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शत्रुघ्न सिन्हा, जिन्होंने अमित शाह के बारे में कहा था कि इन्हें तो बड़ा बोल बोलने की आदत है

मोदी से लेकर बीजेपी के तमाम बड़े नेताओं को अपनी कड़वी बातों का काढ़ा पिला चुके हैं शॉटगन सिन्हा.

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फोटो - thelallantop
बिहार विधानसभा चुनाव 2016 के वक़्त की बात है. शत्रुघ्न सिन्हा ने एक इंटरव्यू में कहा,
“हमारे पार्टी प्रेसिडेंट अमित शाह ने पूरे विश्वास के साथ कहा कि वो दो-तिहाई बहुमत से जीतेंगे. लगता है ऐसी बातें बोलना उनकी आदत बन गई है. उन्होंने दिल्ली चुनावों के वक़्त भी ऐसी ही बात बोली थी. हकीकत में हमें वहां दो-तिहाई सीटों की जगह दो-तीन सीटें मिलीं.”
जो मन में आए, वो बिना लाग-लपेट के बोल देना शत्रुघ्न सिन्हा की खासियत रही है. न जाने कितने मौकों पर उन्होंने ऐसी बातें बोली हैं, जो पार्टी की नज़र में अनुशासनात्मक कार्रवाई को न्योता देती नज़र आती हैं. इस बार भी शत्रुघ्न सिन्हा एक ऐसी ही ज़ुबानी जंग का हिस्सा बने हैं.
ट्विटर पर उन्होंने लिखा - नकारात्मक राजनीति और विरोधियों पर कीचड़ उछालना बहुत हुआ. चाहे केजरीवाल हों, लालू हों या सुशील कुमार मोदी. या तो अपने आरोपों के सबूत पेश करें या बस्ता बांध लें. मीडिया को सनसनीखेज़ ख़बरें देना बंद करें. निजी तौर पर मैं सभी राजनेताओं की, ख़ास तौर से केजरीवाल की, उनके संघर्ष, विश्वसनीयता और प्रतिबद्धता के लिए बहुत इज्ज़त करता हूं.
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उनकी ये बात उन्हीं की पार्टी के सुशील कुमार मोदी को ज़रा न भायी. उन्होंने पलटवार कहते कहा - जिस लालू के बचाव में नीतीश नहीं उतरे, उनके बचाव में भाजपा के ‘शत्रु’ कूद पड़े. ये ज़रूरी नहीं कि जो शख्स मशहूर है, उस पर ऐतबार किया जाए, जितनी जल्दी हो ऐसे गद्दारों को बाहर किया जाए.
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हालांकि बाद में अपनी बात संवारते हुए सुशील कुमार मोदी ने ये कहा कि मैं शत्रुघ्न सिन्हा की राजनीति का फैन भले ही ना होऊं, लेकिन फ़िल्मी फैन ज़रूर हूं. वो मेरे बड़े भाई और सम्मानित नेता हैं. मैं उनका बहुत आदर करता हूं.
मैंने जो ट्वीट किया है वो किसी ख़ास नेता पर नहीं है. किसी को ऐसा लगे तो मैं कुछ नहीं कर सकता. शत्रु यानी बीजेपी का शत्रु. अगर किसी को लगता है कि वो बीजेपी का शत्रु है तो ये उनकी समझदारी विषय है.
शत्रुघ्न सिन्हा समय-समय पर अपनी पार्टी और उसके नेताओं की आलोचना करते रहे हैं. भाजपा के कद्दावर माने जाने वाले नेताओं में से एक शत्रुघ्न सिन्हा बिहार की राजनीति में भाजपा का बड़ा चेहरा रहे हैं.

