आप कभी किसी पहेली से मिले हैं क्या? नहीं! कोई बात नहीं. हमारे पास एक पहेली है. लंपटा बासू. एक पहेली की तरह ही बासू की भी कोई शक्ल नहीं है. अपने मन से जैसी चाहे लाइनें खींच लीजिए.
बेटी दुल्हन बनी घर में बैठी थी, बाप ATM की कतार में मर रहा था
ये लंपटा बासू के पहाड़ों का एक किस्सा है, जिसमें दिल्ली भी एक किरदार है.

मौके-बेमौके जब पुराने किस्से कुलांचे मारते हैं, तो बासू कविता-कहानी ठेल देता है. उसकी कहानियां पहाड़ों जैसी होती हैं. निर्मोही मगर ताज़ी. एक नॉवेल बड़े दिनों से उसके गले में हड्डी की तरह अटका हुआ है. हड्डी से याद आया, वो बुढ़ापे में कुत्ता पालेगा. पहाड़ों पर नारंगी छीलने का सपना हर सुबह उसे जगा देता है. ताउम्र पहाड़ कहां हर किसी की किस्मत में होते हैं. तो बासू आपको अपने लंपट किस्से सुनाएगा. ये चौथी किस्त है. 'पोस्टर'.
कोहरे में लिपटी सुबह के साथ दिल्ली जाग रही है. मेट्रो तय अंतराल पर दौड़ रही है. लक्ष्मी नगर के उस छोटे से दो कमरों के घर में आस-पास के बाकी घरों से ज्यादा चहल-पहल है, जहां तीन दिन पहले आया चंदू का परिवार अपनी बेटी की शादी के लिए जुटा है. ये उसके बड़े बेटे मुकेश का घर है. किराए का घर. मुकेश ने 7 साल पहले नौकरी के सिलसिले में पिथौरागढ़ छोड़ा था. वो भी अब दिल्ली की उठा-पटक का हिस्सा है. सुबह से शाम दिल्ली के भीतर दौड़ती ज़िंदगी में एक ज़िंदगी उसकी भी है.
कल रश्मि की बारात आनी है. रश्मि चंदू की बेटी है और मुकेश के बाद उसकी दूसरी संतान है. देर रात तक घर में चहलकदमी रही. खूब गाना-बजाना हुआ. ईजा भी देर रात तक नाचती रही. बच्चों के चेहरों पर तैरती ख़ुशी में ईजा भी शामिल थी. सबसे पहले कोहरे को चीरते हुए बालकनी पर ईजा ही नजर आई. ईजा के सिर पर तौलिया बंधा हुआ है. उसने एक नजर गली में दौड़ाई और फिर तुलसी के पौधे को पानी देकर वापस अंदर चली गई.
गली में दो-तीन मोटे अधेड़ हांफते हुए चक्कर लगा रहे हैं. एक लड़की अभी-अभी बड़ी तेज़ी में ईजा की बालकनी के नीचे से गुजरी है. उसके कान में हेडफ़ोन लगे हुए हैं. शर्मा जी की दुकान का शटर उठ रहा है. मरियल पप्पू खर्र-खर्र करते शटर को धकेल रहा है. शर्मा जी बुदबुदा रहे हैं. शायद ईश्वर को याद कर रहे हैं. दो-तीन जगहों पर रात का बासी खाना कुत्तों के इंतज़ार में डला हुआ है. ऊपर एक बैनर झूल रहा है. उस पर लिखा है, 'मनोज तिवारी को दिल्ली बीजेपी का अध्यक्ष चुने जाने पर बधाई'. गले में गमछा डाले एक फोटो लगा हुआ है. बगल में दूसरा पोस्टर लगा हुआ है. उस पर लिखा हुआ है, 'मोहल्ला क्लीनिक...'! एक और पोस्टर लगा है, जिस पर लिखा है, 'दिल्ली सरकार के खिलाफ कांग्रेस की रैली फलां तारीख को...'. कोई लवली सिंह है. ये वाला पोस्टर थोड़ा पुराना है... फटने लगा है. बाकी दूसरे पोस्टर इस पोस्टर को निगलने के लिए दीवार पर पसर रहे हैं.

