मान लीजिए आप किसी दुकान में खड़े हैं. एक चमचमाता स्मार्टफोन हाथ में है. या फिर आप इलेक्ट्रिक कार की टेस्ट ड्राइव लेकर आए हैं और दिल कह रहा है, बस यही चाहिए. आप कीमत देखते हैं, कैमरा देखते हैं, रेंज देखते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि इस फोन का ‘दिमाग’ और इस कार का ‘खून’ कहां से आया?
चिप का ‘दिमाग’, बैटरी का ‘खून’: लिथियम और सेमीकंडक्टर से कैसे बदलेगा भारत का खेल?
India Semiconductor Mission: सेमीकंडक्टर फैब से लेकर लिथियम खनन तक, भारत मैन्युफैक्चरिंग के नए दौर में प्रवेश कर चुका है. जानिए कैसे चिप्स, EV बैटरियां और MSME इकोसिस्टम आने वाले दस साल में भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन का बड़ा खिलाड़ी बना सकते हैं.


यही वो सवाल है जो आने वाले दस साल में भारत की किस्मत तय करने वाला है.
‘वी फोरम’ (weforum) की रिपोर्ट ‘विनिर्माण का भविष्य, आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन’(Future of Manufacturing, Supply Chain Resilience) के मुताबिक दुनिया इस वक्त एक बड़े बदलाव के बीच खड़ी है. सप्लाई चेन टूट रही हैं, नए गठजोड़ बन रहे हैं.
‘China+1’ जैसी रणनीतियां चर्चा में हैं. कंपनियां चाहती हैं कि उनका उत्पादन सिर्फ एक देश पर निर्भर न रहे. और इसी खिड़की से भारत झांक रहा है, जैसे कह रहा हो, “अब बारी हमारी है.”
यह कहानी सिर्फ फैक्ट्रियों की नहीं है. यह कहानी है उस शिफ्ट की, जिसमें भारत ‘कंज्यूमर’ से ‘क्रिएटर’ बनना चाहता है.

आज का जमाना चिप्स का है. नहीं, खाने वाली नहीं. वो जो आपकी जेब में रखे फोन से लेकर आसमान में उड़ते फाइटर जेट तक को कंट्रोल करती हैं.
दुनिया की सबसे एडवांस चिप्स लंबे समय तक मुख्यतः ताइवान और चीन में बनती रही हैं.
अगर वहां भूकंप आ जाए, राजनीतिक तनाव बढ़ जाए या समुद्री रास्ते पर संकट आ जाए, तो पूरी दुनिया की फैक्ट्रियां ठप पड़ सकती हैं.
कोविड के समय यही हुआ. कार कंपनियों की गाड़ियां तैयार थीं, लेकिन चिप नहीं थी. नतीजा, लाखों गाड़ियां फैक्ट्री में खड़ी रह गईं. यहीं से भारत की एंट्री होती है
भारत का सेमीकंडक्टर मिशनभारत ने सेमीकंडक्टर को सिर्फ एक इंडस्ट्री नहीं, बल्कि स्ट्रैटेजिक जरूरत माना है. इसी सोच के साथ ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ शुरू हुआ. मकसद साफ है, चिप डिजाइन से लेकर मैन्युफैक्चरिंग और पैकेजिंग तक पूरी वैल्यू चेन देश में बनानी है.
सरकार ने प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव और कैपिटल सपोर्ट जैसी योजनाओं के जरिए कंपनियों को आकर्षित करने की कोशिश भी तेज की है. ‘इनवेस्ट इंडिया’ के मुताबिक कुछ बड़े प्रोजेक्ट इस बदलाव की नींव रख रहे हैं.
- गुजरात के धोलेरा में टाटा समूह और ताइवानी कंपनी PSMC मिलकर हाई एंड चिप्स बनाने की तैयारी में हैं.
- गुजरात के सानंद में मेमोरी चिप्स की असेंबली और टेस्टिंग की सुविधाएं विकसित की जा रही हैं.
- असम में चिप पैकेजिंग यूनिट से पूर्वोत्तर को टेक हब बनाने की कोशिश है.
