कारगिल को लेकर एक गलतफहमी बहुत लोगों के दिमाग में बैठी है. कि ये युद्ध मई 1999 में शुरू हुआ. यानी जब घुसपैठ की खबर बाहर आई और अखबारों में हेडलाइन बनने लगी. लेकिन असल में कारगिल युद्ध की पटकथा बहुत पहले लिखी जा चुकी थी. अगर इस कहानी की असली शुरुआत पकड़नी हो, तो कैलेंडर में एक तारीख को लाल स्याही से घेरना पड़ेगा.
कारगिल का ‘सफेद सागर’ और मुशर्रफ की ‘सीक्रेट लैंडिंग’, 2 अप्रैल 1999 की वो रात जब युद्ध की नींव रखी गई!
Kargil War: 2 अप्रैल 1999 की वो रात जब कहा जाता है कि पाकिस्तान का तत्कालिन आर्मी चीफ जनरल परवेज मुशर्रफ एलओसी पार करके कारगिल पहुंचा और बर्फ के पीछे युद्ध का जाल बिछा. चरवाहों की पहली सूचना से लेकर टाइगर हिल पर तिरंगा फहराने तक, ऑपरेशन विजय और ऑपरेशन सफेद सागर की पूरी कहानी.


तारीख- 2 अप्रैल 1999. ये वही तारीख है जब दिल्ली में लोग गर्मी के मौसम के लिए पंखे-कूलर निकाल रहे थे. और सीमा पर बर्फ के पीछे, पाकिस्तान का एक जनरल अपने सबसे बड़े जुए की गोटी बिछा रहा था. उसका नाम था परवेज मुशर्रफ. वही मुशर्रफ जो आगे चलकर पाकिस्तान का तानाशाह बना. वही मुशर्रफ जिसने बाद में टीवी पर बैठकर ये तक कह दिया कि कारगिल तो बस ‘मुजाहिदीन’ का काम था. लेकिन सच्चाई ये थी कि कारगिल पाकिस्तान की फौज का प्लान था. और उसका सेंटर पॉइंट था मुशर्रफ.
आज हम उसी 2 अप्रैल की रात से लेकर 26 जुलाई 1999 को तिरंगा फहराने तक की पूरी कहानी खोलेंगे. लेकिन कहानी सिर्फ गोलियों और बमों की नहीं है. ये कहानी है धोखे की. रणनीति की. इंटेलिजेंस की चूक की. राजनीति की मजबूरी की. और भारतीय सैनिकों की उस जिद की, जो पहाड़ों पर नहीं चढ़ती, पहाड़ों को जीत लेती है.

