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जेब और बैंक खाते में पड़े पैसे से अलग है क्रिप्टोकरेंसी

क्रिप्टोकरेंसी कैसे अलग है डिजिटल करेंसी से?

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बिटकॉइन सबसे पुरानी और सबसे आज सबसे महंगी क्रिप्टोकरेंसी है (फोटो साभार - इंडिया टुडे)

एक नया पैसा: पार्ट-2 ‘एक नया पैसा’ के पहले पार्ट के बाद आपका सवाल होगा कि डिजिटल करेंसी तो समझ में आ गई, पर क्रिप्टोकरेंसी क्या है? आज इसी के बेसिक्स को समझने का प्रयास करेंगे. साथ ही जानेंगे कि क्रिप्टोकरेंसी एक करेंसी है या एक एसेट क्लास.
लेकिन इस सबसे पहले अनुरोध है कि पहला पार्ट ज़रूर पढ़ें . क्योंकि उसी में हमारी कहानी के हीरो ‘लल्लन’ की धमाकेदार एंट्री होती है और ‘लल्लन’ से ही तो हम क्रिप्टो का तिया-पांचा समझने का प्रयास कर रहे हैं. पहले पार्ट के लिंक के लिए क्लिक करें. तो चलिए आज के एपिसोड में लल्लन की स्टोरी को ‘पंचतंत्र की कहानी’ सरीखा विस्तार दें. # क्रिप्टोकरेंसी क्या है? ज़्यादातर जगहों पर ‘क्रिप्टोकरेंसी’ और ‘डिजिटल करेंसी’, दोनों टर्म्स को एक ही चीज़ के लिए इस्तेमाल किया गया होगा. लेकिन कुछ छोटे-मोटे अंतर है, जिन्हें समझ गए तो किसी भी बैठक में आपका भोकाल टाइट रहेगा.
जैसे सबसे बड़ा अंतर तो ये है कि डिजिटल करेंसी में कोई ‘गवर्निंग बॉडी’ होती है और ये करेंसीज़ सेंट्रलाइज़ होती हैं. मतलब अगर भारत सरकारलल्लन डिजिटल टोकनजैसी कोई चीज़ ज़ारी करेगी तो वो डिजिटल करेंसी कहलाएगी. वहीं, अगर लल्लन अपने लल्लन डिजिटल टोकन में परिवर्तन करके उसे सर्वसुलभ कर दे तो वो कहलाएगी क्रिप्टोकरेंसी.
यानी क्रिप्टोकरेंसी एक ऐसी करेंसी है जिसको जारी करने के बाद लल्लन का भी उसमें कोई अधिकार नहीं रहेगा. जो होगा दुनिया भर की जनता का होगा. किसी तरह का कोई रेग्यूलेशन नहीं. न कोई इसे जारी करने वाला, न कोई इसे डीमोनेटाइज़ करने वाला. तो यूं एक लाइन में ‘सामान्यीकरण’ के जोखिमों के साथ बताएं तो-
जहां डिजिटल करेंसी सरकारी है, वहीं क्रिप्टोकरेंसी सामाजिक. (प्राइवेट नहीं, सामाजिक. जिसका कोई भी मालिक नहीं और जिसके सभी मालिक हैं.)
क्रिप्टोकरेंसी (प्रतीकात्मक चित्र- आज तक)
क्रिप्टोकरेंसी (प्रतीकात्मक चित्र- आज तक)
# क्रिप्टो और डिजिटल करेंसी के बीच का टेक्निकल अंतर: जैसा हमने जाना था कि करेंसी डिजिटल हो क्रिप्टो हो या आम सिक्के या नोट, वो सिर्फ़ एक (सिंगल) लेन-देन के लिए नहीं बनी होती. आपके पास से दूसरे के पास, दूसरे से तीसरे के पास जाती है और घूमती रहती है.
डिजिटल करेंसी के मामले में तो एक कोड ही दरअसल करेंसी है. यानी ये कोड, एकाधिक बार यूज़ किया जा सके ये व्यवस्था ज़रूरी है. और यही होता है क्रिप्टोकरेंसी में भी. यानी डिजिटल करेंसी हो या क्रिप्टो, दोनों ही मामलों में ये सुनिश्चित करना होगा कि जब आपके पास मौजूद ये कोड, किसी और के पास जाए तो आपके लिए ये कोड डिसेबल हो जाए. या ये कोड अगर आप 100 लोगों में बांट दें तो भी 99 लोग इसका उपयोग न कर पाएं.
तो यहां तक तो डिजिटल करेंसी और क्रिप्टो करेंसी के बीच में कोई बड़ा ‘टेक्निकल’ अंतर नहीं आता. लेकिन हमने जो डिजिटल करेंसी और क्रिप्टो के बीच में ‘सामाजिक विज्ञान’ के नज़रिए जो अंतर बताया था (मतलब पहली वाली सेंट्रलाइज्ड और दूसरी वाली डिसेंट्रलाइज्ड) उसी के चलते इनकी टेक्निकल्टी में भी बड़ा अंतर आ जाता है.
वो ऐसे कि डिजिटल करेंसी तो, जैसा हमें पता है, एक रेगुलेटेड करेंसी है. तो उसमें तो हर लेन-देन को सरकार देख रही है. वो अलग-अलग चेक्स से ड्यूप्लिकेसी न हो ये सुनिश्चित कर लेगी. लेकिन क्रिप्टोकरेंसी में क्या हो? उसका तो कोई मालिक ही नहीं है. उसके लेन देन कैसे ‘ड्यूप्लिकेसी प्रूफ़’ रहें?
बिटकॉइन, ईथर, लाइटकॉइन वगैरह क्रिप्टोकरेंसी हैं (फोटो सोर्स -reuters)
बिटकॉइन, ईथर, लाइटकॉइन वगैरह क्रिप्टोकरेंसी हैं (फोटो सोर्स -reuters)