बालकनी में ईजा के बाद संतोष आया और पीछे-पीछे चाय का प्याला लिए हुए चंदू. संतोष चंदू का छोटा बेटा, जिसके बाल शाहिद कपूर की तरह बीच सिर से झूल रहे हैं और कान के ऊपर से कटिंग रंगरूट सरीखी है. चंदू ने हाथ से बुना हुआ कई रंगों का ऊनी स्वेटर पहना है. पिछली सर्दियों में ईजा ने बचे हुए ऊन के गोलों से चंदू के लिए एक स्वेटर तैयार कर ली थी. रंग-बिरंगी सतरंगी स्वेटर. चेहरे पर बढ़ी हुई सफ़ेद दाढ़ी लिए हुए पिछले दो दिनों से काम की दौड़-भाग के बीच चंदू, दिल्ली की ठंड में इसी स्वेटर के सहारे जूझ रहा है.
चंदू ने चाय निपटाई और वापस घर में दाखिल हो गया. संतोष बालकनी में ऊंघ रहा है. इतने में अंदर से ईजा की आवाज तैरती है, 'जल्दी उठ... टट्टी जाना है तो जा! अभी खाली है लैट्रिंन!' ईजा जोर-जोर से बोलती है. ईजा को है आदत जोर से बोलने की. वो हमेशा खुले गांव में रही, जहां एक हिस्से से दूसरे हिस्से में संवाद के लिए सशरीर जाने की जरूरत नहीं होती. आधी बातें लोग एक-दूसरे से चिल्ला-चिल्लाकर ही कर लेते हैं. गढ़वाल में इस पूरी प्रॉसेस को 'धै' लगाना कहते हैं. कुमाऊं में शायद कुछ और कहते हों!
खैर, दिन चढ़ते-चढ़ते उस दो कमरों के घर से कुल जमा पांच लोग बाहर निकले, जिनमें रश्मि, मुकेश की पत्नी विनीता, चंदू, संतोष और ईजा थे. मुकेश के जिम्मे दुसरे काम आए. वेडिंग प्वाइंट की जिम्मेदारी जैसे काम. विनीता और रश्मि को पार्लर जाना है. संतोष ईजा को साड़ी दिलवाने बाज़ार गया, जो आज शाम के फंक्शन में ईजा को पहननी है. चंदू रुपयों का इंतजाम करने बैंक गया. पिछली शाम ही प्रधानमंत्री ने हजार-पांच सौ के नोटों को बंद करने की घोषणा की थी. शादी के शोर-शराबे के बीच मर्दों के लिए ये भी एक दिलचस्प खबर थी.
दो धड़े थे. पहला धड़ा चंदू के साथ था, जो इस फैसले से खुश था. आखिर उसने प्रधानमंत्री को चुनने के लिए अपने गधेड़े सांसद को संसद जो पहुंचाया था. और दूसरा धड़ा मुकेश के साथ था, जो इस फैसले पर हंस रहा था. चंदू तब इतना ही बोला, 'देखना बड़ा गहरा असर पड़ेगा इस फैसले का'. हां, लेकिन एक संकट भी खड़ा हो गया था. पिथौरागढ़ से चंदू ये सोचकर पैसे लेकर नहीं निकला था कि बैंक ATM का ज़माना. साथ पैसे लेकर चलने में धुकधुकी सी बनी रहती है. सुबह ईजा इसी बात पर नाराज भी हो गई थीं.
