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इंटरव्यू : अनुराग कश्यप की फ़िल्मों की सबसे विचित्र हिरोइन

दिल्ली में पली-बढ़ी. अंग्रेजी नाटक पढ़े-किये. फिर बरेली की लड़की बन गईं.

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फोटो - thelallantop
एक नई हीरोइन आई हैं. हीरोइन कौन होती है? जो फिल्म में लीड रोल करे. उस हिसाब से. और बढ़िया करे तो उसे एक्ट्रेस भी कह सकते हैं. अर्थात हर हीरोइन एक्ट्रेस नहीं होती. ये समूह ग की भर्ती से शुरू होने वाले रीजनिंग के सवाल की तरह हो सकता है. हर कुर्सी मेज है, कुछ मेज डोरमेट हैं. सभी डोरमेट कुर्सी नहीं हैं जैसा. ये कन्फ्यूजिंग हो गया है. साफ-पारदर्शी सरल नहीं है. मगर है. सरल. एक्टिंग. जोया की. जो हमारी हीरोइन हैं. और एक्ट्रेस भी. जिन्होंने डेब्यू किया है अनुराग कश्यप की फिल्म मुक्काबाज से. हालांकि ये डेब्यू नहीं है. क्योंकि जोया इससे पहले तीन फिल्में और कर चुकी हैं. जिनके बारे में आपको नहीं पता. क्योंकि किसी ने पता करने की जहमत नहीं उठाई. क्योंकि फिल्म मतलब फीचर फिल्म जो सिनेमा हॉल में रिलीज हो, ऐसी समझ बना और जमा दी गई है. इस इंटरव्यू में जोया को ये फिल्म कैसे मिली, इसकी तैयारी कैसे की, जैसे रेगुलर सवाल हैं. पर जवाब असली हैं. ये भी है कि जोया और अनुराग में लड़ाई क्यों होती है. और ये भी कि दिल्ली की एक लड़की, जब मुंबई जाती है तो क्या होता है. कैसे होता है. खैर, जोया से हमने बात की. तसल्ली से. मजा आया. हम दोनों को. आप भी इससे होकर गुजरें.
सवाल- पर्सनल लाइफ से शुरू करते हैं. बल्कि लाइफ से. उसकी शुरुआत से. पैदाइश से.  जोया- दिल्ली में पली बढ़ी हूं. कई जगह रही. पंचशील पार्क, मालवीय नगर. दरअसल एक घर जैसा कुछ सैनिक फॉर्म में था. तब वहां फॉर्म हाउस नहीं खेत होते थे. फिर आखिर में फैमिली गुड़गांव सेटल हो गई है आठ साल से. सवाल- पढ़ाई लिखाई कहां की? जोया- घर-परिवार के लोग दून और वैलहम में पढ़े हैं. पापा भी. जब वो 14 साल के थे तो दादाजी का इंतकाल हो गया. पापा को आज तक अफसोस है. बोर्डिंग के चक्कर में वो अपने वालिद के साथ वक्त नहीं गुजार सके. और इसलिए पापा ने तय किया कि मैं अपने बच्चों को अपने पास रखकर पढ़ाऊंगा. इसके चलते मैं और मेरी बहन दिल्ली में ही पढ़े. पापा के दून स्कूल के एक टीचर थे. वो वसंत वैली स्कूल में प्रिंसिपल बनकर आए थे. तब ये नया-नया स्कूल था. क्लास में 20-25 बच्चे ही होते थे. यहां पढ़ाई से ज्यादा एक्स्ट्रा कैरिकुलर एक्टिविटीज पर जोर था. यहीं हमारा एडमिशन करवा दिया गया. सवाल- तो एक्टिंग का कीड़ा कहां काटा? जोया- स्कूल