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ममता बनर्जी की बेटी कही जाने वाली IPS ऑफिसर ने क्यों की बगावत

क्या भारती घोष के पास ममता बनर्जी के कई राज हैं?

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राजनीति में ऐसे कई किस्से मिलेंगे. एक वक्त में दांतकटी यारी और फिर गाढ़ी दुश्मनी. छुपे राज खोलने वाले दोस्त. ममता बनर्जी और भारती घोष का भी ऐसा ही केस है.
2011 की बात है. ममता बनर्जी बंगाल की मुख्यमंत्री बनी थीं. नई-नई जीत थी. लंबी पारी खेलने के लिए बड़ी तैयारियां करनी थीं. जगह-जगह अपने भरोसेमंद प्यादे सेट करना नेताओं की सबसे बड़ी तैयारी होती है. कुछ दिन बीते और एक महिला अक्सर उनके साथ नजर आने लगी. उसका नाम था, भारती घोष. IPS ऑफिसर. भारती कहतीं, ममता 'मां' हैं. ममता कहतीं, भारती 'अच्छी बच्ची' है. दोनों जब भी एक-दूसरे के लिए बोलते, शहद का भगोना उड़ेल देते. रैलियों में. सभाओं में. सरकारी कार्यक्रमों में. हर जगह. भारती ऐसी हो गईं कि ममता का साया लगतीं. सात साल तक ऐसा ही चलता रहा. इतने टाइम में तो इंसान के काले बाल सफेद हो जाते हैं. बेटे की चप्पल का नंबर बाप के बराबर हो जाता है. इन 'मां-बेटी' का रिश्ता भी बदला. इतना बदला कि कल की वो 'भालो मेये' अब मां को धमका रही है. भारती घोष सरेआम कहने लगीं कि ममता के राज खोल देंगी. उनका पर्दाफाश कर देंगी.
भारती घोष कौन हैं? भारती घोष IPS अधिकारी हैं. संयुक्त राष्ट्र की पीसकीपिंग मिशन में भारत की ओर से भेजे गए अधिकारियों में शामिल थीं. कोसोवो और बोस्निया जैसे जंग प्रभावित इलाकों में काम करने का अनुभव है उनको. हावर्ड से मैनेजमेंट की पढ़ाई की थी. इतना तगड़ा CV लेकर भारती जब बंगाल आईं, तो मुख्यमंत्री ममता की नजर पड़ी उन पर. उन्हें CID से उठाकर पश्चिमी मिदनापुर का SP बना दिया गया. 2008 के बाद से ही ये इलाका अशांत था. माओवादी गतिविधियां बढ़ गई थीं. भारती को UN में आदत थी. इस तरह के उपद्रव वाले इलाकों में काम करने की. ममता को यकीन था कि भारती संभाल लेंगी.
भारती घोष का CV बड़ा मजबूत है. काम कर सकती हैं या नहीं, इसमें कोई शक नहीं. दिक्कत इस बात से थी कि वो अपनी ड्यूटी का फायदा उठाकर राजनीति कर रही थीं.
भारती घोष का CV बड़ा मजबूत है. काम कर सकती हैं या नहीं, इसमें कोई शक नहीं. दिक्कत इस बात से थी कि वो अपनी ड्यूटी का फायदा उठाकर राजनीति कर रही थीं. खुलकर पक्षपात करना और क्या माना जाएगा?

ममता के भरोसे को पूरा निभाया भारती ने ममता ने भरोसा किया. भारती ने निभाया. उन्होंने माओवादियों को दांतों चने चबवा दिए. नकेल कस दी जैसे. इस इलाके में एक बड़ा माओवादी नेता था. कोटेश्वर राव. एक मुठभेड़ में मारा गया. इसका श्रेय भी भारती के हिस्से गया. खूब पीठ थपथपाई गई उनकी. कामयाबी बस इतने पर नहीं रुकी. कई माओवादियों से हथियार रखवा दिए गए. क्रांति का सपना देखने वाले नक्सली सत्ता की चमचमाहट से चौंधिया दिए गए. कई को तृणमूल कांग्रेस में जगह दी गई. ममता जो चाहती थीं, भारती उसे पूरा कर रही थीं. पुरुलिया, बांकुरा और पश्चिमी मिदनापुर बहुत हद तक नक्सली प्रभाव से बाहर निकल आए. ममता ने भी इन जिलों को बहुत कुछ दिया. बहुत बांटा.
पुलिस से ज्यादा ममता की सिपाही लगने लगीं भारती घोष भारती घोष 'टू इन वन' थीं. कहने को IPS ऑफिसर, वैसे तृणमूल कांग्रेस की कार्यकर्ता. विपक्षी पार्टियां उनके ऊपर उंगली उठाने लगी थीं. वो कहते कि भारती घोष ममता की सिपाही ज्यादा लगती हैं.
भारती घोष का परफॉर्म करना उनको ममता के करीबियों की लिस्ट में लाने का जरिया बना. उनके ऊपर पुलिस विभाग में रहकर ममता बनर्जी की ड्यूटी बजाने का आरोप लगता रहा.
भारती घोष का परफॉर्म करना उनको ममता के करीबियों की लिस्ट में लाने का जरिया बना. उनके ऊपर पुलिस विभाग में रहकर ममता बनर्जी की ड्यूटी बजाने का आरोप लगता रहा. और उन्होंने कभी इन आरोपों को गलत साबित करने की परवाह की हो, ऐसा लगा नहीं.

