The Lallantop

आपको याद है आपकी मां के पीरियड कब बंद हुए थे?

बचपन से लेकर आज तक, वो चीजें जो हम समझ नहीं पाए.

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फोटो - thelallantop
मैं टीवी और फिल्मों के मामले में जमाने से काफी पीछे चलती हूं. दो दिन पहले एक 10 साल पुराना टीवी शो देखना शुरू किया- 'डेक्सटर'. शो तो जो है, सो है. लेकिन उसकी एक करेक्टर 'रीटा' ने मेरा ध्यान खींचा. हीरो की गर्लफ्रेंड, दो बच्चों की मां. पति से डिवोर्स लेना चाहती है. वजह, पति पीटता था. सालों तक उसका रेप करता रहा. लेकिन हर बार वो सोचती रही कि सब ठीक हो जाएगा. अपने बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए मार खाती रही. बच्चे पिता के बिना बड़े न हों इसलिए. फिर एक दिन उकता गई और पति को छोड़ दिया. पति जब परोल पर बाहर आया, तो बदल सा गया था. बच्चों से मिलने आया. तब रीटा ने उससे कहा, 'तुम वो नहीं हो जो तुम्हारे बच्चे तुम्हें समझते हैं. बच्चों को मालूम होना चाहिए कि उनका बाप वो व्यक्ति है जो उनकी मां को पीटता था.'
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मगर वो मायामी था और ये इंडिया है. जहां कल्चर से लेकर अर्थव्यवस्था तक तो सबसे छोटा यूनिट परिवार है. हम यहां खुद के लिए नहीं कमाते. कमाते हैं ताकि बच्चे कम से कम 25-26 की उम्र तक पल सकें. कमाते हैं ताकि पिता के लिए हुए लोन की किस्तें दे सकें. कुछ खरीदते हैं तो पूरे घर के लिए. हमने बचपन से साथ रहना सीखा है. हमने ये भी सीखा है कि बंटे हुए परिवार बुरे परिवार होते हैं. हमने ये सीखा है कि कुछ भी हो, परिवार को जोड़कर चलना चाहिए.

और एक व्यवस्थित तरीके से परिवारों को जोड़कर चलाने की जिम्मेदारी औरतों के कंधों पर आ टिकती है.

इसलिए ये आश्चर्य की बात नहीं कि हमारी कहानियों से लेकर फिल्मों तक, अंत में सबकुछ ठीक हो जाता है. भले ही उसमें हमारी औरतों को अपने पर्सनल एम्बिशन से समझौता ही क्यों न करना पड़े. हममें से कई लोगों की माओं ने नौकरी नहीं की, ताकि बच्चों को बेहतर परवरिश दे सकें. परिवार जुड़ा रहे, पति नाराज न हो. लेकिन ये बस परिवार को जोड़कर चलना भर नहीं है.
हमारा पति हमें कमा कर खिला रहा है, इसमें एक एहसान, औरतों की तरफ से एक कृतज्ञता की भावना जुड़ी रहती है. और हर बुरे समय में 'उन्होंने हमारे लिए इतना किया है' पर आकर रुक जाती है. और ये कृतज्ञता पत्नियों में ही नहीं, गर्लफ्रेंड्स में भी देखी जा सकती है.
मेरी उम्र की कई लड़कियां हैं जो 'उसने मेरे लिए बहुत कुछ किया है' की भावना से घिरी होने के कारण जाने कितने अब्यूजिव रिलेशनशिप बर्दाश्त करती रहती हैं. और अब्यूज का मतलब मेरा सिर्फ शारीरिक नहीं, मानसिक हैरेसमेंट से भी है.
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मानसिक हैरेसमेंट इतना आम है कि हम उसे समझ ही नहीं पाते हैं. बल्कि उसे हैरेसमेंट की श्रेणी में रखते ही नहीं हैं. हो सकता है किसी से आपकी बचपन की ख़ास यादें जुड़ी हों. कि आपके पिता ने नाराजगी जताई हो कि मां शॉपिंग करने क्यों गई. क्यों उसने 500 की जगह 700 की साड़ी खरीद ली. हम उस पीढ़ी के हैं जिन्होंने अपनी घर की औरतों को घर के खर्च के लिए मिलने वाले पैसों में से कई बार छिपकर पैसे बचाते हुए देखा है. इसलिए कि कभी जरूरत पड़े तो मां झट से निकालकर दे दे. लेकिन कई बार सिर्फ इसलिए कि उनके पति उनकी छोटी-छोटी इच्छाओं को समझते ही नहीं थे. कि पत्नी को कभी किसी सहेली के साथ बाहर जाकर 5 रुपये के गोलगप्पे खाने की इच्छा हो सकती है, उनके पतियों ने समझा ही नहीं. कि कभी घर के खर्च के अलावा पत्नियों को खुद पर भी खर्च करने की इच्छा हो सकती है, उन्होंने कभी सोचा ही नहीं. और इसलिए पत्नियां पैसे बचाती गईं, छिपाती गईं. और जो कुछ चाहिए था, पति की गैरमौजूदगी में खरीदा.
हो सकता है कुछ घरों में ऐसा भी हुआ हो कि मां के घर से बाहर रहने पर पिता या सास-ससुर ने मां के चरित्र पर सवाल उठाया हो. या सिर्फ 'अच्छे घर की बहुएं ऐसा नहीं करतीं' कहकर चुप हो गए हों.

