कोरोना का ओमीक्रॉन वेरिएंट कितना ख़तरनाक है?
दुनिया इस वेरिएंट से निपटने के लिए क्या उपाय कर रही है?
Advertisement

दुनिया इस वेरिएंट से निपटने के लिए क्या उपाय कर रही है?
गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में मनोज वाजपेयी का एक डॉयलॉग है - सरदार ख़ान नाम है हमारा, बता दीजिएगा सबको. अबकी ये उक्ति साउथ अफ़्रीका से आई है. नए रूप में. क्या? ओमीक्रॉन नाम है हमारा, बता दीजिएगा सबको. अब तक आप ये जान चुके होंगे कि ओमीक्रॉन कोरोना वायरस का नया वेरिएंट है. इसे सबसे पहले साउथ अफ़्रीका में डिटेक्ट किया गया. 26 नवंबर के लल्लनटॉप शो में हमने ओमीक्रॉन वेरिएंट के बारे में शुरुआती जानकारियां दी थी. आज हम जानेंगे, ओमीक्रॉन वेरिएंट कितना ख़तरनाक है? दुनिया के देश इससे निपटने के लिए क्या उपाय कर रहे हैं? साउथ अफ़्रीका और WHO ट्रैवल बैन्स को हटाने की अपील क्यों कर रहे हैं? और, तमाम चिंताओं के बीच ओमीक्रॉन के नामकरण पर भसड़ क्यों मची हुई है 24 नवंबर 2021. साउथ अफ़्रीका ने दुनियावालों को एक संदेश दिया. उन्होंने कहा कि हमारे यहां कोरोना का एक नया वेरिएंट पहचान में आया है. ये तेज़ी से फैलता है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को आसानी से भेद सकता है. शुरुआत में इसको बी, वन, वन, फ़ाइव टू वन (B.1.1.529) नाम दिया गया. विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी कि WHO (काम में जैसी भी हो), एक वैश्विक संस्था है. उसके दिशा-निर्देशों के आधार पर दुनियाभर के देश हेल्थ से जुड़े नियम-कानून बनाते हैं. WHO कोरोना महामारी के साथ लड़ाई का नेतृत्व कर रही है. उसने साउथ अफ़्रीका में पाए गए नए वेरिएंट की पड़ताल की. उन्हें भी लगा कि स्थिति चिंताजनक है. फिर WHO ने इसको ‘वेरिएंट ऑफ़ कंसर्न’ की कैटेगरी में डाला. वेरिएंट ऑफ़ कंसर्न का मतलब ये कि मामला गंभीर है. जब से महामारी शुरू हुई है, तब से कोरोना वायरस म्यूटेट होता रहा है. ये सैकड़ों बार अपना रूप बदल चुका है. अधिकतर म्यूटेशन से डरने की ज़रूरत नहीं होती. हमारे शरीर की इम्युनिटी उन्हें मार गिराने में कारगर होती है. कई दफा तो म्यूटेशन फायदेमंद भी होते हैं. लेकिन कुछ म्यूटेशन अबूझ पहेली बन जाते हैं. वे वैक्सीन या संक्रमण से मिली इम्युनिटी को आसानी से भेद सकते हैं. ऐसे में संक्रमण फैलने की रफ़्तार बढ़ जाती है. उपलब्ध इलाज की प्रभाव-क्षमता घट जाती है. कुल जमा बात ये कि उनका जवाब खोजने के लिए नए सिरे से शुरुआत करनी होती है. WHO ने अभी तक पांच वेरिएंट्स को ‘वेरिएंट ऑफ़ कंसर्न’ की लिस्ट में रखा है. अल्फ़ा, बीटा, गामा, डेल्टा और अभी पकड़ में आए वेरिएंट को नाम दिया गया है - ओमीक्रॉन. दो वेरिएंट्स को ‘वेरिएंट ऑफ़ इंटरेस्ट’ माना गया है. लम्दा और म्यू. वेरिएंट्स के नामकरण की प्रक्रिया के बारे में आगे बताएंगे. पहले दुनियाभर में मचे हंगामे के बारे में जान लेते हैं. जैसे ही WHO ने ओमीक्रॉन को वेरिएंट ऑफ़ कंसर्न घोषित किया. कई देशों ने