The Lallantop

'सवर्ण विरोधी' बताए जा रहे UGC के नए नियमों की एक-एक बात जान लीजिए

UGC Regulations Row: छात्रों का एक वर्ग इन नियमों को वापस लेने की मांग कर रहा है. उनका आरोप है कि ये नियम ‘जनरल कैटेगरी’ के छात्रों के उत्पीड़न का कारण बन सकते हैं. आखिर इस रेगुलेशन में ऐसा क्या है?

Advertisement
post-main-image
देश भर में छात्रों का एक वर्ग UGC के नए नियमों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहा है. (फोटो: इंडिया टुडे)

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर देशभर में बवाल है. छात्रों का एक वर्ग इन नियमों को वापस लेने की मांग कर रहा है. उनका आरोप है कि ये नियम ‘जनरल कैटेगरी’ के छात्रों के उत्पीड़न का कारण बन सकते हैं और इससे सवर्ण छात्र 'स्वाभाविक अपराधी' की तरह देखे जाएंगे. यूपी में बीजेपी पदाधिकारियों और बरेली सिटी मजिस्ट्रेट ने तो इन नियमों के विरोध में इस्तीफा तक दे दिया. आखिर इस रेगुलेशन में ऐसा क्या है, जिसका इतना विरोध हो रहा है (UGC New Guidelines 2026 Explained)? 

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement
UGC के नए नियम क्या हैं?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी कोप्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026 नाम से एक नोटिफिकेशन जारी किया था. यह रेगुलेशन 15 जनवरी 2026 से देशभर के यूनिवर्सिटी-कॉलेज में लागू हो गया. इन नियमों का मकसद शैक्षणिक संस्थानों से धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान, नस्ल या विकलांगता के आधार पर भेदभाव को खत्म करना है. साल 2012 में भी UGC ने कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में जातीय भेदभाव रोकने के लिए इसी नाम से (प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस) कुछ नियम बनाए गए थे. UGC के नए नियम भी 2012 के उसी रेगुलेशन की जगह लेते हैं और उन्हें आगे बढ़ाते हैं. 

इन नियमों को लागू कैसे किया जाएगा?

UGC के नए नियमों का मकसद कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में हर तरह के भेदभाव को खत्म करना है. इन नियमों को लागू करने के लिए, हर संस्थान में ‘समान अवसर केंद्र’ (Equal Opportunity Centre-EOC), ‘समता समिति’ (Equity Committee) और ‘समता दल’ (Equity Squads) होना जरूरी है. आइए जानते हैं कि ये तीनों क्या हैं और उनका काम क्या है ?

Advertisement

इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर (EOC)

नए नियमों के मुताबिक, हर कॉलेज-यूनिवर्सिटी में एक ‘इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर’ होगा. इसका काम होगा- कमजोर और वंचित वर्ग से जुड़ी नीतियों को सही तरीके से लागू कराना. जरूरत पड़ने पर यह जिला प्रशासन और पुलिस से बात भी करेगा और कानूनी मदद भी दिलाएगा. इस सेंटर में संस्थान के 5 फैकल्टी मेंबर होंगे लेकिन इन 5 पदों पर किसी तरह का आरक्षण नहीं होगा. 

इक्विटी कमेटी

Advertisement

इक्वल अपॉर्च्युनिटी सेंटर (EOC) के अंदर 10 लोगों की एक कमेटी बनेगी. नाम होगा- इक्विटी कमेटी. इसके अध्यक्ष संस्थान के प्रमुख (प्रिंसिपल/कुलपति) होंगे. इन 10 में से 5 सदस्य आरक्षित वर्गों से होंगे यानी ओबीसी, दिव्यांग, एससी-एसटी और महिलाएं. नियमों के मुताबिक, अगर कोई शिकायत आती है तो कमेटी 24 घंटे के अंदर मीटिंग करेगी और 15 दिनों के अंदर अपनी रिपोर्ट संस्थान प्रमुख को देगी. इसके बाद संस्थान प्रमुख को 7 दिनों के भीतर कार्रवाई शुरू करनी होगी.

इक्विटी स्क्वाड

यह टीम कैंपस में किसी भी तरह के भेदभाव पर नज़र रखेगी और उसे रोकने का काम करेगी. इस टीम के लोग लगातार एक्टिव रहेंगे और संवेदनशील जगहों पर बार-बार दौरा करेंगे. भेदभाव की शिकायत के लिए 24 घंटे की इक्विटी हेल्पलाइन भी होगी. 

ये नियम 2012 के नियमों से अलग कैसे हैं?

भेदभाव की साफ परिभाषा

UGC के नए नियमों में भेदभाव को साफतौर पर परिभाषित किया गया है. जबकि 2012 वाले नियमों में भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा नहीं थी. नए नियमों में कहा गया है, 

जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जन्म-स्थान, विकलांगता के आधार पर कोई भी गलत या पक्षपाती व्यवहार, जो पढ़ाई में बराबरी में बाधा बने या मानव गरिमा के खिलाफ हो, उसे जातिगत भेदभाव माना जाएगा.