में थिएटर करती थी. उसके बाद मन था एलएसआर (लेडी श्रीराम कॉलेज) से जर्नलिज्म करने का. वहां एडमिशन नहीं मिला. तो डीयू के साउथ कैंपस के वेंकटेश्वर कॉलेज में बीए प्रोग्राम में चली गई. उस टाइम पर 'यात्रिक थिएटर ग्रुप' ज्वाइन किया. इसमें सुनीत टंडन जैसे कई लोग थे. हम इंग्लिश में प्ले करते थे. मैं ग्रुप की सबसे छोटी मेंबर थी. zoya2 सवाल- घरवालों ने लोड नहीं लिया? जोया- हमारी फैमिली में क्रिएटिव लोग हैं. नाना आर्किटेक्ट थे और नानी पेंटर. मां चाइल्ड साइकॉलजिस्ट. पापा टूरिज्म के बिजनेस में हैं, मगर ट्रेंड सिंगर भी हैं. तो किसी ने ये नहीं कहा कि ये कहां थिएटर करने लग गई. हां, पापा को एक डर था कि थिएटर घर नहीं चला सकता. उनका कहना था कि इंडिपेंडेट होना चाहिए. फाइनेंसियली. कोई प्रफेशनल डिग्री हो, सीए या लॉयर टाइप की. बैकअप के लिए. जब ग्रेजुएशन के बाद बॉम्बे आने का सोचा तब पापा को दूसरा डर हुआ. इंडस्ट्री में किसी को नहीं जानती. कैसे क्या होगा. पर मैं आ गई. मेरी एक कजिन यहां काम करती थी. उसके पास. फाइट मारने. अब तो मेरी छोटी बहन भी यहीं है. वो एक ऑनलाइन एजेंसी में राइटिंग करती है. सवाल- डीयू में थिएटर के बाद ज्यादातर लोग एनएसडी का ख्वाब पालते हैं... जोया- मैं भी एनएसडी जाना चाहती थी. वहां अप्लाई करने के लिए कम से कम 10 प्रफेशनल प्ले होने चाहिए. मेरे सिर्फ आठ थे. तो आई मूव्ड टु बॉम्बे. 2012 में आई. दिल्ली में थिएटर के दम पर खर्चा नहीं चल सकता. मगर मुंबई में ऐसा नहीं था. तो वही काम यहां करना शुरू किया. सवाल- मुंबई थिएटर का कोई खास वाकया. जैसे आपकी फिल्म मुक्काबाज की कंपोज़र रचिता यहां मकरंद देशपांडे से मिलीं. मकरंद ने काम देखने के बाद अनुराग से रचिता का जिक्र किया... जोया- मकरंद देशपांडे से मैं भी मिली थी. बहुत अच्छे हैं. उन्होंने बोला, ये किताबें पढ़ो. अगर आपके पास ऑफिस हो, तो रोज का रुटीन हो जाता है. ऑफिस भी नहीं हो. आपका रुटीन क्या होना चाहिए. दो साल लोगों से मिलने की कोशिश की. दिल्ली में सेविंग्स थीं. पापा पैसे भेजते थे. प्ले देखो. बॉम्बे में लोग अप्रोचेबल हैं. कास्टिंग डायरेक्टर हैं. कास्टिंग एजेंसी से मिली थीं. पोर्टफोलियो कभी बनाया नहीं. सवाल- ओके.तो मुक्काबाज आपकी पहली फिल्म है. जोया- नहीं मुक्काबाज मेरी चौथी फिल्म है. जोया -  पहली फिल्म- तीन और आधा. केरल के फिल्म फेस्ट में प्रीमियर हुआ है इसका. मेरा पार्ट हिंदी में है. बाकी इंग्लिश और मराठी. बनाया है यूक्रेनियन डायरेक्टर ने. मेरी एक दोस्त हैं उनके थ्रू डायरेक्टर ने एप्रोच किया. डायरेक्टर का नाम- डारिया गाई. वो एक्ट्रेस खोज रही