लाहौर बस चल रही थी, लेकिन बंदूकें भी तैयार थीं
फरवरी 1999 में भारत के तत्कालिन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान गए थे. लाहौर बस यात्रा हुई. हाथ मिलाए गए. लाहौर डिक्लेरेशन हुआ. कैमरों के सामने मुस्कान थी. टीवी पर शांति के गीत बज रहे थे.
लेकिन दूसरी तरफ पाकिस्तान की सेना का एक हिस्सा इस शांति को ‘कमजोरी’ मान रहा था. पाकिस्तान में असली सत्ता अक्सर प्रधानमंत्री के पास नहीं होती, सेना के पास होती है. नवाज शरीफ प्रधानमंत्री थे, लेकिन सेना के चीफ और उनके भरोसेमंद जनरल परवेज मुशर्रफ, पर्दे के पीछे बैठकर कुछ और ही प्लान कर रहे थे.
पाकिस्तान को लग रहा था कि कश्मीर में आतंकवाद के जरिए भारत को लंबे समय तक घसीटा जा सकता है. लेकिन 1990 के दशक के अंत तक भारत की पकड़ मजबूत होने लगी थी. दुनिया भी आतंकवाद को लेकर ज्यादा सख्त हो रही थी. पाकिस्तान को लगा कि अब कोई ‘बड़ा’ झटका देना होगा. ऐसा झटका जिससे भारत की रीढ़ पर हाथ पड़े.
यहीं से जन्म हुआ कारगिल प्लान का.
कारगिल की सच्चाई: जहां ऊंचाई ही हथियार है
कारगिल इलाका लद्दाख का हिस्सा है. यहां पहाड़ सिर्फ पहाड़ नहीं हैं. ये पत्थर की दीवारें हैं, जिनकी ऊंचाई 16 हजार से 18 हजार फीट तक जाती है. सर्दियों में यहां तापमान माइनस 30 से माइनस 40 तक गिर जाता है. बर्फ इतनी पड़ती है कि कई पोस्ट पर रहना लगभग नामुमकिन हो जाता है.
और इसी वजह से दशकों से एक परंपरा चली आ रही थी. जिसे सेना की भाषा में ‘विंटर वैकेशन’ या ‘विंटर गैप’ कहा जाता है. यानी सर्दियों में कुछ ऊंची पोस्ट खाली कर दी जाती थीं. सैनिक नीचे आ जाते थे. और गर्मियों में फिर वापस जाते थे. यही वो कमजोर कड़ी थी, जिसे पाकिस्तान ने पकड़ा.
पाकिस्तान का प्लान था कि सर्दियों में जब भारतीय पोस्ट खाली हों, तब उनके सैनिक वहां चुपचाप जाकर बैठ जाएं. बंकर बना लें. संगर्स खड़े कर लें. और गर्मी शुरू होते ही जब भारतीय सेना वापस आए, तब उन्हें ऊपर से गोली मारकर रोक दिया जाए.
युद्ध का आधा हिस्सा तो ऊंचाई ही तय कर देती है. जो ऊपर है, वो शिकारी है. और जो नीचे है, वो शिकार.
2 अप्रैल 1999: वो रात जब मुशर्रफ ने एलओसी पार की!
अब आते हैं असली तारीख पर. 2 अप्रैल 1999 की तारीख कारगिल की कहानी में इसलिए अहम मानी जाती है, क्योंकि कई सैन्य लेखों और संस्मरणों के मुताबिक इसी दौर में पाकिस्तानी सेना ने अपनी घुसपैठ की योजना को अंतिम रूप देना शुरू किया था.
इसी संदर्भ में यह भी उल्लेख मिलता है कि तत्कालीन पाकिस्तानी सेना अध्यक्ष परवेज मुशर्रफ खुद एलओसी क्रॉस करके कारगिल इलाके में आया. वो हेलीकॉप्टर से पहुंचा. और उसने आगे की तैयारियों का निरीक्षण किया. ये कोई छोटा कदम नहीं था. एक फौजी कमांडर का दुश्मन की सीमा के भीतर आकर बैठना मतलब साफ संदेश था कि ऑपरेशन बहुत बड़ा है और बहुत सीक्रेट है.
कारगिल रिव्यू कमेटी रिपोर्ट और तत्कालीन भारतीय सेना प्रमुख जनरल वी.पी. मलिक की किताब ‘From Surprise to Victory’ जैसे स्रोत बताते हैं कि पाकिस्तान की यह घुसपैठ अचानक नहीं थी, बल्कि महीनों पहले से योजनाबद्ध तरीके से सर्दियों की आड़ में की गई थी. यही वजह है कि 2 अप्रैल 1999 को अक्सर उस तारीख के रूप में देखा जाता है, जब कारगिल युद्ध की नींव जमीन पर नहीं, रणनीति के नक्शों पर रखी जा चुकी थी.