OBC और EWS भी शामिल

साल 2012 के नियमों में OBC छात्रों का जिक्र तक नहीं था. उसमें सिर्फ इतना लिखा था कि SC और ST छात्रों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए. नई परिभाषा में एससी/एसटी के अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और आर्थिक रूप से कमजोर (EWS) छात्रों को भी शामिल किया गया है. नए नियमों में कहा गया है कि OBC और EWS के खिलाफ किसी भी पक्षपातपूर्ण व्यवहार को जाति-आधारित भेदभाव माना जाएगा.

ugc new guidelines 2026 explained
(फोटो: UGC)

‘झूठी शिकायत’ करने पर सजा का प्रावधान हटा

पिछले साल जारी किए ड्राफ्ट में झूठी शिकायतों को कम करने के लिए भी प्रावधान था. इसमें कहा गया था कि अगर जानबूझकर किसी के खिलाफ झूठी शिकायत की गई तो शिकायत करने वाले को जुर्माना या सस्पेंड किया जा सकता था. लेकिन नए नियमों से ये प्रावधान हटा लिया गया है. इसी प्रावधान को हटाए जाने को लेकर सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है. आरोप लग रहे हैं कि इससे सवर्ण छात्रों को निशाना बनाया जा सकता है.

सजा का स्पष्ट प्रावधान 

साल 2012 में जो नियम बने थे, उनमें साफ सजा तय नहीं थी और न ही उसमें सजा लागू कराने की ताकत थी. बस इतना कहा गया था कि भेदभाव या उत्पीड़न हुआ तो उसकी गंभीरता के हिसाब से कार्रवाई होगी लेकिन अगर कोई कॉलेज या यूनिवर्सिटी इन नियमों को माने ही नहीं तो उसके खिलाफ क्या होगा, यह कहीं साफ नहीं लिखा था. पुराने नियमों में यह भी कहा गया था कि संस्थानों में इक्वल अपॉर्च्युनिटी सेंटर बनाए जाएंगे, लेकिन उसमें कौन लोग होंगे, उनकी ज़िम्मेदारी क्या होगी और भेदभाव की शिकायत आने पर क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी, यह स्पष्ट नहीं था.

नए नियमों में यह कमी दूर करने की कोशिश की गई है. अब UGC राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी करेगा कि नियम सही से लागू हो रहे हैं या नहीं. अगर कोई संस्थान नियम नहीं मानता तो उसके खिलाफ सख़्त कदम उठाए जा सकते हैं. ऐसे संस्थानों को UGC की योजनाओं से बाहर किया जा सकता है. यहां तक कि UGC की मान्यता भी रद्द की जा सकती है.

UGC को क्यों लगा कि अब ये नया नियम लाना ज़रूरी हो गया है?

तारीख 17 जनवरी 2016. हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में 27 साल के रोहित वेमुला ने अपनी जान दे दी. रोहित पीएचडी स्कॉलर थे और कैंपस में दलित छात्रों के हक की बात करते थे. वे अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन से भी जुड़े हुए थे. आरोप है कि एक छात्र नेता की शिकायत के बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने रोहित के साथ भेदभाव किया. उन्हें कैंपस से बाहर कर दिया गया और लगातार मानसिक दबाव में रखा गया. इसी तनाव के चलते उन्होंने हॉस्टल के एक कमरे में आत्महत्या कर ली. उनके सुसाइड नोट ने पूरे देश को झकझोर दिया. जल्द ही इस आत्महत्या को ‘सांस्थानिक हत्या’ (इंस्टीट्यूशनल मर्डर) कहा जाने लगा. 

इसी तरह, साल 2019 में मुंबई के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाली डॉक्टर पायल तड़वी ने अपनी जान दे दी. आरोप है कि उनके साथ भी जातिगत भेदभाव हुआ. पायल ST कैटेगरी से थीं. आरोप है कि तीन सीनियर महिला डॉक्टरों ने उन पर जातिगत टिप्पणियां कीं. परिवार ने बताया कि अपमान और मानसिक दबाव की वजह से पायल टूट चुकी थी. 22 जनवरी 2019 को पायल ने अपने हॉस्टल में फांसी लगाकर जान दे दी. 

इसी तरह जातिगत भेदभाव से परेशान होकर 12 फरवरी 2023 को IIT बॉम्बे में पढ़ने वाले छात्र दर्शन सोलंकी ने भी आत्महत्या कर ली. 

ये फेरहिस्त बहुत लंबी है. इन घटनाओं के बाद सवाल उठने लगे कि क्या ये सिर्फ आत्महत्याएं हैं या जातिगत भेदभाव से उपजी ‘सांस्थानिक हत्याएं’. 