फटाफट सीमाएं बंद कर दी. इज़रायल और जापान ने किसी भी विदेशी नागरिक के घुसने पर बैन लगा दिया है. यूरोपियन यूनियन (EU), ब्रिटेन, अमेरिका, ब्राज़ील, ईरान समेत कई देशों ने साउथ अफ़्रीका से आने वाली और उधर की तरफ़ जाने वाली सभी फ़्लाइट्स को रोक दिया है. इन देशों ने साउथ अफ़्रीका के अलावा उसके पड़ोसी देशों पर भी लाल कलम चलाई है. भारत ने दक्षिण अफ़्रीका की उड़ानों को बंद तो नहीं किया है, लेकिन सरकार स्थिति पर नज़र बनाए हुए हैं. इंटरनैशनल एयरपोर्ट्स पर निगरानी बढ़ा दी गई है. दक्षिण अफ़्रीका से आने वाले यात्रियों के लिए टेस्टिंग और क़्वारंटीन से जुड़े नियम वापस लाए गए हैं. प्रतिबंधों के पीछे तर्क ये दिया जा रहा है कि इससे तैयारी के लिए वक़्त मिल जाएगा. वैज्ञानिक ये मान रहे हैं कि ट्रैवल बैन से कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला. बहुत संभावना है कि ओमीक्रॉन पहले से ही सीमाओं में दाखिल हो चुका है. इसलिए, हमें पहले स्टेप से शुरुआत करनी होगी. कोरोना प्रोटोकॉल्स का पालन करना होगा. और, वैक्सीनेशन की रफ़्तार और तेज़ करनी होगी. उधर, ट्रैवल बैन का नियम लागू किए जाने के चलते अफरा-तफरी मची है. साउथ अफ़्रीका में ये टूरिज़्म सीजन की शुरुआत का मौसम है. अधिकतर पर्यटक यूरोप और अमेरिका से आते हैं. अचानक उड़ान बंद होने से वे लोग फंस गए हैं. कुछ महीनों से पटरी पर लौट रहा बिजनेस अचानक से दुर्घटनाग्रस्त हो गया है. ये अफ़्रीकी देशों के इनकम पर चोट है. एक और बात है. अभी तक हमें ओमीक्रॉन वेरिएंट का पूरा दायरा पता नहीं चला है. हमें ये भी पता नहीं है कि कोरोना की उपलब्ध वैक्सीन इसके ऊपर कितनी कारगर है. इसके बावजूद सीधे-सीधे अफ़्रीकी देशों को निशाना बनाया जा रहा है. साउथ अफ़्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफ़ोसा ने प्रतिबंध हटाने की अपील की है. उन्होंने कहा कि अफ़्रीकी देशों के साथ भेदभाव किया जा रहा है. इससे कोरोना संक्रमण तो नहीं रुकेगा, लेकिन प्रभावित देशों की अर्थव्यवस्था ज़रूर चौपट हो जाएगी. जानकारों का कहना है कि साउथ अफ़्रीका की अपील सुनी जानी चाहिए. उसकी बात में दम है. कैसे? पहली बात. ये कहना भ्रामक होगा कि ओमीक्रॉन वेरिएंट साउथ अफ़्रीका की पैदाइश है. असल में, इसका पहला केस साउथ अफ़्रीका में पकड़ में आया. हो सकता है ये वेरिएंट अमेरिका या ब्रिटेन या ऑस्ट्रेलिया या चीन से वहां पहुंचा हो. ये भी संभव है कि ये वेरिएंट बाकी दुनिया में पहले से मौजूद हो, लेकिन वो पकड़ में ना आया हो. कुछ भी संभव है. सीमित संसाधनों के बावजूद साउथ अफ़्रीका ने वेरिएंट की पहचान की. और, पहली फुरसत में दुनिया को आगाह किया. इसलिए, साउथ अफ़्रीका की भूमिका एक संदेशवाहक की है. बहुत मशहूर कहावत है, Never shoot the messenger. लेकिन साउथ अफ़्रीका के साथ उलटा हो रहा है. उसे पारदर्शी होने की सज़ा दी जा रही है. यूरोप के कई देशों में रोज़ाना 30-40 हज़ार केस आ रहे हैं. लेकिन विकासशील या अल्प-विकसित देशों ने कभी