कई रिपोर्ट्स और किताबों में यह बात दर्ज है कि मुशर्रफ ने उसी दौरान अपने अफसरों को ब्रीफ किया. यानी कहां बैठना है, कैसे बैठना है, कितनी सप्लाई चाहिए, कौन सा पॉइंट पकड़ना है.
यहां सबसे दिलचस्प बात ये है कि उस समय भारत को इसकी भनक तक नहीं लगी. न मीडिया को. न आम जनता को. और न ही पूरी तरह से सिस्टम को. और यही वो जगह है जहां कहानी का पहला बड़ा सवाल खड़ा होता है. क्या हमारी इंटेलिजेंस सो रही थी?
RAW-IB की चूक: भ्रम कि ये सिर्फ आतंकियों की हरकत होगी
कारगिल युद्ध के बाद बनी Kargil Review Committee की रिपोर्ट में साफ लिखा गया कि इंटेलिजेंस में कमी थी. पाकिस्तान की हलचलें दिख रही थीं, लेकिन उन्हें ठीक से जोड़ा नहीं गया. कुछ इनपुट आए, लेकिन उन्हें उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया जितना लिया जाना चाहिए था. क्यों?
एक कारण यह भी था कि भारत उस समय ‘शांति की उम्मीद’ के मूड में था. लाहौर बस यात्रा के बाद माहौल बना था कि रिश्ते सुधर रहे हैं. दूसरा कारण यह था कि पाकिस्तान पहले भी घुसपैठ करवाता रहा था. अक्सर उसे आतंकियों की हरकत मानकर स्थानीय स्तर पर निपटा दिया जाता था.
लेकिन कारगिल की घुसपैठ अलग थी. यह सिर्फ आतंकियों का मामला नहीं था. यह एक मिलिट्री ऑपरेशन था. प्लानिंग के साथ. मैपिंग के साथ. सप्लाई लाइन के साथ. सबसे बड़ा फर्क ये था कि इस बार घुसपैठिए सिर्फ घुसकर गोली मारने नहीं आए थे. वो घुसकर बैठ गए थे. उन्होंने जमीन पर कब्जा कर लिया था.
चरवाहों की पहली आहट: युद्ध की पहली घंटी
कारगिल की कहानी में चरवाहों का रोल बहुत अहम है. क्योंकि युद्ध की पहली असली सूचना किसी सैटेलाइट से नहीं आई. किसी जासूस से नहीं आई. वो आई उन लोगों से जो रोज बर्फीले पहाड़ों में अपने जानवर चराते हैं.
स्थानीय चरवाहों ने देखा कि कुछ लोग पहाड़ों पर ऐसी जगहों पर मौजूद हैं जहां आमतौर पर कोई नहीं होता. उनके पास हथियार हैं. उन्होंने पत्थरों से दीवारें बना रखी हैं. और उनका व्यवहार सामान्य नहीं है.
उन्होंने ये बात स्थानीय लोगों और फिर सेना तक पहुंचाई. अब यहां से कहानी में एक दूसरा बड़ा मोड़ आता है.
भारतीय सेना ने शुरुआत में इसे गंभीर खतरा नहीं माना. उन्हें लगा कि कुछ घुसपैठिए होंगे. या कुछ आतंकवादी होंगे जो सर्दियों में ऊपर रह गए होंगे. लेकिन असली तूफान तो अभी बाकी था.
कैप्टन सौरभ कालिया: वो मिशन जिससे सच सामने आया
जब सेना को इन संदिग्ध गतिविधियों की खबर मिली, तो जांच के लिए पेट्रोलिंग पार्टी भेजी गई. इसी दौरान कैप्टन सौरभ कालिया और उनके साथी जवान दुश्मन के संपर्क में आए. और फिर जो हुआ, वो भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में से एक है.
कैप्टन सौरभ कालिया और उनके जवानों को पकड़ लिया गया. बाद में उनके साथ जो अत्याचार हुआ, उसकी कहानी आज भी लोगों को झकझोर देती है. जब उनके शव वापस मिले, तो शरीर पर टॉर्चर के निशान थे.
इस घटना ने एक बात साफ कर दी. ये कोई मामूली घुसपैठ नहीं थी. ये युद्ध था. और अब दिल्ली की नींद टूटी.