पति के क्रोध की वजह से मां का घर में कैद होना हैरेसमेंट था. जो न कभी हमारी माओं ने समझा, न हमने.

हममें से शायद लड़कियों को याद हो, पर लड़कों को याद नहीं होगा कि उनकी मां को मीनोपॉज कैसे हुआ. मीनोपॉज, यानी औरतों के पीरियड का हमेशा के लिए बंद हो जाना. मीनोपॉज अपने साथ तमाम तरह के हॉर्मोनल बदलाव लेकर आता है. जिसमें औरतें सामान्य दुख और अनिच्छा से लेकर डिप्रेशन तक का शिकार हो सकती हैं. शायद आने वाली पीढ़ियां इसका ध्यान रखें, लेकिन हमने कभी नहीं सोचा कि मां से पूछ लें उन्हें खाने में क्या चाहिए. उनसे कह दें कि चलो मां घूमकर आएं. हमारी माएं तो वो थीं जो रेस्टोरेंट में जाकर भी खुद कुछ ऑर्डर नहीं कर पाती थीं. कहतीं, जो तुम लोग मंगाओगे उसमें से ही कुछ खा लूंगी. मगर वो क्या करतीं, उन्होंने ये सीखा ही नहीं कि उनकी इच्छाएं भी इच्छाएं होती हैं. न उन्होंने सीखा, न हमने.
माएं घर के बाहर निकलीं तो खाना बनाने के टाइम वापस आ गईं. देर हुई तो सास या पति का फोन पहुंच गया कि कहां हो. जब जब पैसे खर्च किए, उनका हिसाब मांगा गया. कभी माओं ने नहीं कहा कि उन्हें पहाड़ों पर या समंदर किनारे घूमने जाना है. सब पिता और बच्चों की मर्जी से हुआ. और माओं ने कभी नहीं समझा ये उनकी इच्छाओं का हनन हुआ है.
हम कह सकते हैं कि वो तो पिछली पीढ़ी थी. लेकिन इस पीढ़ी में हम कितने बेहतर हुए हैं? मेंटली अब्यूजिव रिलेशनशिप को हम पहचानने में देरी करते हैं. सिर्फ औरतें ही नहीं, पुरुष भी. हर वक़्त कहां हो, क्या कर रहे हो, कितनी रोटियां खाई, फलां लड़के या लड़की के साथ क्यों घूम रही/रहे हो, फलां लड़का या लड़की तुम्हें इतने मैसेज क्यों भेजता है, तुम ऑफिस से लेट क्यों आते हो, तुम रात को पार्टी क्यों करती हो, तुम छोटे कपड़े क्यों पहनती हो, तुमने वो खबर मुझसे पहले फलां व्यक्ति से क्यों शेयर की... फेहरिस्त लंबी है.
लड़कियां अब हमारी माओं सी नहीं हैं, वो सवाल उठाती हैं. इच्छाएं जाहिर करती हैं. लेकिन हैरेसमेंट का नेचर बदल गया है. कुछ समय तक हम इसे पजेसिवनेस कहकर क्यूट मानते हैं, फिर इनसिक्योरिटी समझते हैं. और फिर सहने लगते हैं. अगर ये रिलेशनशिप शादी में बदलता है तो औरतें ठीक उसी पोजीशन में आ जाती हैं, जिसमें हमारी माएं हुआ करती थीं. परिवार को जोड़कर चलने के लिए हर तरह के समझौते करती हैं. और कई बार अपनी मर्जी के खिलाफ हुई शादियों में भी पति से प्रेम करना सीख जाती हैं.

उनके लिए प्रेम 'करने' नहीं, 'सीखने' की चीज़ बन जाती है.

और सालों-साल चलने वाली अब्यूजिव रिलेशनशिप को बिना सवाल उठाए लोग सिर्फ इसलिए निभाते रहते हैं कि कहीं परिवार बिखर न जाए. बर्दाश्त दोनों करते हैं, चाहे पुरुष हो या स्त्री. मगर पुरुष के लिए ये समाज ज़रा बेहतर होता है. औरतों के लिए ज़रा मुश्किल.
इसलिए बुरे रिश्तों को दूसरों के सामने अच्छा कहकर खुद से झूठ न बोलिए. अब बस करिए. कितना बर्दाश्त करेंगे?
https://youtu.be/H3c4nnS9KRM?t=1m21s
मैं ये नहीं कहती कि रिश्ते झट से तोड़ दें. मगर उनपर बात करें. औरतें अपनी इच्छाएं जाहिर करें. अगर आपको फ्रीडम मिलती है तो उसके लिए कृतज्ञ न हों. क्योंकि वो हक है आपका. हो सकता है आपके पति या बॉयफ्रेंड ने आपका उस बुरे वक़्त में साथ दिया हो जब किसी ने नहीं दिया. लेकिन उसका बोझ अपने ऊपर लेकर उसका हर कहा-सुना बर्दाश्त न करें. लड़ें, जबतक प्रेमी या पति के साथ बराबरी न महसूस करें. हमारी आने वाली पीढ़ियां हमपर निर्भर हैं.


 
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