बात उस 'अदृश्य' स्कूल की जहां बच्चा कभी जाता नहीं, और उस 'मंडी' की जहां बच्चा कभी सोता नहीं. हम बात कर रहे हैं 'डमी स्कूलों' और 'कोचिंग कल्चर' की. क्या आपने कभी सोचा है कि जिस उम्र में बच्चों को मैदान में पसीना बहाना चाहिए. उस उम्र में वो एयर-कंडीशन्ड कमरों में बैठकर 'प्रोजेक्टाइल मोशन' के फॉर्मूले क्यों रट रहे हैं? क्यों आज का बच्चा स्कूल की यादों से महरूम है?
डमी स्कूलों का मायाजाल, कोटा से लेकर 'कोचिंग की मंडी' तक, कमीशन का 'रेफरल बोनस' खेल
लल्लनटॉप पड़ताल: बच्चा घर पर है, हाजिरी स्कूल में लग रही है और करोड़ों का कमीशन इधर से उधर हो रहा है! कोटा के हॉस्टल रूम में पंखों पर स्प्रिंग और खिड़कियों पर लोहे के जाल क्यों लग रहे हैं? क्या हम अपने बच्चों को 'एंट्रेंस निकालने वाली मशीन' बनाने के चक्कर में उनसे उनका बचपन छीन रहे हैं? डमी स्कूलों का मायाजाल, कोचिंग सेंटर्स का 'रेफरल बोनस' वाला खेल और सरकार की नई गाइडलाइंस का पूरा कच्चा-चिट्ठा. पढ़िए ये पड़ताल, क्योंकि ये आपके बच्चे की जिंदगी का सवाल है.
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क्या हम सिर्फ डिग्री वाले रोबोट तैयार कर रहे हैं? आइए, एक-एक करके इस ‘डमी स्कूलों’ के इस मायाजाल की परतों को उधेड़ते हैं.
एक लाचार पिता की कहानी'कोचिंग सेंटर और डमी स्कूलों के इस खूनी गठजोड़ को बेनकाब करने वाली ये कहानी शुरू करते हैं कानपुर के रमेश तिवारी (बदला हुआ नाम) से. रमेश जी ने अपनी ज़िंदगी की जमापूंजी, अपनी पीएफ (PF) की रकम एक कोचिंग के काउंटर पर जमा कर दी.
उनका बेटा अब कोटा के एक 10x10 के कमरे में 'सपनों' की फैक्ट्री का कच्चा माल है. रमेश जी खुश हैं कि बेटा इंजीनियर बनेगा. रमेश तिवारी कहते हैं,
साहब, जमाना बदल गया है. पड़ोस का बच्चा डमी स्कूल में पढ़कर आईआईटी निकाल गया. मेरा बेटा अगर रोज़ स्कूल जाएगा, तो वो 6 घंटे बर्बाद हो जाएंगे. कोचिंग में वो 12-14 घंटे घिसेगा तभी तो कुछ बनेगा.
यह 'बर्बाद होने' का डर ही डमी स्कूलों का सबसे बड़ा फ्यूल है. माता-पिता को लगता है कि स्कूल में होने वाली स्पोर्ट्स और सोशल लाइफ 'टाइम वेस्ट' है.
2020 की नेशनल एजूकेशन पॉलिसी कहती है कि स्कूल सिर्फ सिलेबस पूरा करने की जगह नहीं, बल्कि इंसान बनने की नर्सरी होती है.

दिल्ली की रहने वाली सुनीता जी की कहानी और भी चुभने वाली है. उनका बेटा पिछले दो साल से एक नामी कोचिंग में है और पास के ही एक डमी स्कूल में उसका इनरोलमेंट है.
सुनीता जी बताती हैं,
संडे को टेस्ट होता है, मंडे को रैंक आती है. अगर रैंक गिर जाए, तो वो दो दिन तक कमरे से बाहर नहीं निकलता. उसके स्कूल के कोई दोस्त नहीं हैं, बस 'कॉम्पिटिटर्स' हैं.
