहले अधिकारी थे संजीव भट्ट.
गोधरा दंगे में मोदी के खिलाफ बोलने वाले पहले अधिकारी थे संजीव भट्ट.

ये हलफनामा गुजरात काडर के आईपीएस अफसर संजीव भट्ट का था. दंगों में नरेंद्र मोदी की भूमिका वाली थ्योरी को सबसे ज़्यादा बल इसी हलफनामे से मिला था. 20 जून2019 के रोज़ गुजरात की एक अदालत ने संजीव भट्ट को हत्या के एक मामले में उम्रकैद की सज़ा सुना दी. 1990 में जामनगर पुलिस की हिरासत में टॉर्चर की वजह से हुई इस मौत के मामले में सज़ा सुनते वक्त संजीव कुमार के आगे आईपीएस के अलावा एक और शब्द लग गया था - बर्खास्त.
संजीव भट्ट देश की कहानी आज की तारीख में हमारे मुल्क के दो सबसे ताकतवर लोगों की कहानी से गुत्थम-गुत्था है - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह. इन दोनों पर अतीत में लगे लगभग हर इल्ज़ाम के किस्से में अनिवार्य रूप से संजीव भट्ट का ज़िक्र आता है. तो ये सवाल काफी वज़न रखता है कि संजीव भट्ट आखिर हैं क्याएक बर्खास्त आईपीएस अफसर जो अपनी ज़बान पर काबू नहीं रख पाता या फिर एक दुस्साहसी व्हिसल ब्लोअरजो किसी से नहीं डरता. हम इस सवाल को टटोलते हुए आपके सामने कुछ तथ्य रख रहे हैं. 
संजीव भट्ट - जो कभी मोदी के मुहाफिज़ थे
संजीव भट्ट कभी मोदी-शाह के बेह करीबी हुआ करते थे.
संजीव भट्ट कभी मोदी-शाह के बेह करीबी हुआ करते थे.

आईपीएस होने से पहले संजीव भट्ट का परिचय आईआईटियन का था. 1985 में उन्होंने आईआईटी बॉम्बे से एमटेक की पढ़ाई की. फिर आईपीएस की परीक्षा पास की. ट्रेनिंग पूरी होने पर काडर मिला गुजरात. बैच- 1988. अपनी बर्खास्तगी तक सर्विस का लगभग पूरा समय उन्होंने गुजरात में ही बिताया. ढेर सारे विवादों में रहे. करियर में इतनी इंक्वायरियां और मामले झेले कि 10 साल तक प्रमोशन रुका रहा. 2007 आने तक भट्ट के कई साथी आईजी हो गए थेलेकिन वो एसपी ही रहे. गुजरात से बाहर दुनिया ने भट्ट को उनके चर्चित हलफनामे के बाद ही जाना. तो उसी कहानी पर लौटते हैं.
2002 में संजीव भट्ट के ज़िम्मे इंटेलिजेंस और VVIP सिक्योरिटी थी. मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का सिक्योरिटी कवर संजीव भट्ट को ही रिपोर्ट करता था. 27 फरवरी2002 की सुबह क्या हुआसब जानते हैं. बहस शाम की घटनाओं को लेकर है. संजीव भट्ट के हलफनामे के मुताबिक 27 फरवरी2002 की शाम मुख्यमंत्री के घर मीटिंग हुई थी. लेकिन दंगों की जांच के लिए बनी एसआईटी ने संजीव के दावों को निराधार बताया था. कमरे में जिन लोगों के होने की बात संजीव ने कही थीउन्होंने भी इनकार किया. हलफनामे पर गुजरात पुलिस के जिस कॉन्स्टेबल केडी पंत के दस्तखत थेउसने बाद में कहा कि भट्ट ने दबाव डालकर दस्तखत करवाए. पंत ने इस मामले में भट्ट के खिलाफ पुलिस केस भी दर्ज करवाया था. फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी हैं. संजीव भट्ट ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर जितने आरोप लगाए वो सुप्रीम कोर्ट में टिके नहीं.
गुजरात दंगे में सरकार की भूमिका पर संजीव भट्ट ने सवाल उठाए. इसके बाद उनके बुरे दिन शुरू हो गए.
गुजरात दंगे में सरकार की भूमिका पर संजीव भट्ट ने सवाल उठाए. इसके बाद उनके बुरे दिन शुरू हो गए.