थीं, जो थिएटर वाली हो. इनफैक्ट इस फिल्म में सभी थिएटर के हैं . अंजुम राजाबली, सुहासिनी मुले. केके रैना. तो सबसे पूछ-पूछ डारिया मुझ तक पहुंची. मैंने उनके लिए रीडिंग की. उन्हें मैं अच्छी लगी. वो मुझे. स्क्रिप्ट पसंद आई. फिल्म वन टेक शूट वाली थी. इसलिए थिएटर वाली चाहती थीं वो. ये एक एक कमरे की कहानी है. तीन पार्ट में. पहली, लड़के और उसके दादा की. दूसरी, सेक्स वर्कर और क्लाइंट. तीसरा एल्डरली कपल. मैं दूसरे पार्ट में सेक्स वर्कर बनी हूं. इसकी कहानी बहुत स्वीट है. वो लड़की इस जगह (यानी कमरा) में पहली बार आई है. और उस आदमी की भी पहली रात है. वो सोशली ऑकवर्ड है. दोनों को पता नहीं. स्ट्रेंज लगता है. दोनों को वहां होना नहीं है. इसी में सिचुएशन बनती है (सवाल- आपको रिस्क नहीं लगा. पर्दे पर पहला रोल सेक्स वर्कर का. जोया- नहीं, कहानी बहुत अच्छी है. कहने में कंट्रोवर्सियल लगता है. रोल है नहीं वैसा.) दूसरी फिल्म- इंग्लिश में है. द कलर ऑफ लॉस और (or)ब्लू. एक लड़की है, लाइफ में फ्लोट कर रही है. फ्री स्पिरट. वो फ्लोट को लेकर डिनाइल में है. कुछ भी शॉर्टेड नहीं है. वो जज करना शुरू करती है. तीसरी फिल्म- नामदेव भाऊ- इन द सर्च फॉर सायलेंस. ये भी डारिया गाई की है. भाऊ मुंबई के एक टैक्सी ड्राइवर हैं. पक गए हैं. फिर उन्हें रोड पर एक आर्टिकल मिलता है. दस मोस्ट क्वाइट जगहें ऑन दिस प्लेनेट. एक छोड़ सब विदेशी. जो एक छोड़ी, वह है स्पीति वैली. ये जगह इंडिया में है. उन्हें शांति चाहिए. वो बैग पैक कर निकलते हैं .रोड ट्रिप है. उन्हें एक लड़का मिलता है. जो गुम गया है. वो आकर भाऊ संग चिपक जाता है. बोलता है उनसे कि मैं भी यहीं जा रहा हूं.मेरा कैरेक्टर एक लड़की का है. वो लद्दाख में मिलती है. बहुत इरिटेटिंग है. उसे अकेले सोने में डर लग रहा है. टूरिस्ट है. वहीं पर रह रही है. अब तक अकेली है. मगर ये दोनों मिल गए तो उनको इरिटेट करने लगती है. zoya1 सवाल- और इन तीन के बाद मिली सुनैना (मुक्काबाज में जोया के किरदार का नाम) जोया- हां. मैं अनुराग को जानती थी. अवनी के थ्रू. अवनी मेरी स्कूल फ्रेंड है. उसने अपने पापा रघु राय (मशहूर फोटोग्राफर) पर एक डॉक्युमेंट्री बनाई. ये अनुराग ने प्रॉड्यूस की थी. तब से अनुराग से मिलना हो रहा है. फिर मैंने उन्हें अपनी लिखी एक शॉर्ट स्टोरी दिखाई. मैं चाहती थी कि अनुराग इसमें एक रोल करें. मगर वो बोले, ये स्टोरी नहीं प्ले है. इस दौरान वह तीन और आधा प्रॉड्यूस कर रहे थे. जब उन्होंने ये फिल्म देखी तो पूछा, तू क्या क्या करती है. उन्हें लगता था कि मैं बस लिखती हूं. उस दौरान उन्होंने कहा था. तुम्हारे