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प्रधानमंत्री जी, गैरसैंण को राजधानी बना दो प्लीज: कक्षा 7 की छात्रा आकांक्षा

गैरसैंण: प्रेमिका के परायी-स्त्री हो जाने की कथा

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उत्तराखंड की महिलाओं की एक झलक. सांकेतिक. (फोटोः हिमालयन बज़)

गैरसैंण एक संज्ञा है. दो विलोमार्थी विशेषणों से मिलकर बनी है. गैर अर्थात गहरा और सैंण मतलब समतल. गैरसैंण शब्द का pun बनाने वाले संधि विच्छेद यूं भी करते हैं - गैर अर्थात पराया और सैंण (कुमाऊंनी) मतलब स्त्री. अर्थात परायी स्त्री.

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चमोली जिले का एक छोटा सा शहर - गैरसैंण. जिसकी नियति भी दो विपरीत अंतिम परिणामों के बीच झूलती रही है - एक राज्य की राजधानी या कोई स्मॉल-टाउन.

जब 42 लोगों की शहादत और पांच दशक से अधिक समय तक चले आन्दोलन के बाद उत्तराखंड के लोगों को उनके सपनों का राज्य मिला तो उन-पर देहरादून के रूप में अस्थायी राजधानी थोप दी गई. तब जबकि गैरसैंण अलग-राज्य के आन्दोलन का नॉन-ऑफिसियल मैस्कॉट बन चुका था क्यूंकि वो उत्तराखंड की जियोग्राफी ही नहीं उत्तराखंड की डेमोग्राफी का भी प्रतिनिधित्व करता था. राज्य बने दो दशक बीतने को है और 'स्टेटस-क्यूओ' बना हुआ है.

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यानी न देहरादून का प्रॉबेशन पीरियड समाप्त हुआ न गैरसैंण को अपॉइंटमेंट लैटर ही मिला.

जहां एक तरफ़ राज्य का आम जन गैरसैंण बनाम देहरादून को आम बनाम खास, जनता बनाम सत्ता और शोषित बनाम शोषक की लड़ाई के रूप में देखता आया है वहीं सरकार इतनी बेवकूफ़ नहीं कि देहरादून को स्थाई राजधानी बनाकर जनता से सीधे पंगा ले या राजधानी गैरसैंण शिफ़्ट कर सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को एक झटके में मार दे.


‘कौशिक’ और ‘दीक्षित’ के बीच फंसा है उत्तराखंड की स्थाई राजधानी का मुद्दा

1994. अभी उत्तराखंड यूपी का ही हिस्सा था. और समाजवादी (मतलब मुलायम सिंह यादव की) सरकार थी. अलग राज्य के निर्माण के लिए रमा शंकर कौशिक समिति का गठन किया गया. इसी समिति की एक रिपोर्ट के मुताबिक साठ प्रतिशत से ज़्यादा लोग गैरसैंण को उत्तराखंड की राजधानी बनते देखना चाहते थे. उत्तराखंड तो बना लेकिन राजधानी बना दी देहरादून. फॉर दी टाइम बीइंग. अस्थाई.

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राज्य बना तो राज्य को एक अदद मुख्यमंत्री भी मिला. नाम था नित्यानंद स्वामी. उम्मीदों का ग्राफ तेज़ी से ऊपर जाने लगा था. गैरसैंण के दिन बहुरने जा रहे थे. मगर फिर स्वामी जी ने दीक्षित आयोग नाम की एक समिति गठित कर दी. जानने को कि राजधानी बने कहां?

दीक्षित आयोग ने गैरसैंण को नकार दिया. आयोग तो कह रहा था कि देहरादून न सही भले काशीपुर बना दो मगर गैरसैंण को नो नो! कारण एक नहीं सैकड़ों बताये - जल स्रोत, भूमि की उपलब्धता और मूल्य, टोपोग्राफी, विद्युत आपूर्ति, ड्रेनेज सिस्टम, भविष्य में विस्तार की संभावनाएं और निवेश की क्षमता और इसके बाद 'आदि-आदि'.

कारण - जो देहरादून के पास थे मगर गैरसैंण के पास नहीं.