लेकिन मीटिंग की बात कहने वाले संजीव भट्ट अकेले शख्स नहीं थे. भट्ट के अलावा कम से कम एक और शख्स ने मोदी के घर हुई मीटिंग का ज़िक्र किया था - भाजपा नेता और गुजरात सरकार में राजस्व मंत्री हरेन पंड्या. सरकारी से इतर गुजरात दंगों पर एक रिपोर्ट और तैयार हुई थी कंसर्न्ड सिटिज़न्स ट्राइब्यूनल.  पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ जैसे गैर सरकारी संगठनों ने ये ट्राइब्यूनल बनाई थी. समाजसेवियों और रिटायर्ड पुलिस अधिकारियों के अलावा इसके सदस्य तीन सेवानिवृत्त जज भी थे -
>>जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर (सेवानिवृत्त जजसुप्रीम कोर्ट)
>> जस्टिस पीबी सावंत (सेवानिवृत्त जजसुप्रीम कोर्ट)
>> जस्टिस होसबेट सुरेश (सेवानिवृत्त जजबॉम्बे हाई कोर्ट)
हरेन पंड्या ने इस ट्राइब्यूनल के सामने मोदी के यहां हुई मीटिंग का ज़िक्र किया था. अगस्त 2002 में पंड्या ने समाचार मैगज़ीन आउटलुक को दिए एक इंटरव्यू में गवाही की बात कबूली थी. 19 नवंबर 2007 में आउटलुक मैगज़ीन में छपी एक दूसरी रिपोर्ट में जस्टिस होसबेट ने भी कबूल किया कि पंड्या ने ऐसा बयान दिया था. अक्टूबर 2011 में इंडियन एक्सप्रेस अखबार में छपी लीना मिश्रा की रिपोर्ट के मुताबिक जैसे ही किसी मंत्री के ट्राइब्यूनल के सामने पेश होने की बात लीक हुईमोदी सरकार ने खुफिया पुलिस से उसका पता लगाने को कह दिया.

हरेन पंड्या गुजरात सरकार में मंत्री थे जिनकी हत्या कर दी गई थी.

खुफिया विभाग के चीफ आर बी श्रीकुमार ने नानावटी कमीशन के सामने गवाही दी थी कि खुफिया शाखा को ये निर्देश दिए गए थे. साथ में हरेन पंड्या का फोन टैप करने को भी कहा था. इंटेलिजेंश शाखा में संजीव भट्ट श्रीकुमार को ही रिपोर्ट करते थे. 26 मार्च2003 को हरेन पंड्या की हत्या होने के बाद से संजीव अकेले शख्स हैं जिन्होंने मीटिंग के बारे में सार्वजनिक तौर पर कोई दावा किया है. भट्ट ने नानावटी आयोग को दिए अपने बयान में भी मीटिंग का ज़िक्र किया था.
बर्खास्तगी और मोदी-शाह से अदावत
संजीव भट्टी की पत्नी ने उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी के खिलाफ विधानसभा का चुनाव भी लड़ा था.
संजीव भट्टी की पत्नी ने उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी के खिलाफ विधानसभा का चुनाव भी लड़ा था.