संतोष, चंदू और ईजा चांदनी चौक पहुंचे. रश्मि और विनीता पार्लर चली गईं. रास्ते में जहां-जहां चंदू की बैंक ATM पर नजर गई, वहां लोगों का रेला लगा हुआ था. कुछ ATM खाली भी थे. शायद उनमें पैसे ख़त्म हो गए हों. ईजा को छेड़ते हुए चंदू ने कहा, 'देख, आज इस नालायक के साथ जा रही है. कंजूसी मत करना. हमेशा इन्होंने लूटा है हमें. तू तो सबसे सुंदर साड़ी खरीदना।' और फिर 3 हजार रूपए चंदू ने अलग से ईजा के हाथ में रख दिए ये कहते हुए कि 'तुझे जो पसंद हो, ले लेना...'.
ईजा ने पलट कर इतना ही कहा, 'हां तुम अब जाओ. दवा खा लेना और जल्दी लौटना'. चंदू चांदनी चौक की उस भीड़ भरी गली को छोड़कर लाल किले की सीध में आगे बढ़ गया. रश्मि के चेहरे पर ब्लीच मलते हुए पार्लरवाली बोली, 'हालत खराब है! पुराने नोट जमा करने के लिए बैंकों में भीड़ है. ये तो रात को ही बड़ी मुश्किल से 6 हजार निकाल सके. 3 ATM से ही लोगों ने पैसा निकालने दिया. फिर वो पार्लरवाली ब्लीच मलते हुए ही विनीता की तरफ घूमी. 'अब बताओ बहनजी, आदमी ही तो आदमी के काम आएगा? आपकी भी ब्लीच कर दूं... चेहरा डल पड गया है.' विनीता मुस्कुराई, 'दुल्हन मैं थोड़े न हूं!' फिर पार्लरवाली ने अपने बातूनी स्वभाव के चलते नई बात छेड़ी, 'तो क्या हुआ. अरे भैय्या खुश हो जाएंगे. आप भी करवा लीजिए न. ब्राइडल मेकअप जित्ता महंगा थोड़े न है'. पार्लरवाली खुद भी सजने-संवरने की शौकीन थी.
उधर चंदू बैंक पहुंचा, तो वहां पहले से दो-ढाई सौ लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था. चंदू भी उस भीड़ में शामिल हो गया. उसने नोट बदलने के लिए फॉर्म भरा, तो उसके हाथ में गार्ड ने एक टोकन थमा दिया, जिस पर नंबर पड़ा था 317. चंदू खीझ गया. दिल्ली उसके लिए अनजान ही तो थी. उस भीड़ में न कोई पहचाना हुआ चेहरा था, न कोई पूछ-परख करने वाला परिचित. दो घंटे बाकी लोगों के साथ चंदू ने भी बैंक के आगे-पीछे घुमते हुए गुजार दिए.
3 चाय, 11-12 बीड़ियां और दो समोसों से चंदू ने वक़्त काटा. बाकियों ने भी काटा. कुछ ने आदतन झगड़ते हुए वक़्त बिताया. दिन तेज़ी से गुजर रहा था. रश्मि और विनीता लौट आई थीं. दोपहर के तीन बजे तक ईजा और संतोष भी लौट आए. घर पर नाते-रिश्तेदार जुटने लगे थे. घर में बिस्तर जगह-जगह फैले हुए थे. रश्मि के मौसा और उनका परिवार अभी-अभी दरवाजे पर पहुंचा था. बाकी लोगों ने चंदू को दिल्ली के लिए चलते हुए पिथौरागढ़ में ही न्योता थमा दिया था. उन्हें चंदू वापस जाकर दावत देगा. देवता के मंदिर में रश्मि और चंदू का होने वाला दामाद मत्था टेकने आएंगे, ये दावत तब दी जाएगी. ऐसा प्लान ईजा और चंदू ने बनाया था. ईजा कहती है, 'जिसका खाया है, उसे लौटाना भी तो पड़ेगा!'