चुनाव के समय इलेक्शन कमीशन की आंखों में चढ़ गईं भारती पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में. फिर 2016 के विधानसभा चुनाव में. भारती घोष का रवैया चुनाव आयोग की आंखों में चढ़ गया. उनके ऊपर चुनाव अधिकारियों को बहकाने (प्रभावित करने) के आरोप लगे. ये भी कहा गया कि वो अपनी सीमा पार कर रही हैं. तृणमूल कांग्रेस को फायदा पहुंचाने के लिए अपनी पोस्ट का बेजा इस्तेमाल कर रही हैं. 2016 में चुनावी आचारसंहिता लागू होने के बावजूद वो ममता के नंबर दो मुकुल रॉय से मिलीं. भारती रॉय के नजदीक मानी जाती थीं. चुनाव आयोग की त्योरियां चढ़ गईं. उसने भारती को फटकार लगाई. मगर 'सैयां भये कोतवाल अब डर काहे का' में सैयां को बदलकर 'मां' पढ़ लीजिए. भारती पर किसी चेतावनी का असर नहीं पड़ा. चुनाव आयोग ने हार-थककर उनका तबादला कर दिया. मगर भारती को क्या परवाह इसकी. उनकी पीठ पर ममता का हाथ था. उन्हें अच्छी-अच्छी पोस्टिंग दी जाती. ताकत तो थी ही उनके पास. रौला था उनका. कहते हैं कि भारती पुलिस का काम कम करती थीं और ममता के दुश्मनों-विरोधियों को परेशान करने में ज्यादा मन लगाती थीं. जितना वो ममता के काम आती गईं, उतनी तरक्की पाती गईं. ये 'लेन-देन' दोनों ओर से हो रहा था.
एक वक्त था जब भारती घोष साये की तरह ममता बनर्जी के साथ नजर आती थीं.
एक वक्त था जब भारती घोष साये की तरह ममता बनर्जी के साथ नजर आती थीं.

लेकिन हर चीज की एक एक्सपायरी डेट होती है पहले आई मुकुल रॉय की एक्सपायरी. कहां कभी ममता बनर्जी के नंबर दो, उनके सिपहसालार थे और कहां पार्टी में अब उनके लिए कुछ बचा ही नहीं था. ममता को छोड़ा, तो बीजेपी ने गले लगाया. बस यहीं से 'मां-बेटी' की कहानी में जामन पड़ गया. भारती घोष अब ममता का भरोसा खोने लगीं. एकाएक शुरू हुआ सब. फिर हुआ ये कि बंगाल में पैर जमा रही बीजेपी ने मुकुल रॉय के कंधों पर जिम्मेदारी डाली. जंगल महल इलाके में भगवा को मजबूत करने की. बातें उड़ीं कि मुकुल के संघर्ष में हाथ बंटा रही हैं भारती घोष. ताकि वो अपने पैर जमा सकें.
भारती घोष मुकुल रॉय के बेहद करीब मानी जाती थीं. सो जब मुकुल बीजेपी में गए, तो भारती के सामने निष्ठा साबित करने की चुनौती थी. लगा कि वो लोड नहीं ले रही हैं इसका. खुलकर बीजेपी का साथ दे रही हैं.
भारती घोष मुकुल रॉय के बेहद करीब मानी जाती थीं. सो जब मुकुल बीजेपी में गए, तो भारती के सामने निष्ठा साबित करने की चुनौती थी. लगा कि वो लोड नहीं ले रही हैं इसका. खुलकर बीजेपी का साथ दे रही हैं.