2011 में संजीव भट्ट का हलफनामा आया था. इसी साल उन्हें बिना इजाज़त ड्यूटी से गायब रहने और सरकारी गाड़ियों के बेज़ा इस्तेमाल के आरोप में निलंबित किया गया. लेकिन भट्ट खबरों से बाहर नहीं हुए. क्योंकि अगले साल गुजरात में विधानसभा के चुनाव थे. संजीव की पत्नी श्वेता भट्ट ने ये चुनाव लड़ा. मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अहमदाबाद की मणिनगर सीट से. अगस्त 2015 में भट्ट सेवा से बर्खास्त कर दिए गए. इसके बाद से वो लगातार अदालती लड़ाइयों में उलझे हुए हैं.
गिरिराज सिंह विरोधियों और विपक्षियों पर बरसते रहते हैं. इस बार इफ़्तार पार्टी को लेकर उन्होंने अपने ही सहयोगियों पर उंगली उठा दी. खबर है कि इसके लिए उन्हें अमित शाह से डांट पड़ी है (फोटो: रॉयटर्स)
संजीव भट्ट ने कहा था कि उनके पास हरेन पंड्या की हत्या से जुड़े सबूत अमित शाह को भेजे थे, जिसे उन्होंने नष्ट करने को कहा था.

गुजरात हाई कोर्ट को दिए अपने एक दूसरे हलफनामे में भट्ट ने दावा किया था कि 2003 में जेल सुपरिंटेंडेंट रहते हुए उनके हाथ ऐसे सबूत लगे थे जिनका इशारा इस बात की तरफ था कि पंड्या की हत्या के पीछे गुजरात के सीनियर नेता और पुलिस अफसर थे. भट्ट का कहना था कि जब उन्होंने ये सबूत गुजरात के गृह मंत्रालय को भेजे तो अमित शाह ने उन्हें फोन करके सबूत नष्ट करने को कहा था. संजीव भट्ट ने गुजरात में कथित फर्जी मुठभेड़ों में अमित शाह का हाथ होने की बात कही थी, लेकिन ये आरोप अदालत में सिद्ध नहीं हुए.
विवाद तरह तरह के
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संजीव भट्ट सरकार के साथ-साथ एक पत्रकार से भी उलझ गए थे.

भट्ट के सिर्फ सरकार से विवाद रहेऐसा नहीं है. एक महिला पत्रकार ने गुजरात दंगों पर किताब लिखी. किताब के बारे में 2017 में भट्ट ने सोशल मीडिया पर लिख दिया कि पत्रकार के आईपीएस अफसरों से नज़दीकी संबंध थे. भट्ट ने दावा किया कि राज्य सरकार के पास इस बात की जानकारी थी और इस जानकारी के आधार पर न सिर्फ किताब के ब्योरे बदले गएबल्कि कथित फर्ज़ी मुठभेड़ों के मामले भी प्रभावित हुए. इसके अलावा भी संजीव भट्ट अपने दावों-बयानों से चर्चा में बने रहते हैं. मिसाल के लिए 22 अक्टूबर2017 को उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट किया -
 ''क्या इस समय भारतीय क्रिकेट टीम में कोई मुस्लिम खिलाड़ी है आज़ादी से आज तक ऐसा कितनी बार हुआ कि भारत की क्रिकेट टीम में कोई मुसलमान खिलाड़ी ना होक्या मुसलमानों ने क्रिकेट खेलना बन्द कर दिया है या खिलाड़ियों का चुनाव करने वाले किसी और खेल के नियम मान रहे हैं ?''
भट्ट ने ये पोस्ट ट्विटर पर डाला तो बवाल हो गया. क्रिकेटर हरभजन सिंह समेत कई लोगों ने भट्ट की बात का विरोध किया था.
कौन से मामले में उम्रकैद हुई है भट को?
लालकृष्ण आडवानी ने 1990 में सोमनाथ से रथयात्रा निकाली थी.
लालकृष्ण आडवानी ने 1990 में सोमनाथ से रथयात्रा निकाली थी. इसी में जामजोधपुर में दंगा हो गया था.