सांकेतिक तस्वीर
मौसा ने गेट पर आते ही पूछा, 'भाई साहब कहां है?' जवाब संतोष ने दिया, 'बैंक गए हैं'. मौसा सरप्राइज होते हुए बोले, 'ये आदमी लापरवाही नहीं छोड़ेगा. अरे बताया नहीं कि आज बैंक में लोगों की भीड़ है. हम आ तो गए थे'. इस दफा जवाब रश्मि ने दिया, 'अरे पापा को जरूरी पैसे निकालने थे. वो तो कल ही जाने वाले थे, लेकिन फिर आज गए. अब उन्हें क्या पता था कि आज ऐसा हो जाएगा'.
शाम के 4 बज गए. चंदू वापस बैंक में दाखिल हुआ और सामने भीड़ से जूझ रहे गार्ड के पास जाकर बोला, 'भैया, कितना नंबर चल रहा है?' गार्ड ने खीझकर जवाब दिया, '164'. चंदू के चेहरे पर देरी का तनाव उभर गया. वो बैंक से तेज़ी से बाहर निकला और सामने लगी ATM की लाइन में जा लगा. उसकी जेब में सौ-सौ के 2 नोट और कुछ खुल्ले पैसे ही बचे हुए थे. उसे लगा था कि भला दिल्ली में इतने बैंक हैं, तो कहीं से भी पैसा निकाल लेगा, लेकिन आज तो मानों पूरी दिल्ली ने बैंकों की दौड़ लगा दी हो. उस भीड़ में अकेला चंदू ही परेशान नहीं था. एक 60-65 साल का बूढा तो रोने लगा था. उसने लोगों को दुहाई दी, लेकिन कोई भी अपना नंबर छोड़ने को राजी नहीं हुआ. एक घंटा होने को आया, लेकिन लाइन अभी बामुश्किलन 40 मीटर ही आगे सरक सकी. आगे वाला बोला, 'सर्वर डाउन बता रहे हैं'.
चंदू वहां से तेज़ी से निकल आया. वो सीधे नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन पहुंचा और फिर लक्ष्मी नगर. चंदू एक बार फिर से बैंक की लाइन में था. लोग सरकार को कोस रहे थे. एक ने तंज़ कसा, 'अरे पिक्चर हॉल में भी तो खड़े होते हो लाइन में'. चंदू मुस्कुराया. यहां भी वही हाल था. 6 बजने को आए, लेकिन यहां भी लाइन छोटी होने के बजाय बढ़ती ही चली गई. चंदू ने घड़ी पर नजर दौड़ाई और फिर लाइन से उचककर पैसे निकालकर लौटते उस युवक को देखने लगा, जिसके चेहरे पर विजय की मुस्कान थी. उसके हाथों में सौ-सौ के नोट चमक रहे थे.
सवा छः बज गए. चंदू के आगे अब भी तकरीबन 40 लोग और रहे होंगे. इतने में ईजा का फ़ोन भी आ गया. 'कहां हो... अब लोग जुटने लगे हैं और लड़की का बाप गायब है!'. चंदू ने तकरीबन खीझते हुए जवाब दिया, 'हद है... ऐसा लगता है सबको आज ही पैसों की जरूरत पड़ गई. कहीं पैसा नहीं निकल रहा. लौट रहा हूं... और फिर हमने करना ही क्या है.' उसने जल्दी लौटने का कहकर फ़ोन काट दिया. वो लौटने की सोच ही रहा था कि इतने में जमीन पर गिरकर छटपटाने लगा. भीड़ से चंदू अलग हो गया था. लोगों ने चंदू को देखा और फिर वापस अपनी लाइन में खड़े हो गए. चंदू तड़प रहा था.

'पिक्चर हॉल की लाइन' का तंज कसने वाला लड़का फिर बोला, 'अरे ये अंकल को मिर्गी का दौरा पड़ा है शायद!'. ATM पर बैठे गार्ड ने अनसुना कर दिया. आगे शोर बढ़ने लगा था. दो मर्द आपस में झगड़ रहे थे. उनमें से एक ने दो ATM से पैसा निकाल लिया था और अब वो तीसरे ATM से पैसा निकालना चाहता था. इसी पर दो लोग आपस में भिड़ने लगे थे. फिर बाकी लोग भी हंगामे में शामिल हो गए. भीड़ है. भीड़ का क्या? इतनी देर में चंदू की देह शांत पड़ गई. भीड़ ने आपस में सहमति बनाई कि एक आदमी दो ATM से ज्यादा पैसा नहीं निकालेगा. हंगामा बढ़ता देख गार्ड ने पहले ही खुद को भीड़ से अलग कर लिया था. चंदू का फ़ोन बज रहा था.
