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प्लेन क्रैश में देश शोक में, लेकिन ट्रोल पूछ रहे हैं 'पायलट महिला थी क्या?'

अजित पवार की प्लेन क्रैश में मौत के बाद सोशल मीडिया का एक धड़ा उस एयरक्राफ्ट की को-पायलट सांभवी पाठक को ट्रोल कर रहा है. इस हादसे के लिए सांभवी और उनके जेंडर को निशाना बनाया जा रहा है. यह लेख दुख की घड़ी में जेंडर के आधार पर दोष ढूंढने वाली सोच को आईना दिखाने की कोशिश करता है.

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देश हादसे से टूटा था, ट्रोल मानसिकता नहीं टूटी

महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश में आज एक अजीब सा सन्नाटा है. एक बड़ा नेता, दशकों से राजनीति का स्थिर चेहरा, अचानक प्लेन क्रैश में चला गया. 28 जनवरी 2026 को बारामती एयरपोर्ट पर लैंडिंग के दौरान विमान क्रैश हुआ और अजित पवार समेत कई लोगों की मौत हो गई. 

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शुरुआती जांच में खराब विजिबिलिटी और लैंडिंग एप्रोच के दौरान समस्या जैसे कारण सामने आ रहे हैं, हालांकि जांच जारी है. लेकिन… दुख की इस घड़ी में भी कुछ लोग अपनी छोटी सोच का ढोल पीटने से बाज नहीं आ रहे. और यही असली कहानी है.

देश दुख में है… लेकिन ट्रोल फैक्ट्री ओवरटाइम पर है

देश शोक में है. पर इंटरनेट का एक कोना आज भी वही पुराना खेल खेल रहा है. किसी ने लिखा,

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देखा… इसलिए कहते हैं महिला पायलट रिस्क होती हैं.

दूसरा बोला,

इमोशनल होकर प्लेन उड़ाया होगा.

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तीसरा ज्ञान दे रहा है,

डिफेंस और एविएशन में जेंडर इक्वालिटी नहीं चलती.

ये वही लोग हैं जिन्हें बाइक स्टार्ट करने से पहले भी यूट्यूब ट्यूटोरियल चाहिए. लेकिन एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट की जांच इनसे बेहतर कोई नहीं कर सकता.

ट्रोल लॉजिक: डिग्री शून्य, आत्मविश्वास सुपर सोनिक

एविएशन में हजारों पैरामीटर होते हैं. मिसाल के तौरपर,

  • वेदर
  • एयर ट्रैफिक
  • मशीन
  • मेंटेनेंस
  • एप्रोच एंगल
  • रनवे विजिबिलिटी

पर ट्रोल साइंस कहती है कि अगर महिला है… तो वही कारण है.  यानी ब्लैक बॉक्स बाद में देखेंगे. पहले वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी का व्हाइट पेपर पढ़ेंगे.

कर्नल सोफिया कुरैशी… और वही पुरानी बीमारी

याद है… जब कर्नल सोफिया कुरैशी को ट्रोल किया गया था. कहा गया,

महिलाएं युद्ध नहीं लड़ सकतीं.

इतिहास क्या कहता है…रानी लक्ष्मीबाई, प्टन तान्या शेरगिल, फाइटर पायलट अवनि चतुर्वेदी जैसी ना जाने कितनी महिलाएं मध्यकाल से लेकर आज तक अपनी बहादुरी को लोहा मनवा चुकी हैं. 
पर ट्रोल इतिहास नहीं पढ़ते, वो सिर्फ कमेंट सेक्शन लिखते हैं.

ट्रोलिंग का असली मतलब: डर

सच ये है कि इन लोगों को महिला सफलता से डर लगता है. क्योंकि, अगर महिला प्लेन उड़ा सकती है तो वह ऑफिस भी चला सकती है. घर चला सकती है तो देश भी चला सकती है.
और फिर ऐसा हर दूसरी महिला करने लगी तो “घर संभालो” वाला डायलॉग फेल हो जाता है.

इक्कीसवीं सदी… लेकिन सोच मध्यकालीन

2026 चल रहा है. AI आ गया. स्पेस मिशन चल रहे है. इलेक्ट्रिक एयरक्राफ्ट टेस्ट हो रहे हैं. पर कुछ दिमाग अभी भी “लड़कियां स्कूटी तक ठीक हैं” मोड में हैं
ये वही लोग हैं, जो फ्लाइट में बैठकर कहते हैं “पायलट महिला है क्या?” और फिर उसी प्लेन से उतरकर कहते हैं “जय हिंद”.

एक्सीडेंट में जेंडर नहीं होता

विमान हादसे टेक्निकल, एनवायरनमेंटल और ऑपरेशनल फैक्टर्स से होते हैं. रिपोर्ट्स में साफ है कि खराब विजिबिलिटी और लैंडिंग एप्रोच जैसे मुद्दे जांच में हैं. लेकिन ट्रोल के लिए फैक्ट्स से ज्यादा जरूरी है ईगो.

सोशल मीडिया का नया कीचड़ युग

पहले लोग अफवाह चाय की दुकान पर फैलाते थे. अब 4K क्वालिटी में फैलाते हैं. पहले 5 लोग सुनते थे. अब 5 लाख पढ़ते हैं. और सबसे खतरनाक बात ये लोग खुद को “रियलिस्ट” कहते हैं

सवाल ये नहीं कि ट्रोल क्यों हैं, सवाल ये है कि हम चुप क्यों हैं

जब कोई महिला ऑफिस में लीडर बनती है. जब कोई लड़की फाइटर पायलट बनती है. जब कोई महिला वैज्ञानिक बनती है. तब समाज का असली टेस्ट शुरू होता है.

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असली श्रद्धांजलि क्या होगी

अजित पवार जैसे नेता की मौत एक राजनीतिक और सामाजिक झटका है. राज्य की राजनीति और प्रशासन पर इसका असर लंबे समय तक रहेगा. 

लेकिन असली श्रद्धांजलि ये नहीं कि हम मोमबत्ती जलाएं. असली श्रद्धांजलि ये होगी कि हम दिमाग जलाएं.

आखिरी बात

अगर प्लेन हादसा होता है. तो जांच एजेंसियां कारण निकालती हैं. अगर समाज हादसा करता है. तो कारण हम होते हैं. आज फैसला करना है. हम जांच का हिस्सा बनेंगे या समस्या का.

वीडियो: अजित पवार के साथ प्लेन क्रैश में मारे गए अन्य 4 लोगों के बारे में क्या पता चला?

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