The Lallantop

पैगंबर मुहम्मद के वक़्त और भी कई लोगों ने पैगंबरी पर दावा कर रखा था

'इस्लाम का इतिहास' की ग्यारहवीं किस्त.

Advertisement
post-main-image
पैगंबरी के लिए युद्ध भी हुए.

20196805_10213145238562576_712062070_n_210717-073138-265x150
ये आर्टिकल 'दी लल्लनटॉप' के लिए ताबिश सिद्दीकी ने लिखा है. 'इस्लाम का इतिहास' नाम की इस सीरीज में ताबिश इस्लाम के उदय और उसके आसपास की घटनाओं के बारे में जानकारी दे रहे हैं. ये एक जानकारीपरक सीरीज होगी जिससे इस्लाम की उत्पत्ति के वक़्त की घटनाओं का लेखाजोखा पाठकों को पढ़ने मिलेगा. ये सीरीज ताबिश सिद्दीकी की व्यक्तिगत रिसर्च पर आधारित है. आप ताबिश से सीधे अपनी बात कहने के लिए इस पते पर चिट्ठी भेज सकते हैं - writertabish@gmail.com




इस्लाम के पहले का अरब: भाग 11

इस्लाम के पहले अरब में केवल मूर्तिपूजा ही हो रही थी ऐसा नहीं था. मूर्तिपूजा के साथ-साथ वहां आसपास अन्य धर्म भी फल-फूल रहे थे. यहूदी और ईसाई तो पहले से ही थे वहां. कुछ अन्य पंथ और धर्म भी थे, जो साथ-साथ चल रहे थे. पांचवीं शताब्दी के आते-आते अरबों के बीच इस बात को लेकर एक हीनता बहुत जोर से सर उठा रही थी कि उनके पास कोई आसमानी किताब और पैगंबर नहीं है. अरब इस बात को लेकर बड़े बेचैन रहते थे कि आखिर अल्लाह ने उन्हें आसमानी किताब और पैगंबर से उपेक्षित क्यों रखा?
उपेक्षा की ये धारणा इसलिए और भी मज़बूत होती गई क्योंकि यहूदी और ईसाई अपने आप पर इस बात का बहुत गर्व करते थे कि ख़ुदा ने उन लोगों को आसमानी किताब और पैगंबर दिया है. यहूदी हमेशा से अपने आप को ख़ुदा द्वारा धरती पर भेजी गई ख़ास नस्ल समझते थे. ईसाई तो मूर्तिपूजक अरबों की इसी बात को लेकर बहुत हंसी उड़ाते थे.
2696a93e786d15822d483151823f167b--islamic-miracles-masjid-al-haram

झूठे पैगंबर

पांचवी और छठवीं शताब्दी का दौर इस कशमकश से गुज़र रहा था. जहां एक ओर अरबों के भीतर ख़ुदा द्वारा उपेक्षित किए जाने दर्द था, वहीं उनके भीतर ये आस भी लगी हुई थी कि शायद इस बार अगला पैगंबर उन्हीं में से हो. ये पैगंबर और भविष्यवक्ता की प्रतिस्पर्धा उस समय इतनी प्रबल हो चुकी थी कि मुहम्मद के आने से पहले से ही कई लोगों ने अपने आपको पैगंबर घोषित कर रखा था. उनके अच्छे खासे समर्थक भी थे. आज के इस्लाम में इन्हें 'False Prophets' या 'झूठे पैगंबर' के नाम से पुकारा जाता है.
पैगंबर मुहम्मद के आने से पहले जिस व्यक्ति ने स्वयं को पहले से पैगंबर घोषित कर रखा था वो था, मुसैलिम या मुसलमा. इतिहासकार अन्य पैगंबरों के बारे में भी बताते हैं मगर कोई एतिहासिक सबूत नहीं मिल पाता है. मुसैलिम के बारे में इसलिए अधिक जानकारी उपलब्ध है क्योंकि वो पैगंबर मुहम्मद के इस दुनिया से जाने के बाद भी जीवित रहा. मुहम्मद के जीवन काल में और उसके बाद जिन-जिन प्रमुख लोगों ने अपने आपको पैगंबर घोषित कर रखा था वो थे, मुसैलिम, तुलैहा, अल-अस्वद, अलसफ़ बिन सय्यद, और सजाह.

