इसके पहले 23 फरवरी को केंद्रीय जांच एजेंसियों ने जम्मू-कश्मीर पुलिस के साथ मिलकर जमात के करीब 250 अलगाववादी नेताओं को गिरफ्तार किया था. गिरफ्तार नेताओं में अलगाववादी नेता यासीन मलिक, जमात के आमिर यानी कि इसके प्रेसिडेंट डॉ. अब्दुल हामिद फ़याज़, ज़ाहिद अली, ग़ुलाम कादिर लोन, अब्दुर रऊफ और मुदसिर अहमद भी शामिल थे.
फिर मार्च की पहली तारीख आई. और आया गृह मंत्रालय का एक नोटिस. इसमें लिखा था-
केंद्र सरकार मानती है कि जमात-ए-इस्लामी (जम्मू-कश्मीर) आतंकी संगठनों के संपर्क में है. अलगाववाद को बढ़ावा देती है और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में लिप्त है. अगर इसे तुरंत रोका नहीं गया तो जमात भारतीय सरकार को गिराने और 'इस्लामिक स्टेट' बनाने की कोशिशों को बढ़ाएगी. कश्मीर के भारत में विलय का विरोध और अलगाववाद को बढ़ावा देगी. जमात के रहने से आतंकी गतिविधियां और अलगाववादी ताकतें बढ़ेंगी. इसलिए सरकार जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर पर UAPA के सेक्शन 3 के तहत 5 साल के लिए प्रतिबंध लगाती है.

जमात-ए-इस्लामी (जम्मू-कश्मीर) पर प्रतिबंध लगाने वाला नोटिस
ये तो रहा सरकार का फैसला, जिसके तहत जमात-ए-इस्लामी की जम्मू-कश्मीर ब्रांच को बैन कर दिया गया. लेकिन जमात-ए-इस्लामी की कहानी बेहद पुरानी है. भारत की आजादी से भी पहले की कहानी.जमात-ए-इस्लामी, जिसने कहा था भारत का बंटवारा न हो
भारत को आजादी मिलने से पहले की बात है. नए आजाद भारत में मुसलमानों का क्या भविष्य होगा, इसका फैसला करने वाले नेताओं की कमी नहीं थी. ऐसे ही रहनुमा बनने की होड़ में एक तरफ मुहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग थी, जो मुसलमानों के लिए एक अलग मुल्क़ की मांग कर रही थी. दूसरी तरफ मुत्तहिद क़ौमियत की बात करने वाली जमीयत-अल-उलेमा-ए-हिंद के हुसैन अहमद मदानी थे. मुत्तहिद क़ौमियत का मतलब है 'कॉम्पोजिट नैशनलिज़्म'. यानी हिंदुस्तान अविभाजित रहे पर हिंदुओं और मुसलमानों के लिए अलग-अलग संस्थान, नियम और व्यवस्थाएं हों. इसी रेस में एक नाम था सैय्यद अबुल आला मौदूदी का.

सैय्यद अबुल आला मौदूदी
1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर सेशन में मुस्लिम बहुल इलाकों को स्वायत्त राज्य बनाने के लिए 'पाकिस्तान रेज़ोल्यूशन' पास हुआ. मौदूदी शुरुआत में इसके खिलाफ थे. उनका विचार था कि विभाजन नहीं होना चाहिए. किसी भी तरह की सरकार या देश का गठन इस्लाम के अनुकूल नहीं है, इसीलिए पाकिस्तान बनाने की बात भी इस्लाम के मुताबिक सही नहीं है. और इसके लिए उन्होंने 26 अगस्त 1941 को एक नया संगठन बनया. नाम रखा जमात-ए-इस्लामी. विचारधारा ये थी कि इस्लाम बस उनके लिए नहीं है, जिन्होंने मुसलमान परिवार में जन्म लिया है. इस्लाम सबके लिए है और इसके लिए पूरे भारत में प्रसार होना चाहिए. ये प्रसार किसी आंदोलन से नहीं किया जाएगा. इस्लाम का प्रसार होगा समाज के नेताओं और बड़े लोगों को क़ुरआन और हदीस की सीखों को समझाकर. साथ ही ऊंचे पदों पर जमात के लोगों को बैठाकर. इसका अंतिम मकसद समय के साथ पूरे हिंदुस्तान में इस्लाम का प्रसार करना था.
जमात-ए-इस्लामी हिंद से अलग है कश्मीर का प्रतिबंधित संगठन
1947 में आजादी के बाद जमात-ए-इस्लामी अलग-अलग खेमे में बंट गई. 1948 में इलाहाबाद में एक ब्रांच बनी जमात-ए-इस्लामी हिंद. इसके आमिर (प्रेसीडेंट) बने मौलाना अबुल लाइस नदवी. पाकिस्तान वाली ब्रांच कहलाई जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान. और ये वक्त था जब कश्मीर, भारत और पाकिस्तान दोनों से ही अलग था. कश्मीर में एक धड़ा था जो पाकिस्तान के साथ जाना चाहता था. 1947 में पाकिस्तान ने कश्मीर को हथियाने के लिए आक्रमण किया. भारत की सेना ने कश्मीर का बचाव किया. पाकिस्तानी सेना को बाहर खदेड़ा फिर राजा हरि सिंह ने 'ट्रीटी ऑफ एक्सेशन' पर दस्तखत किए और कश्मीर का भारत में विलय कर दिया. लेकिन पाकिस्तान के लिए लॉबिंग करने वाले जमात-ए-इस्लामी के सदस्यों को ये नागवार गुजरा. उन्होंने 1947 से 1952 के बीच कई मस्जिद और मदरसे बनाए. इन्होंने अपना प्रोपगैंडा फैलाया और आखिर में 1952 में जमात-ए-इस्लामी हिंद से कटकर अलग ब्रांच बनाई. नाम रखा जमात-ए-इस्लामी कश्मीर. यही ब्रांच अलगाववादी संगठनों का समर्थन करते आई है. इस ब्रांच के लोग ज मात-ए-इस्लामी हिंद से ज्यादा जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान की तरफ झुकाव रखते हैं. भारत सरकार ने इसी ब्रांच पर 5 साल का प्रतिबंध लगाया है.

