
'ब्लैक हॉक डाउन' (2001) मोगादिशू में हुई एक अमेरिकी रेड की कहानी कहती है
स्क्रीन पर लिखे का हिंदी तर्जुमा कुछ ऐसा बनेगा -
'रेड में एक हज़ार सोमाली मारे गए और 19 अमरीकी फौजियों की जान गई (शहादत दी भी पढ़ सकते हैं).ढाई घंटे की 'ब्लैक हॉक डाउन' 3-4 अक्टूबर, 1993 के दरम्यान मोगादिशू की लड़ाई में भाग लेने वाले इन 19 अमरीकी फौजियों के बलिदान की गाथा कहती है. लेकिन इस बात को नज़रअंदाज़ करते हुए कि मरने वाले (और घायल) सभी फौजी अपने फर्ज़ के चलते ही सही, ऐसे हथियार चला रहे थे जिनसे किसी की जान जा सकती है. खुद फिल्म के मुताबिक चौबीस घंटे में एक हज़ार सोमाली मारे जाते हैं. लेकिन फिल्म में ये त्रासदी एक फुटनोट से ज़्यादा कुछ नहीं है. ये 'ब्लैक हॉक डाउन' की समस्या है.
लेकिन आज रिडली स्कॉट ('ब्लैक हॉक डाउन' के डायरेक्टर) का बड्डे नहीं है. आज 'ब्लैक हॉक डाउन' की रिलीज़ की बरसी भी नहीं है. न ही आज मोगादिशू की लड़ाई की बरसी है. मैंने 'ब्लैक हॉक डाउन' का गड़ा मुर्दा उखाड़ा इसलिए कि जो गलती रिडली स्कॉट से 2001 में हुई थी, वो दुनियाभर के मीडिया से (और आम लोगों से भी) 2017 में हो गई है. मैं बात कर रहा हूं मोगादिशू में हुए अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले की मीडिया कवरेज और लोगों की प्रतिक्रिया की.

ये सोमालिया में अल शबाब का अब तक कराया सबसे बड़ा हमला था (फोटोःरॉयटर्स)
सोमालिया की राजधानी मोगादिशू में अल शबाब का हमला हुआ शनिवार दोपहर साढ़े चार बजे (भारतीय समय के मुताबिक). इस धमाके में हुए नुकसान को ऐसे समझें-
# एक पूरा इलाका मलबे में बदल गया. तस्वीरों में एक इमारत नज़र आ रही है जिसके सिर्फ कॉन्क्रीट कॉलम बचे हैं. धमाके में खिड़की के कांच तो क्या दीवार की ईंटें तक उड़ गईं.ये हर तरह से सोमालिया में अल शबाब का कराया सबसे बड़ा आतंकी हमला था. 'आतंकी हमला' शब्द पर ध्यान दीजिए. हादसा नहीं. आतंकी हमला. अब ध्यान इस बात पर लगाइए कि पिछले दो दिनों में आपने कितनी बार सोमालिया या मोगादिशू शब्द सुना. ट्विटर पर #Mogadishublast उस तरह ट्रेंड नहीं हुआ जिस तरह नेवादा या वेगस हुआ था. लोगों ने फेसबुक पर प्रोफाइल पिक काली नहीं की. फेसबुकिया चलन के मुताबिक किसी ने मुसलमानों से इतनी मौतों का हिसाब नहीं मांगा, न किसी मुसलमान ने ही अल शबाब को कट्टरपंथ के मारे भटके हुए मुसलमान बताने की कोशिश की. माने किसी ने लोड ही नहीं लिया. धमाका हो गया, लोग मर गए. चिल. नीग्रो की मौत पर बहाने के लिए हमारे पास आंसू नहीं हैं.
# 277 लोगों की जान गई. धमाके में कुछ मारे गए कुछ लोगों के अवशेष कभी न मिलने की संभावना है.
# 40 लोगों की हालत इतनी बुरी थी कि उनका इलाज सोमालिया में हो ही नहीं सकता था, इन्हें इलाज के लिए तुर्की ले जाया गया है.
# धमाके में एक कतर के दूतावास को भी नुकसान पहुंचा है. दूतावास के स्टाफ को भी चोटें आई हैं.