पाकिस्तान का असली मास्टरप्लान: NH-1A काट दो और भारत की सप्लाई तोड़ दो
कारगिल ऑपरेशन का असली लक्ष्य बहुत साफ था. श्रीनगर से लेह जाने वाला हाईवे, जिसे NH-1A कहा जाता था, वह कारगिल के पास से गुजरता है. यही हाईवे लद्दाख और सियाचिन के लिए भारत की लाइफलाइन है. अगर ये हाईवे कट जाता, तो सियाचिन में बैठे भारतीय सैनिकों तक रसद पहुंचाना बेहद मुश्किल हो जाता.
पाकिस्तान की योजना थी कि वो ऊंची चोटियों पर बैठकर इस हाईवे को तोपों और मशीनगनों से कंट्रोल करेगा. भारत की सप्लाई लाइन टूटेगी. और फिर भारत दबाव में आकर बातचीत की मेज पर आएगा.
मतलब एक तरह से पाकिस्तान ‘सियाचिन’ को अप्रत्यक्ष तरीके से जीतना चाहता था. यहां पाकिस्तान को लग रहा था कि भारत के पास दो ही विकल्प होंगे.
- पहला, पीछे हट जाओ और सियाचिन को जोखिम में डाल दो.
- दूसरा, बड़ी लड़ाई छेड़ो और इंटरनेशनल दबाव झेलो.
पाकिस्तान को भरोसा था कि भारत तीसरा विकल्प नहीं चुन पाएगा. यानी सीधे जाकर ऊंचाई पर बैठे दुश्मन को निकाल बाहर करना. लेकिन पाकिस्तान भूल गया था कि भारत के पास तीसरा विकल्प नहीं, एक ही विकल्प था… लड़ना और जीतना.
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ऑपरेशन विजय: जब जमीन पर भारत ने तय किया कि अब पीछे नहीं हटेंगे
जैसे ही साफ हुआ कि दुश्मन पाकिस्तानी सेना है, भारतीय सेना ने बड़े पैमाने पर ऑपरेशन शुरू किया. इस ऑपरेशन का नाम रखा गया. ‘ऑपरेशन विजय’ (Operation Vijay).
ऑपरेशन विजय का मतलब था, एक-एक चोटी वापस लेना. लेकिन ये काम कागज पर जितना आसान लगता है, असल में उतना ही खून मांगता है. क्यों? क्योंकि दुश्मन ऊपर बैठा है. उसके पास पहले से बने बंकर हैं. पत्थर की दीवारें हैं. मशीनगनें हैं. स्नाइपर हैं. और सबसे बड़ी चीज, उसे पता है कि नीचे से आने वाला हर सैनिक खुला निशाना है.
ऊपर से गोली चलाना आसान है. नीचे से ऊपर चढ़ना मौत को गले लगाने जैसा है. यही वजह है कि कारगिल युद्ध में भारतीय सेना ने जितनी बहादुरी दिखाई, उतनी दुनिया के बहुत कम युद्धों में दिखती है.
बोफोर्स की वापसी: जो तोप घोटाले से बदनाम थी, वो युद्ध की हीरो बन गई
कारगिल युद्ध की सबसे बड़ी स्टार बनी. ‘बोफोर्स होवित्जर’ (Bofors Howitzer). वही बोफोर्स, जिस पर 1980 के दशक में घोटाले के आरोप लगे थे. जिस पर राजनीति होती रही. लेकिन युद्ध में बोफोर्स ने दिखा दिया कि हथियार को बदनाम किया जा सकता है, उसकी ताकत को नहीं.
कारगिल की ऊंचाई पर दुश्मन को मारने के लिए भारी आर्टिलरी जरूरी थी. बोफोर्स की खासियत यह थी कि यह ऊंचाई पर भी सटीक गोले दाग सकती थी. भारतीय सेना ने जब बोफोर्स से लगातार फायरिंग शुरू की, तो पाकिस्तानी बंकर हिलने लगे. सप्लाई लाइन टूटने लगी. और कई जगह दुश्मन को पीछे हटना पड़ा.

कारगिल में बोफोर्स ने एक तरह से भारतीय सैनिकों के लिए रास्ता बनाया. वरना सिर्फ पैदल चढ़ाई करके दुश्मन को हटाना और भी ज्यादा मुश्किल होता.
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तोलोलिंग: पहली बड़ी चोटी, पहली बड़ी कीमत
कारगिल की लड़ाई में तोलोलिंग एक शुरुआती और अहम पॉइंट था. इस पर कब्जा करना जरूरी था क्योंकि यहां से दुश्मन पूरे इलाके को देख सकता था. तोलोलिंग को वापस लेने की कोशिश में भारतीय सेना ने भारी नुकसान उठाया. लेकिन यही वह मोड़ था जहां भारत ने साबित कर दिया कि वो पीछे हटने वाला नहीं.
इस लड़ाई में जवानों ने रात के अंधेरे में चढ़ाई की. कई जवान रास्ते में ही गोली का शिकार हो गए. लेकिन फिर भी चढ़ाई नहीं रुकी. कारगिल की लड़ाई में सबसे डरावनी चीज थी. सीधी चढ़ाई. बिना कवर के. और यह काम भारतीय जवानों ने बार-बार किया.