पॉलिटिकल करियर

शत्रुघ्न सिन्हा ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1992 में की. नई दिल्ली लोकसभा सीट से राजेश खन्ना के खिलाफ़. यहां उपचुनाव हो रहे थे. लालकृष्ण आडवाणी ने गांधीनगर और नई दिल्ली दोनों सीटें जीती थीं. उन्होंने गांधी नगर की सीट रख कर, नई दिल्ली की छोड़ दी. उनकी जगह शत्रुघ्न सिन्हा को राजेश खन्ना के खिलाफ़ उतारा गया. शत्रुघ्न सिन्हा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि अपने दोस्त राजेश खन्ना के खिलाफ़ चुनाव लड़ना उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा रिग्रेट है.
इमेज सोर्स: यूट्यूब
इमेज सोर्स: यूट्यूब

इस उपचुनाव में राजेश खन्ना ने शत्रुघ्न सिन्हा को करीब 25,000 वोटों से हराया. जीत के बावजूद राजेश खन्ना के दिल से शत्रुघ्न सिन्हा के लिए नाराज़गी नहीं गई और उसके बाद उन्होंने कभी शत्रुघ्न सिन्हा से बात नहीं की. शत्रुघ्न सिन्हा ने फिर से दोस्ती की काफी कोशिश की, लेकिन ये मुमकिन न हो सका. राजेश खन्ना की 2012 में हुई मौत तक उनकी बात बिगड़ी ही रही.

वाजपेयी सरकार में मंत्री

1999 में एनडीए की सरकार बनी और अटल बिहारी वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने. इस सरकार के कार्यकाल में 2002 में मंत्रिमंडल में फेरबदल हुए. शत्रुघ्न सिन्हा को कैबिनेट मिनिस्टर बनाया गया. मई 2006 में उन्हें बीजेपी के कला और संस्कृति विभाग का मुखिया भी बनाया गया.

सांसद शत्रुघ्न सिन्हा

2009 में बिहार की पटना साहिब विधानसभा सीट से शत्रुघ्न सिन्हा ने सांसदी के लिए चुनाव लड़ा. कांग्रेस ने उनके खिलाफ़ ऐक्टर शेखर सुमन को उतारा था. शत्रुघ्न सिन्हा को चुनाव जीतने में कोई ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. शेखर सुमन तीसरे नंबर पर रहे. अपने तमाम विरोधी उम्मीदवारों के टोटल से ज़्यादा वोट (करीब 57 प्रतिशत) ले गए शत्रुघ्न सिन्हा. गौरतलब है कि पहले सिर्फ पटना की लोकसभा सीट हुआ करती थी. 2008 में हुए परिसीमन के बाद पाटलिपुत्र और पटना साहिब की दो सीटें वजूद में आईं. इस लोकसभा सीट से अब तक हुए दोनों चुनाव शत्रुघ्न सिन्हा ने जीते हैं.
इमेज सोर्स: बॉलीवुड लाइफ.
इमेज सोर्स: बॉलीवुड लाइफ.

2014 में जब दोबारा यहां चुनाव हुए तब भी शत्रुघ्न ही विजयी रहे. उन्होंने कांग्रेस के कुणाल सिंह को हराया. मत प्रतिशत इस बार भी पचास प्रतिशत से पार रहा. 55 परसेंट वोट बटोर ले गए शत्रुघ्न सिन्हा. इन चुनावों की एक दिलचस्प बात है. बहुचर्चित VVPAT मशीन का इस्तेमाल पहली बार इन्हीं चुनावों में हुआ था. पटना साहिब की सीट उन चुनिंदा सीटों में थी, जहां VVPAT मशीनों का इस्तेमाल हुआ. कहने का मतलब ये कि यहां से हुई शत्रुघ्न सिन्हा की बंपर जीत पर केजरीवाल तक सवाल नहीं उठा सकते.