उनके यहां की उड़ानों पर बैन नहीं लगाया. वही क़ातिल हैं, वही मुंसिफ़ भी हैं. वे अपने मन मुताबिक फ़ैसला ले रहे हैं. WHO ने भी कहा है कि ट्रैवल बैन का फ़ैसला जल्दबाजी में लिया जा रहा है. सरकारों को साइंटिफ़िक नज़रिए से सोचने की ज़रूरत है. उड़ानों पर बैन लगा देने से संक्रमण की रफ़्तार कम होगी. लेकिन ये इसको पूरी तरह नहीं रोक सकता. जिस समय साउथ अफ़्रीका को सबके साथ की ज़रूरत है, उसे अलग-थलग किया जा रहा है. ओमीक्रॉन वेरिएंट की चर्चा के बीच एक बार फिर से ‘वैक्सीन असमानता’ की बहस चालू हो गई है. दुनियाभर के वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता एक बात दोहराते रहे हैं. No one is safe until we are all safe. यानी, जब तक हर एक व्यक्ति सुरक्षित नहीं होता, तब तक कोई भी सेफ़ नहीं है. कोरोना का एक नया केस पूरी दुनिया को नचा सकता है. इससे बचने के लिए ज़रूरी है कि सबको वैक्सीन लगे. ये आदर्श स्थिति होती. लेकिन हुआ क्या? अमीर देशों ने वैक्सीन का स्टॉक अपने पास रख लिया. कुछ देशों ने तो आबादी से छह गुणा अधिक वैक्सीन रखीं है. इसकी तुलना में अफ़्रीका लावारिस रह गया. उन देशों की बुनियादी समस्याएं हैं. भूख, ग़रीबी, प्राकृतिक आपदा, सिविल वॉर आदि. उनके पास वैक्सीन खरीदने के लिए पैसा नहीं है. WHO ने इसका भी रास्ता निकाला. उसने ग्लोबल वैक्सीन शेयरिंग स्कीम बनाई. इसमें डोनेशन से वैक्सीन खरीदी जानी थी. साथ ही, विकसित देशों को अपने पास मौजूद अतिरिक्त हिस्सा दान करना था. दोनों में से कुछ भी ढंग से नहीं हुआ. दिसंबर 2021 तक कोवैक्स के ज़रिए दो सौ करोड़ डोजेज़ बांटने का लक्ष्य था. अभी तक इस मद में सिर्फ़ 54 करोड़ डोज़ ही आए हैं. रिपोर्ट्स हैं कि दिसंबर महीने में सप्लाई बढ़ाई जाएगी. लेकिन इन दावों पर भरोसा कैसे किया जाए? असमानता का एक और उदाहरण सुन लीजिए. नॉर्थ अमेरिका में 64 प्रतिशत और यूरोप में 62 प्रतिशत आबादी को कोरोना वैक्सीन की कम से कम एक डोज लग चुकी है. अफ़्रीकी महाद्वीप में ये आंकड़ा दस फीसदी से भी कम है. साउथ अफ़्रीका इस महाद्वीप के बाकी देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में है. वहां 42 फीसदी आबादी को वैक्सीन की एक खुराक लग चुकी है. साउथ अफ़्रीका के पास ठीक-ठाक संसाधन भी हैं. इसके बावजूद हालात नाज़ुक हैं. बाकी देशों के बारे में बस कल्पना ही की जा सकती है. अमेरिकी अख़बार वॉशिंगटन पोस्ट में छपे एक लेख में सटीक बात कही गई है, अगर ओमीक्रॉन पश्चिमी देशों में तबाही मचाता है तो वे अपनी बोई हुई फसल ही काट रहे होंगे. ये उनकी ही ग़लती होगी. गॉर्डन ब्राउन 2007 से 2010 तक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे. फिलहाल, वो WHO के एम्बैस्डर हैं. ब्राउन ने ब्रिटिश अख़बार गार्डियन में लिखा है, लगातार दी जा रही चेतावनियों के बावजूद, हम विकासशील देशों तक वैक्सीन पहुंचाने में नाकाम रहे. ये हम पर भारी पड़ने वाला है. हमने सब सुन कर अनसुना कर दिया. अब स्थिति गंभीर हो चुकी है.