टाइगर हिल: नाम सुनते ही रोंगटे क्यों खड़े हो जाते हैं?
कारगिल युद्ध का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया- ‘टाइगर हिट’ (Tiger Hill). टाइगर हिल एक ऐसी चोटी थी जहां से दुश्मन पूरे इलाके पर नजर रख सकता था. यहां से हाईवे पर फायरिंग आसान थी. और यहां बैठे दुश्मन को हटाना मतलब युद्ध का रुख बदल देना.
टाइगर हिल पर लड़ाई सिर्फ युद्ध नहीं थी, यह एक टेस्ट था. सैनिकों की सहनशक्ति का, नेतृत्व का और रणनीति का. भारतीय सेना ने कई बार हमला किया. हर बार भारी नुकसान हुआ. लेकिन आखिरकार भारतीय जवानों ने इस चोटी पर कब्जा किया.
टाइगर हिल पर तिरंगा फहरना सिर्फ एक सैन्य जीत नहीं थी. वो एक मनोवैज्ञानिक जीत थी. उस दिन भारत ने दुनिया को बता दिया कि ऊंचाई पाकिस्तान के पास हो सकती है, लेकिन हौसला भारत के पास है.

ऑपरेशन सफेद सागर: जब आसमान से भारत ने पहाड़ों पर हमला किया
कारगिल युद्ध की एक खास बात यह थी कि यहां एयरफोर्स का रोल बहुत अलग था. पहाड़ों में एयर स्ट्राइक करना आसान नहीं होता. ऊंचाई ज्यादा, ऑक्सीजन कम, मौसम अनिश्चित और दुश्मन छिपा हुआ.
फिर भी भारत ने फैसला किया कि वायुसेना को मैदान में उतरना होगा. इस ऑपरेशन का नाम रखा गया- ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ (Operation Safed Sagar). सफेद सागर नाम इसलिए क्योंकि चारों तरफ बर्फ ही बर्फ थी. और इसी सफेद सागर में भारतीय वायुसेना को अपने टारगेट खोजने थे.

शुरुआत में मुश्किलें आईं. मिग-21 और मिग-27 जैसे विमान पहाड़ी युद्ध के लिए उतने अनुकूल नहीं थे. एक मिग-21 गिरा. एक एमआई-17 हेलीकॉप्टर भी दुश्मन की फायरिंग का शिकार हुआ.
लेकिन इसके बाद मैदान में आया भारत का सबसे भरोसेमंद फाइटर- Mirage 2000. मिराज ने लेजर गाइडेड बमों के जरिए दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाया. पहाड़ों पर बने बंकरों को उड़ाया. सप्लाई डिपो खत्म किए.
यहां से युद्ध का संतुलन बदलने लगा. अगर ऑपरेशन विजय ने जमीन पर लड़ाई लड़ी, तो ऑपरेशन सफेद सागर ने आसमान से दुश्मन की रीढ़ तोड़ी.
ऑपरेशन तलवार: नौसेना की वो भूमिका जो लोग भूल जाते हैं
कारगिल युद्ध का जिक्र आते ही लोग सेना और वायुसेना की बात करते हैं. लेकिन भारतीय नौसेना ने भी एक बड़ा कदम उठाया था. इसका नाम था- ‘ऑपरेशन तलवार’ (Operation Talwar).
इस ऑपरेशन के तहत भारतीय नौसेना ने अरब सागर में पाकिस्तान के समुद्री रास्तों पर दबाव बनाया. पाकिस्तान की तेल सप्लाई और व्यापारिक रास्तों पर खतरा पैदा हुआ. मतलब पाकिस्तान को संदेश था.
“अगर तुम पहाड़ों पर युद्ध करोगे, तो समुद्र में भी चैन से नहीं बैठ पाओगे.”

