बहुत दिनों से एक बात दिल में थी. कई बार ज़बान पर आई, लेकिन कहा नहीं. मगर आज कह देने का मन है. आपका एक्सटेंशन नंबर मालूम होता तो कॉल करता, वर्कस्टेशन नंबर मालूम होता तो आकर मिलता (वैसे मुझे इतना मालूम है कि आप हमारे सर पर ही कहीं बैठे हुए हैं), लेकिन फिर सोचा कि लेटर लिखा जाए. इसी बहाने आपके पास याद रहेगी मेरी एक.
बात ये है कि आपने यहां हमारे काम करने के लिए जो 1760 प्रातःस्मरणीय नियम बनाए हैं, उन्हें मैं सिर-आंखों पर रखता हूं, पलकों पर सजाता हूं. पर एक बात पर मेरा दिमाग खज्जू हो रखा है. वो है आपका बनाया एक अलिखा नियम. इसका ज़िक्र जॉइनिंग लेटर से लेकर उन तमाम मेल्स तक में कहीं नहीं है, जिनमें आप हमें बताते हैं कि फलाने फ्लोर पर बैठने वाली फलानी टीम के फलाने बंदे का आज बड्डे है. मैं अपने यहां के 'ड्रेस कोड' (?) की बात कर रहा हूं.
मैं आपकी चिंता समझता हूं. आप चाहते हैं कि ऑफिस आने वाले 'ढंग' से ऑफिस आएं. लेकिन मेरी शिकायत है कि आपका ये 'ढंग' लड़कों तक सीमित है. हम शर्ट और ट्राउज़र्स में ही आ सकते हैं. बहुत हुआ तो जींस डाल लेंगे, शर्ट थोड़ी कैज़ुअल फंसा लेंगे. कभी-कभी टीशर्ट. लेकिन हम जानते हैं कि एक 'लिमिट' के बाद हमें इस अलिखित ड्रेस कोड के साथ ज़्यादा 'एक्सपेरिमेंट' नहीं करना है.

दीदी ऐसे ऑफिस चली जाएंगी, भैया नहीं जा पाएंगे
लेकिन लड़कियों के लिए ऐसा नियम नहीं है. अगर है, तो मैंने उसे अमल में नहीं देखा है. मैंने लड़कियों को ऑफिस में कैपरी से लेकर स्कर्ट और साड़ी से लेकर हॉट पैंट पहन कर आते देखा है. इसमें सैंतालीस तरह के टॉप आप अपनी ओर से जोड़ लीजिए, उनके बारे में मुझे ज़्यादा मालूम नहीं है. मुझे नहीं लगता कि ऑफिस आने वाली कोई लड़की कपड़ों की अलमारी के सामने खड़े होकर ये सोचती होगी कि ये पहनने से HR या एडमिन का मेमो तो नहीं आ जाएगा.
लेकिन मुझे सोचना पड़ता है. मेरे पास कपड़ों की अलमारी नहीं है, कपड़ों का एक ढेर है बस. लेकिन मैं इस ढेर में से वो कपड़े पहनकर नहीं आ सकता जिसमें मैं कम्फर्टेबल महसूस करता हूं (कैपरी या कोई लूज़ सा लोअर).मैंने कई बार सोच के देखा है कि ऐसा क्यों है. आप काम चाहते हैं 'TVF' जैसा, नियम आपके 'मध्य प्रदेश सहकारी साख मर्यादित' जैसे हैं. मुझे लगता है कि आप भी उसी समस्या से गुज़र रहे हैं जिस से भारत का सामान्य मानवी गुज़र रहा है. गूगल के डीफॉल्ट सर्च रिज़ल्ट की ही तरह आपको भी लगता है कि सेक्सिज़म की शिकार सिर्फ लड़कियां होती हैं.

गूगल के मुताबिक सेक्सिज़म एक तरह का पूर्वगृह, रूढ़ि या भेदभाव है, जो औरतों के साथ लैंगिक आधार पर होता है. गूगल सटीक जवाब नहीं देता. उसका अल्गॉरिदम वो रिज़ल्ट बताता है, जिसे सबसे ज़्यादा लोग सही मानते हैं.
आपका बनाया ड्रेस कोड भी सेक्सिज़म की ही देन है. इसे रिवर्स सेक्सिज़म न कहा जाए. ये औरतों के साथ होने वाले सेक्सिज़म से कमतर नहीं है. पहनावा एक बेहद निजी चुनाव होता है. कम से कम लड़कियों के मामले में तो हम इसे शाश्वत सत्य मानते ही हैं. लेकिन लड़कों को आप ये चुनने का अधिकार नहीं देना चाहते कि वो क्या पहन कर ऑफिस आएं.
'टांग मत दिखा देना'
आमतौर पर लोग उंगली दिखाने पर ऑफेंड होते हैं. आपका मामला अलग है. आपका पूरा ज़ोर इस बात है कि मेरी टांगे तो न ही दिखें. इसलिए मैं ये जानना चाहता हूं कि क्या बालों वाली मेरी टांगें आपके लिए किसी लड़की की टांगों से कम डिज़ायरेबल (वांछनीय) हैं? अगर ऐसा है तो आप मेरे साथ-साथ यहां की लड़कियों के साथ भी अन्याय कर रहे हैं. आपके अलिखे नियम का मतलब यही निकलता है कि एक लड़की का बदन काम करने की जगह पर वांछनीय है, लेकिन एक लड़के का नहीं. इसलिए लड़के खुद को जितना हो सके, ढंकें. ऐसा करते हुए एक ओर आप लड़कियों को नुमाइश की एक चीज़ बना देते हैं, साथ ही लड़कों के पूरे शरीर को नकारने लगते हैं. ऐसा ही स्लीवलेस कपड़ों के बारे में भी है.
मेरी टांगों और उनके बालों से दिक्कत है आपको? (क्रेडिट - बिज़नेस इंसाइडर)आपके (नहीं) बनाए ड्रेस कोड का सिर्फ एक फायदा है. मुझे जाग कर ऑफिस पहुंचने में सिर्फ 20 मिनट लगते हैं. पहनने में चुनाव खत्म है. वही पहनना होता है, जिससे मैं और मेरे ऑफिस वाले चट चुके हैं.कम्प्लीट मैन की छवि
ऑफिस में काम करने के लिए एक ऐसे शख्स की ज़रूरत है, जिस पर ज़िम्मेदारी डाली जा सके. आप लोग मान कर बैठ गए हैं कि ज़िम्मेदार आदमी सिर्फ रेमंड का 'कम्प्लीट मैन' होता है. एक ऐसा आदमी जिसके बाल जमे हुए हों, उसने थ्री पीस सूट पहना हो. या कैज़ुअल पहने हों तो वो फंकी न हों. क्योंकि फंकी कपड़ों से लंपटता झलकती है. गज़ब का सरलीकरण है!
ऑफिस एक ऐसी जगह होती है, जहां पर अनुशासन और पावर रिलेशन न सिर्फ होते हैं, बल्कि साफ-साफ दिखाई भी पड़ते हैं. इसलिए ये बहुत ज़रूरी है कि आप इस ओर ध्यान दें. क्योंकि मेरी तरह त्रस्त युवाओं की एक पूरी जमात आपके और देश भर के ऑफिसों में मौजूद है जो अपना 100% इसलिए नहीं दे पाते क्योंकि वो ऐसे कपड़ों में आकर 9 घंटे घिसाई करते हैं, जिसमें वो सहज महसूस नहीं करते.
आपका,
निखिल
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