तो क्रिप्टो में होता है ‘ब्लॉकचेन’ का विकल्प.
ब्लॉकचेन मतलब एक डेटाबेस सरीखा, कि “अभी किसके पास ‘वास्तव में’ क्रिप्टोकरेंसी है, पहले किसके पास था. कहां से आई, कहां गई. इसमें सबकुछ एड होता रहता है.” और ये ब्लॉकचेन होती है सर्वसुलभ. मतलब कोई भी, कभी भी इसे एक्सेस कर सकता है.
यही ब्लॉकचेन, क्रिप्टोकरेंसी को अत्यधिक पारदर्शी और काफ़ी हद तक लोकतांत्रिक भी बनाती है. तो जब आप कोई क्रिप्टोकरेंसी (कोड) के माध्यम से शॉपिंग कर रहे हों तो सबसे पहले आपका लेन-देन इसी ‘ब्लॉकचेन’ को हिट करेगा और यहीं से आपके कोड, आपकी क्रिप्टोकरेंसी की वैधता और उसके मूल्य के बारे में जानकारी मिल जाएगी.
अब ‘ब्लॉकचेन’ का पूरा कॉन्सेप्ट क्या है और कैसे काम करती है, ये जानना काफ़ी मज़ेदार है. इसके लिए हमने अलग से एक एपिसोड आगे बनाया है. जो आपको टेकी, गीक या नर्ड्स की श्रेणी में ला खड़ा करेगा.
ब्लॉकचेन तकनीक क्रिप्टो के लेन-देन को सुरक्षित बनाती है(प्रतीकात्मक फोटो - आज तक)
ब्लॉकचेन तकनीक क्रिप्टो के लेन-देन को सुरक्षित बनाती है(प्रतीकात्मक फोटो - आज तक)