ये रणनीतिक दबाव पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ा था क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था पहले ही कमजोर थी. और युद्ध लंबा चलता तो ईंधन और सप्लाई की दिक्कतें और बढ़ जातीं.
पाकिस्तान की चाल: सैनिक थे लेकिन नाम ‘मुजाहिदीन’ का लगाया गया
कारगिल युद्ध का सबसे बड़ा धोखा यही था कि पाकिस्तान शुरू में कहता रहा कि ये उसके सैनिक नहीं हैं. ये कश्मीरी मुजाहिदीन हैं. यानी स्थानीय लड़ाके. लेकिन असलियत यह थी कि वहां पाकिस्तान की ‘नॉदर्न लाइट इंफेंट्री’ (Northern Light Infantry) के जवान थे. बाद में यही यूनिट पाकिस्तान आर्मी का हिस्सा बन गई.
अब सवाल ये है कि पाकिस्तान ने झूठ क्यों बोला? वजह साफ थी- अगर पाकिस्तान मान लेता कि उसके सैनिक एलओसी पार करके आए हैं, तो यह सीधा युद्ध अपराध होता. इंटरनेशनल मंच पर पाकिस्तान की धज्जियां उड़ जातीं. इसलिए उसने कहानी बनाई कि ये ‘स्वतंत्रता सेनानी’ हैं.
लेकिन युद्ध में झूठ ज्यादा देर नहीं चलता. भारतीय सेना के हाथ दस्तावेज लगे. हथियारों के निशान मिले. रेडियो इंटरसेप्ट हुए. और फिर दुनिया समझ गई कि पाकिस्तान सीधे तौर पर शामिल है.
भारत की रणनीति: एलओसी पार नहीं करेंगे, लेकिन घर में घुसकर मारेंगे
कारगिल युद्ध में भारत ने एक बड़ा राजनीतिक और रणनीतिक फैसला लिया. भारत ने तय किया कि वह एलओसी पार नहीं करेगा. बहुत लोगों को उस समय यह फैसला कमजोर लगा. लेकिन असल में यह एक मास्टरस्ट्रोक था. क्यों?
क्योंकि अगर भारत एलओसी पार करता, तो पाकिस्तान तुरंत इसे ‘फुल वॉर’ घोषित कर देता. और फिर इंटरनेशनल दबाव भारत पर भी आता. साथ ही न्यूक्लियर धमकी का खेल और तेज हो जाता.

भारत ने दुनिया को साफ संदेश दिया. हम अपनी जमीन वापस ले रहे हैं. हम किसी और की जमीन नहीं छू रहे. इससे भारत को कूटनीतिक फायदा मिला. अमेरिका और बाकी देशों को पाकिस्तान पर दबाव डालने का मौका मिला. और पाकिस्तान का झूठ धीरे-धीरे टूटने लगा.
नवाज शरीफ बनाम मुशर्रफ: पाकिस्तान के अंदर की राजनीति
कारगिल युद्ध सिर्फ भारत-पाकिस्तान की लड़ाई नहीं थी. यह पाकिस्तान के अंदर सत्ता की लड़ाई भी थी. कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि नवाज शरीफ को इस ऑपरेशन की पूरी जानकारी नहीं थी. या कम से कम उसे इसकी गंभीरता का अंदाजा नहीं था. मुशर्रफ और सेना ने उसे अंधेरे में रखा.
जब युद्ध बढ़ने लगा और पाकिस्तान की हालत खराब होने लगी, तब नवाज शरीफ को एहसास हुआ कि ये खेल बहुत बड़ा हो गया है. और फिर वो अमेरिका पहुंचे.
बिल क्लिंटन की एंट्री: जब पाकिस्तान को पीछे हटने का आदेश मिला
जुलाई 1999 में नवाज शरीफ अमेरिका गए और राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से मिले. वहां पाकिस्तान ने उम्मीद की कि अमेरिका भारत पर दबाव बनाएगा. लेकिन हुआ उल्टा. क्लिंटन ने साफ कहा कि पाकिस्तान को पीछे हटना होगा. एलओसी का उल्लंघन गलत है. और अगर पाकिस्तान नहीं हटेगा तो दुनिया उसके खिलाफ जाएगी.
यह पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका था. क्योंकि उसे लग रहा था कि न्यूक्लियर ताकत होने के कारण दुनिया उसे गंभीरता से लेगी. लेकिन कारगिल में पाकिस्तान साफ तौर पर आक्रांता था. और दुनिया को यह समझ में आ गया. यहीं से पाकिस्तान का मनोबल टूटने लगा.

मैदान में जवान, दिल्ली में राजनीति और मीडिया का रोल
कारगिल युद्ध के दौरान भारत में मीडिया का रोल बहुत अलग था. यह पहला ऐसा युद्ध था जिसे टीवी ने लगभग लाइव कवर किया. रिपोर्टर पहाड़ों के नीचे तक पहुंचे. जवानों के इंटरव्यू हुए. शहीदों के घरों की तस्वीरें आईं.
इससे देश में एक भावनात्मक लहर उठी. लोग सेना के साथ खड़े हो गए. हर घर में कारगिल की चर्चा होने लगी. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी था. युद्ध के बीच में जानकारी का लीक होना. कभी-कभी ऑपरेशन की संवेदनशील बातें भी बाहर चली जातीं.
फिर भी कुल मिलाकर कारगिल युद्ध ने भारत में सेना के प्रति सम्मान को कई गुना बढ़ा दिया.