साथ काम करूंगा. मुझे लगा, मुंबई में सब ऐसे ही बोल देते हैं. इसने भी बोल दिया. फिर एक रोज उसने मुक्काबाज की स्क्रिप्ट भेजी. मैंने दो तीन दिन तक रिप्लाई नहीं किया. मुझे लगा कि फीडबैक लेने के लिए भेजी है. फिर उसका कॉल आया. अवनी का भी. तब समझ आया कि मुझे सुनैना का रोल ऑफर हुआ. है. सवाल- कैसे की गूंगेपन की तैयारी? जोया- अनुराग का साफ कहना था. साइन लैंग्वेज सीखनी होगी. इसके लिए छह-आठ महीने का टाइम था. उन्होंने दो ऑप्शन दिए थे. दिल्ली या मुंबई में सीखो. दिल्ली का घर होने की वजह से सोचा होगा. मगर मैं मुंबई रुकी. और यहीं पर संगीता गाला से मिली. मेरी ट्रेनर. उन्होंने ब्लैक, बर्फी, शमिताभ के लिए एक्टर्स को ट्रेन किया है. मगर कोई पब्लिसिटी नहीं मिली. zoya4 सवाल- तो आप उन तक कैसे पहुंचीं? जोया- मेरा एक दोस्त डायरेक्शन में है. एक छोटी सी प्यारी सी फिल्म बनी थी. साइलेंट नेशनल एंथम. उसमें वो एडी था. उसके लिए संगीता गाला ने ही सबको ट्रेन किया था. मैंने अपने दोस्त से बोला. साइन लैंग्वेज का कोच नहीं मिल रहा. उसने मुझे संगीता जी तक पहुंचा दिया. वो खुद डेफ़ हैं. मगर उनकी पर्सनैलिटी सुनैना जैसी है. तो हमारी खूब बनी. संगीता डेफ़ बच्चों के साथ और वकीलों के साथ बहुत काम करती हैं. उन्हें देखकर भी बहुत कुछ सीखने को मिला. रोड पर कैसे चलना है. मुंह कैसे मूव करना है. ये सब. मैनरिज्म भी. आप ये सब स्कूल में नहीं सीख सकते हो . सवाल- क्या ब्रीफिंग थी सुनैना के रोल के लिए अनुराग की तरफ से? जोया- परिवार में उसे सब बहुत कहते हैं, अपशगुनी है. ये बात उसे बहुत चुभती है. फिल्म में मैं सिर्फ नहीं बोल पाती. मगर मैं ठीक हूं. आपसे ज्यादा स्मार्ट हूं. आपसे ज्यादा इंपैथी है. मगर लड़की हूं. वो भी यूपी के फ्यूडल सेटअप में. तो वो अपने ढंग से रिएक्ट करती है. हरकतें मारती है. चाचा कहता है कि काला क्यों पहना तो और पहनती है. आंख में बहुत देखती है. सवाल- अनुराग और जोया का झगड़ा क्यों होता है? जोया- हम सीन के लिए ऑर्ग्यू करते हैं. अनुराग कॉलैबरेट (संगत) करने के लिए बहुत ओपन हैं. उनके हिसाब से कैरेक्टर में पर्सनैलिटी एक्टर डालते हैं. जैसे सुनैना च्युइंगम खाती है. जो मैं बहुत खाती हूं ताकि नाखून काटने की आदत से बच सकूं. तो इसे पिक्चर में डाल दिया. सवाल- और विनीत, उससे भी झगड़ीं क्या तुम? जोया- नहीं, विनीत तो पागल हो रखा था अपने रोल की तैयारी में. पता नहीं उसके ब्रेन में एंजाइम्स को क्या हुआ. पर सच में बहुत इंस्पायरिंग है वो. उसने छोटी-छोटी चीजों में मेरी बहुत हेल्प की. उसी ने सिखाया कि कैमरा लेफ्ट में है तो मेरी राइट