साए की ज़रूरत वहीं होती है जहां कड़ी धूप हो, जहां प्यासे बसते हो, वहीं पे फूटना चाहिए पानी का चशमा, ठंडी हवाओं के झोंके रेगिस्तान की ही ज़रूरत है और बोलती, चीखती सदाओं को वहीं से उठना चाहिए जहां आवाजों को कुचल देने का चलन हो.पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में अक्सर ये विरोधाभास नज़र आया है. जहां एक तरफ कट्टर मुल्लाशाही होशमंद आवाजों को निगल लेने के लिए तत्पर रहती है, वहीं दूसरी तरफ बोलने के हक के लिए हाथ आए हर ज़रिये को हथियार बनाते बहादुरों की पूरी की पूरी खेप नज़र आती है. तानाशाही का दौर हो या मुल्लाशाही का अंडर-करंट, विरोध में मुखर होती आवाजों की पाकिस्तान में कभी कोई कमी नहीं रही.
छोटी सी बात पर जहां सीधे जान चली जाने का ख़तरा हो वहां मुखालफ़त के झंडे को मज़बूती से थामे रहना हौसले का काम है. और इस हिम्मत का इश्तेहार बनते लोगों की वहां बहुतायत है.उनकी बनाई वेब-सीरीज ‘लेडीज ओनली’ आज कल पाकिस्तान में धूम मचा रही है. इसमें पाकिस्तानी महिलाओं की बातें महिलाओं द्वारा, महिलाओं के लिए की जा रही है. मुल्लाशाही के धुर्रे बिखेरती ये वेब-सीरीज लोगों के लिए उत्सुकता का विषय बनी हुई है. अब तक इसके चार एपिसोड आ चुके हैं. जिसके सब्जेक्ट रहे हैं, लड़कियों का हैरैसमेन्ट, वुमन प्रोटेक्शन बिल के खिलाफ़ मौलवियों का विलाप, बीच पर बुर्का और क़त्ल कर दी गई कंदील बलोच को श्रद्धांजलि.
इमेज कर्टसी: लेडिज ओनली फेसबुक पेज
पाकिस्तान की कुछ लड़कियां अपनी हैसियत भर लोहा ले रही है उन तमाम मूर्खताओं से जो एक पुरुषवादी, ओवर-रिलीजियस समाज ने उन पर लादी है. उस समाज से जो अतिवादी है, पाखंडी है, बेशर्म है, क्रूर है. जहां ना सिर्फ ईश्वर की निंदा बल्कि सेट किए गए हर एक सामाजिक नियम के खिलाफ़ जाना ब्लास्फेमी है. जहां सोसाइटी का एक कलेक्टिव जजमेंट है चीज़ों के बारे में और वो हद दर्जे का एंटी-वुमन है. इन्हीं धारणाओं, वर्जनाओं को तोड़ने की कोशिशों में लगी है अनम अब्बास और उनकी टीम.
अनम अब्बास कहती है, “ये सब मुमकिन हो पाया उन दोस्तों की मौजूदगी से जो मदद को आगे आए, जिन्होंने एक्ट करने की हामी भरी, एडिटिंग में हाथ बंटाया, सोशल मीडिया पर सपोर्ट किया. ‘लेडीज ओनली’ मुझे और हम सबको अपनी कल्पनाओं को जीने की आज़ादी देती हैं.”
आगे अनम ने बताया, “एपिसोड चार, जो कि कंदील बलोच पर था, को फिल्माना बहुत पावरफुल काम था. हम सब गुस्से और ग़म से भरे हुए थे. मुझे नहीं लगता हम उसको कभी भुला पाएंगे.”
इस वेब सीरीज के लिए कंटेंट तलाशने के लिए अनम को कहीं दूर नहीं जाना पड़ा. तमाम संवाद उन्हें सोशल मीडिया के तलबारबाजों ने उपलब्ध कराएं. पहले एपिसोड में जो ‘उदारवादी मुल्ला’ का किरदार है, उसके डायलॉग्स असल में ट्रिब्यून और डॉन में छपे आर्टिकल्स पर आए लोगों के कमेंट्स हैं. हकीकत ही इतनी नंगी थी कि पैकेजिंग की ज़रूरत ही नहीं पड़ी. बस जैसा पाया वैसा ही परोस दिया. पीटीवी की एंकर माहा मखदूम और फेसबुक से जुड़े मुनीर अहमद ने इसमें काम किया है.एक और एपिसोड में एक खोई खोई लड़की है जो बीच पर घूम रही है, सड़कों पर दौड़ रही है, डांस कर रही है और इस सारे वक़्त एक लबादे में लिपटी हुई है. कंदील बलोच वाले एपिसोड में पाकिस्तानी हुक्मरानों और तानाशाहों के मुखौटे लगाए लोग दिखते हैं. और बैकग्राउंड में आवाज़ गूंजती रहती है, ‘कौम की बेटी, कौम की बेटी, कौम की बेटी.......’ मज़हब के नाम पर बेटियों के क़त्ल कर देने वाले समाज पर बहुत तीखा तमाचा है ये फ़िकरा.

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रूढ़िवाद को धक्का देने और एक बेहतर समाज बनाने के इरादे से बनी ये वेब-सीरीज धूम मचा रही है. अनम बताती है कि चार एपिसोड के बाद अब ढेर सारे मैसेज आने लगे हैं जो एक्टिंग, लेखन या किसी भी तरह की मदद पेश करते हैं. संभावनाओं का एक नया दर खुला है उनके आगे.
पाकिस्तान ऐसा मुल्क है जहां आख़िरी पायदान पे खड़े आदमी से लेकर सर्वोच्च सीट पर बैठे शख्स तक कोई महफूज़ नहीं. मज़हबी लॉजिक से चली गोली किसी भी खोपड़ी को निशाना बनी सकती है.
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ये सब उस पाकिस्तान में हो रहा है जहां बोलती आवाजों को खामोश करने का लंबा इतिहास है. पिछले कुछ दिनों में चार एक्टिविस्ट लापता हैं. ‘मैं भी काफ़िर’ नज़्म लिखने वाले सलमान हैदर भी गायब हैं. ब्लास्फेमी लॉ का विरोध करने पर जहां एक गवर्नर को सरेआम क़त्ल कर दिया जाता हो वहां आम आदमी की बिसात ही क्या!
शाबाश अनम एंड टीम!
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नमूने के लिए एक छोटा सा टीज़रनुमा वीडियो दिखा रहे हैं. बाकी के लिए मेहनत कीजिये. सर्च करके देखिए.
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