युद्ध का मनोविज्ञान: पहाड़ पर लड़ना सिर्फ हथियार नहीं, मानसिक ताकत मांगता है
कारगिल की लड़ाई सिर्फ गोली-बम वाली नहीं थी. यह मानसिक युद्ध था. सोचिए, एक जवान रात के अंधेरे में चढ़ाई कर रहा है. उसके ऊपर दुश्मन बैठा है. बर्फ फिसल रही है. सांस फूल रही है. पीठ पर सामान है. और हर कदम पर मौत की संभावना है.
यहां डर भी होता है. थकान भी. लेकिन फिर भी जवान आगे बढ़ता है. क्यों?
क्योंकि पीछे हटने का मतलब सिर्फ हार नहीं, देश का अपमान है. कारगिल युद्ध में कई बार जवानों ने हाथों में राइफल के बजाय चाकू लेकर हमला किया. कई जगह आमने-सामने की लड़ाई हुई. पत्थर के पीछे छिपकर ग्रेनेड फेंके गए. ये युद्ध तकनीक से ज्यादा साहस का युद्ध था.
भारत की सप्लाई और लॉजिस्टिक्स: असली लड़ाई पीछे चल रही थी
कारगिल युद्ध में जो दिखता है वो फ्रंटलाइन है. लेकिन असली जंग सप्लाई लाइन पर भी थी. इतनी ऊंचाई पर सैनिकों को खाना पहुंचाना, गोला-बारूद पहुंचाना, मेडिकल सपोर्ट देना, कपड़े पहुंचाना, ऑक्सीजन देना, यह सब एक अलग युद्ध है.
भारतीय सेना ने हजारों टन सामग्री पहाड़ों पर पहुंचाई. खच्चरों से, ट्रकों से, हेलीकॉप्टरों से. और यही लॉजिस्टिक ताकत युद्ध जीतने में बहुत बड़ा कारण बनी.

पाकिस्तान की सप्लाई टूटने लगी, घुसपैठिए फंसने लगे
जब भारत ने आर्टिलरी और एयर स्ट्राइक तेज की, तो पाकिस्तान की सप्लाई लाइन टूटने लगी. ऊपर बैठे सैनिकों को खाना और गोला-बारूद पहुंचाना मुश्किल हो गया. और यही वह पॉइंट था जहां पाकिस्तान की योजना फेल होने लगी.
क्योंकि ऊंचाई पर बैठना तब तक फायदा देता है जब तक आपके पास सप्लाई है. अगर खाना खत्म हो जाए, गोलियां खत्म हो जाएं, तो ऊंचाई भी कब्र बन जाती है. कई पाकिस्तानी सैनिकों ने पीछे हटने की कोशिश की. कई मारे गए. कई घायल हुए.
और धीरे-धीरे भारत एक-एक चोटी वापस लेने लगा. कारगिल में भारत की जीत का सबसे बड़ा कारण क्या था? अगर एक लाइन में जवाब देना हो तो- “स्पष्ट राजनीतिक निर्णय और सैनिकों की जिद”.
भारत ने तय कर लिया था कि जमीन वापस लेनी है. कोई कन्फ्यूजन नहीं. कोई डील नहीं. कोई आधा समझौता नहीं. और सैनिकों ने उस फैसले को अपने खून से सच कर दिया.
इसके अलावा कुछ और कारण भी थे,
- भारत की कूटनीति पाकिस्तान से आगे रही
- एयरफोर्स ने समय पर निर्णायक भूमिका निभाई
- बोफोर्स जैसी आर्टिलरी ने गेम पलट दिया
- पाकिस्तान की योजना लंबी लड़ाई के लिए तैयार नहीं थी
- दुनिया पाकिस्तान के झूठ को पहचान गई