‘शॉटगन’ की शूटिंग

अपनी बेबाकी के लिए मशहूर शत्रुघ्न सिन्हा ने कई बार ऐसी बातें कहीं या की हैं, जो पार्टी लाइन के विपरीत रही हैं. या जिनके निशाने पर बीजेपी या उसके नेता रहे हैं.
जब कीर्ति आज़ाद ने डीडीसीए में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे और उसकी ज़द में अरुण जेटली आये थे, तो शत्रुघ्न सिन्हा ने खुले तौर पर कीर्ति आज़ाद का समर्थन किया था. कीर्ति आज़ाद को ‘हीरो’ बताया था. कहा था कि 'बीजेपी पार्टी विथ डिफरेंस' की जगह 'पार्टी विथ डिफरेंसेस' बन गई है.
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2014 में जब लोकसभा चुनाव होने थे, तब ऐसी सुगबुगाहट थी कि भाजपा शत्रुघ्न सिन्हा की जगह रविशंकर प्रसाद को पटना साहिब सीट से उतारेगी. इन्हीं सरगोशियों के बीच शत्रुघ्न सिन्हा नीतीश कुमार से मिलने पहुंच गए. उनके टूटे अंगूठे की मिजाज़पुर्सी के बहाने. बीजेपी ने इशारा कैच कर लिया. जैसे इतना ही काफी नहीं हो, शत्रुघ्न सिन्हा ने नीतीश को ‘पीएम मटेरियल’ कह डाला. बात साफ़ थी. शत्रुघ्न सिन्हा पाला बदल भी सकते थे. हालांकि ये उन्होंने अपने मुंह से कभी नहीं कहा, लेकिन बीजेपी डर तो गई ही थी. उन्होंने पटना साहिब से शत्रुघ्न सिन्हा को ही उतारा, जिन्होंने ढाई लाख से ज़्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल की.
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फ़रवरी 2015 में दिल्ली चुनावों के नतीजे आने के ज़रा पहले उन्होंने कहा था,
“हार या जीत जो भी होगी, मोदी की होगी. मोदी कैप्टन हैं.”
ना सिर्फ यही, बल्कि अरविंद केजरीवाल को ‘अच्छा आदमी’ कह दिया था.
बिहार के विधानसभा चुनावों से पहले उन्होंने खुले तौर पर इस बात की आलोचना की थी कि भाजपा मुख्यमंत्री पद के लिए कैंडिडेट का ऐलान किए बगैर चुनाव लड़ रही है. उन्होंने नीतीश कुमार के लिए अपना स्नेह पब्लिकली जता कर भाजपा नेताओं को असहज कर दिया था.
कहा जाता है कि उन्होंने एक बार एक न्यूज़ एजेंसी से यहां तक कह दिया था कि वो मोदी कैबिनेट में मंत्री न बनाए जाने से हैरान हैं. जबकि वो वरिष्ठता, अनुभव और पॉपुलैरिटी में कई लोगों से आगे हैं.
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इमेज: पीटीआई.

अमित शाह की खुल के आलोचना करती एक बात तो आपको शुरू में ही बता चुके हैं. इसके अलावा वो एक बार पटना में अमित शाह से होने वाली एक पब्लिक मीटिंग भी जानबूझकर मिस कर चुके हैं. बाद में उन्होंने कहा था कि उन्हें न्योता नहीं मिला था.
बहरहाल, राजनीतिक हलकों में दबी ज़ुबान में ये चर्चा आम है कि अपने संसदीय क्षेत्र से अमूमन गायब रहने का खामियाज़ा शत्रुघ्न सिन्हा को भुगतना पड़ सकता है. 2014 की उनकी दूसरी जीत का सेहरा मोदी मैजिक के सर बांधने वाले राजनीतिक पंडितों का कहना है कि 2019 में तीसरी बार ये कर दिखाना उनके लिए मुश्किल होगा. और वो भी तब जब बीजेपी उनको तीसरी बार उतारना कबूल करे. उससे पहले उन्हें अपनी मुखरता का खामियाज़ा भी तो भुगतना पड़ सकता है.


 
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