अब बने पक्ष और प्रतिपक्ष. पक्ष ज़ाहिर था प्रतिपक्ष पिन्हां. जहां प्रतिपक्ष ने दीक्षित आयोग के लॉजिक गिनाये वहीं पक्ष ने कौशिक समिति की दलीलें दीं. न तब कुछ हुआ न अब. बेदर्द थी ज़िंदगी, बेदर्द है.

और उनके लिए गैरसैंण अब भी परायी-स्त्री है जिनकी शादी उनकी मर्ज़ी के बिना देहरादून से कर दी गयी.


प्रधानमंत्री जी गैरसैंण को राजधानी बना दो प्लीज!

अब रुद्रप्रयाग के नालंदा पब्लिक स्कूल  में कक्षा 7 में पढ़ रही 13 वर्षीय आकांक्षा नेगी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजी. क्या लिखा, आप खुद पढ़ लीजिए:
आदरणीय प्रधानमंत्री जी, नमस्ते! मैं पहाड़ के एक छोटे से नगर रुद्रप्रयाग में रहती हूं. पहले अपने गांव राजकीय प्राथमिक विद्यालय कनकचैरी (पोखठा) में पढ़ती थीलेकिन वहां न तो छात्र थे और न ही अध्यापक. मेरी छोटी बहन कक्षा तीन में पढ़ती है जबकि भाई दूसरी कक्षा में है. गांव में पढ़ने की अच्छी सुविधा नहीं थी. स्कूल भी दूर था तो मेरे पिता मुझेमेरी बहन व भाई को लेकर रुद्रप्रयाग आ गये. अब मैं एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ रही हूं. प्रधानमंत्री जी में पढ़-लिख कर जज बनना चाहती हूं आपने बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा दिया हैलेकिन जब मैं अपनी सहेली तनुजा के बारे में सोचती हूं तो दुख होता है. वो पढ़ने में होशियार हैलेकिन जिस सरकारी स्कूल में पढ़ती है तो वह गांव से बहुत दूर है. हाई स्कूल तो और भी दूर है. गांव के कई बच्चों को नदी पार करनी होती है. जब केदारनाथ आपदा आई थी तो झूला पुल बह गये थे. वो पुल अब भी नहीं बने हैं. गांव के बच्चे नदी पार करते समय ट्राली को भी हाथों से खींचते हैं. ट्राली खींचते समय कई बच्चों की उंगलियां कट जाती हैं. प्रधानमंत्री जीमैं आपको यह भी बताना चाहती हूं कि गांवों के अधिकांश स्कूलों में न तो अध्यापक हैं और न ही अन्य सुविधाएं. कई स्कूलों में तो शौचालय और पीने का पानी भी नहीं हैजिससे हम लड़कियों को ज्यादा समस्या होती है. मिडिल के बाद हाई स्कूल और इंटर कालेज बहुत दूर हैं. ऐसे में गांव की लड़कियों को पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ जाती है क्योंकि माता-पिता अपनी बेटियों को गांव से अधिक दूर पढ़ने के लिए नहीं भेजते हैं. ऐसे में बेटियां कैसे पढ़ेंगी. हमारे पहाड़ का जीवन बहुत कठिन होता है सरयहां कई समस्याएं हैंसड़कस्वास्थ्यजंगली जानवर का भय और उससे भी अधिक भूस्खलनभूकंप और बाढ़ का भय. मेरी मां को आज भी घास-लकड़ी लेने जंगल जाना होता है और वहां हमेशा गुलदार या भालू का भय होता है.

मोदी सरआपने श्रीनगर गढ़वाल में पिछले साल भाषण में गढ़वाली में दो शब्द कहे तो मुझे बहुत अच्छा लगा था.

मेरे पिता कहते हैं कि यदि राजधानी गैरसैंण होती तो गांव में ये समस्याएं नहीं होती. नेता और अधिकारी पहाड़ में हमारी तरह रहते तो हमारा दर्द समझ पाते. यदि राजधानी गैरसैंण होती तो लोग पहाड़ छोड़कर मैदानों की ओर नहीं. आकांक्षा नेगी कक्षा - 7 अ

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