दोनों संगठनों के बीच फर्क बताने के लिए ANI ने ट्वीट किया
कई चुनाव लड़े हैं जमात-ए-इस्लामी कश्मीर ने
1969 में जमात-ए-इस्लामी कश्मीर ने पंचायत के चुनाव में अपने कुछ सदस्यों को उतारा. इस चुनाव में कुछ सदस्यों की जीत के बाद जमात, नेशनल कॉन्फ्रेंस के विरोध में एक सीरीयस पॉलिटिकल ताकत के रूप में उभरी. 1971 में इसने लोक-सभा चुनाव भी लड़ा. हालांकि कोई सीट नहीं मिली. और सीट न जीतने की वजह को जमात ने चुनाव में धांधली होना बताया. अपना सिक्का जमाने के लिए 1972 के विधानसभा चुनाव में भी ये संगठन 22 सीटों से चुनाव लड़ा. खाते में आईं पांच सीटें, फिर भी धांधली का आरोप लगाया और पांच सीटों पर जीत को अपनी बड़ी जीत माना. 70 के दशक में जमात की ताकत लगातार बढ़ती गई. सीटों के लिहाज से कभी बड़ी जीत हासिल नहीं हुई, पर अलगाववादी विचारधारा के साथ जमात का वजूद भी काफी बढ़ा. इतना बढ़ा कि 1990 में आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन के कमांडर ने हिजबुल को 'जमात की तलवार' बताया.
पहली बार नहीं लगा है बैन
कश्मीर में 1975 में इंदिरा गांधी और शेख अब्दुल्ला के बीच समझौता हो गया. शेख अब्दुल्ला फिर से मुख्यमंत्री बन गए. लेकिन जमात ने इसका विरोध किया, क्योंकि उसे इस समझौते की वजह से कश्मीर का अलगाववादी आंदोलन कमजोर होता नजर आ रहा था. जब देश में इमरजेंसी लगी, तो प्रो-पाकिस्तान और अलगाववादी विचारधारा के लिए इंदिरा गांधी ने संगठन को बैन कर दिया. इमरजेंसी हटने के साथ ही बैन भी हटा लिया गया.
हिजबुल मुजाहिद्दीन को अपना साथी माना और फिर से बैन लग गया
1989 तक जमात ने आतंकी संगठनों से खुलकर अपने रिश्ते नहीं कबूले थे. पर 1989 में हिजबुल मुजाहिद्दीन बनी. जमात ने खुलकर हिजबुल मुजाहिद्दीन को अपना साथी माना. वीपी सिंह सरकार ने 1990 में जमात को फिर से प्रतिबंध लगा दिया. पर यह प्रतिबंध भी ज्यादा दिन नहीं चला. तीन साल में ही 1993 में नरसिंहा राव की सरकार ने बैन हटा लिया. उसके बाद अब 2019 में तीसरी बार जमात-ए-इस्लामी (जम्मू-कश्मीर) पर बैन लगा दिया है.
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