सुनीता जी का ये डर जायज है. डमी स्कूल और कोचिंग का ये गठजोड़ बच्चों से उनकी 'इमोशनल इंटेलिजेंस' छीन रहा है. NCRB की 'एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया' (ADSI) रिपोर्ट, इस तस्वीर का एक और खतरनाक पहलू पेश करती है. खासकर कोचिंग हब माने जाने वाले शहरों (जैसे कोटा) में यह समस्या विकराल हो चुकी है.
नीचे पिछले पांच सालों (2019-2023) के दौरान छात्रों द्वारा आत्महत्या के आंकड़ों का विवरण दिया गया है. ध्यान दें कि NCRB विशेष रूप से "कोचिंग पढ़ रहे छात्रों" का अलग से कॉलम 2023 की रिपोर्ट तक बहुत स्पष्टता नहीं रखता. लेकिन "छात्र" (Students) श्रेणी में होने वाली मौतों का बड़ा हिस्सा इन कोचिंग सेंटर्स से जुड़ा पाया गया है.
पिछले 5 सालों में छात्रों की आत्महत्या के आंकड़े (NCRB ADSI Report)यह टेबल भारत में कुल छात्र आत्महत्याओं के रुझान को दिखाती है:
| साल | छात्रों की कुल आत्महत्याएं (भारत) | प्रतिदिन औसत (लगभग) | मुख्य वजह |
| 2019 | 10,335 | 28 | परीक्षा में विफलता, पारिवारिक दबाव |
| 2020 | 12,526 | 34 | महामारी का तनाव, पढ़ाई का बोझ |
| 2021 | 13,089 | 35 | अनिश्चित भविष्य, अकेलापन |
| 2022 | 13,044 | 35 | करियर का दबाव, कोचिंग का तनाव |
| 2023 | 13,500+ | 37 | अनिश्चित भविष्य, अकेलापन |
सोर्स: NCRB Accidental Deaths & Suicides in India (ADSI) Report
कोटा स्पेशल: कोचिंग सिटी का खौफनाक सचकोटा (राजस्थान) के स्थानीय प्रशासन और पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, कोचिंग छात्रों के आंकड़े राष्ट्रीय औसत से अधिक तेजी से बढ़े हैं. आगे बढ़ने से पहले एक नजर उन पर भी डाल ही लेते हैं.
| साल | कोटा में कोचिंग छात्रों की आत्महत्या | स्थिति |
| 2019 | 18 | चिंताजनक |
| 2020 | 04 | लॉकडाउन के कारण बच्चे घर पर थे |
| 2021 | 09 | पढ़ाई का दबाव |
| 2022 | 15 | गंभीर |
| 2023 | 26-29 (अनुमानित) | सबसे ज्यादा खराब हालात |
सोर्स: NCRB Accidental Deaths & Suicides in India (ADSI) Reports 2019-2023
आंकड़ों का विश्लेषण: क्या कह रही है रिपोर्ट?NCRB के आंकड़ों को देखकर तीन बातें साफ हो रही हैं.
- लगातार बढ़ोतरी: पिछले 5 सालों में छात्रों की आत्महत्या के मामलों में लगभग 30% की वृद्धि हुई है.
- असफलता का डर: रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 5-7% आत्महत्याओं का सीधा कारण 'परीक्षा में विफलता' (Failure in Examination) दर्ज किया गया है.
- उम्र का पड़ाव: मरने वालों में सबसे बड़ी संख्या 15 से 18 साल के किशोरों की है. जो आमतौर पर डमी स्कूल और कोचिंग के चक्कर में 11वीं-12वीं में होते हैं.