धमाके के बाद इमारत की ईंटें तक उड़ गईं (फोटोःरॉयटर्स)
यही हाल दुनियाभर के मीडिया का भी था. हिंदुस्तान के तीन बड़े अखबारों ने (अंग्रेज़ी अखबारों की बात हो रही है, क्योंकि वही काम के बचे हैं) इस हमले को सोमवार को जाकर छापा, वर्ल्ड पन्ने पर. दो-तीन कॉलम की खबर लगा कर इतिश्री कर ली. अल जज़ीरा और गार्डियन जैसे अपवाद छोड़ दिए जाएं तो कमोबेश यही हाल दुनियाभर के मीडिया का भी था. 'दी लल्लनटॉप' ने ऑस्ट्रेलिया से लेकर अमरीका और इरान से लेकर जर्मनी तक के अखबारों को खंगाला. मोगादिशू हमला कहीं बड़ी खबर नहीं था. हर जगह सेक्शन-सबसेक्शन में जाना पड़ रहा था, तब जाकर कवरेज नज़र आ रही थी. ये तब है जब एक आतंकी हमले में एक दूतावास को भी नुकसान पहुंचा था.
मोगादिशू की जगह मैनहैटन में बम फट जाता तो?
सोचने वाली बात है कि अगर ये हमला मोगादिशू की जगह मैनहैटन या मॉन्ट्रैल में हुआ होता तो क्या इस हमले को लेकर इतना ही कम बज़ होता? मोगादिशू में मरने वालों का अब तक का आंकड़ा हाल में लास वेगस में हुई मास शूटिंग का ढाई गुना है. लेकिन कवरेज उसके मुकाबले पांच पैसे की नहीं हुई है. इंटरनेट पर फिर भी मोगादिशू टाइप करने पर कुछेक आर्टिकल खुल रहे हैं, टीवी पर (हिंदुस्तानी टेलिविज़न) से तो सारा मामला ही गायब है.

22 मार्च 2017 को लंदन में हुए आतंकी हमले में 6 लोगों की जान गई थी. पूरी दुनिया में इस हमले को बड़े पैमाने पर कवर किया गया था (फोटोःरॉयटर्स)
ऐसा क्यों हुआ, इसका जवाब मेरे पास नहीं है. मुझे बस इतना समझ आ रहा है कि काली चमड़ी पर जब खून बहता है, तो वो तगड़ा कॉन्ट्रास्ट नहीं बनता जो गोरी चमड़ी के लहुलुहान होने से बनता है. शायद इसीलिए लंदन के एक पुल पर कार के भीड़ में घुस जाने पर आइकॉनिक तस्वीरें आती हैं. मोगादिशू हमले में मारे जाने वाले लोगों पर ह्यूमन स्टोरी करने माफिक तस्वीरें काफी कम हैं, अगर हैं भी तो.
ये सोच कर मेरा दिमाग और चकरा जाता है कि मोगादिशू के साथ एक नायाब तरह का भेदभाव हुआ है जो चमड़ी के रंग से आगे जाता है. दुनियाभर में कई ऐसे लोग हैं जो #Blacklivesmatter का हैशटैग लगाकर ट्विटर पर भावुक हुए हैं. ये लोग चमड़ी के रंग के आधार पर होने वाले भेदभाव को समझते हैं. लेकिन शायद ही इन सबने मोगादिशू हमले पर 160 की कैरेक्टर लिमिट को आंशिक या पूरी तरह से भरा. मेरा मोटा दिमाग इसका ये मतलब निकाल रहा है कि हमारे दिमाग में अमरीका की काली चमड़ी सोमाली की काली चमड़ी से ज़्यादा मायने रखती है. इस बर्ताव के लिए अजीब के अलावा कोई दूसरा शब्द सूझ नहीं रहा.
2001 में हज़ार सोमाली एक फुटनोट बने थे, अब पौने तीनसौ दो कॉलम की खबर बन गए हैं. ये ठीक नहीं लगता. मुझे बस इतना कहना था.