1990 में संजीव भट्ट जामनगर के एडिशनल एसपी थे. उन दिनों लालकृष्ण आडवाणी की राम रथ यात्रा निकल रही थी और देश में माहौल तनाव का था. 10 अक्टूबर1990 को जामनगर के जामजोधपुर इलाके में सांप्रदायिक दंगा हुआ. तब संजीव के निर्देश पर तकरीबन 133 लोगों हिरासत में लिया गया था. इन्हीं में से एक थे विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता प्रभुदास वैष्णानी. 8 नवंबर को प्रभुदास को रिहा किया गया. रिहाई के 11वें दिन प्रभुदास की अस्पताल में मौत हो गई. इल्ज़ाम लगा कि उन्हें पुलिस हिरासत में प्रताड़ित किया गया था. तो प्रभुदास के भाई अमृतलाल वैष्णानी ने संजीव भट्ट समेत आठ पुलिस वालों के खिलाफ हिरासत में भाई की मौत का केस दर्ज करवाया. अमृतलाल का आरोप था कि भट्ट और उनसे साथी पुलिस वालों ने प्रभुदास को इतना पीटा कि उसे डॉक्टर बचा नहीं सके.
गुजरात सरकार - कभी हांकभी ना
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गुजरात सरकार ने पहले संजीव भट्ट के खिलाफ मामला वापस ले लिया था. बाद में जब संजीव भट्ट ने गोधरा दंगे पर बोला तो सरकार ने उनपर मामला चलाने का आदेश दे दिया.

ये केस राज्य सीआईडी को दिया गया था. 1992 में सीआईडी ने सीआरपीसी की धारा 197 के तहत राज्य सरकार से भट्ट और बाकी पुलिसवालों के खिलाफ मामला चलाने की इजाज़त मांगी थी. 1995 में गुजरात सरकार ने सेशंस कोर्ट में कहा था कि जामनगर वाले मामले में भट्ट की कार्रवाई अच्छी मंशा से थी. माने वो अपनी ड्यूटी कर रहे थे. इसके बाद सरकार ने सीआईडी को मामले में क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश भी दिया था. अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया और भट्ट के खिलाफ अभियोजन दायर करने को कहा. 1996 में सरकार ने अदालत में फिर भट्ट के पक्ष में हलफनामा दाखिल किया. 18 अगस्त2011 को समाचार वेबसाइट द हिंदू पर छपी खबर के मुताबिक जिस दिन संजीव भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट में दंगों से संबंधित हलफनामा दाखिल किया थाउसी दिन गुजरात सरकार ने 1996 में दाखिल अपना हलफनामा वापिस ले लिया. इसने भट्ट के खिलाफ जामजोधपुर वाला मामला शुरू करने के लिए रास्ता साफ कर दिया.
MAY 16, 2011 Ahmedabad: Sanjiv Bhatt, a 1988 batch IPS officer arrives for interrogation in connection with Gujarat communal riots case in 2002, at the Justice Shah & Navati commission office in Ahmedabad on Monday. Photo : Mail Today 17Pubmay2011
हाई कोर्ट में भट्ट ने 40 गवाहों की मांग रखी थी, लेकिन पता चला कि कुछ का देहांत हो गया है और कुछ अदालत आकर गवाही देने की स्थिति में नहीं थे.

मामले में अभियोजन ने 300 गवाहों की ज़िक्र किया थाजिनमें से 32 की अदालत में पेशी हुई थी. 2019 में भट्ट के वकील ने गुजरात हाई कोर्ट में कहा था कि इन गवाहों के बयान दर्ज करने वाले पुलिस अधिकारियों में से एक की भी अदालत में पेशी नहीं हुई थी. हाई कोर्ट में भट्ट ने मामले में 40 और लोगों की गवाही की मांग रखी. लेकिन हाई कोर्ट में ये सामने आया कि 40 में से कुछ गवाहों का या तो देहांत हो गया था या तो वो अदालत आकर गवाही देने की स्थिति में नहीं थे. अप्रैल 2019 में अमृतलाल वैष्णानी की याचिका पर गुजरात हाई कोर्ट ने मामले की रोज़ सुनवाई का आदेश दिया. इसी साल जून महीने में भट्ट सुप्रीम कोर्ट गए. कहा 11 लोगों की गवाही करवा लीजिए. ये मांग भी खारिज हो गई. अब फैसले की घड़ी थी.
कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
जामनगर के ज़िला एवं सत्र न्यायालय ने मामले में दो पुलिस वालों को हत्या का दोषी माना है - संजीव भट्ट और प्रवीणसिंह ज़ाला. इन दोनों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई है. बाकी आरोपियों को आईपीसी की धारा 323 और 506 के तहत हिरासत में प्रताड़ना यानी टॉर्चर करने का दोषी माना गया है. इन दोषियों की सज़ा का ऐलान होना बाकी है.
एक और केसगुजरात सरकार का एक और हलफनामा