लखनऊ के एक सीनियर स्कूल टीचर शिवम गंगावार टीचर बताते हैं,
आजकल 11वीं और 12वीं की क्लास खाली पड़ी रहती हैं. बच्चे डमी स्कूलों में नाम लिखवाकर कोचिंग जा रहे हैं. हमारे पास सिर्फ वो बच्चे आते हैं जो भारी कोचिंग की फीस नहीं भर सकते. हम शिक्षा नहीं, अब सिर्फ सर्टिफिकेट बांटने वाले क्लर्क बनकर रह गए हैं.
शिक्षकों का मानना है कि डमी स्कूल शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ तोड़ रहे हैं. UNESCO की 'Shadow Education' in India रिपोर्ट भी इसी तरफ इशारा कर रही है.
'कमीशन का काला खेल: शिक्षा का "रेफरल बोनस"'क्या आप जानते हैं कि आपका बच्चा एक 'प्रोडक्ट' है जिसकी कीमत बाजार में लग चुकी है? कई बड़े कोचिंग संस्थान स्कूलों के साथ 'सेटिंग' करते हैं. हर एडमिशन पर स्कूल या एजेंट को एक मोटा 'कमीशन' मिलता है. इसे इंडस्ट्री की भाषा में "रेफरल बोनस" कहते हैं.
नोएडा के एक नामी स्कूल में पढ़ाने वाले एक टीचर ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया,
'हॉस्टल या जेल? पंखों में स्प्रिंग और खिड़कियों पर जाल'स्कूल के प्रिंसिपल खुद पेरेंट्स को समझाते हैं कि "बेटा डमी स्कूल ले लो, भविष्य बन जाएगा." असल में, वो स्कूल अपनी बिल्डिंग के रखरखाव का खर्चा आपके बच्चे के भविष्य को बेचकर निकाल रहा है.
कोटा जैसे शहरों में जब आप हॉस्टल की दीवारों पर लोहे के जाल देखते हैं और पंखों में 'एंटी-सुसाइड स्प्रिंग' देखते हैं, तो दिल दहल जाता है. प्रशासन समाधान ढूंढने की जगह 'डर' का इलाज कर रहा है.
हम बच्चों को ऐसी जगहों पर भेज रहे हैं, जहां हमें पहले से ही उनके सुसाइड करने का डर है. ये जालीदार खिड़कियां चीख-चीख कर कह रही हैं कि यहां का माहौल किसी जेल से कम नहीं है.
'आइसोलेशन का मनोविज्ञान: जब दोस्त सिर्फ प्रतियोगी बन जाएं'“नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस” (National Institute of Mental Health and Neurosciences) यानी NIMHANS की ‘स्टूडेंट मेंटल हेल्थ गाइडलाइंस’ का मानना है कि ‘डमी स्कूल’ बच्चों का "सोशल कैपिटल" खत्म कर रहे हैं. स्कूल में बच्चा झगड़ता है, फिर सुलह करता है, खेलता है और हारता है.
डमी स्कूल और कोचिंग में उसे सिर्फ 'रैंक' से मतलब होता है. जब उसकी रैंक गिरती है, तो उसके पास बात करने के लिए कोई दोस्त नहीं होता क्योंकि हर कोई उसका 'दुश्मन' (कॉम्पिटिटर) है. यही अकेलापन उसे मौत के करीब ले जाता है.
'कोचिंग टाउन की इकोनॉमी: एक करोड़ों का धंधा'कोटा या मुखर्जी नगर सिर्फ शिक्षा के केंद्र नहीं हैं. राजस्थान सरकारी की एक बजट रिपोर्ट के मुताबिक ये कोचिंग सेंटर एक विशाल 'आर्थिक तंत्र' हैं. पीजी (PG), मेस, ऑटो वाले, फोटोकॉपी की दुकानें-सब उसी 16 साल के बच्चे की जेब पर टिके हैं.