और हां एक बात और. क्रिप्टोकरेंसी को इसके नामकरण के आधार पर भी समझ सकते हैं. क्रिप्टो का शाब्दिक अर्थ होता है, ‘गोपनीय’ या ‘कूट’. तो, इस करेंसी के ऑनलाइन लेनदेन को सुरक्षित करने के लिए इसमें स्ट्रॉन्ग क्रिप्टोग्राफी (अत्यधिक गोपनीयता) वाले एक ऑनलाइन बही-खाते का उपयोग किया जाता है. ऑनलाइन बही-खाता बोले तो, वही ‘ब्लॉकचेन’. # क्रिप्टोकरेंसी एक एसेट क्लास है या करेंसी? अगर एक स्केल के इंच और सेंटीमीटर की लंबाई हर दिन के हिसाब से घटने बढ़ने लगे तो ऐसा स्केल हमारे किसी काम के नहीं. ऐसा ही हिसाब करेंसी का भी है. वो भी एक स्केल ही है. महंगाई, दाम, मूल्य नापने का. मतलब अर्थशास्त्र की सबसे महत्वपूर्ण इकाई. इंच और सेंटीमीटर की तरह परफेक्ट नहीं भी तो भी काफ़ी हद तक अपरिवर्तनीय. मतलब हो सकता है कि रूपये का मूल्य डॉलर के मुक़ाबले घटे बढ़े, लेकिन प्रतिदिन के हिसाब से इतना नहीं घटता-बढ़ता कि आफ़त आ जाए. और साथ ही ये भी गौरतलब है कि किसी एक करेंसी को नापने के लिए भी किसी दूसरी करेंसी का ही सहारा लिया जाता है. यानी बेशक रुपया न हो वो स्केल, डॉलर यूरो या येन भी न हो. लेकिन इन सबसे मिलकर जो कॉन्सेप्ट बनता है वो अन्य वस्तुओं के लिए अर्थशास्त्र का ‘महत्तम संभव’ परफेक्ट या ‘महत्तम संभव’ फ़ाइन ट्यून्ड स्केल बन जाता है. और इसी स्केल का नाम है, फ़िएट. फिएट मुद्राओं का मूल्य है जिसका इस्तेमाल सरकारों द्वारा जारी की जाने वाली पारंपरिक मुद्राओं का वर्णन करने के लिए किया जाता है. सरकारें फिएट मुद्राओं को नियंत्रित करती हैं. अगर कोई करेंसी इस स्केल से इधर-उधर होती है, तो वही होता है जो प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी में हुआ था और हाल के दशकों में वेनेज़ुएला और ऑस्ट्रिया में.
वेनेज़ुएला में जुलाई 2018 में एक कप कॉफ़ी के लिए 25 लाख बोलिवर(वहां की मुद्रा) चुकाने पड़ रहे थे. (फोटो साभार - इंडिया टुडे)
वेनेज़ुएला में जुलाई 2018 में एक कप कॉफ़ी के लिए 25 लाख बोलिवर(वहां की मुद्रा) चुकाने पड़ रहे थे. (फोटो साभार - इंडिया टुडे)