UGC के आंकड़े भी तो इसी तरफ इशारा कर रहे हैं. 

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में UGC ने संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट के सामने आंकड़े पेश किए, जिनसे पता चला कि यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों में पिछले 5 सालों में 118.4% की बढ़ोतरी हुई है. आंकड़ों से पता चला कि दर्ज की गई घटनाओं की संख्या 2019-20 में 173 से बढ़कर 2023-24 में 378 हो गई.

UGC के नए नियम सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका के बाद बनाए गए हैं. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह याचिका पायल तड़वी और रोहित वेमुला की माताओं ने दायर की थी. दोनों छात्रों ने जाति-आधारित भेदभाव से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी. याचिकाकर्ता अबेदा सलीम तड़वी और राधिका वेमुला ने अदालत को बताया कि अगर 2012 के ‘समानता नियमों’ को ठीक से लागू किया गया होता तो शायद उनकी जान बच गई होती.

उन्होंने मांग की कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए मजबूत और असरदार व्यवस्था बनाई जाए, ताकि भविष्य में ऐसे मामले न हों. इस पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने 3 जनवरी 2025 को साफ कहा कि नियम सिर्फ कागज़ी या दिखावे के लिए नहीं होने चाहिए, बल्कि जमीन पर असर दिखना चाहिए. इसके बाद फरवरी 2025 में नए इक्विटी (समानता) नियमों का मसौदा जनता की राय के लिए जारी किया गया. फिर अप्रैल 2025 में अदालत ने कहा कि UGC इन नियमों को आखिरी रूप देकर लागू कर सकती है.

विरोध क्यों हो रहा है?

UGC के इन नए नियमों के लागू होने के बाद से एक बड़ा वर्ग इसका विरोध कर रहा है. जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने मिलकर ‘सवर्ण समाज समन्वय समिति’ (एस-4) का गठन किया है और एक बड़े संगठन के बैनर तले इस रेगुलेशन के विरोध में बड़ा आंदोलन कर रहे हैं.

सोशल मीडिया पर भी #UGCRollBack और #ShameOnUGC जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं. कई अकाउंट्स यह आरोप लगा रहे हैं कि ये नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों के लिए ‘अन्यायपूर्ण’ हैं और सरकार द्वारा OBC वोटरों को साधने की तैयारी है. आलोचक इन नए नियमों में कई तरह की खामियां बता रहे हैं.

झूठी शिकायत पर कोई सजा नहीं

आलोचकों का आरोप है कि इन नियमों के जरिए जनरल कैटेगरी के छात्रों को निशाना बनाया जा सकता है. उनका कहना है कि अगर कोई छात्र दुर्भावना से झूठी शिकायत करता है तो उसके खिलाफ नए नियमों में कोई प्रावधान नहीं है.

भेदभाव की परिभाषा में सवर्ण छात्रों का जिक्र नहीं

नए नियमों में भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा बताई गई है. सवर्ण छात्रों का आरोप है कि इस परिभाषा में उनका जिक्र नहीं है. बरेली के निलंबित सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने यह आरोप लगाकर ही इस्तीफा दिया था कि नया नियम सामान्य वर्ग के छात्रों को ‘स्वघोषित अपराधी’ बनाने जैसा है. उन्होंने आरोप लगाया,

इससे सिर्फ एक ही चीज हो सकती है. सामान्य वर्ग के बेटे-बेटियों का या तो शोषण होगा. या बेटियों पर जिनकी बुरी नजर होगी। वो समता समिति के जरिए फर्जी शिकायतें करेंगे. इससे बेटियों को या तो जान देने के लिए मजबूर करेंगे या उन्हें शारीरिक शोषण के लिए मजबूर करेंगे.

बीजेपी के सीनियर नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ संजय सिंह का कहना है कि निर्णय प्रक्रिया में सभी वर्गों की भागीदारी जरूरी है, जिससे किसी भी तरह की असमानता न रहे.

शिक्षा मंत्री ने दी सफाई

इन सबके बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पूरे मामले पर आश्वासन देते हुए कहा कि किसी को भी भेदभाव के नाम पर कानून का दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी

प्रधान ने कहा कि नियमों का निष्पक्ष पालन सुनिश्चित करना UGC, केंद्र और राज्य सरकारों की सामूहिक जिम्मेदारी है.  

बता दें कि UGC के नए नियमों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर की गई है. एडवोकेट विनीत जिंदल की तरफ से दायर याचिका में कहा गया है कि ये नियम जनरल कैटेगरी के साथ भेदभाव करते हैं और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं.

वीडियो: जाति को लेकर 'डर' था! रोहित वेमुला सुसाइड केस की क्लोजर रिपोर्ट में क्या लिखा है?

Advertisement