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पाकिस्तान की बजबजाती गंदगी का ये एक नमूना है

वो लिखता रहा काफ़िर, काफ़िर, काफ़िर…! ये भी काफ़िर, वो भी काफ़िर! बिना किसी डर के कहता रहा. वो सोशल एक्टिविस्ट भी है. प्रोफेसर भी है और शायर भी. अब वो कहां हैं कोई कुछ बताने वाला नहीं. बीवी है. जो बार बार ये ही कह रही है. रात 8 बजे तक लौट आने को कहा था. इंतजार में 10 बज गए. मगर वो नहीं आए. रिश्तेदार ढूंढ रहे हैं. मगर ख़ूबसूरती से सबको काफ़िर बताकर ये शख्स कहां गायब हो गया. तीन दिन बीत गए. अभी तक पता नहीं चला. हमारे पास उनकी वो नज़्म है जिसने लोगों पर अमिट छाप छोड़ दी है. और वो नज़्म ‘काफ़िर’ ही है.

पाकिस्तान. हां ये पाकिस्तान में ही हुआ है. प्रोफेसर सलमान हैदर. शायर भी सोशल एक्टिविस्ट भी. कट्टरपंथियों को अच्छे से धोया. उनकी कट्टरता की धार को कुंद किया. फातिमा जिन्ना यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं. आखिरी बार इस्लामाबाद में दिखे थे. शुक्रवार की रात से लापता हैं. महज़ वो अकेले नहीं हैं. जिनको गायब किया गया है. उनके अलावा तीन और एक्टिविस्ट पाकिस्तान में गायब कर दिए गए. यानी पांच दिन में सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाले चार लोगों को लापता कर दिया गया.

असीम सईद
असीम सईद

AFP एजेंसी को साइबर सिक्योरिटी NGO ने बताया कि वक़ास गोराया और असीम सईद 4 जनवरी से लापता हैं. अहमद रज़ा नसीर शनिवार से गायब हैं. ये सभी सोशल मीडिया पर बहुत एक्टिव थे. अहमद रज़ा नसीर के रिश्तेदार का कहना है वो तो पोलियो से पीड़ित हैं. आंतरिक मामलों के मंत्री चौधरी निसार का कहना है कि जांच एजेंसियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं लापता लोगों को खोज निकालने के लिए पुलिस जुटी हुई है.

अहमद वक़ास
अहमद वक़ास गोराया

एक सिक्योरिटी अफसर ने AFP को बताया कि चारों लोगों के गायब होने में इंटेलिजेंस सर्विस का हाथ नहीं है. पाकिस्तान में पत्रकारों, सोशल एक्टिविस्टों के लिए हालात बहुत बुरे हैं. कब कट्टरपंथियों का निशाना बन जाएं, नहीं पता. कट्टरपंथियों के मन की बात न होने पर उन्हें पीता जाता है. धमकाया जाता है. और क़त्ल कर दिया जाता है.

ये पाकिस्तान में आपातकाल है. विरोध स्वर का खामोश होना जम्हूरियत को मरते हुए देखना है. आज वो गायब हैं. कल किसी और का नंबर होगा. सिस्टम से सवाल किया जाना चाहिए आखिर कहां हैं ये ह्यूमन राइट्स की बात करने वाले.

अब तक ज्यादा जानकारी प्रोफेसर और शायर सलमान हैदर के बारे में ही मिली है. शुक्रवार की रात सलमान इस्लामाबाद के बानी गाला इलाके में अपने दोस्तों के साथ थे. उन्होंने अपनी बीवी को फ़ोन किया और कहा कि वह रात आठ बजे तक घर लौट आएंगे. सलमान जब रात 10 बजे तक घर नहीं लौटे तो उनकी बीवी ने फोन किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

सलमान के भाई जीशान हैदर ने कहा, ‘सलमान की बीवी के मोबाइल पर एक मैसेज आया कि वह कोरल चौक इलाके से अपनी कार घर ले जाएं. वहां पुलिस के साथ पहुंचे तो कार तो थी. मगर सलमान का पता नहीं था.’

राइटर और एनालिस्ट रज़ा रूमी साल 2014 में खुद पर हुए हमले के बाद पाकिस्तान को छोड़ चुके हैं. उनपर एक गनमैन ने हमला किया था, जिसमें उनके ड्राईवर को गोली लगी थी और वो मर गया था. तभी से वो पाकिस्तान से बाहर रह रहे हैं. उन्होंने ट्वीट किया, ‘स्टेट ने टीवी को तो कंट्रोल कर लिया अब सोशल मीडिया पर फोकस किया जा रहा है.’