बनासकांठा के एक केस में संजीव भट्ट 2018 में गिरफ्तार हुए थे. तब से वो जेल में ही हैं.

भट्ट की जटिल कहानी समझने में एक और केस काम का है. वो केसजिसकी वजह से उनका हाल पता पालनपुर जेल है. 30 अप्रैल1996 को उनके बनासकांठा एसपी रहते पुलिस ने एक वकील सुमेरसिंह राजपुरोहित को गिरफ्तार किया. इल्ज़ाम लगाया कि पालनपुर के एक होटल में सुमेरसिंह के रूम से 1.15 किलो अफीम बरामद हुई. बाद में बनासकांठा पुलिस ने सुमेरसिंह को केस से बरी करने की सिफारिश कर दी थी. लेकिन राजस्थान पुलिस की जांच में सामने आया कि सुमेरसिंह को बनासकांठा पुलिस ने पाली से अगवा किया था. राजस्थान पुलिस ने ये भी इल्ज़ाम लगाया कि अफीम वाला प्लान संजीव भट्ट ने गुजरात हाई कोर्ट के तत्कालीन जज आर आर जैन के इशारे पर अंजाम दिया गया था. ताकि राजपुरोहित पर पाली की एक विवादित प्रॉपर्टी खाली करने को लेकर दबाव बनाया जा सके. इस मामले में आरोपी रहे बनासकांठा पुलिस के तत्कालीन इंस्पेक्टर आईबी व्यास ने 1999 में गुजरात हाई कोर्ट में इस मामले की तफसील से जांच के लिए एक याचिका लगाई. इस मामले में भट्ट की गिरफ्तारी सितंबर 2018 में हुई थी और तब से वो न्यायिक हिरासत में हैं.
जामनगर वाले मामले की ही तरह इस मामले में भी गुजरात सरकार सेशंस कोर्ट में भट्ट का पक्ष ले चुकी है. राज्य सरकार ने 1999-2000 में भट्ट के खिलाफ आरोप खत्म करने की सिफारिश की थी. बाद में राज्य सरकार ने अपना हलफनामा वापस लियाजिसकी वजह से ये भट्ट के खिलाफ मामला फिर से चल पड़ा. भट्ट का दावा है कि जब उन्होंने 2002 में गुजरात सरकार की भूमिका पर बोलना शुरू कियातब से सरकार ने पाला बदला.
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संजीव भट्ट, जिनकी कई कहानियां हैं और उनमें कई पेचीदगियां हैं.

संजीव भट्ट की कहानी इतनी पेचीदा है कि उसके सारे पहलू एक बार में नहीं छुए जा सकते. जैसे-जैसे बातें सामने आती जाती हैंतथ्य और कल्पना के बीच की लाइन धुंधली होती जाती है. आज के लिए हम दावे से सिर्फ एक बात कह सकते हैं. एक अदालत ने संजीव भट्ट को हत्या का दोषी पाया है और उन्हें उम्रकैद की सज़ा हुई है.

राम रथ यात्रा के वक्त हुए कस्टोडियल डेथ के केस में आईपीएस संजीव भट्ट को उम्रकैद|दी लल्लनटॉप शो| Episode 241

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