- उत्तर प्रदेश में डिस्प्ले और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के लिए बड़े निवेश प्रस्तावित हैं.

यह सिर्फ नक्शे पर बिंदु नहीं हैं. ये आने वाले दशक के टेक कॉरिडोर हैं.
चिप बनाना इतना मुश्किल क्यों है?आप सोच सकते हैं, मोबाइल तो हम सालों से बना रहे हैं. फिर चिप बनाना इतना बड़ा काम क्यों?
क्योंकि चिप बनाना नैनो लेवल की इंजीनियरिंग है. एक चिप में अरबों ट्रांजिस्टर होते हैं. उनकी मोटाई इंसानी बाल से हजारों गुना पतली होती है. एक छोटा सा कण भी पूरी वेफर खराब कर सकता है.
पानी की प्यासएक सेमीकंडक्टर फैब को रोज लाखों लीटर अल्ट्रा प्योर पानी चाहिए. यह सामान्य पानी नहीं होता. इसमें जरा सा भी मिनरल या धूल हो तो चिप बेकार. इसलिए पानी की सप्लाई और रीसाइक्लिंग सिस्टम हाई टेक होना जरूरी है.
बिजली का अनुशासनफैक्ट्री 24 घंटे चलती है. एक सेकंड का पावर फ्लक्चुएशन करोड़ों का नुकसान कर सकता है. इसलिए स्टेबल ग्रिड और बैकअप इंफ्रास्ट्रक्चर अनिवार्य है.
टैलेंट की परीक्षाचिप डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग के लिए हजारों स्पेशलाइज्ड इंजीनियर चाहिए. भारत डिजाइन में पहले से मजबूत है. बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में ग्लोबल कंपनियों के डिजाइन सेंटर हैं. लेकिन मैन्युफैक्चरिंग का अनुभव बनाना समय लेगा.
यह दौड़ सौ मीटर की नहीं, मैराथन है.

अब जरा इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की बात करते हैं. ईवी को अगर शरीर मानें, तो बैटरी उसका दिल है और लिथियम उसका खून.
लंबे समय तक भारत लिथियम के लिए आयात पर निर्भर रहा. लेकिन में लिथियम के भंडार मिलने की खबर ने तस्वीर बदली. इसके बाद में भी संभावनाएं तलाश की जा रही हैं.
दुनिया इस समय ‘मिनरल रेस’ में है. जिस देश के पास लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे खनिज हैं, वही ईवी क्रांति का असली खिलाड़ी होगा. खाड़ी देशों के लिए तेल का जैसा महत्व था, वैसा ही आने वाले समय में लिथियम का हो सकता है.
क्या इससे ईवी सस्ती होंगी?सीधा जवाब है, तुरंत नहीं. खनन, रिफाइनिंग, बैटरी मैन्युफैक्चरिंग, सबको इंटीग्रेट करना होगा. लेकिन अगर भारत अपनी धरती से लिथियम निकालकर देश में ही बैटरी बनाए, तो लागत पर कंट्रोल बढ़ेगा. आयात बिल घटेगा. कीमतें स्थिर होंगी.
बड़ा खेल: सब वेंडर इकोसिस्टमसिर्फ एक बड़ी फैक्ट्री से देश सुपरपावर नहीं बनता. असली ताकत उस इकोसिस्टम में होती है जो उसके आसपास बनता है.
एक चिप फैब के लिए सैकड़ों तरह के केमिकल, गैस, मशीन पार्ट्स और सर्विसेज चाहिए. यह सब बड़े कॉर्पोरेट नहीं बनाएंगे. यहां एंट्री होगी एमएसएमई की.
मान लीजिए धोलेरा में फैब लगी. उसके आसपास छोटे उद्योग शुरू होंगे जो स्पेशलाइज्ड वाल्व बनाएंगे, अल्ट्रा प्योर गैस सप्लाई करेंगे, क्लीनरूम उपकरण तैयार करेंगे. हजारों नौकरियां बनेंगी. लोकल यूनिवर्सिटीज नए कोर्स शुरू करेंगी. एक पूरा टेक सिटी उभरेगा.