आंख में देखो. उसने अनुराग के साथ काम किया है. तीन-तीन फिल्मों में. तो मुझे बताता रहता था कि अभी सर का मूड ऐसा है. अभी वो इस जोन में हैं. अभी बात करो. अभी नहीं करो. वैसे मैं विनीत की इस मामले में सुनती नहीं थी. उसके लिए सर थे, मैं दोस्त की तरह ट्रीट करती थी. zoya3 सवाल- जोया अब फीचर फिल्मों की भी एक्ट्रेस हैं. इस एरिया में उनका कोई फेवरिट? जोया- ऋचा चड्ढा. गैंग्स ऑफ वासेपुर में उनका रोल देखिए. कितने शेड्स हैं. कितना चेंज है. कैरेक्टर का लाइफ स्पैन कमाल का है. बहुत बड़ी फैन हूं मैं उनकी. जब मिलीं फर्स्ट टाइम, तो बताया भी. सवाल- मुक्काबाज के बाद क्या. अनुराग जल्दी पल्दी हीरोइन रिपीट नहीं करते. विनीत को भी अल्टीमेटम दे चुके थे. जोया- मेरे साथ अनुराग काम करेंगे. उन्होंने मुझे प्रॉमिस किया है. और वो मेरी फिल्म में भी काम करेंगे. (जोया सच कह रही हैं. अनुराग से जब मैंने बात की, तो उन्होंने कहा. हां जोया के साथ एक फिल्म तो ऐसी और करूंगा, जिसमें उसका किरदार बोले, मुक्काबाज में तो वो गूंगी थी. रही बात जोया की फिल्म में काम करने की, तो अनुराग को अभी भी लगता है कि वो फिल्म नहीं प्ले है. दोनों अभी भी डिनर टेबल पर इस पर झगड़ा करते हैं. फिर सुस्ताने लगते हैं. किसी और रोज झगड़ा यहीं से शुरू करने के लिए) सवाल- आप लिखती हैं. तो आपके फेवरिट राइटर कौन हैं? जोया- इटैलियन हैं एक, लुईजी पेरैंदैलो. नाटक लिखते हैं. स्टाइल अबसर्ड है. उनका प्ले है फ्यू कैरेक्टर्स इन द सर्च ऑफ ऑथर. मैंने मकरंद देशपांडे को बोल दिया था. कि ये मेरा फेवरिट प्ले है. उन्होंने इस पर आधा घंटा ग्रिल किया. फिर हंसने लगे. फिर बोले, मेरा भी फेवरेट प्ले है. तो चेक कर रहा था. तुमने पढ़ा भी है कि नहीं. सवाल- हिंदी में भी कुछ पढ़ा है क्या? जोया- यात्रिक में हम इंग्लिश में ही प्ले करते थे. तो ज्यादा तो नहीं पढ़ा. एक प्ले किया था तब, टॉय कार्ट. ये किसी हिंदी, नो-नो, संस्कृत प्ले पर बेस्ड था. मृच्छकटिकम (मृच्छकटिकम अर्थात मिट्टी की गाड़ी. संस्कृत के सबसे पॉपुलर प्ले में से एक. फर्स्ट सेंचुरी बीसी में लिखा गया. राइटर थे शूद्रक. प्ले में खास ये है कि चोर, वेश्या, दासी जैसे कई कैरेक्टर हैं. उनका अहम रोल है. वो मिलकर राजा की सत्ता हिला देते हैं. ये पहली बार हुआ था किसी नाटक में.) इसके अलावा झांसी की रानी का रोल तो सभी करते हैं. (मतलब जोया ने भी किया) और ताज महल का टेंडर भी. तीसरी कसम (रेणु की कमाल कहानी. नहीं पढ़ी तो पढ़ लो, पाठकों. ये रहा लिंक.) भी. zoya5 सवाल- आप इंग्लिश मीडियम में पढ़ीं. प्ले भी वही किए. और ये फिल्म हिंदी की. वो भी