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अपनी प्यारी बेटी से ये बातें कभी मत कहना

सवालों की झड़ी लगाते हो. उसकी ख़ुशी के लिए इतना तो कर ही सकते हो.

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फोटो - thelallantop

बातें बड़ी कॉमन हैं. कई बार की सुनी हुईं. मगर हम गौर नहीं करते. क्योंकि उन्हें सच मान बैठे हैं. वो क्या है न कि जब झूठ भी सलीके से बोला जाए और बार-बार बोला जाए तो वह कब सच बन जाता है, पता ही नहीं चलता. कुछ ऐसे ही बातें हैं जो मैंने अक्सर सुनीं. बेटी को और कितना पढ़ाओगे? जहेज़ की तैयारी कब शुरू करेंगे? आखिर उसे दूसरे ही घर जाना है? बेटी की शादी के लिए कुछ बचा भी रहे हो या नहीं? बेटी है बड़ी ज़िम्मेदारी है. पैदा होने से लेकर शादी तक बार-बार ये ही सवाल. इन सवालों के जवाब चाहे बाप की मुश्किल हल करते हो, मगर बेटी कमज़ोर, और कमज़ोर होती जाती है.

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घर में बार-बार लड़की को एहसास कराया जाता है, ये बाबुल का अंगना है. बेटी अभी बाप के घर है जैसी कहावतें गढ़ दी गई हैं. यानी अगर बेटी अपने बाप के घर है तो सब सही है. इस बात को इतनी बार बोला जाता है कि उसे एहसास हो जाए. यहां के अलावा उसे बाकी जगह परेशानियां ही उठानी पड़ेंगी. इतना प्यार लुटाएंगे कि बस पूछो मत साथ ही कहेंगे ये सब खुशियां यहीं हैं, कर लो मौज. ससुराल में ऐसा कुछ नहीं मिलेगा.

बेटी पैदा हुई. पहले तो उसका पैदा होना ही गलत समझा जाता था. मगर अब कुछ अक्ल आई है तो मुबारक बाद देने वाले आते हैं. मगर साथ ही एक जुमला पेश करते हैं. पहले अल्लाह बेटा ही दे देता तो अच्छा रहता. और अगर दूसरी भी बेटी हुई तो फिर वही मुबारकबाद, लेकिन अफ़सोस के साथ कि इस बार तो बेटी ही दे देता अल्लाह. खैर, मुझे इस बात में नहीं पड़ना है. मुझे तो प्यारे अम्मी-अब्बा से कुछ बात करनी हैं जो अपनी बेटी को खुश देखने के चक्कर में कब कमज़ोर बना बैठते हैं, उन्हें खुद इस बात का इल्हाम नहीं होता. फिर ऐसी नसीहतें शुरू होती हैं कि बेटी के दिमाग में ससुराल का खौफ बैठ जाए. सास का खौफ. रीति रिवाजों का खौफ. ये न करना वो न करना का खौफ. प्यारी सी नसीहत दी जाएंगी. 'जैसा सास कहे वैसा ही करना. कोई शिकायत न सुनने को मिले. मतलब ऐसी ऐसी बातें कि जैसे उसकी शादी नहीं, बल्कि वो उनसे दो दो हाथ करने जा रही है.
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सबसे खतरनाक तो ये बात होती है कि ससुराल में सब्र करना. मतलब अब चाहे कुछ भी हो जाए. बस लड़की को सब्र करना है. अगर कुछ बोलने की कोशिश करेगी तो वो उसकी बत्तमीजी में काउंट कर दिया जाएगा. ये सब्र कब उस लड़की पर ज़ुल्म बनके टूटना शुरू हो जाता है. पता ही नहीं चलता. मगर अम्मी अब्बा ये ही समझाते रहते हैं वो ससुराल है तेरी. न कि तेरे अपने अब्बा जी का घर. बर्दाश्त तो करना पड़ेगा. क्यों भाई, क्यों करना पड़ेगा. बर्दाश्त. अगर सब्र करने की आदत न डाली होती तो वो अपना हक़ नहीं मरने देती. ज़ुल्म को बर्दाश्त न करती. सब्र करना अलग बात है और ज़ुल्म सहकर चुप रह जाना अलग. अगर सब्र और ज़ुल्म का फर्क समझाया होता तो वो मज़बूत होती.
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एक और जुमला है जो मीठे ज़हर सा जिंदगी में घुल जाता है. जब बेटी रुखसत होकर ससुराल चली जाती है तो सबकुछ लड़की पर ही डाल दिया जाता है कि जैसे उसे ही एडजस्ट होना है, बाकी किसी ससुराल वालों को नहीं. जब उसे वहां ये ताने सुनने को मिलते हैं कि हमारे यहां ऐसा नहीं होता, ये तुम्हारे घर होता होगा. अपने घर की बातें अपने घर छोड़ो. मतलब एक लड़की जो कम से कम 18 साल एक घर में गुज़ार कर आई है उसे एकदम ऐसे चेंज करने की कोशिश की जाती है जैसे वो लड़की नहीं बल्कि कोई पीतल का बर्तन हो और उसपर फटाक से कलई चढ़ाएं और उसका इस्तेमाल कर लें.
जब ये परेशानियां वो झेलना शुरू करती है तो उसे समझाने के लिए एक और ज़हरीली लाइन परोस दी जाती है. 'अभी शुरुआत है.' शुरू के कुछ महीने में दिक्कतें आती ही हैं. सब ठीक हो जाएगा. और ये ठीक होने के इंतजार में कब घर टूट जाता है इसका अंदाज़ा अम्मी अब्ब्बा भी नहीं लगा पाते.
जब कुछ ज्यादा ही हद होती है तो लड़की अलग होने का फैसला करती है. मगर फिर उसे डराया जाता है. बेटी का असली घर उसका ससुराल ही होता है. वो तुम्हारा शौहर है अगर दो बातें झेल लोगी तो कुछ बुरा नहीं हो जाएगा.
किसी भी इन्सान के लिए आसान नहीं होता कि वो अपनी पुरानी जिंदगी को भुला दे. अतीत सामने आता है. बार-बार आता है. फिर क्यों बेटी से ही उम्मीद की जाती है कि वो अपनी पुरानी जिंदगी को भुला दे.
आप अपनी बेटी से खूब प्यार कीजिये. मोहब्बत लुटाइए. मगर बार बार उसके ज़हन में वो बातें न डालिए जिससे उसे लगने लगे कि उसकी जिंदगी महज़ सास, ससुराल और शौहर तक ही महदूद है. इनको खुश रखना है नहीं तो गुनाह-ए-अज़ीम हो जाएगा. उसकी जिंदगी इन बातों के अलावा भी खूबसूरत हो सकती है. अगर आप उसे ये बता सको कि सब्र कब तक करना है, ताकि वो सब्र समझकर ज़ुल्म को न बर्दाश्त करने लगे. उसे बताइए कि जो बाबुल का घर है वही ससुराल. ससुराल कोई खतरनाक जगह नहीं.


 

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