जैसे एक फिल्म सिर्फ हीरो से नहीं बनती. कैमरा टीम, एडिटर, लाइटमैन, स्पॉटबॉय सब मिलकर फिल्म बनाते हैं. वैसे ही मैन्युफैक्चरिंग भी टीम गेम है.
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माइंडसेट शिफ्ट: असेंबली से डिजाइन तकभारत ने मोबाइल असेंबली में बड़ी छलांग लगाई है. लेकिन अगला कदम डिजाइन और आईपी का है.
दुनिया की कई बड़ी टेक कंपनियों के रिसर्च सेंटर भारत में हैं. अब अगर चिप डिजाइन, आर्किटेक्चर और पेटेंट भी यहीं बनें, तो वैल्यू एडिशन कई गुना बढ़ जाएगा.
नई पीढ़ी के इंजीनियर सिर्फ कोड नहीं लिखेंगे, बल्कि सिलिकॉन आर्किटेक्चर डिजाइन करेंगे. यह ‘मेड इन इंडिया’ से आगे बढ़कर ‘डिजाइंड इन इंडिया’ का दौर होगा.
पर्यावरण का सवालअक्सर पूछा जाता है, क्या इतनी बड़ी फैक्ट्रियां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएंगी? आज की आधुनिक फैब्स में वेस्ट मैनेजमेंट और वाटर रीसाइक्लिंग सिस्टम एडवांस होते हैं. कई प्लांट 80 से 90 प्रतिशत पानी दोबारा इस्तेमाल करते हैं. ग्रीन एनर्जी के साथ इंटीग्रेशन पर भी जोर है.
चुनौती है संतुलन की. विकास भी हो और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे. यही असली परीक्षा होगी.
भू-राजनीति और भारत की भूमिकासेमीकंडक्टर और लिथियम सिर्फ आर्थिक मुद्दे नहीं हैं. ये भू-राजनीतिक ताकत के प्रतीक हैं.
अगर भारत चिप्स और बैटरी में आत्मनिर्भर होता है, तो वह सिर्फ अपने लिए नहीं बनाएगा. वह ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनेगा. अफ्रीका, यूरोप, दक्षिण पूर्व एशिया तक भारतीय चिप्स और बैटरियां जाएंगी.
दुनिया के देश ऐसी सप्लाई चाहते हैं जो भरोसेमंद हो, लोकतांत्रिक व्यवस्था में हो और लंबी अवधि तक स्थिर रहे. भारत इस भरोसे का दावा पेश कर रहा है.
आने वाले दस साल: तस्वीर कैसी होगी?कल्पना कीजिए, 2035 का भारत. जहां-
- ईवी आम बात होंगी.
- कई ग्लोबल ब्रांड अपनी चिप्स भारत में बनवा रहे होंगे.
- छोटे शहरों में भी हाई टेक फैक्ट्रियां होंगी.
- इंजीनियरिंग कॉलेजों में नैनोफैब्रिकेशन लैब्स सामान्य होंगी.
यह सपना नहीं, रोडमैप है. लेकिन शर्त एक है, नीतियों में निरंतरता, इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश और शिक्षा में सुधार.
अंतिम सवाल: क्या भारत ‘नया बॉस’ बनेगा?‘नया बॉस’ बनने का मतलब यह नहीं कि कोई और हार जाए. असली मतलब है, दुनिया की सप्लाई चेन में निर्णायक भूमिका निभाना.
अगर चिप का दिमाग और बैटरी का खून भारत से आएगा, तो दुनिया की टेक इंडस्ट्री की नब्ज कहीं न कहीं दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और धोलेरा से होकर गुजरेगी.
यह बदलाव रातों रात नहीं होगा. लेकिन बीज बो दिए गए हैं.
अब कहानी इस बात पर टिकी है कि हम इसे सिर्फ हेडलाइन बनाकर छोड़ देते हैं या अगले दस साल में इसे हकीकत में बदलते हैं. क्योंकि आने वाला दौर सिर्फ ‘मेड इन इंडिया’ का नहीं, ‘मेड फॉर द वर्ल्ड’ का हो सकता है.
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