सतरंगी स्वेटर के भीतर से मोबाइल बजता, तो ऐसा लगता जैसे चंदू के दिल के पास आतिशबाजी हो रही हो. भीड़ में से कोई भी शख्स अपनी जगह छोड़ने के लिए अब भी तैयार नहीं था. गार्ड चंदू की शांत पड़ चुकी देह के करीब आया और लगभग चौंकते हुए बोला, 'ये आदमी तो मर गया'. उधर मुकेश वेडिंग हॉल के गेट पर लगे 'रश्मि वेड्स विवेक' के पोस्टर को निहार रहा है. थोड़ी देर में यहां सब जुटने वाले थे. ईजा ने नई साड़ी को पहनने से पहले कंधे पर डालकर रश्मि से पूछा, 'इसका रंग पक्का है... छूटेगा नहीं शायद'. रश्मि बोली, 'पापा खुश होंगे. तूने पहली बार इत्ती महंगी साड़ी खरीदी है.'
अब शाम को कान में हेडफ़ोन लगाए वो लड़की बालकनी के नीचे से वापस घर के लिए गुजर रही थी. सुबह जो अधेड़ टहल रहे थे, उनमें से एक स्कूटर को रोककर एक दूसरे शख्स से बातचीत कर रहा था. कुत्ते बासी खाना चट कर चुके थे. मौसा टाई बांधकर वेडिंग हॉल की व्यवस्थाएं देखने के लिए संतोष के साथ निकल रहा था. बैंक के बाहर एक पोस्टर चिपक गया था, जिस पर लिखा था, 'ATM में पर्याप्त कैश है. हड़बड़ी न मचाएं.' किसी ने चंदू के फ़ोन को छुआ तक नहीं था. दिल्लीवालों के लिए अब ये मामला पुलिस का था. फ़ोन बजते-बजते थककर आखिर बंद हो गया. ATM से मेट्रो स्टेशन की दीवार पर बहुत से पोस्टर लगे हुए थे, जिनमें 'कालेधन को समाप्त करने के लिए बीजेपी नेताओं ने प्रधानमंत्री को बधाई दी थी'. पुलिस पहुंच गई. चंदू के शरीर को हिला-डुलाकर देखने के बाद उनमें से एक ने उसका फ़ोन उठाया. फ़ोन बंद था. ईजा नई साड़ी पहनकर निकली, तो चेहरे पर पड़ी सदियों की सिलवटें भी सिमट गईं. चंदू की लाश पर पुलिस ने एक बोरा डाल दिया था. ईजा की साड़ी के आगे सचमुच उसकी चमक फीकी थी.
कुछ देर बाद मेट्रो स्टेशन के पास आकर एक साइकिल रुकी. उसके कैरियर पर पोस्टर का बण्डल था. थोड़ी देर बाद एक लड़का उनमें से एक पोस्टर लेकर आया और उसने कालेधन, बधाई, मोदी... सबको अपने पोस्टर से ढंक दिया. पुलिस बैंक के सामने से लाश हटा रही है. उस पोस्टर पर लिखा था, 'वजह तुम हो'!
जो पल्ले न पड़ा: ईजा: मां
लंपटा बासू के पिछले किस्से:
यमरजंसी न जानने वाला सुकुडू, जो कभी बाप नहीं बन सका
पिंक लिपस्टिक वाली पिंकी, जिसके साथ बहुत बुरा हुआ
चकोर झाड़ियों से निकल आई, बटेर दौड़ भागे और तीतर ने ‘तीन तौला छप’ कहा










