The Lallantop

बीजेपी के एंटी रोमियो दल के विरोध में मजनू का खुला ख़त

लफंगा, मजनू या रोमियो नहीं होता. आशिकों के अपमान पर क्यों कोई आवाज़ नहीं उठाता?

Advertisement
post-main-image
फोटो - thelallantop
बीजेपी का घोषणापत्र आया. कहा गया कि एंटी-रोमियो दल बनेंगे, जो स्कूल-कॉलेज के आस-पास घूमने वाले लफंगों पर नकेल कसेंगे. ये जो लफंडर लडकियां छेड़ते फिरते हैं. इन्हें रोमियो क्यों कहा जाता है. एक..दो..तीन बार ये सवाल कर रोमियो बेहोश हो गया. उसके मुंह पर छींटे डालने का काम उसका दोस्त मजनू कर रहा था. मजनू वो जिसका नाम बदनाम है. पुलिस लफंगों को पकडती है. अखबार में छपता है डेढ़ दर्ज़न मजनू पकड़ाए. मजनू सोचता है, हंस लूं या रोऊं, ये मजनू कैसे हुए? मैंने कब किसी कन्या पाठशाला के आगे किसी का हाथ पकड़ा था. फिर सोचता है ठीक भी है. डेढ़ दर्जन मजनू ही हैं, तो पुलिस बस पकड़ ही रही है, मेरे समय में मुझ अकेले मजनू को तो मौत आ गयी थी. 13 फरवरी को वोटिंग है. रोमियो लफंगई का नहीं प्रेम का नाम है, 13 को वोट देने के पहले 14 का हाल सोच लीजिए. खैर इस मौके पर रिवाजानुसार मजनू ने एक ओपन लेटर लिख दिया है. ओपन लेटर इसलिए कि जो कुछ नहीं करता वो खुला ख़त ही लिख देता है. मजनू ने तो फिर इश्क किया था. उसकी सुनी जानी चाहिए. बाकी मजनू ने ये क्लियर किया है, उन लफंगों का जीभर निपटारा होना चाहिए, पर उन्हें मजनू या रोमियो नहीं कहना चाहिए.

