"खेती करूं तो थाने समझ बताऊं रे, बळद्या ने दुख मत दीजे. औसर खेत बीज मत बोजे, घरे ही बैठो रीजे. मन तूं ऐसी खेती कीजे...."
कांग्रेस ने इस लोकगायक को टिकट क्यों दे दी?
कभी टीचर थे. फिर सुपरस्टार लोकगायक बने. अब सांसद बनने की तैयारी है.
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लोक गायक प्रह्लाद टिपानिया
उज्जैन में एक गांव पड़ता है लूणियाखेड़ी. मालवा में लूण कहते हैं नमक को और खेड़ी मतलब गांव. यहां एक लड़का था. घर से बेहद गरीब. पढ़ाई-लिखाई के लिए इंदौर चला गया. अपने नाना के घर. पूरी पढ़ाई वहीं की. मन था कि बड़ा होकर डॉक्टर बनेगा. 12 की पढ़ाई की. इसके बाद बीएससी (बायो) में एडमिशन ले लिया. सोचा कि बीएससी के साथ-साथ तैयारी भी करते रहेंगे. इस बीच शिक्षा विभाग में टीचर की नौकरी मिल गई. दलित समुदाय से आने वाले इस नौजवान के लिए अवसर बेहद सिमित थे. लिहाजा जो मिला स्वीकार कर लिया. बीएससी के पहले साल ही नौकरी लग गई. आगे की पढ़ाई की नहीं. पोस्टिंग मिली उज्जैन के काठबड़ोदा गांव की मिडिल स्कूल में. उज्जैन और देवास जिले की सीमा का गांव. स्कूल के बगल में ही एक गांव पड़ता था, गोरखेड़ी. किसी दौर में कुमार गंधर्व इस गांव में रहे थे ताकि लोक पम्परा के कबीर को समझ सकें. इसी गांव में एक जागरण था. नौजवान टीचर को भी न्यौता मिला. वो जागरण में गया. मीरा और कबीर के भजन सुने. भजन से ज्यादा एक साज ने नौजवान टीचर का मन मोह लिया. वहां के कलाकारों से पूछा तो पता लगा कि एक साज के कई नाम हैं, कोई बीणों कहता है, कोई शारदा और कोई तंबूर. तंबूर दिखने में काफी बड़ा होता है लेकिन वजन में बेहद हल्का. टीचर ने दम लगाकर तंबूर को उठाया और खुद पर हंसने लगा. टीचर ने तंबूर सीखने की इच्छा जताई. कलाकारों ने कहा कि बजाने के साथ-साथ गाओ भी, जल्द सीखोगे. मालवी का एक भजन लिखकर दिया. बोल थे-
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इससे पहले नौजवान के लिए कबीर का मतलब 10 नंबर तक सीमित था. परीक्षा में कबीर का कोई पद सप्रसंग व्याख्या के लिए जरूर आया करता था. लिहाजा नौजवान इसे याद कर लिया करता था. अब तंबूर सीखने के लिए कबीर का भजन गा रहा था. इसी भजन में एक लाइन है-
देवास से उम्मीदवारी क्यों देवास की सीट 2007 के परिसीमन के बाद बनी है. दलित समुदाय के लिए सुरक्षित इस सीट से 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के सज्जन वर्मा चुनाव जीत चुके हैं. 2014 में यहां से बीजेपी के मनोहर उतवाल को जीत हासिल हुई थी. इस सीट पर दलित समाज के वोट निर्णायक भूमिका में हैं. प्रह्लाद टिपानिया इसी समुदाय से आते हैं. देवास लोकसभा में कुल आठ विधानसभा सीटें हैं. आठों विधानसभा सीटों में कबीर पंथ के अच्छे-खासे अनुयायी हैं. प्रह्लाद टिपानिया अपने गांव लूणियाखेड़ी में बने कबीर आश्रम के महंथ हैं. पूरे इलाके में उनकी लोकप्रियता रॉकस्टार जैसी है. वो देवास में कांग्रेस की टिकट के सबसे मजबूत दावेदार थे.
वीडियो- सीतामढ़ी के एनडीए के इस उम्मीदवार ने नीतीश कुमार को अपना टिकट लौटा दिया है
"रोड़ा को फूल थाने लागे सुहावणों सिर साट मत लीजे. मन तूं ऐसी खेती कीजै."
मालवा में सेमल को रोड़ा कहा जाता है. गांव में नौजवान टीचर एक बार दिशा-मैदान के लिए गया. सामने सेमल का पेड़ था. टीचर ने देखा कि एक पक्षी उड़ता हुआ वहां आया. उसने सेमल के फूल में जैसे ही चोंच मारी फूल टूटकर नीचे गिर गया. टीचर को तुरंत भजन की याद आ गई. पहली बार यह लगा कि भजन में कही गई बातों में सच्चाई है. यहां से कबीर के प्रति रुझान पैदा हुआ. धीरे-धीरे हाथ से कलम छूट गई. तंबूरा हाथ में आ गया. जगह-जगह जाकर गाने लगे. कबीर के पंथ से भी जुड़ाव हो गया. देखते ही देखते नौजवान पूरे इलाके में मशहूर हो गया. नौजवान का नाम है, प्रह्लाद टिपानिया. पद्म श्री से सम्मानित टिपानिया आज भी लोक परम्परा के कबीर को जानने का सबसे विश्वसनीय सूत्र हैं. उनका यह भजन सुनिए-वीडियो- सीतामढ़ी के एनडीए के इस उम्मीदवार ने नीतीश कुमार को अपना टिकट लौटा दिया है
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