तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव का एक अजीबोगरीब बयान चर्चा में है. देश में बादल फटने की घटनाओं को उन्होंने एक तरह से साजिश बता दिया. कहा कि इन घटनाओं के पीछे दूसरे देशों का हाथ हो सकता है. तेलंगाना में भारी बारिश के चलते बाढ़ जैसे हालात हैं. इस दौरान केसीआर एक राहत शिविर पहुंचे थे. वहां बाढ़ पीड़ितों को संबोधित करते हुए उन्होंने कह दिया कि पहले सिर्फ लद्दाख के लेह में ऐसा होता था, लेकिन अब दूसरे राज्यों में भी ये घटनाएं सामने आने लगी हैं.
सिलाई होती है या थान कच्चा होता है जो बादल फट पड़ता है?
तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव का एक अजीबोगरीब बयान चर्चा में है. देश में बादल फटने की घटनाओं को उन्होंने एक तरह से साजिश बता दिया. कहा कि इन घटनाओं के पीछे दूसरे देशों का हाथ हो सकता है.

हालांकि ये कहते हुए केसीआर ने ये भी कहा कि वे नहीं जानते कि ये बात कितनी सच है.
बहरहाल, केसीआर के बयान का कई लोग मजाक उड़ा रहे हैं. लेकिन कई ये भी जानना चाह रहे हैं कि आखिर बादल फटना क्या है और ये होता कैसे है.
बादल फटने का साधारण मतलब है बहूहूहूहूत सारी बारिश होना! इसके आगे का जो आप नहीं जानते, आज जान लीजिए.
'बादल फटना' ही क्यों कहते हैं?
बादल में कोई सिलाई नहीं होती जो उधड़ जाए, न उसका कपड़ा कमज़ोर थान का होता है जो ज़ोर पड़ने पर फट जाए. ये आज सामान्य जीके है. लेकिन हमेशा नहीं था. एक वक्त था जब पब्लिक मानती थी कि बादल गुब्बारे जैसा होता है जो कभी फट पड़ता है तो ताबड़तोड़ बारिश होने लगती है. फिर एक दिन एक सयाने ने बादलों पर रिसर्च की और बताया कि बादल भाप के बने होते हैं. बादल फिर गुब्बारे नहीं माने गए. लेकिन 'बादल फटना' जो नाम पड़ा था, पड़ा रह गया.
कब कहते हैं कि बादल फट पड़ा?
बादल फटना और बारिश दोनों में आसमान से पानी गिरता है. फर्क होता है पानी की मात्रा का, माने क्वांटिटी का. कंफ्यूज़न नहीं हो, इसलिए सयाने लोगों ने तय कर रखा है कि एक घंटे के अंदर 100 एमएम या उससे ज़्यादा पानी बरस जाए तो उसे बादल फटना या क्लाउड-बर्स्ट कहा जाए. 100 एमएम माने लगभग चार इंच. अब ये इंच-एमएम का खेला मैं यहां नहीं बता रहा. आगे की बात करते हैं.
लेकिन बादल फटता कैसे है?
बादल में बहुत बड़ी-बड़ी बूंदें बन जाएं तो बादल फटने का चांस पैदा होता है. औसत से बड़ी बूंदें तब बनती हैं, जब बादल की बूंदें नीचे टपकने के बजाय ऊपर उठने लगें. अब आप कहेंगे कि न्यूटन पर सेब तो नीचे की ओर गिरा था, तो बूंदें ऊपर कैसे उठ जाती हैं.
तो बात ये है कि जब गर्म हवा तेज़ी से ऊपर उठती है, तो कई बार बादलों की बूंदों को अपने साथ ऊपर उठा लेती है. ये बूंदें ऊपर तैर रही बूंदों से मिल कर और बड़ी हो जाती हैं. और जब बूंदें बादल में अटके रहने के लिए बहुत भारी हो जाती हैं, तो बरस पड़ती हैं.

गर्म हवा के ऊपर उठने लायक स्थितियां पहाड़ी इलाकों में ज़्यादा बनती हैं. इसलिए बादल फटने की घटनाएं भी ज़्यादातर पहाड़ी इलाकों में ही होती हैं. लेकिन पहाड़ों का बादल फटने पर कॉपीराइट नहीं है, मैदानी इलाकों में भी बादल फट जाते हैं.
बचने का कोई इंतज़ाम है?
बादल फटने के बाद कितना नुकसान होता है, ये हम सब जानते हैं. तो अब सवाल बचा कि बादल फटने के बारे में वॉर्निंग वगैरह का इंतज़ाम हो सकता है कि नहीं. लेकिन इसका तय जवाब नहीं है. क्योंकि बादल फटने लायक मौसम बहुत जल्दी-जल्दी बन-बिगड़ जाता है. इसे पकड़ने के लिए कई राडार हमेशा तैयार रखने होंगे, जो बहुत खर्चीला होगा. इसके बाद भी गैरंटी नहीं रहेगी.
तो बात यहां आकर ठहरती है कि जिन इलाकों में बादल फटने की घटनाएं होती रहती हों, वहां पब्लिक और प्रशासन अपनी ओर से तैयारी रखें कि अगर बादल फट पड़े तो क्या कदम उठाए जाएंगे.
नोट: बादल फटने की जानकारी से जुड़ी ये स्टोरी सबसे पहले 3 अक्टूबर 2017 को पब्लिश की गई थी. तेलंगाना के सीएम के चंद्रशेखर राव के बयान के बाद इसे रीपब्लिश किया गया है.
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