पैगंबर और नजूमी एक जैसे ही समझे जाते थे

सजाह एक औरत थी और मुहम्मद के जीवन काल में ही उसने स्वयं को पैगंबर घोषित कर रखा था. उसके भी बहुत भारी मात्रा में समर्थक थे. इस्लामिक इतिहास ये कहता है कि सजाह ने ख़ुद को पैगंबर मुहम्मद के जाने के बाद घोषित किया. हालांकि सारे इतिहासकार इस से सहमत नहीं हैं. क्योंकि सजाह इस से पहले एक बहुत मशहूर भविष्यवक्ता के रूप में जानी जाती थी. उस समय के अरबों के लिए पैगंबर और भविष्यवक्ता में कुछ ख़ास फ़र्क नहीं था.
Image: Reuters
Image: Reuters
जब पैगंबर मुहम्मद इस दुनिया से चले गए, तो पहले ख़लीफ़ा अबू-बकर ने 'स्वधर्म त्याग युद्ध' के नाम से एक सैनिक कार्यवाई शुरू की. जिसमें ऐसे सारे लोगों के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया गया, जिन्होंने स्वयं का कोई धर्म चला रखा था या स्वयं को पैगंबर घोषित किया हुआ था. इस युद्ध का जवाब देने के लिए सजाह (सजाह बिन्त अल-हारिस) ने अपने चार हज़ार समर्थकों के साथ मदीना की ओर प्रस्थान किया. मदीना में भी उसके बहुत से समर्थक उठ खड़े हुए थे. जो इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि सजाह को लोग पहले से पैगंबर स्वीकार कर चुके थे. एक दिन में इतने समर्थक किसी को नहीं मिल जाते.
कहा जाता है कि तुलैहा ने भी पैगंबर मुहम्मद के आख़िरी दिनों में ही स्वयं को पैगंबर घोषित किया था. बहुत सारे कबीलों ने उसे अपना पैगंबर स्वीकार भी कर लिया था. क़बीलों द्वारा इतनी भारी मात्रा में खड़े हो कर किसी को पैगंबर स्वाकार कर लेना इस बात को और मज़बूत करता है कि इन 'झूठे पैगंबरों' की गतिविधियां बहुत पुरानी रही होंगी. ऐसा जन समर्थन पाना और अपनी सेना खड़ी कर लेना कुछ रातों की बात नहीं होती है. तुलैहा भी एक भविष्यवक्ता था और उसने ये दावा भी कर रखा था कि उसके पास भी कुरान की तरह आयतें आती हैं.

तुलैहा और खलीफा अबू-बकर का युद्ध

अरब के लोग भविष्यवक्ता के भविष्य बताने को वैसे भी अल्लाह की ज़बान समझते थे. इसलिए उसकी वाणी को अल्लाह की वाणी स्वीकार करना कोई ऐसी बड़ी बात नहीं थी. जितने भी भविष्यवक्ता होते थे उस समय, उन सब की वाणी को अल्लाह की वाणी समझा जाता था. इसलिए हर एक ये दावा करता था कि जैसे मुहम्मद को अल्लाह की वाणी आती है, वैसे उन्हें भी आती है.
kaba cover

पहले ख़लीफ़ा अबू-बकर द्वारा चलाये गए स्वधर्म त्याग युद्ध में तुलैहा के साथ अबू-बकर की सेना का युद्ध हुआ, जिसे 'बुज़ाखा का युद्ध' के नाम से जाना जाता है. इसमें अबू-बकर की ओर से उनके सेनापति ख़ालिद बिन वलीद के साथ तुलैहा की जंग हुई. इस युद्ध में तुलैहा के पंद्रह हज़ार सैनिक थे, जबकि ख़ालिद के छः हज़ार. अंत में तुलैहा की हार हुई और वो सीरिया भाग गया. बाद में जब मुसलमानों का सीरिया पर कब्ज़ा हो गया, तो उसने इस्लाम अपना लिया. और ख़लीफा उमर के साथ आगे के युद्धों में भी इस्लाम की ओर से हिस्सा लिया.
इस्लाम द्वारा घोषित इन झूठे पैगम्बरों में सबसे रोचक इतिहास है 'मुसैलिमा या मुसलमा का. जिसकी पूरी कहानी, शिक्षा और मुहम्मद के साथ उसके संबंध के बारे में हम अगले भाग में जानेंगे.
(इस आर्टिकल का ज़्यादातर रेफरेन्स A.I. Akram, The Sword of Allah: Khalid bin al-Waleed, His Life and Campaigns Lahore से लिया गया है)
क्रमशः...


'इस्लाम का इतिहास' की पिछली किस्तें:

Part 1: कहानी आब-ए-ज़मज़म और काबे के अंदर रखी 360 मूर्ति
यों
 की

Advertisement

Part 2: कहानी उस शख्स की, जिसने काबा पर कब्ज़ा किया था

Part 3: जब काबे की हिफ़ाज़त के लिए एक सांप तैनात करना पड़ा

Advertisement
Advertisement