प्रोफेसर सलमान हैदर
प्रोफेसर सलमान हैदर

मैं भी काफ़िर, तू भी क़ाफ़िर

सलमान हैदर ने मुस्लिम उलेमाओं की कट्टरता पर तंज़ कसते हुए काफ़िर नज़्म लिखी थी. क्योंकि कहीं कोई बात हुई ये मौलवी लोग फ़ौरन काफ़िर का फतवा लांच कर देते थे. सलमान हैदर की कविताओं का तंज़ तिलमिला देने के लिए काफी है. तो आप खुद पढ़िए

मैं भी काफ़िर, तू भी क़ाफ़िर
मैं भी काफ़िर, तू भी क़ाफ़िर
फूलों की खुशबू भी काफ़िर
शब्दों का जादू भी काफ़िर
यह भी काफिर, वह भी काफिर
फ़ैज़ भी और मंटो भी काफ़िर

नूरजहां का गाना काफिर
मैकडोनैल्ड का खाना काफिर
बर्गर काफिर, कोक भी काफ़िर
हंसी गुनाह, जोक भी काफ़िर
तबला काफ़िर, ढोल भी काफ़िर
प्यार भरे दो बोल भी काफ़िर
सुर भी काफिर, ताल भी काफ़िर
भांगरा, नाच, धमाल भी काफ़िर
दादरा, ठुमरी, भैरवी काफ़िर
काफी और खयाल भी काफ़िर
वारिस शाह की हीर भी काफ़िर

चाहत की ज़ंजीर भी काफ़िर
जिंदा-मुर्दा पीर भी काफ़िर
भेंट नियाज़ की खीर भी काफ़िर
बेटे का बस्ता भी काफ़िर
बेटी की गुड़िया भी काफ़िर
हंसना-रोना कुफ़्र का सौदा
गम काफ़िर, खुशियां भी काफ़िर

जींस भी और गिटार भी काफ़िर
टखनों से नीचे बांधो तो
अपनी यह सलवार भी काफ़िर
कला और कलाकार भी काफ़िर
जो मेरी धमकी न छापे
वह सारे अखबार भी काफ़िर
यूनिवर्सिटी के अंदर काफ़िर
डार्विन भाई का बंदर काफ़िर
फ्रायड पढ़ाने वाले काफ़िर
मार्क्स के सबसे मतवाले काफ़िर

मेले-ठेले कुफ़्र का धंधा
गाने-बाजे सारे फंदा
मंदिर में तो बुत होता है
मस्जिद का भी हाल बुरा है
कुछ मस्जिद के बाहर काफ़िर
कुछ मस्जिद में अंदर काफ़िर
मुस्लिम देश में अक्सर काफ़िर
काफ़िर काफ़िर मैं भी काफ़िर
काफ़िर काफ़िर तू भी काफ़िर

पिछले साल एक एक्टिविस्ट को गोली मार दी गई

मई 2016 की खबर है. पाकिस्तान के जाने-माने पत्रकार और ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट ख़ुर्रम ज़की को कराची में गोली मारी गई. इस गोली ने उन्हें दुनिया से रुखसत कर दिया था. इस हमले की ज़िम्मेदारी पाकिस्तान तालिबान ने ली और कहा, ‘इस्लामाबाद की लाल मस्जिद के इमाम अब्दुल अज़ीज़ के ख़िलाफ़ ख़ुर्रम ज़की के बयानों की वजह से उसको मार गया है.’

khurram
खुर्रम ज़की का जनाज़. source Reuters

ज़की और अन्य लोगों ने अब्दुल अज़ीज़ के ख़िलाफ़, शिया कम्युनिटी के लोगों के ख़िलाफ़ नफ़रत और हिंसा भड़काने का मामला दर्ज कराया था. हमलावरों ने जिस वक्त गोलियां चलाईं उस वक्त वो किसी के साथ खाना खा रहे थे. इस गोलीबारी में दो और लोग जख्मी हुए थे. ख़ुर्रम ज़ाकी ‘लेट अस बिल्ड पाकिस्तान’ वेबसाइट के एडिटर थे. ये वेबसाइट पाकिस्तान में सांप्रदायिकता की मुख़ालफ़त और डेमोक्रेसी की हिमायती है.

ये रहा वीडियो, सुन लो सलमान हैदर को

 

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