जालिम दुनिया के नाम मजनू का खुला खत

भूखा, प्यासा था. बदन पर पत्थर से लगी चोट के घाव थे. कड़ी धूप थी. फटे कपड़े थे. जहां से निकलता, लोग बेवजह पत्थर मारते. आशिकी में जब 'अनगिनेबल' टाइम्स मैं महबूब की खुशी की खातिर दर्द इग्नोर कर मुस्कुराता जाता हूं, तब कहीं जाकर मुहब्बत की डॉक्टरेट डिग्री हासिल कर 'मजनू' कहलाता हूं. लेकिन मेरे नाम पर स्याही सी पुत जाती है जब दुनिया उन शोहदों को मजनू कहती है, जिन्हें इश्क का इमला तक नहीं मालूम. इश्क की ग्रामर में कमजोर लोगों, मुझे तुम्हारी छिछोरों को मजनू कहने की आदत से सख्त नफरत है. लैला की खातिर मैं कैस (मजनू का असली नाम) से कैसी हालत में पहुंच गया था. लैला की शादी के बाद भी उससे मुहब्बत करता रहा. घर छोड़ दिया. दर-दर भटकता रहा. मुहब्बत हम दोनों की सच्ची थी. तभी तो लैला अपने शौहर को तलाक देकर मेरे पास लौट आई. लेकिन सही-गलत के चुत्जपा में जालिम दुनिया का हमेशा से इश्क से दुश्मन रहा है. हम फिर अलग हुए. लैला ने शरीर छोड़ा तो मुझे भी रूह हड्डियों और मांस के बीच चुभने लगी. हम दोनों ने बदन को खुद से रिहा कर दिया. हमारी रूह मिली, शरीर नहीं. तब जाकर दुनिया मुझे मजनू नाम से याद करने लगी. मजनू यानी इश्क की खातिर सब भूल जाने वाला. दीवाना हो जाने वाला.
सब कुछ भूलना समझते हैं? जिन्होंने इश्क किया होगा, उनसे पूछिएगा. छोड़िए पूछिएगा मत. क्योंकि जो इश्क में होंगे, वो इस सवाल का जवाब नहीं दे पाएंगे. आप बस देखिएगा. किसी सवाल के जवाब में या भीड़ के गुच्छों में वो कितने अकेले रहते हैं. लेकिन ये अकेलापन सिर्फ बाहरी दुनिया को दिखता है. क्योंकि मन में तो महबूब के हाथ की छोटी उंगली से लगातार सुकूं और मुस्कान से भरा शरबत छलकता रहता है. ग़र किसी ऐसे इश्कज़ादे से आपकी मुलाकात हुई है, जिसका महबूब उससे दूर हो. बिछड़ने के चांसेस ज्यादा हों, फिर भी चोरी-चोरी वो अंधेरे में कैद किसी डायरी पर अपनी लव स्टोरी दर्ज करा रहा हो, तो जनाब मानिए घर बैठे मक्का-मदीना मिल गया. यही होता है मजनू. जिसे पहचाना नहीं, महसूस किया जाता है और महसूसने के लिए इश्क की प्रैक्टिकल समझ जरूरी है.
गली, मुहल्लों और पार्कों में निगाह से लड़कियों के बदन को नोचते लौंडों को जब कोई मजनू कहता है. तो बौखला जाता हूं. मुहब्बत की सस्ती समझ देख मन सिहर जाता है. साल में तीन दफे किसी लड़की को देखकर रिलेशनशिप स्टेट्स की बंजर जमीं पर हरियाली भरे ख्वाब देखने वालों से मुझे परहेज नहीं. इश्क की चिंगारियां नहीं निकलेंगी तो कमबख्त जला देने वाली आग कैसे लगेगी. 'प्यार सिर्फ एक बार होता है' दरअसल ये बात इश्क की जमीं पर चुभीले 'फेंस' लगाने की साजिश है.
ग्लोबलवार्मिंग के साथ इश्क की ग्रामर जरूर बिगड़ी है. तभी तो शब्दों के कंजूसों ने मेरी पोस्ट सिचुएशन 'मजनूगिरी' तक को नहीं बख्शा है. किसी लड़की के साथ छिछोर हरकत करने वाले टुटपुंजियाओं को मजनू कहना बंद कीजिए. इश्क की अलिफ से महरूम जाहिलों को कौन बताए, मजनू ने किसी से जबरन इश्क नहीं किया था. उसे तो बस हो गया था. बेवजह इश्क.
ऐ दुनिया, तुमसे गुजारिश है मेरी मासूम इश्किया कौम पर एक एहसान करो. इन कमज़र्फ आशिकों को सब दीजिए. मतलब पीठ पर गर्म चिमटा. गाल पर लप्पड़. शरीफियत की सलाह. बस मेरा नाम मजनू मत दीजिए. इश्क और मजनू को यूं बदनाम न कीजिए. पायरेटेड आशिकी के छोटा रिचार्ज टाइप लौंडों को 'मजनू' कहना बंद कीजिए. इश्क के लिए हम मजनुओं को हमारी इश्किया दुनिया में रहने दीजिए. सुकूं से भरा बेवजह इश्क. ताकि जब आपके ये 'सो कॉल्ड मजनू' उर्फ छिछोरे फर्जी आशिकी और फरेब से यकीं तोड़कर दुनिया में नफरत भर चुके हों, तब इश्क में डूबा कोई मजनू किसी यकीं से डबडबाती, इश्क से घबराती लड़की का हाथ थाम अपनी लैला बना सके. खुद मजनू बन सके.

प्यार में बेवजह दीवाना मजनू

Advertisement

मजनू की ओर से ये खुला ख़त दो साल पहले की नवंबर में टिनटिन त्रिवेदी ने लिखा था. कमाल देखिए, ये आज भी प्रासंगिक है.

Advertisement
Advertisement