चीन से सटी सीमा पर ठंड और बर्फ के बीच दो कूबड़ वाला ऊंट करेगा सेना की मदद
जहां वाहन नहीं जा सकते वहां भी जाएगा ये ऊंट.
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लद्दाख के शुष्क वातावरण में ये आसानी से रह लेता है. फोटो- इंडिया टुडे
लद्दाख की नुब्रा घाटी. यहां एक खास किस्म का ऊंट पाया जाता है. दो कूबड़ वाला. इस ऊंट को शिप ऑफ कोल्ड डेज़र्ट कहा जाता है. पूर्वी लद्दाख का वो इलाका जहां आना-जाना बेहद दुर्गम है, वहां ये ऊंट सेना की मुश्किलों को आसान बना रहा है. इस खबर में हम आपको इसकी हर खासियत बताएंगे और साथ ही ये भी कि हेलीकॉप्टर के मुकाबले ये क्यों बेहतर है. पूर्वी लद्दाख में भारतीय सेना और चीन की सेना के बीच मई 2020 से ही तनाव की स्थिति बनी हुई है. दोनों ओर से काफी संख्या में सैनिक मोर्चे पर तैनात हैं. चीन और भारत के बीच कई दौर की वार्ता भी हुई लेकिन बात सुलझ नहीं पाई. तो फिलहाल हालात ये है कि चीन अभी तक पीछे नहीं हटा है और सर्दी का मौसम चरम पर है. भारतीय सेना भी ऐसी स्थिति में, बर्फीले मौसम में, हाड़ कंपा देने वाली ठंड में वहां मोर्चे पर तैनात है. सर्दी का मौसम है. हर तरफ बर्फ है. लगातार बर्फबारी हो रही है और ऐसे में सड़क के रास्ते सेना तक कोई भी सामान पहुंचाना बेहद कठिन है. बर्फबारी के कारण सड़कों पर काफी बर्फ जमा हो जाती है. ऐसे में गाड़ियां चलाना काफी कठिन हो जाता है. एक तरफ पहाड़ तो दूसरी तरफ गहरी खाई. और सड़क पर जमी बर्फ. ऐसे में सेना तक रसद या जरूरत का बाकी सामान पहुंचाना अपने आप में बहुत कठिन काम है. किसी के भी जेहन में सवाल आएगा कि ऐसे में सेना अपने खास हेलीकॉप्टर के जरिए संपर्क बरकरार रख सकती है. लेकिन सोचिए बर्फबारी के बीच हेलीकॉप्टर उड़ाना कितना कठिन होता होगा. दूसरी बात हेलीकॉप्टर आवाज करता है, दूर से ही दिखता है. ऐसे में सेना नहीं चाहेगी कि चीन की फौज को उसकी गतिविधि की जानकारियां मिलें. सेना अपने ऑपरेशन्स को लो-प्रोफाइल रखना चाहती है. ऐसे में सेना की मदद के लिए तैयार है दो कूबड़ वाला ऊंट. ये ऊंट यहां की जलवायु में रचा बसा है. ना पेट्रोल की जरूरत और ना ही बर्फबारी की चिंता. सेना के जवानों को गश्त करनी हो तो ऊंट. रसद, दवाई या अन्य सामान पहुंचाना हो तो ऊंट. ना आवाज करेगा और ना ही दुश्मन की नजरों में आएगा. दो कूबड़ वाला ऊंट किसी जमाने में सिल्क रूट पर व्यापारियों द्वारा इस्तेमाल किया जाता था. पिछले काफी वक्त से सेना इसको ट्रेनिंग दे रही है ताकि कोल्ड डेज़र्ट में ये वाकई एक 'शिप' की भूमिका निभा सके. दो कूबड़ वाले ऊंट को बैक्ट्रियन कैमल कहा जाता है. तकरीबन 17 हजार फीट की ऊंचाई पर जो काम ये ऊंट कर सकता है वो शायद ही कोई दूसरा जानवर कर सकता हो. इन ऊंटों के बारे में लेह स्थित डिफेंस इंस्टीट्यूट ने पूरी रिसर्च की है. पहले यहां राजस्थानी ऊंटों पर भी रिसर्च की गई लेकिन ये पाया गया कि इस मौसम में बैक्ट्रियन कैमल ही टिक सकते हैं. लेह में इनकी ब्रीडिंग की जा रही है ताकि सेना को जरूरत के हिसाब से ऊंट मिल सकें. ये ऊंट बिना पानी के 72 घंटे तक आराम से रह सकते हैं. 17 हजार फीट की ऊंचाई पर 170 किलो वजन लेकर चल सकते हैं. समस्या ये है कि लद्दाख में इस ऊंट की आबादी बेहद कम है. इसी कारण सेना का ध्यान इसकी ब्रीडिंग पर है. शायद जल्द ही सेना इन ऊंटों को इस्तेमाल कर सकेगी और ठंड के मौसम में भी गश्त को तेजी से अंजाम दिया जा सकेगा.
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