अब सवाल ये उठता है कि कोई उम्मीद बची है या नहीं?
अभी उम्मीद है. जिस डॉक्टर ने सबसे पहले ओमीक्रॉन वेरिएंट का पता लगाया, उनका कहना है कि अभी तक इसके लक्षण बहुत गंभीर नहीं दिखे हैं. हालांकि, ये शुरुआती ऑब्ज़र्वेशन है. जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, नए नतीजे निकलेंगे. तभी निश्चित होकर कुछ कहा जा सकता है. क्या उपलब्ध कोरोना वैक्सीन बेअसर होगी? जानकारों का मत है कि ऐसा नहीं होगा. पुरानी वैक्सीन से मिली इम्युनिटी ओमीक्रॉन को आसानी से अपना काम नहीं करने देगी. अगर पूरी सुरक्षा नहीं भी मिली तो भी हॉस्पिटलाइज़ेशन और मौत से बचने की संभावना बरकरार रहेगी. फ़ाइज़र और मॉडर्ना ने दावा किया है कि वे सौ दिनों के भीतर ओमीक्रॉन स्पेशल वैक्सीन तैयार कर सकते हैं. वैज्ञानिक वैक्सीन की उपयोगिता जांच रहे हैं. पूरा रिजल्ट आने में एक से दो हफ़्ते का वक़्त लग सकता है. जब तक हम पूरी तरह श्योर नहीं हो जाते, तब तक के लिए क्या करना होगा? कोरोना प्रोटोकॉल्स का पालन करना होगा. सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क को दिनचर्या का हिस्सा बनाना होगा. और, सबसे ज़रूरी बात, अगर वैक्सीन को लेकर किसी तरह की हिचक या थ्योरी मन में समाई हो तो उसे भी दूर फेंकना होगा. ये तो हुई व्यक्तिगत बात. सरकारों के स्तर पर अभी बहुत उदारता की ज़रूरत है. कोरोना वैक्सीन के पेटेंट को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है. जो कंपनियां वैक्सीन बनाने में सक्षम हैं, उनके साथ फ़ॉर्म्यूला साझा करना ज़रूरी है. जो देश वैक्सीन के स्टॉक पर कुंडली जमाकर बैठे हैं, उन्हें भी अपना हठ छोड़ना चाहिए. वरना, अगला वेरिएंट (ऐसा ना हो तो बेहतर) कहां से निकलेगा, कहा नहीं जा सकता. चेक गणराज्य की एक लोकोक्ति है. Hope is a good breakfast, but a poor dinner. अर्थ कुछ यूं होगा. उम्मीद करना अच्छी बात है, लेकिन उस पर टिके रहना मूर्खता. जैसा कि किसी सज्जन ने कहा था, करने से होगा. वो समय आ चुका है.
अब बात ओमीक्रॉन के नामकरण की.
