
ये आर्टिकल 'दी लल्लनटॉप' के लिए ताबिश सिद्दीकी ने लिखा है. 'इस्लाम का इतिहास' नाम की इस सीरीज में ताबिश इस्लाम के उदय और उसके आसपास की घटनाओं के बारे में जानकारी दे रहे हैं. ये एक जानकारीपरक सीरीज होगी जिससे इस्लाम की उत्पत्ति के वक़्त की घटनाओं का लेखाजोखा पाठकों को पढ़ने मिलेगा. ये सीरीज ताबिश सिद्दीकी की व्यक्तिगत रिसर्च पर आधारित है. आप ताबिश से सीधे अपनी बात कहने के लिए इस पते पर चिट्ठी भेज सकते हैं - writertabish@gmail.com
इस्लाम के पहले का अरब: भाग 13दबिस्तान-ए-मज़ाहिब बताती है कि मुसलमा को मानने वाले स्वयं हो रहमानिया कहते थे. मगर उनके इस पंथ को 'सादिकिया' के नाम से जाना जाता था. 17वीं शताब्दी में इस पंथ के लोग दिल्ली, मुल्तान, लाहौर और गुजरात में रहते थे. दबिस्तान-ए-मज़ाहिब के लेखक ने इसी पंथ के एक व्यक्ति मुहम्मद क़ुली से बात की थी और उनके पैगम्बर मुसलमा की शिक्षाओं और उनकी पवित्र पुस्तक पर बात की थी.

मुसलमा की गहरी आध्यात्मिक शिक्षा को बताते हुए क़ुली कहता है कि मुसलमा की किताब फ़ारूक कहती है "ख़ुदा के फरिश्तों पर यक़ीन करो मगर ये न कहो कि फरिश्तों के पास पंख (उड़ने वाले) होते हैं या नहीं होते हैं. क्यूंकि जिस रूप में वो तुम्हें दिखे हैं ज़रूरी नहीं है कि उनका रूप वैसा ही हो. वो तुम्हें वैसे ही दिखते हैं जैसा उन्हें दिखने का हुक्म मिलता है. (ख़ुदा की ओर से) और ये समझ भी रखो कि अच्छा और बुरा, सुन्दरता और कुरूपता भी है इस दुनिया में. मगर तुम अपने मुंह से ये न कहो कि ये अच्छा है और ये बुरा है. क्यूंकि हो सकता है तुम जिसे बुरा कह रहे हो वो भीतर से ऐसा न हो और वो तुम्हें सिर्फ इसलिए बुरा दिख रहा है क्यूंकि उसे ऐसा दिखने का हुक्म मिला है." ज्ञात हो कि मुसलमा की किताब 'फ़ारूक' का अर्थ ही है सही और ग़लत का भेद.
मुसलमा के अनुयायियों की इबादत का तरीका
मुसलमा (मुसैलिमा) को मानने वाले काबा को ख़ुदा का घर नहीं कहते थे. क्यूंकि वो ये मानते थे कि अगर ख़ुदा का कोई घर हुआ और उसमे वो रहता है तो फिर ख़ुदा का शरीर भी होना चाहिए. फिर वो निराकार नहीं हो सकता है. मुसलमा को मानने वालों के लिए प्रार्थना की कोई तय समय नहीं होता था. वो मुहम्मद के मानने वालों के जैसी प्रार्थना नहीं करते थे. उनको जब भी मन होता तब वो प्रार्थना करते थे. प्रार्थना में वो अपनी पवित्र किताब की आयतों को पढ़ते थे. मगर उनकी आयतों में कहीं भी उनके पैगम्बर का नाम नहीं होता था. न वो अपनी पूरी प्रार्थना में कहीं भी पैगम्बर का नाम लेते थे. वो सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ुदा की आयत और उसी का नाम लेते थे. वैसे इस धर्म को ज़्यादातर मानने वाले सिर्फ दिन में तीन बार ही प्रार्थना करते थे. वैसे ये एक मात्र संयोग ही हो सकता है कि क़ुरान में भी तीन समय की ही प्रार्थना का वर्णन मिलता है पांच का नहीं.

