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तो इसलिए सोशल मीडिया पर इतनी गालियां बकते हैं लोग

सोशल मीडिया के लकड़बग्घों, तुम्हारे लिए तेजाब आया है.

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फोटो - thelallantop

Puneet Sharmaआज आप पुनीत शर्मा की कलम के जादू में गुम होंगे. इंदौर के रहने वाले. हाल मुकाम मुंबई. पढ़ाई की बायोटेक की. मगर नौकरी की इश्तेहार लिखने की. गाने भी लिखते हैं. औरंगजेब और रिवॉल्वर रानी के नगमे रचे. हर वक्त सिनेमा की पिनक में रहते हैं. नशा यूं ही तारी रहे.

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कल मैं ट्विटर पर चहलकदमी कर रहा था. वहां ज़रा कम ही जाता हूं. मैंने देखा कि स्वरा भास्कर के एक बयान पर लोग उसे बुली कर रहे हैं. उनकी हरकत ऐसी थी, जैसे झुंड बनाकर लकड़बग्घे हमला करते हैं. उनमें से अधिकतर बुली ऐसे थे, जो अपनी गुप्त पहचान से ट्विटर के जंगल में विचरते हैं और कमज़ोरों पर हमला करते हैं. उनमें सबसे ज्यादा लोग सत्ता के साथी होते हैं. सत्ता किसी की भी हो, मेरे लिए सत्ता है. तो ये प्राणी सत्ता पर हमला नहीं करते, सत्ता पर सवाल उठाने वाले पर करते हैं. उनकी ट्वीट हिस्ट्री देखकर समझ आता है कि उन्होंने अपना नैरेटिव तय कर लिया है.

अगर मैं आपको पंचतंत्र की एक कथा के दो विकल्प दूं. पहली में लकड़बग्घे एक कमजोर हिरण-शावक को घेरकर मारते हैं और दूसरे विकल्प में लकड़बग्घे ताकतवर शेर को घेरकर मारते हैं. आप कौन सा विकल्प चुनेंगे? मैं तो शेर वाला विकल्प चुनुंगा और इसलिए नहीं कि शेर क्रूर है, बल्कि इसलिए कि वो पलटकर और जोर से वार कर सकता है. वो मुकाबला दिलचस्प है, लेकिन ये लकड़बग्घे इतने दिलेर नहीं.

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तभी मैं ये सोचने लगा कि इस मुखौटे के पीछे छिपे इंसान की आत्मा में कितने घाव होंगे. उसी का दर्द दबाने के लिए शायद वो इतनी गालियां बकता हो. जैसे नुक्कड़ पर खड़े बेरोजगार लड़के, जो आने-जाने वालों पर फब्तियां कसते हैं, क्योंकि उनकी जिंदगी में बहुत कुछ अंदर से टूट चुका है. उसका दुःख वो कमजोर को डराकर कम करना चाहते हैं, इसलिए वो किसी लीडर के पिछलग्गू बन जाते हैं. वो कूपमंडूक की तरह ना कुछ नया देखना चाहते हैं और ना सीखना.

मेरा ये गीत उन 'मुखौटे वाले मेंढकों' को समर्पित है. 'हे मेंढक मुखौटे वाले! मन में तेरे कितने छाले?'

हे मेंढक मुखौटे वाले! मन में तेरे कितने छाले?

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फूटे छाले छिपा-छिपाकर, अपने भीतर रखता है, दर्द नहीं दबता जब तेरा, सबको गाली बकता है.

बेमुंह का मेंढक, उस पर भी सत्ता का अनुयायी है, सहज तरह से बोलूं तो, तू हरिराम सा नाई है. रीढ़ से खाली कॉकरोच का, धुर सफेद सा खून है तू, घने अंधेरे कमरे में, खुद पर हंसती परछाई है. लाश देखकर अपनी, खुद ही तू सियार सा हंसता है, दर्द नहीं दबता जब तेरा, सबको गाली बकता है.

हे मेंढक मुखौटे वाले! मन में तेरे कितने छाले?

लीडर की बंदूक को कंधा दे, तू वही शिखंडी है, और वो पोछे जिससे पिछवाड़ा, तू ऐसी झंडी है. वो सत्ता की कुल्फी खाकर, तुझको छू-छू करता है, चूस रहा है जिसको तू, वो उस कुल्फी की डंडी है. पीड़ा के संताप में प्यारे, रोज तू कितना धंसता है, दर्द नहीं दबता जब तेरा, सबको गाली बकता है.

हे मेंढक मुखौटे वाले! मन में तेरे कितने छाले?

रूह पर तेरी कितने फोड़े और कितनों से पीप बहे? मन का तेरे तट टूटा या भावनाओं के द्वीप बहे? दिल की चमड़ी के टांके उधड़े या बुद्धि उबल गई? ऐसे कितने सपने थे, जो आकर तेरे समीप बहे? मुस्तक़बिल तेजाब है तीखा, तुझ पर रोज बरसता है? दर्द नहीं दबता जब तेरा, तभी तू गाली बकता है?

हे मेंढक मुखौटे वाले! मन में तेरे कितने छाले?


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