और ताबूत में आखिरी कील तब ठुकी, जब... पश्चिमी मिदनापुर. यहां एक सीट है, सबांग. वहां उपचुनाव हुए. सीट तो निकाल ली तृणमूल कांग्रेस ने. करीब 67,000 वोटों से जीती. बीजेपी दूसरे नंबर पर ही नहीं, तीसरे नंबर पर आई. मगर ये बीजेपी की हार नहीं थी. उसका वोट शेयर बढ़ा था. थोड़ा-बहुत नहीं, 17 पर्सेंट. बंगाल में इतना वोट शेयर बढ़ा लेना, ममता बनर्जी की दांत के नीचे से रोटी छीनने जैसा है. बस. लग गई ममता को ये बात. मानस भूनियान राज्यसभा सांसद हैं. कांग्रेस में थे, फिर तृणमूल में चले गए. वो सबांग के ही थे. भारती घोष उन्हें कभी नहीं सुहाती थीं. चिढ़ने की वजह भी थी. भारती जब विपक्ष के नेताओं को सताती थीं, तो भुक्तभोगियों में मानस भी थे. उस समय कांग्रेस में थे. उपचुनाव के बाद उन्हें मौका मिल गया. भारती से अपना पुराना हिसाब-किताब ठीक करने का. उन्होंने ममता के कान भरे. बताया कि देखो, ये कर रही है मुकुल रॉय की मदद. फिर ममता को खुफिया विभाग की भी रिपोर्ट मिली. कि भारती घोष ने गुपचुप कई बीजेपी नेताओं से मुलाकात की थी. उनकी मदद कर रही थीं. भारती घोष जिस तरह उनके लिए 'गुड बेटर बेस्ट' बनी थीं, उसी तरह 'बैड वर्स वर्स्ट' बन गईं. पश्चिम मेदिनीपुर के पुलिस अधीक्षक पद से उनका तबादला कर दिया गया. उन्हें राज्य सशस्त्र पुलिस में अधिकारी बनाकर बैरकपुर भेजने का फरमान जारी हुआ. भारती का नाराज होना लाजमी था. उन्होंने इस्तीफा दे दिया.
बंगाल कभी लेफ्ट का किला था. अब वो ममता का किला है. बीजेपी इस किले में सेंधमारी करने की कोशिश कर रही है. ममता अपने किले को बचाने की पूरी कोशिश कर रही हैं.
बंगाल कभी लेफ्ट का किला था. अब वो ममता का किला है. बीजेपी इस किले में सेंधमारी करने की कोशिश कर रही है. ममता अपने किले को बचाने की पूरी कोशिश कर रही हैं.

पहले ममता का साथ देने में फायदा था, अब उनके खिलाफ जाने में फायदा है देखें तो ममता से छत्तीस का आंकड़ा बनाकर भारती को कोई नुकसान नहीं हुआ है. पहले उन्हें ममता का साथ देने में फायदा मिल रहा था. अब उनके खिलाफ जाने में उनका फायदा है. बीजेपी बंगाल में भले न हो, केंद्र में तो उसकी ही सरकार है. इस्तीफा देकर शायद उन्हें चैन ही मिला होगा. खुलकर राजनीति कर सकेंगी. पहले भी उन्होंने निष्पक्षता साबित करने का लोड नहीं लिया था. अब इस्तीफा देकर इस शब्द से हमेशा के लिए पीछा छुड़ा लेंगी.
भारती तो गईं, मगर उनके पास ममता के 'राज' तो हैं ही भारती बहुत करीब थीं ममता के. उनकी पार्टी के. इतना लंबा साथ रहा दोनों का. जाहिर है, उन्होंने अपने आस्तीन में ममता ऐंड पार्टी के कई सीक्रेट्स भी छुपाकर रखे होंगे. ममता बनर्जी किसी भी हाल में उनका मुंह बंद करवाना चाहेंगी. शायद इसीलिए उन्होंने भारती के खिलाफ जांच भी बिठा दी है. मगर लगता नहीं कि ये पैंतरा भारती को डिगा पाएगा. वो खुलकर खेलने के मूड में दिखती हैं. तभी तो कह रही हैं कि उनके पास बहुत कुछ है कहने और बताने को. ममता इतनी अनाड़ी तो कतई नहीं कि धमकी न समझें.


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