जब भी सरकार कड़े नियम लाने की कोशिश करती है, ये 'लोकल लॉबी' दबाव बनाती है क्योंकि ये करोड़ों का बिजनेस बंद हो जाएगा. यहां बच्चा नहीं, उसका 'पैसा' ज्यादा कीमती है.
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'सरकार की नई गाइडलाइंस 2024: क्या अब रुकेगी ये मनमानी?'केंद्र सरकार ने इस बार सख्त हंटर चलाया है. शिक्षा मंत्रालय ने इस बाबत साफ़ निर्देश दिए हैं. जिनके मुताबिक,
- 16 साल से कम उम्र के बच्चों का कोचिंग में दाखिला बैन.
- "रैंक की गारंटी" देने वाले विज्ञापनों पर रोक.
- कोचिंग सेंटर में प्रोफेशनल मनोवैज्ञानिक की नियुक्ति अनिवार्य.
- नियम तोड़ने पर 1 लाख रुपये का जुर्माना और रजिस्ट्रेशन रद्द
वैसे ऐसा भी नहीं है कि डमी स्कूलों पर सरकारें एक्शन नहीं ले रही हैं. नीचे के टेबल में ऐसी कुछ कोशिशों को आप देख सकते हैं.
| राज्य | लिया गया एक्शन |
| राजस्थान | बायोमेट्रिक हाजिरी अनिवार्य, डमी स्कूलों की जांच के लिए टास्क फोर्स. |
| दिल्ली (CBSE) | 20 से ज्यादा स्कूलों की मान्यता रद्द क्योंकि वहां छात्र सिर्फ कागज पर थे. |
| उत्तर प्रदेश | स्कूलों में 75% अटेंडेंस की सख्ती से जांच शुरू. |
सोर्स: CBSE Notification on Disaffiliation of Dummy Schools
'सावधान पेरेंट्स: झांसे से बचने की चेकलिस्ट'अगर आप भी अपने बच्चे को इस ‘कोचिंग और डमी स्कूलों’ की इस मंडी में भेजने की सोच रहे हैं, तो इन 5 बातों को जरूर चेक करें:
- अटेंडेंस का खेल: क्या स्कूल कह रहा है कि "आने की जरूरत नहीं है"? अगर हां, तो वो स्कूल गैर-कानूनी है.
- फीस की पारदर्शिता: क्या कोचिंग आपसे 'डमी स्कूल' की फीस भी खुद ले रही है? यह कमीशन नेक्सस का हिस्सा है.
- सोशल लाइफ: क्या बच्चे के पास हफ्ते में कम से कम 5 घंटे खेलने या दोस्तों से मिलने का समय है?
- रिफंड पॉलिसी: क्या कोचिंग सेंटर बीच में छोड़ने पर फीस वापस करने की लिखित गारंटी दे रहा है?
- मानसिक स्वास्थ्य: क्या उस संस्थान में कोई सर्टिफाइड काउंसलर मौजूद है?
सोर्स: Guidelines for Parent Awareness - Department of School Education
'बचपन दोबारा नहीं आता'NCERT की “शैक्षणिक तनाव का विश्लेषण” (Analysis of Academic Stress) रिपोर्ट के मुताबिक कॉम्पिटिशन और करियर जरूरी हैं, पर बचपन की कीमत पर नहीं.
डमी स्कूल और कोचिंग की ये 'जुगलबंदी' एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रही है जो 'एंट्रेंस' तो क्लियर कर लेगी, पर 'ज़िंदगी' में शायद पीछे छूट जाए.
तो अगली बार जब आप अपने बच्चे के लिए 'डमी स्कूल' का विकल्प चुनें, तो खुद से पूछें- क्या आप उसे भविष्य दे रहे हैं, या उसकी मुस्कान मिटा रहे हैं?
वीडियो: लल्लनटॉप अड्डा में आई अहसास चन्ना : बचपन से लेकर कोटा फैक्टरी तक के सफ़र पर की खुल कर बात

















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