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नरेंद्र भाई के नए दोस्त: नीतीश और नवीन?

अमित शाह के दिमाग में आखिर क्या चल रहा है?

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फोटो - thelallantop
'मैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का स्वागत करता हूं कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की काले धन के खिलाफ लड़ाई को समर्थन दिया है.'
ये बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के शब्द थे. दो दिन पहले कर्नाटक में रैली में उन्होंने ये बात कही. नोटबंदी ने देश में राजनीतिक समीकरणों की शिकंजी बना दी है और सबसे ज्यादा धुआं बिहार से आ रहा है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 'सैद्धांतिक' आधार पर नोटबंदी के फैसले के साथ हैं, जबकि प्रदेश में उनकी साझेदार आरजेडी नोटबंदी के खिलाफ है.

अब मतभेद है कि मनभेद है?

आपका दोस्त, दुश्मन के किसी कदम की तारीफ कर बैठे तो त्यौरियां चढ़ेंगी ही. इसीलिए बिहार में महागठबंधन के कमजोर होने और नीतीश-बीजेपी के पुनर्मिलन की संभावनाओं की सुगबुगाहटें चल निकली हैं. ये सुगबुगाहटें ही हैं, पर सोचने में क्या जाता है. किसने सोचा था कि नीतीश-लालू 2015 का चुनाव मिलकर लड़ेंगे. नीतीश ने हाल में बिहार से बाहर पांव पसारने और राष्ट्रीय स्तर पर मोदी का प्रतिद्वंद्वी दिखने की कोशिश की है. इसलिए नोटबंदी पर उनका अचानक सरकार को समर्थन किसी के गले नहीं उतर रहा. उनके दिमाग में आखिर चल क्या रहा है? इसमें दो थ्योरीज चल रही हैं. एक नीतीश लालू को 'कायदे में' रखना चाहते हैं. उन्हें बताना चाहते हैं कि विधानसभा में भले ही आपकी सीटें ज्यादा हो, लेकिन ये जनादेश नीतीश कुमार के नाम पर है और हमारी राजनीति आप पर निर्भर रही है. सियासत में इसे उस घुड़की की तरह समझा जा सकता है, जो सीधे नहीं दी गई और समझ भी ली गई. भविष्य में किसी तरह की ब्लैकमेलिंग की आशंकाओं की भ्रूण हत्या, यू नो! गठबंधन के अनुभवी नीतीश का ये आजमाया हुआ तरीका है. जब वो बीजेपी के साथ रिलेशनशिप में थे तो बीच-बीच में कांग्रेस को भी गुलाब का फूल देते रहते थे. दो दूसरी थ्योरी ज्यादा दिलचस्प है. वो ये है कि एक 'राष्ट्रीय महत्व' के मुद्दे पर सैद्धांतिक समर्थन देकर नीतीश अपनी 'राष्ट्रीय नेता' की छवि को मजबूत करना चाहते हैं और वाकई भविष्य में कोई ऐसा रास्ता तैयार कर रहे हैं, जिस पर वह बीजेपी के साथ चल सकेंगे. लेकिन व्यावहारिक तौर पर फिलहाल ऐसी संभावना नहीं है. भविष्य का पता नहीं, पर अभी उत्तर प्रदेश में वो BS4 और RLD के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुके हैं. बिहार के महागठबंधन में उनकी हैसियत 'बड़े भाई' की ही है. इसका प्रतीक इसे भी माना जा सकता है कि सोमवार को पटना में नोटबंदी के खिलाफ जो प्रदर्शन हुआ, उसमें RJD चीफ लालू और उनके दोनों बेटे शामिल नहीं हुए. कांग्रेस को आरजेडी के छोटे नेताओं के साथ मार्च निकालना पड़ा. और सरकार को भी ये रास आ रहा है. नरेंद्र मोदी-अमित शाह की बीजेपी भावनात्मक आधार पर नहीं चलती है. शाह राज में कई पूर्व विरोधियों को बांहें फैलाकर गले लगाया गया है. इसलिए अमित शाह भी जब कर्नाटक गए तो नीतीश के समर्थन का स्वागत कर आए.

नोटबंदी पर साथ लाने की कोशिश

मंगलवार के इंडियन एक्सप्रेस की सबसे बड़ी खबर है. नोटबैन पर विपक्ष के विरोध प्रदर्शनों को फुस्स करने के लिए सरकार उन मुख्यमंत्रियों से संपर्क साध रही है, जिनसे उन्हें समर्थन मिलने की संभावना है. सरकार, जनता पर नोटबंदी के असर की समीक्षा और कैशलेस इकॉनमी पर नए प्रस्तावों के लिए मुख्यमंत्रियों की एक सब-कमेटी बनाना चाहती है. अखबार के मुताबिक, अरुण जेटली ने बीजेपी की साझीदार TDP के अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू से इस सब-कमेटी का अध्यक्ष बनने का अनुरोध किया. इसी के साथ, जेटली ने ओडिशा के मुख्यमंत्री और BJD चीफ नवीन पटनायक और नीतीश कुमार से भी बात की और उन्हें इस कमेटी का हिस्सा बनने का न्योता दिया. नीतीश और नवीन, दोनों अपने गढ़ में मजबूत हैं, 'गवर्नेंस' की छवि बनाना चाहते हैं और अतीत में बीजेपी के साझेदार रह चुके हैं. BJD चीफ नवीन पटनायक खुले मन से नोटबंदी की तारीफ कर चुके हैं. उनके पास लोकसभा में 20 सांसद हैं. Modi naveen BJD 1998 से ही केंद्र और ओडिशा दोनों जगह बीजेपी के साथ गठबंधन में थी. साल 2000 से 2009 तक उसने बीजेपी के साथ शानदार कामयाबी भी हासिल की. 2009 में सीट शेयरिंग के मुद्दे पर वह BJP से अलग हो गई. 2014 लोकसभा चुनाव में उसने ओडिशा की 21 में से 20 लोकसभा सीटें जीतीं. अभी विधानसभा की 147 सीटों में से 117 BJD के पास हैं. नवीन भी बीजेपी के लिए फायदे का सौदा हैं.   वैसे नीतीश कुमार ने मंगलवार को ये भी कहा, 'हम बीजेपी के करीब आ रहे हैं, ऐसा कहकर मेरे विरोधी मेरी राजनीतिक हत्या करना चाह रहे हैं.' मौजूदा समय-काल के हिसाब से ये अपेक्षित बयान है. लेकिन राजनीति में स्थायी शत्रु और स्थायी मित्र नहीं होते. साझेदार और प्रतिद्वंद्वी होते हैं. इसलिए हर पुराना बयान बासी हो जाता है. अभी मिले-जुले इशारे मिल रहे हैं. प्रतीक्षा कीजिए.
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