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मुलायम जी, बर्बाद होने के लिए 11 क्यों एक ही वकील काफी था

इतने वकील रहते हारना शर्मनाक है, शर्मनाक ये नहीं कि वो हार गए, शर्मनाक ये कि इतनी जल्दी हार गए.

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इस तस्वीर में देखने के लिए काफी कुछ है, अखिलेश हैं, नेता जी हैं, और ऊपर से उनको देख रहे लोहिया हैं, मानो कह रहे हों यार 'समाजवादी' का नाम तो न डुबा दो. नज़र आ रही हो तो एक अदद साइकल भी है. जिस पर अब तो मुलायम सिंह यादव को फूलों की माला चढा देनी चाहिए.
कहते तो हैं कि 12 साल में घूर के दिन भी फिरते हैं, लेकिन कोई ये नहीं बताता कि उसके बाद वाले 12 साल में क्या होता है. जो होता है वो आदमी को चूर-चूर कर देता है. जैसे मुलायम सिंह यादव के साथ हुआ. 24 साल की पार्टी हाथ से ऐसे निकल गई, जैसे गीली चप्पल के नीचे से पैडल निकल जाता है. उनके पैर से पैडल भी कहां सारी साइकल निकल गई. मुलायम सिंह यादव को एक बात अच्छे से समझ आ गई है. इंजीनियरिंग के लौंडों से नहीं भिड़ना चाहिए, फिर चाहे वो खुद का ही लौंडा क्यों न हो. अखिलेश यादव ने 4700 नेताओं का सपोर्ट होने के डेढ़ लाख डॉक्यूमेंट्स पेश करवा दिए. ये उन स्टूडेंट्स सरीखी हरकत थी, जो सारा सेमेस्टर माथाफोड़ी करते हैं, और मौक़ा पड़ने पर एक रात में प्रोजेक्ट से लेकर प्रोजेक्ट फाइल तक बनाकर अगले रोज़ जमाकर आते हैं. लेकिन गौर करने वाली जो बात थी वो ये कि इलेक्शन कमीशन में पक्ष रखते वक़्त मुलायम के पीछे 11 वकीलों का साथ था. 11 वकीलों से पैरवी कराके भी मुलायम सिंह यादव अपना पक्ष मजबूत न रख सके. बेटे से हार गए. ये तो होना ही था, पर सवाल ये कि बर्बाद होने के लिए 11 वकीलों की फीस क्यों दी? उन्हें हारना था तो ये काम वो एक वकील की मदद से भी कर सकते थे. दो परिवारों का जीवन बर्बाद करने को एक वकील ही काफी होता है, यहां तो परिवार भी एक ही था. और तो और अखिलेश की तरफ से तो वकील भी कपिल सिब्बल थे. कपिल सिब्बल या पी चिदंबरम जैसा एक आदमी पूरी कांग्रेस का भट्ठा बिठाने के लिए काफी था. तब भी मुलायम कुछ न कर पाए. वकीलों पर एक शेर है. जो कि वकीलों के इंट्रो के लिए काफी है.
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हालांकि यूं 11 वकीलों का साथ होकर भी मुलायम सिंह यादव वाला मामला हाथ से निकलना शर्मनाक है. शर्मनाक ये नहीं कि वो हार गए, शर्मनाक ये कि इतनी जल्दी हार गए. बुरे से बुरा वकील भी बिना मेहनत के एक टुच्चा सा केस दस से पांच साल तक लटकाकर रख सकता है. 11 वकीलों पर कुछ नहीं तो इस केस को बीसेक साल तक तो लटकना ही चाहिए था. मुलायम जी सॉरी टू से यू पर आपके वकीलों ने मेहनत नहीं की. हमने ऐसे भी पोते देखे हैं, जो अपने दादा के खेत में बारी रूंधने का केस लड़ रहे होते हैं. बीच में पापा का जिक्र इसलिए नहीं है क्योंकि वो तो यही केस लड़ते-लड़ते खेत रहे.
मुलायम सिंह यादव को अच्छे वकील नहीं मिले, वरना डेढ़ लाख डाक्यूमेंट्स की ग्यारह कॉपी मांगते और फोटो कॉपी कराते-कराते चुनाव बीत जाता. हमने तो ऐसे वकील भी देखे हैं, जो क्लाइंट्स को मुंशी का पीला कागज दिखा डरा देते हैं. जितने कम समय में इलेक्शन कमीशन ने निर्णय दे दिया, उतना टाइम तो नोटरी के पास से टिकिट आने में लग जाता है. दो मौके मिले तब भी मुलायम सिंह यादव की तरफ से कोई नेता हलफनामा देने नहीं आया. जबकि वकील तो ऐसे होते हैं कि पान खाने को भी उठते हैं तो आते-आते एक दर्ज़न हलफनामा लगा आते हैं.
वकीलों के बहाने तो भतेरे होते हैं. रिकॉर्ड जमा कराने का टाइम मांग लेते हैं. कह देते हैं पक्षकार नहीं आया. अंत समय में कोर्ट में जाते हैं जब तक कि सुनवाई का टाइम निकल जाए. लेकिन मुलायम की किस्मत देखिए. कोर्ट में केस नहीं था, चुनाव आयोग से हार गए. कोर्ट होती तो पांच साल का वक़्त तो एक अदना सा वकील 'मौका' मांग-मांगकर निकाल सकता था. और कुछ नहीं तो दावे में संशोधन की ही कह देते, जब तक कुछ होता पहले चरण का मतदान भी हो गया होता. काश, काश अब क्या ही कहें पर कोई कोर्ट होती और अच्छे वकील होते तो वकील समय पर नोटिस ही न कटाता और ऐसे ही मुलायम जी की बुढ़ौती कट जाती.
PS: भावनाएं आहत होने की बढ़ती घटनाओं के चलते ये निवेदन है कि 'वकील पाठक' इसे दिल पर न लें, ये समझें कि हम आपकी नहीं बुरे वाले वकीलों की बात कर रहे हैं. और प्लीज हम पर कोई केस न करें. आपका कुछ नहीं जाएगा, फीस भी नहीं, हमारी पुश्तें बिक जावेंगी. PPS: लेखक के पिता स्वयं वकील है.

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