इसे ऐसे सोचिए क्या हो अगर रुपया रोज़ तेज़ी के घटता-बढ़ता रहे. यूं अगर कल कहा जाएगा कि पेट्रोल के दाम 200 रूपये हो गए हैं तो आप ये सोचने के बदले कि पेट्रोल महंगा हुआ है, पहले ये भी देखोगे कि कहीं रूपये की वैल्यू तो नहीं गिरी है.
हम आपको ये सब क्यूं बता रहे हैं? ताकि हम समझ सकें कि रूपये का मूल उद्देश्य इन्वेस्टमेंट नहीं है. वो तो अर्थशास्त्र का एक, या कई मायनों में एकमात्र, स्केल है. इन्वेस्टमेंट क्या हुआ फिर? इन्वेस्टमेंट कोई ऐसी चीज़ हुई जो आपने कम दामों पर ख़रीदी और बढ़े दामों पर बेच दी, या बेचने का प्लान किया. जैसे सोना, रियल स्टेट, शेयर्स, FD वग़ैरह. और देखिए, बढ़े हुए दाम का स्केल? करेंसी ऑफ़ कोर्स. मतलब आप यही तो कहते हैं न कि कल सोना एक लाख रूपये में ख़रीदा था आज सवा लाख रूपये में बेच दिया.
अब आप कहेंगे कि करेंसी को भी तो इन्वेस्टमेंट की तरह यूज़ किया जाता है. जैसे कुछ हज़ार डॉलर ले लिए और उसका भाव बढ़ने पर बेच दिया. पर गौर कीजिए कि यहां पर एक करेंसी का भाव बढ़ना दूसरी करेंसी से तुलना है. वरना तो डॉलर का भाव कल भी एक डॉलर प्रति डॉलर था और आज भी एक डॉलर प्रति डॉलर. यूं बेशक आप करेंसीज़ को इन्वेस्टमेंट के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन उसका मूल उद्देश्य इन्वेस्टमेंट नहीं है. जैसे माचिस की तीली का मूल उद्देश्य कान खुजाया जाना नहीं है, लेकिन उससे कान भी खुजाए जा सकते हैं.
लेकिन क्रिप्टोकरेंसी के मामले में मामला बिलकुल अलग हो जा रहा है. हालांकि इन्हें बनाया तो लेन-देन के वास्ते ही गया है, किसी भी अन्य करेंसी की तरह. लेकिन ये प्राथमिक रूप से इन्वेस्टमेंट या टेक्निकल भाषा में बोलें तो एसेट क्लास ही हो गई है. क्यों, क्योंकि ये करेंसी के उस मानक को पूरा नहीं करती जिसकी हमने बात की थी. यानी ये स्केल नहीं बन पा रही. रोज़, रोज़ क्या हर पल, इतना तेज़ी से घटती बढ़ती है कि  ‘ब्लैक स्वान’ के लेखक नसीम निकोलस तालेब, जो पहले बिटकॉइन (सबसे ज़्यादा प्रचलित और चर्चित क्रिप्टोकरेंसी) की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते थे, के अनुसार, कम से कम अभी के लिए तो कहा जा सकता है कि बिटकॉइन एकविफलताहै.
क्योंकि, “एक करेंसी कभी भी उस चीज़ से ज्यादा अस्थिर नहीं होनी चाहिए जिस चीज़ को आप उससे ख़रीद रहे हैं. आप किसी चीज़ पर बिटकॉइन (सबसे चर्चित क्रिप्टो) का प्राइस टैग नहीं लगा सकते.”
बिटकॉइन (प्रतीकात्मक फोटो सोर्स - pixabay)
बिटकॉइन (प्रतीकात्मक फोटो सोर्स - pixabay)

दूसरी तरफ़ वो वजह, जिसके चलते ये करेंसी नहीं बन पा रही वही वजह इसे एक बढ़िया (और थोड़ी रिस्की) एसेट क्लास बना दे रही है. और लोग दौड़कर इसके पीछे भाग रहे हैं. और वो दूसरी वजह है, इसका तेज़ी से घटना-बढ़ना. वैसे ये भी जान लीजिए कि क्रिप्टो भारत में इन्वेस्टमेंट के लिहाज़ से तो लीगल है लेकिन करेंसी के लिहाज़ से नहीं.
अच्छा अंत में एक सवाल, “लल्लन के शहर में तो लोगों की मजबूरी थी ‘लल्लन डिजिटल करेंसी’ के पीछे जाना.  लेकिन फिर दुनिया समेत भारत में क्रिप्टोकरेंसी का इतना ज़ोर क्यों चल रहा है?” उत्तर खोजने का प्रयास कीजिए. न मिले तो कोई नहीं, हम हैं न, आने वाले एपिसोड्स में हम बताएंगे. विस्तार से. अभी के लिए विदा.

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