26 जुलाई 1999: जब भारत ने कहा, कारगिल अब हमारा है
करीब दो महीने तक चली इस भीषण लड़ाई के बाद भारत ने 26 जुलाई 1999 को आधिकारिक तौर पर घोषणा की कि कारगिल पूरी तरह घुसपैठियों से मुक्त है. यही दिन आज विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है.
यह सिर्फ जीत की घोषणा नहीं थी. यह उस जिद की मुहर थी जिसने पाकिस्तान के सबसे बड़े सैन्य धोखे को चकनाचूर कर दिया. टाइगर हिल, तोलोलिंग, द्रास, बटालिक. ये नाम अब सिर्फ जगहें नहीं रहे. ये भारत की सामूहिक याददाश्त का हिस्सा बन गए.
कारगिल का असर: भारत-पाक रिश्तों पर एक स्थायी जख्म
कारगिल युद्ध ने भारत-पाकिस्तान रिश्तों में एक बात स्थायी रूप से लिख दी. पाकिस्तान पर भरोसा नहीं किया जा सकता. लाहौर बस चल रही थी और उसी दौरान कारगिल की तैयारी चल रही थी. यह धोखा सिर्फ भारत के साथ नहीं था, यह शांति प्रक्रिया के साथ भी था.
इसके बाद भारत में पाकिस्तान के प्रति अविश्वास और गहरा हुआ. और पाकिस्तान की छवि दुनिया में भी खराब हुई.

कारगिल के बाद भारत ने क्या सीखा?
कारगिल युद्ध के बाद भारत ने कई बड़े बदलाव किए. मिसाल के तौरपर,
- इंटेलिजेंस को मजबूत करने की जरूरत समझी गई
- हाई-एल्टीट्यूड वारफेयर के लिए नई रणनीतियां बनीं
- निगरानी और सैटेलाइट इमेजरी पर जोर बढ़ा
- सेना, वायुसेना और नौसेना के संयुक्त ऑपरेशन की अहमियत समझी गई
- बॉर्डर मैनेजमेंट और पोस्ट सिस्टम में सुधार हुआ
कारगिल ने भारत को झकझोर दिया, लेकिन उसी झटके ने भारत को मजबूत भी किया.
2 अप्रैल 1999 की असली कहानी क्या कहती है?
अब वापस वहीं आते हैं जहां से शुरू किया था. 2 अप्रैल 1999. अगर यह सच है कि मुशर्रफ उस दिन एलओसी पार करके आया, तो इसका मतलब यह है कि कारगिल युद्ध अचानक नहीं हुआ. यह एक सोची-समझी साजिश थी. महीनों की प्लानिंग थी. और पाकिस्तान ने जानबूझकर शांति के माहौल का फायदा उठाया.
यह तारीख हमें यह भी बताती है कि युद्ध सिर्फ सीमा पर नहीं होता. युद्ध कागजों पर, मीटिंग रूम में और नक्शों पर भी होता है. और कारगिल का युद्ध इस बात का उदाहरण है कि अगर आप शांति की उम्मीद में सतर्कता छोड़ दें, तो दुश्मन उसी उम्मीद को हथियार बना लेता है.
कारगिल ने भारत को एक कड़वा सच सिखाया. “शांति जरूरी है, लेकिन शांति के साथ चौकसी भी उतनी ही जरूरी है.”

कारगिल सिर्फ युद्ध नहीं, भारत की जिद की कहानी है
कारगिल युद्ध की कहानी जब भी सुनाई जाती है, तो अक्सर गोलियों और बमों पर टिक जाती है. लेकिन असली कहानी इससे बड़ी है.
- यह कहानी है उस जवान की, जिसने माइनस तापमान में चढ़ाई की.
- यह कहानी है उस परिवार की, जिसने बेटे को तिरंगे में लिपटा देखा.
- यह कहानी है उस देश की, जिसने तय किया कि जमीन का एक इंच भी नहीं जाएगा.
- यह कहानी है उस धोखे की, जो 2 अप्रैल 1999 की रात बर्फ में छिपकर शुरू हुआ.
पाकिस्तान ने कारगिल में एक चाल चली थी. लेकिन भारत ने जवाब में सिर्फ गोली नहीं चलाई. भारत ने इतिहास लिख दिया. जब 26 जुलाई को कारगिल की चोटियों पर तिरंगा फहरा, तो वो सिर्फ कपड़े का टुकड़ा नहीं था. वो उस भरोसे का प्रतीक था कि भारत झुकता नहीं. कारगिल की बर्फ पिघल जाती है. लेकिन कारगिल की यादें नहीं पिघलतीं. यही इस युद्ध की असली जीत है.
वीडियो: किताबवाला: पाकिस्तान, कारगिल वॉर, इराक वॉर पर पूर्व आर्मी चीफ ने क्या बता दिया?





