इबलीस, जिसे इस्लाम में शैतान के तौर पर देखा गया
मुहम्मद क़ुली आगे कहता है कि "ये बात सच नहीं है कि ख़ुदा ने आदम की मूर्ति बनाने के बाद उसे फरिश्तों से सजदा करने को बोला. और इब्लीस ने ऐसा करने से मना कर दिया तो ख़ुदा ने उसे जन्नत से बाहर निकाल दिया. और कहा कि वो आज के बाद इंसानों को बहकायेगा. क्यूंकि कुरान में ही इंसानों को ख़ुदा मुक्त इच्छा (Free Will) देने की बात करता है इसलिए इब्लीस का कोई अस्तित्व ही नहीं बचा. इसलिए आदमी ख़ुद अपने अच्छे और बुरे कर्मों के लिए ज़िम्मेदार है. (Quran 57:14)
रोज़ा और खतने के अलग नियम थे
मुसलमा के पंथ में शादी ब्याह के लिए किसी गवाह और किसी उत्सव की ज़रूरत नहीं समझी जाती थी. इस पंथ के मानने वाले ये मानते थे कि शादी दो व्यक्तियों का व्यक्तिगत मिलन होता है. जिन्हें बस उन दोनों को ही स्वीकारना होता है न कि सारे समाज को. इस पंथ के लोग मानते थे कि प्रार्थना से पहले स्वयं को पानी से ही पवित्र करना होता है. बालू या मिट्टी से वो स्वयं को पवित्र नहीं कर सकते थे.

इस्लाम में वुज़ू
मुसलमा की शिक्षा कहती है कि अगर आपका गुलाम आपका धर्म स्वीकार कर लेता है तो वो उसी दिन आपकी गुलामी से आज़ाद माना जाएगा. आपकी इच्छा का उस से कोई लेना देना नहीं होगा. मुसलमा ने अपने अनुयायियों को सुवर का मांस खाने, शराब पीने से मना किया था. और कहा था कि प्रार्थना के लिए किसी भी दिशा में मुंह करके प्रार्थना कर सकते हैं. दिन में रमजान के रोज़े (व्रत) रखने के लिए मुसलमा ने मना किया था उसकी जगह उसने रात में रोज़ा रखने को बोला था और साथ साथ अपने अनुयायियों को उसने 'ख़तना' (circumcision) कराने से भी मना किया था क्यूंकि ये यहूदियों की परंपरा थी. शराब के साथ साथ मुसलमा ने अफीम, गांजा और हर तरह के नशीले पदार्थों को अपने अनुयायियों के लिए वर्जित कर दिया था.
शादी ब्याह और परिवार के नियम
मुहम्मद क़ुली, जो मुसलमा की किताब और उसकी बातों के बारे में लेखक को बता रहा है. वो कहता है कि "वो मुसलमा की किताब फ़ारूक को रोज़ पढता है. मुसलमा का ये सिद्धांत मुझे अपने बाप दादाओं से मिला है जिन्होंने मुसलमा के साथ समय बिताया था." वो आगे कहता है कि "पहला लड़का पैदा हो जाने के बाद पति और पत्नी को अपना ध्यान ख़ुदा की इबादत में लगाना चाहिए और अगर हो सके तो पति को अपनी पत्नी को कम से कम एक बार दिन में नहीं देखना चाहिए." मुसलमा की किताब कहती है कि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के अलावा दूसरी औरत के साथ भी सम्भोग कर सकता है मगर उसके लिए कोई अनुबंध होना चाहिए.
मुहम्मद क़ुली, अपने पैगम्बर के प्रति भावुक होते हुए कहता है कि "वो अपने पैगम्बर मुसलमा को अक्सर अपने सपने में देखता है. वो उसे दुनिया और ब्रह्मांड के अन्य रहस्यों के बारे में बताते हैं."
