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भारत का मुसलमान क्यों दुनिया के मुसलमानों से ज्यादा समझदार है!

जेहादी जॉन और नफरती चिंटू. दोनों किस्म के लोग जरा थमकर इसे पढ़ लें.

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फोटो - thelallantop
आइये बात करते हैं. मुस्लिम समाज की आलोचना करता ही रहा हूं अक्सर. आज थोडा सा उसके पक्ष में. बिना बहस किए मान लेते हैं कि आमिर ने गलत कहा था असहिष्णुता के मुद्दे पर. आप कहें तो शाहरुख का कहा भी गलत तसलीम कर लेता हूं. सैफ अली ख़ान की नियत में खोट मान लेते हैं जब उन्होंने अपने बेटे का नाम तैमूर रखा. अब आप सिर्फ इतना कीजिये कि इनकी आलोचना कीजिये इंसान समझकर. ना कि मुसलमान समझ कर. खूब कहिये इनसे कि ये देश छोड़ के चले जाएं. ये फरमान ना सुनाइए कि 'पाकिस्तान' चले जाएं. जब जब आप सब ये कह रहे हैं ना (मज़ाक में, व्यंग में, गुस्से में या आहत होकर) तब तब आप दो समुदायों के बीच पहले से मौजूद खाई को और भी चौड़ा किये दे रहे हैं.
अट्ठारह-बीस करोड़ मुसलमानों को अरब सागर में डुबो देने का मन जब तक भारत की बहुसंख्य जनता बना नही लेती तब तक साथ ही रहना है सबने. तो बरायमेहरबानी ये घृणा ना पनपने दीजिये मन में. इससे एक समग्र समाज का बहुत नुकसान, बहुत ज़्यादा नुकसान हो रहा है. बड़े पैमाने पर अशिक्षित/अल्प-शिक्षित मुस्लिम समाज जब घृणा का ये रेला अपनी तरफ आता देखता है तो पहले से कठमुल्लाओं के शिकंजे में जकड़ी ये जमात उसी घृणा को आत्मसात कर लेती है. उसे लौटाने की तरकीबें सोचती है.
रही सही कसर ओवैसी, आज़म खान जैसे अंधे रहनुमा पूरी कर देते हैं जो तालीम, रोज़गार जैसे मुद्दों पर तो मुंह में दही जमा लेते हैं लेकिन मज़हबी मूर्खता को खूब खाद-पानी देते हैं. भारत के लगभग हर शहर कस्बे में मुसलमान मौजूद है. इतने सारे लोगों को गायब नहीं किया जा सकता. सह-अस्तित्व की अवधारणा को कबूलने के अलावा कोई चारा नहीं. हर मुसलमान को शक की नज़र से देखेंगे तो हमारा, हम सबका रोजमर्रा का जीवन सर्कस बन कर रह जाएगा.
यकीन कीजिये दुनियाभर के मुसलमानों में भारत का मुसलमान सबसे ज़्यादा समंजस है. और मैं ये बेहद जिम्मेदारी से कह रहा हूं. ऐसा इसलिए है क्यों कि वो अपने जन्म से ही ऐसे समाज में रहता आया है जहां मिल-जुलकर रहना राष्ट्रीय चरित्र है. जहां सह-अस्तित्व एक कल्पना नहीं बल्कि जीवनशैली का हिस्सा है. इस देश को अपना कहने का उसका हक़ भी है और जिम्मेदारी भी. हम उसके हक़ पे शक नहीं करेंगे तो वो जिम्मेदारी से भी नहीं मुकरने वाला. इतनी उम्मीद तो कर ही सकते हैं ना हम?
मुझे अपवाद ना गिनाइयेगा. अपराधी, गद्दार, रेपिस्ट आदि आदि मुसलमानों में भी उतने ही हैं जितने अन्य धर्मों में. ये मनुष्यों की खामियां हैं इन्हें मजहब से जोड़ कर एक पूरी कौम को खारिज़ करना अपराध जैसा ही है.
अगली बार जब आप कहें कि ये सालें खाते तो यहां का है लेकिन गाते 'वहां' की है' तो याद रखियेगा कि ''वहां' जैसी कोई जगह नहीं है. जो भी है सब यहीं पर है. यहीं पैदा हुए और यहीं मर के दफ़न हो जाने हैं सब.
फैसला सब लोग मिल के कीजियेगा कि जितना जीना है वो लड़ते मरते जीना है या प्यार बांटते हुए. जब देश में रोजमर्रा की ज़िन्दगी से जुड़े हुए ढेरों मसलें उपस्थित हैं तब धार्मिक आधार पर नफरत का खेल खेलना सिवाय मूर्खता के और कुछ नहीं. जरा सा समंजस हो जाना हम सबकी जिम्मेदारी है. इतना मुश्किल भी नहीं होना चाहिए ये समझना. एक अंतिम बात और. अगर आप इस लिखे को एक मुसलमान का लिखा समझ रहे हैं तो ये आपके लिए ही लिखा गया है. अगर आपको एक औसत भारतीय आदमी संवाद की कोशिश करता नज़र आ रहा है तो समझिये हम एक ही कश्ती के मुसाफिर हैं. और हम जितने भी हैं ना यकीन जानिये बचाये रखेंगे प्रेम को. हर हाल में.
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