बरेली का सेटअप. जबान में लहजे की दिक्कत नहीं आई? जोया- डिक्शन का इशू नहीं हुआ. ज्यादातर बात हम इंग्लिश में ही करते हैं शूट से पहले. जब आप इंगलिश थिएटर करते हो, तो उच्चारण में स्ट्रेस करते हो. वैसी आदत बन जाती है. पर फिल्म के लिए सुधार लिया. मेरा लिस्प (तुतलाना) हुआ करता था. अभी भी है. ज्यादा लोगों को पता भी नहीं चलता है. बट आई डोंट रियली केयर. सवाल- मुक्काबाज के गाने धांसू हैं. तुम कैसे गाने सुनती हो. इंग्लिश-विंग्लिश... जोया- हां. बॉब डिलन और जैनस जॉपलिन को खूब सुना. मैं मेटल फ्लूट बजाती थी. जैज और ब्लूज (संगीत के दो फॉर्म) में ट्रेन किया. और पापा सुनते थे पुराने गाने. बेगम अख्तर टाइप्स. तो वो भी सुने. आपको पता है. मैंने आबिदा परवीन के साथ परफॉर्म किया. तब सेवेंथ में पढ़ती थी. बाद में रेखा भारद्वाज के साथ भी. दोनों जहां-ए-खुसरो में परफॉर्म करने आए थे. सवाल-कैसा रहा जिमी शेरगिल और रवि किशन के साथ काम करना. क्या सिखाया उन्होंने? जोया- रवि किशन के साथ मेरी सीन नहीं था कोई. मगर वैनिटी वैन के बहुत किस्से हैं. क्या-क्या बताते सुनाते रहते थे वो हम सबको. और उनकी हिंदी बहुत एंटरटेनिंग है. जिमी शेरगिल बहुत शाई और सॉफ्ट स्पोकन हैं. सीन के दौरान भी ऐसा होता था. हमारे फर्स्ट एडी हैं रणदीप झा. वो बोलते थे, जिमी सर थोड़ा लाउड. ओह, हां. इन दोनों की डबिंग बहुत स्ट्रॉन्ग है.
और अंत में, जोया लोड नहीं लेतीं. इंडस्ट्री का. एक कास्टिंग डायरेक्टर ने कहा, यहां वहां सर्जरी करवा लो. दूसरे ने कुछ और. जोया सबको ठेंगा दिखा आईं. उनमें एक्ट्रेस वाली सारी चीजें हैं. हीरोइन वाली एक भी नहीं. ट्विटर अकाउंट है, जहां ज्यादा कुछ नहीं है. इंस्टा रामजाने है भी या नहीं. सेल्फी से उन्हें दिक्कत होती है. पाउट बनाना आता नहीं. डायरेक्टर की हर बात मानना भी नहीं. बहुत बहस करती हैं. इन सबके बावजूद उन्हें खूब अच्छे प्रोजेक्ट्स मिले हैं. मुक्काबाज के बाद. अच्छे डायरेक्टर्स के साथ. एक कागज होता है. एनडीए कहते हैं उसे. नॉन डिसक्लोजर एग्रीमेंट. एक्टर्स करते हैं, ताकि फिल्म का सस्पेंस खत्म न हो. जोया ने भी किया है. हमें पता है. कुछ-कुछ. उन फिल्मों के बारे में. मगर हमें भी उनके एनडीए का सम्मान करना होगा. उम्मीद करता हूं कि तुम ऐसी ही रहो. जोया. जोया, जिसका मतलब होता है जीवन. जो असल है. कच्चा-पक्का-सच्चा.
फ़िल्म मुक्काबाज़ के डायरेक्टर अनुराग कश्यप का इंटरव्यू. मुक्काबाज़ के मुक्केबाज़ विनीत सिंह का इंटरव्यू. और अंत में पूरी टीम का वीडियो इंटरव्यू, बिस्तर पे बैठ के:

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