पैगम्बर मुहम्मद के इस दुनिया से जाने के फ़ौरन बाद पहले ख़लीफ़ा अबू-बकर ने 'स्वधर्म त्याग' नाम से सैनिक कार्यवाई की थी. उसमें उस दौर के जितने भी लोगों ने अपने आप को पैगम्बर घोषित किया था, सबके ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया. अबू-बक़र के सेनापति ख़ालिद बिन वलीद के साथ मुसलमा की सेना का युद्ध हुआ. मुसलमा अपने चालीस हज़ार समर्थकों से साथ लड़ा. लड़ाई के अंत में ख़ालिद बिन वलीद के सैनिक वहशी इब्न हर्ब ने भाला फ़ेंक कर मुसलमा के पेट को भेद दिया और वो जब दर्द से तड़पता हुवा ज़मीन पर गिरा तो अबू दुजाना ने उसका सर धर से अलग कर दिया.

वहशी इब्न हर्ब का आभासी चित्र
इस युद्ध में मुसलमा के लगभग दस से इक्कीस हज़ार अनुयायी मारे गए थे. ये बहुत बड़ा युद्ध था जिसके बहुत दूरगामी परिणाम हुए थे. ख़लीफ़ा अबू बकर को लाभ के साथ साथ बहुत क्षति भी हुई थी. क्यूंकि इसी युद्ध में करीब आठ सौ कुरान के हाफ़िज़ (जिन्हें कुरान याद थी) मारे गए थे. जिसके बाद ख़लीफ़ा को कुरआन को संकलित करने का ख़याल आया था क्यूंकि कुरान को याद रखे हुए अधिकतर लोग मार डाले गए थे.
मुसलमा के मारे जाने के बाद उसके अनुयायियों में शोक की लहर दौड़ गयी थी. उनकी निष्ठा मुसलमा को लेकर इतनी अधिक थी कि बहुत सारे अनुयायियों ने दुःख में आत्मह्त्या कर ली. वे लोग रो रो कर कह रहे थे कि
'हाय. विश्वासियों के राजकुमार मारे गए'. दुःख और क्रोध में उसके घायल अनुयायी अबू-बकर के सैनिकों से विनती कर रहे थे कि वो उन्हें जान से मार दें ताकि वो इस दुःख (अपने पैगम्बर के मारे जाने के) से आज़ाद हो जाएं.
कहा जाता है कि मुसलमा के मारे जाने के बाद भी उसके पंथ को मानने वाले अरब में चोरी छिपे अपना धर्म मानते थे. वो लोग वहां इस्लाम के आने के पहले दशक तक थे. उसके कुछ अनुयायी कूफ़ा नामक स्थान में इकठ्ठा होते थे और वहां मस्जिद की मीनारों से ये आवाजें सुनाई देती थी 'ला इलाह इल्लल्लाह मुसय्लिमा रसूल-लाल्लाह'. बाद में ख़लीफ़ा के साथी अब्दुल्लाह इब्ने मसूद ने उन सबको बंदी बना लिया और जिन अनुयायियों ने इस्लाम क़बूल कर लिया उन्हें छोड़ दिया गया और जिन्होंने अपना धर्म छोड़कर इस्लाम में आने से इनकार कर दिया उन सबको मौत के घात उतार दिया गया.
ऐसे मुसलमा और उसके धर्म की कहानी ख़त्म हो गयी
क्रमशः
(इस लेख के ज़्यादातर भाग को फ़ारसी पुस्तक दबितान-ए-मज़ाहिब से लिया गया है. रिफरेन्स के लिए उसकी सहायता लें.)
'इस्लाम का इतिहास' की पिछली किस्तें:Part 1: कहानी आब-ए-ज़मज़म और काबे के अंदर रखी 360 मूर्ति
यों
की
Part 2: कहानी उस शख्स की, जिसने काबा पर कब्ज़ा किया था
Part 3: जब काबे की हिफ़ाज़त के लिए एक सांप तैनात करना पड़ा