कोरोना वेरिएंट्स के नामकरण को लेकर लंबे समय तक विवाद चला. वेरिएंट्स के नाम संख्या में होते थे. उनके उच्चारण को लेकर समस्या आती थी. फिर हुआ ये कि वेरिएंट जहां मिला, उस जगह का नाम जोड़ दिया गया. जैसे, B.1.617.2 सबसे पहले भारत में पकड़ में आया था. पॉपुलर कल्चर में इसको ‘इंडियन वेरिएंट’ कहा गया. ये आपत्तिजनक था. उसी तरह जैसे कोरोना वायरस को चाइनीज़ वायरस या वुहान फ़्लू कहने पर आपत्ति जताई गई थी. WHO ने इस विवाद से बचने का एक उपाय निकाला. उन्होंने कहा कि वेरिएंट्स के नाम ग्रीक अल्फ़ाबेट के लेटर्स के आधार पर रखे जाएंगे. इससे बोलने, पहचान करने और याद रखने में आसानी रहेगी. इससे किसी की भावनाएं भी आहत नहीं होंगी. मई 2021 से ये सिस्टम लागू हो गया. वैज्ञानिकों के लिए नंबरिंग वाला नाम चलता रहा. आम लोगों के हिस्से में अल्फ़ा, बीटा, गामा, डेल्टा जैसे नाम आए. ओमीक्रॉन के नामकरण पर हंगामा क्यों हुआ? ओमीक्रॉन ग्रीक अल्फ़ाबेट में पंद्रहवें नंबर पर आता है. WHO ने अभी तक सात वेरिएंट्स को नाम दिया है. डेल्टा चौथा लेटर है. उसके बाद के छह लेटर WHO के मानकों पर खरे नहीं उतरे. इसलिए, दो ‘वेरिएंट्स ऑफ़ इंटरेस्ट’ की पहचान ग्यारहवें और बारहवें लेटर से की गई. लम्दा और मी. जब साउथ अफ़्रीका में नया वेरिएंट पकड़ में आया, तब WHO ने फिर से किताब खोली. तेरहवां लेटर था, nu (नू). चौदहवें नंबर पर Xi (शी) दिखा. ओमीक्रॉन पंद्रहवें नंबर पर दिख रहा था. WHO ने क्या किया? उसने नू और शी को साइड कर दिया और ओमीक्रॉन के कंधों पर बोझ डाल दिया. नू और शी, दोनों WHO के मानकों पर खरे उतरते थे. इसके बावजूद उन्हें स्किप क्यों किया गया? बकौल WHO, नू कुछ-कुछ न्यू यानी नया से मेल खाता है. शी के साथ समस्या ये है कि ये चीन में बहुत ही कॉमन सरनेम है. WHO का तर्क था कि बीमारी के नामकरण में संस्कृति, समाज, देश, क्षेत्र या किसी समूह को आहत करने से बचना चाहिए. यही सही तरीका है. ‘नू’ पर तो बहुत चर्चा नहीं हुई. लेकिन ‘शी’ को छोड़े जाने से कुछ लोगों को आपत्ति है. उनका मानना है कि WHO ने चीन के डर से ऐसा किया. शी, चिन के राष्ट्रपति के नाम का पहला हिस्सा है. अमेरिका के टेक्सस से सेनेटर टेड क्रूज़ ने ट्वीट किया कि अगर WHO चाइनीज़ कम्युनिस्ट पार्टी से इतना ही डरता है, तो उस पर भरोसा कैसे किया जा सकता है? अमेरिाक के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बेटे ने कहा कि मेरे लिए इस वेरिएंट का असली नाम शी वेरिएंट ही रहेगा. WHO पर चीन के मातहत काम करने के आरोप लगते रहे हैं. कोरोना के बारे में दुनिया को बताने की बात हो या ताइवान को वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में ना बुलाने की. कोरोना के नियंत्रण में ताइवान की मिसाल दी जाती है. लेकिन चीन, ताइवान को अपना प्रांत मानता है. भारी दबाव के बावजूद WHO ने चीन का पक्ष लिया. नवंबर 2020 में हुई बैठक में ताइवान को नहीं बुलाया गया. इसको लेकर WHO की ख़ूब आलोचना भी हुई थी. अभी ये स्पष्ट नहीं है कि नामकरण में चीन का दबाव था या नहीं. लेकिन हंगामा मच तो गया ही है. चचा शेक्सपियर कह गए, नाम में क्या ही रखा है? लेकिन ये कथा कुछ और ही दावे करती है.
Advertisement












