वैभव श्रीवास्तव बचपन से अपने माता-पिता, स्कूल के अध्यापकों और दोस्तों को किस्से-कहानियां सुनाते आ रहे हैं. मुहावरें में कहें तब कह सकते हैं कि कहानी कहने की आदत से मजबूर हैं. कहानियों की खोज में आजकल मुंबई में रह रहे हैं. दिन में घड़ी बेचते हैं और रात में लिखते हैं. एक कहानी रोज़ के लिए हमें एक कहानी भेजी है, सो हम आपको पढ़ा रहे हैं. पढ़िए...
यह एक ऐसा काम था जो लाला काका को पसंद था
आज एक कहानी रोज़ में पढ़िए, वैभव श्रीवास्तव की कहानी.
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फोटो - thelallantop
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मेरा नाम दिलीप प्रकाश है, मेरा परिचय शायद इस कहानी के लिए इतना महत्वपूर्ण नहीं है, पर अधिकतर समय अपने पाठकों से संबंध बनाने के लिए शायद ऐसा करना ठीक रहता है. मैं बड़ौदा में एक स्कूल का प्रिंसिपल हूं. मैं इसी स्कूल में 12 साल लगातार पढ़ने के बाद, इंजीनियरिंग की शिक्षा एक ठीक-ठाक कॉलेज से करके यहां पढ़ाने आ गया था. माता-पिता इस बात के बहुत विरुद्ध थे कि मैं पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट या फिर कोई और सरकारी नौकरी करने के बजाए एक स्कूल में पढ़ाने क्यों आ गया. पगार कम थी, जिस कॉलोनी में बचपन में मैं रहता था वहां के मेरे सारे मित्र या तो विदेश में थे या फिर कोई ऐसी नौकरी कर रहे थे जिससे वह बढ़िया कमा रहे थे, और सोसाइटी में स्वीकार्यता मिलने के लिए मेरा चुना हुआ पेशा ठीक नहीं था. पर मुझे उस सबसे कोई मतलब नहीं था, मैंने वही काम किया जिससे मुझे संतुष्टि हुई. और मैं पिछले 25 साल से इसी स्कूल में हूं. खैर, मैं वही गलती कर रहा हूं जो मैं करना नहीं चाहता था, ये कहानी मेरे बारे में नहीं है. ये कहानी लाला काका के बारे में है. लाला काका पिछले 40 साल से इसी स्कूल में काम करते थे, शुरुआत में सफाई वगैरह करते थे, धीरे-धीरे वह स्टाफ रूम के प्यून और बाद में विशेष रूप से प्रिंसिपल के ऑफिस के प्यून बन गए. एक सफाई कर्मचारी के लिए किसी स्कूल में इससे ज्यादा उन्नति करना शायद मुशकिल ही है. जब मैं खुद इस स्कूल में पढ़ता था तब से मैंने उनमें ज्यादा बदलाव नहीं देखा है. उस समय शायद वह 40 साल के रहे होंगे, पर गरीबों के बाल हमारे देश में जल्दी सफेद हो जाते हैं, इसलिए ही जबसे मैंने उनको देखा है, एक बूढ़े आदमी के रूप में ही देखा. मैं और मेरे पुराने स्कूल के दोस्त आपस में उनका मजाक उड़ाते थे, की वह ए. के. हंगल जैसे हैं, जो पिछले 30-40 साल से एक वृद्ध आदमी का ही रोल कर रहे हैं. लाल भाई पटेल उर्फ लाला काका छोटे कद के और निहायती दुबले-पतले थे. उनका एक काम क्लास खत्म होने की घोषणा करने वाली घंटी बजाने का था, बच्चे (और शिक्षक भी) हमेशा उनकी चुटकी लिया करते थे कि ‘‘लाला काका! घंटी आराम से बजाना, कहीं ऐसा न हो कि आपने जोर से बजाई और घंटी के साथ आप भी लटक जाओ!’’ हंस कर वह हिंदी और गुजराती के मिश्रण में जवाब देते थे कि ‘‘हूं तमारे बाप ने टाइम थी घंटी बजाऊं छूं. हवे अभी तक नथी लटका तो अब केम लटकुंगा?’’ यह एक ऐसा काम था जो लाला काका को पसंद था, और प्रिंसिपल के ‘पर्सनल प्यून’ बनाने के बाद भी उन्होंने यह काम किसी और कर्मचारी को देने नहीं दिया. कुछ सालों पहले जब पिलगांवकर मैडम स्कूल में प्रिंसिपल थीं, उन्होंने लाला काका से कहा भी कि यह काम किसी जूनियर स्तर के स्टाफ को दे दें. पर तब भी उन्होंने हंस कर टालते हुए कहा था, ‘‘मैडम, हर कलाक में बे मिनट का काम ही छे ने, मुझे फाता है, और बच्चे भी तो इसी काम थी मने पहचानते हैं की नथी.’’ लाला काका बच्चों की बात बहुत आराम से मान जाया करते थे, किसी किसी दिन अगर कुछ बच्चे आ कर उनसे कहें कि स्पोर्ट्स की कक्षा में थोड़ा आराम से घंटी बजाएं ताकि अगला पीरियड भी छोटा हो जाए और उनका क्रिकेट मैच भी खत्म हो सके तो वह ना-नुकुर करते तो बहुत थे कि उनकी नौकरी छूट जाएगी और प्रिंसिपल नाराज हो जाएंगे, पर वह अंत में करते बच्चों के मन की ही. और अगर दूसरी क्लास के बच्चे आकर कहते कि इस वजह से उनका बोरिंग पीरियड लंबा हो जाता है, तो इंसाफ करते हुए एक-दो दिन बाद उनका भी स्पोर्ट्स पीरियड बढ़ा देते थे. जब तक मैं प्रिसिपल बना, उनकी उम्र ज्यादा हो चली थी, अब वह कोई प्यून का काम नहीं करते थे, बस सिर्फ घंटी के नीचे कुर्सी लगा कर बैठे रहते थे और कक्षा समाप्त होने पर घंटी बजाते थे. एक बार उन्होंने मुझे अपनी घड़ी दिखाई थी, उसका सुनहरा रंग अब मटमैला-भूरा हो गया था, पर वह आश्वस्त थे कि पिछले तीन दशकों से उस घड़ी ने उनको कभी धोखा नहीं दिया. वह घड़ी उनको प्यारी थी क्योंकि उन्होंने एक बार किसी मेले में उसको चक्का फेंक कर जीता था. लंच टाइम पर अगर कोई बच्चा उनकी कहानियां सुनने को तैयार हो जाता था, तो वह अक्सर अपने चक्का फेंकने के हुनर का बखान जरूर करते थे. और इसी बहाने स्कूल का लंच पीरियड भी कई बार काफी लंबा हो जाता था. लाला काका की इन छोटी-सी गलतियों से न तो मैडम पिलगांवकर को कोई परेशानी थी और न ही उनके बाद मुझे. हालांकि मुझसे कई अध्यापकों ने कहा कि मैं उनको हटा दूं, उनको ‘रिटायर’ कर दूं, क्योंकि बढ़ती उम्र के साथ लाला काका थोड़े लापरवाह होते जा रहे थे. अब वह सिर्फ बच्चों के कहने पर ही नहीं, पर कई बार खुद थोड़े खोए हुए रहने के कारण कभी-कभी घंटी बजाना भूल जाते थे. ज्यादातर समय मैं या फिर कोई न कोई उनको धीरे से याद दिला दिया करता था, तो वह तुरंत घंटी बजा कर हंसते हुए कहते थे, ‘‘बे मिनट नि बात छे ने...’’ मेरा दिल कभी उनको हटाने का नहीं करता था. लाला काका और मैं करीब-करीब एक साथ ही इस स्कूल के हिस्से बने. उनको हटाने का मतलब एक तरीके से अपने आपको स्कूल से दूर करना था. आज भी किसी पुराने छात्र से बात करता हूं तो स्कूल की यादों में उनके मेहंदी से सने हुए बाल और मैली नीले रंग की यूनिफॉर्म काफी ऊपर रहती थी. लाला काका स्कूल के अभिन्न अंग थे, इसलिए किसी भी सह-शिक्षक के कहने पर तो मैं उनको नहीं हटाने वाला था. पर आजकल किसी भी स्कूल को चलाने वाले न तो वहां के शिक्षक होते हैं, और न वहां के पढ़ने वाले बच्चे. स्कूल के बारे में फैसला करने का हक सिर्फ उसके ‘ट्रस्टी बोर्ड’ के पास होता है. जो बात मैं बताने जा रहा हूं वह शायद किसी और को छोटी लगेगी, पर मेरे और मेरे स्कूल के लिए ये एक काफी महत्वपूर्ण घटना थी. हुआ कुछ इस प्रकार कि एक दिन सुबह-सुबह ही मेरे कक्ष में धीरेन शाह, जो कि ट्रस्टी बोर्ड जिस परिवार का था, उसका सबसे छोटा और सबसे ज्यादा वाहियात लड़का था, तेजी से अंदर घुसा चला आया. वह एक अजीब ही तरह का बेवकूफ और बड़बोला इंसान था जिससे मिलना मुझे कतई पसंद नहीं था. आज उसके साथ एक फटी और ढीली टी-शर्ट पहने एक और लड़का था. धीरेन अपने ही अंदाज में ऊंची आवाज में बोलने लगा. ‘‘दिलीप सर! मिलिए मेरे दोस्त चिंतन से. ये बढ़िया इंजीनियरिंग कॉलेज... वह है न... आईटीटी, अरे वहां बॉम्बे में जो है... वहां पढ़ाई कर रहा है.’’ ‘‘आईटीटी नहीं धीरेन, आई आई टी.’’ उस लड़के ने एक सहमी आवाज में अपने दोस्त को सही किया. मैं उसकी जगह होता तो साथ में उसको ये भी बताता कि वह बहुत बड़ा बेवकूफ और कूप मंडूक है. पर मैंने इस तरह की उत्तेजना को छोड़ बहुत भरसक प्रयास करके अपने आपको शांत रख कर पूछा, ‘‘कहिए, मिस्टर धीरेन, मैं आप लोगों की किस तरह मदद कर सकता हूं?’’ उसने भद्दी तरह से हंसते हुए कहा, ‘‘अरे दिलीप सर मदद तो मैं आपकी करने आया हूं ने, ये चिंतन है ना, बहुत ही सोलिड आदमी है. कंप्यूटर-शम्पुटर का तेज खिलाड़ी है, एक दम जेम्स बांड माफिक है.’’ ‘‘मिस्टर धीरेन, हमारे यहां कंप्यूटर टीचर की जगह फिलहाल तो खाली नहीं है, शर्मा जी कुशल रूप से अपना काम कर...’’ ‘‘अरे हा हा हा! चिंतन टीचर-वीचर बनने थोड़े ही आया है! वो उससे काफी ऊपर की चीज है, हवे उसने एक अलार्म बनाया है, दिलीप सर, कंप्यूटर वाला अलार्म.’’ ‘‘अलार्म घड़ी तो हर कंप्यूटर में होती है मिस्टर धीरेन, इसमें नई बात क्या है?’’ मेरे इस जवाब से धीरेन थोड़ा सकपका गया, वह कुछ रुक कर बोला, ‘‘सर नवी वात तो छे ने, चिंतन तू ही बता ना, सोलिड चीज जो तू बनाया है.’’ चिंतन ने उसी डरे-सहमे अंदाज में मुझे बताया कि धीरेन अलार्म की नहीं बल्कि स्कूल की घंटी की बात कर रहा था. उसने एक ऐसी यांत्रिक घंटी बनायी थी जिसको स्कूल के टाइम टेबल के साथ मिलाया जा सकता था ताकि वह अपने आप हर पीरियड के अंत में बज जाए. चीज बहुत ही मामूली थी पर ये दोनों मुझे ऐसे समझा रहे थे कि जैसे इन्होंने सदी का सबसे बढ़िया आविष्कार किया हो. मैंने बहुत ही शांत स्वर में उन्हें समझाया कि हमारे यहां इसकी जरूरत नहीं थी और वैसे भी लाला काका अपना काम ठीक से कर रहे थे. ‘‘छोड़ो न उस बुड्ढे को, अने मारी वात साम्भ्ड़ो. चिंतन का ये अलार्म मैं फंड कर रहा हूं. बा कहती हैं कि मैं सिर्फ टाइम पास करता हूं, पर अब मेरे पास बढ़िया बिजनेस आइडिया है और शायद इसको स्टार्ट करने के लिए एकदम बेस्ट जगह अपना स्कूल ही रहेगा. क्यों दिलीप सर? लगवा दीजिए इस अलार्म को, और ये तो अपना ही स्कूल है तो अपने को तो ये पड़ेगा फ्री ऑफ कॉस्ट. हैं ने, चिंतन?’’ ‘‘जी... जी सर. मैं आपके यहां फ्री में लगा दूंगा. यू विल बी वैरी कोम्फोर्ट. और मेरा ये सम्मर प्रोजेक्ट भी हो जाएगा, लगवा दीजिए सर तो ये मैं अपने कॉलेज में बता दूंगा कि इम्प्लेमेंट भी हो चुका है.’’ ‘‘अने मारा बिजनेस चालू. शुं वात छे, दिलीप सर, बरोबर ने?’’ एक लड़के के लिए ये एक प्रोजेक्ट पूरा करने की बात थी, और दूसरे के लिए शौकिया बिजनेस, पर इन दोनों नामुरादों को ये नहीं समझ में आ रहा था कि एक आदमी की नौकरी इससे जा सकती है. धीरेन खुद एक दूसरे स्कूल में पढ़ा हुआ था, और चिंतन भी कभी मेरे स्कूल का छात्र नहीं था. उन दोनों के लिए लाला काका की कोई अहमियत नहीं थी. मैंने उनको टरकाया और कहा कि मैं सोच कर बताऊंगा. मुझे पूरा विश्वास था कि ट्रस्टी बोर्ड मुझ पर दबाव डलवा कर ये बेवकूफाना चीज लगवा ही देंगे, पर इस कारण से मैं लाला काका की नौकरी नहीं जाने देना चाहता था. मैंने वाइस प्रिंसिपल सिन्हा साहब को बुला कर उनसे सलाह मांगी तो उन्होंने दो टुक जवाब दिया, ‘‘सर, लाला काका इज नो लोंगर ऍन एस्सेट सर, ही हैज बीकम अ लायबिलिटी. उनको भी आप आराम करने दीजिए, और ये गैजेट लगवा कर आप शाह साहब को भी खुश कर देंगे.’’ ‘‘पर लाला काका को निकालना जरूरी थोड़े ही है, उनको कोई दूसरा काम भी तो दे सकते हैं.’’ ‘‘सर वो किसी काम लायक नहीं हैं, एक फालतू का घंटी बजाने का काम था, अब हम लोगों के पास बहाना है उनको इस काम से भी हटाने का. वैसे भी एक आदमी की पगार कम देनी पड़ेगी.’’ ‘‘अरे वो कितनी ही पगार ले लेते हैं?’’ ‘‘जितनी भी लेते हों, बचत तो बचत ही होती है. अ पेन्नी सेव्ड इज अ पेन्नी अरंड सर. मैं तो कहता हूं आप कंसीडर करिए... अब वो बुड्ढे काका जी हमारे स्कूल के किसी काम के नहीं रह गए.’’ मैंने सोचा कि हो सकता है धीरेन अपने इस आइडिया के बारे में भूल ही जाए, वैसे भी उस को बेसिर-पैर की चीजों का शौक था, और हो सकता है कि वो अपना ध्यान किसी और बेवकूफी पर लगा दे. पर दो दिन बाद ही मुझे मिस्टर शाह का फोन आ गया, उन्होंने बहुत ही मीठे स्वर में मुझे समझाया कि वक्त के साथ चलना वगैरह जरूरी था, और उनके हिसाब से मात्र ये घटिया घंटी लगाने से ही हमारा स्कूल पूरे बड़ौदा का सबसे मॉडर्न हो जाएगा. मैंने उनको बहुत समझाने की कोशिश की कि लाला काका भी वह काम ढंग से कर रहे हैं, और उनसे कहा कि आइडिया अच्छा है पर शायद पहले उसको किसी और स्कूल में इस्तेमाल करके देखना चाहिए. ट्रस्ट के दो तीन और स्कूल भी थे बड़ौदा के आस-पास के शहरों में. पर वह मेरी बात से हल्का-सा भी सहमत नहीं हुए. उन्होंने मुझे चेतावनी देकर कहा कि अगर मैंने उनका कहा नहीं माना तो मुझे बोर्ड को उत्तर देना होगा. मैंने स्कूल में अध्यापकों की मीटिंग बुलाई, पर सिन्हा साहब ज्यादातर लोगों को तब तक बरगला चुके थे. सबने मुझे यही सुझाव दिया कि ये इलेक्ट्रॉनिक घंटी लगाने जैसी छोटी-सी बात पर मुझे बोर्ड को नाखुश नहीं करना चाहिए, और लाला काका को रिटायर कर देना चाहिए. अगले दिन मैंने भारी मन से लाला काका को अपने कमरे में बुला कर उनको समझाया, ‘‘आपको अब कुछ टाइम के लिए छुट्टी ले लेनी चाहिए.’’ ‘‘शूं?’’ ‘‘लाला काका... इस उम्र में आपको काम नहीं करना चाहिए. आपको आराम की जरूरत है.’’ वह मेरी बात भांप गए थे, पर फिर भी उन्होंने कहा कि ‘‘पण अहियां आरामाज छे ने सर, बे मिनट नो काम छे मारो. बाकी बध्धो दिवस आराम. छुट्टी नो कोई पण वात नथी.’’ मैंने उनको बैठने के लिए कहा, फिर समझाया कि स्कूल में बिजली से चलने वाली घंटी लगेगी. और उसके बाद से किसी को भी हर पीरियड के बाद घंटी बजाने की जरूरत नहीं होगी. ‘‘हां पण, घंटी नो स्वीच दबावा माटे भी तो कोई चाहिए ने, बे मिनट नो काम...’’ ‘‘लाला काका इस घंटी में स्विच नहीं है, अपने आप काम करेगी ये.’’ ‘‘एंवु छे?’’ वह सोच में पड़ गए, ‘‘एटले लाला काका नि छुट्टी?’’ थोड़ी देर बिना कुछ बोले वे बैठे रहे, फिर अचानक से उठ कर बोले, ‘‘कोई वात नथी, हवे छुट्टिज छे ने, लाला काका कुछ टाइम घर पर रहेंगे. बरोबर?’’ मैंने उनको समझाया कि बस कुछ दिन की बात है, उसके बाद मैं उनके लिए कोई न कोई काम ढूंढ़ निकालूंगा. पर वह हंसते हुए यह कह कर चले गए कि मैं उनको जब बोलूंगा उस दिन से वह छुट्टी ले लेंगे. एक-दो दिन बाद वह नालायक धीरेन और उसका दोस्त फिर स्कूल आए, इस बार वह एक मेकैनिक साथ लाए थे. स्कूल में नई तरह की घंटी लग गई, और उस दिन की छुट्टी की घोषणा लाला काका ने शायद आखिरी बार पुरानी पीतल की घंटी से की. अगले दिन वह स्कूल नहीं आए और स्कूल के बच्चों का स्वागत उनकी खाली कुर्सी ने किया, मैंने कुछ बच्चों को आपस में बात करते हुए सुना कि आज बहुत टाइम बाद लाला काका दिख नहीं रहे थे, कुछ लड़कों ने बात ये सोच कर टाल दी कि शायद वह बीमार पड़ गए होंगे. उस दिन पहले पीरियड के बाद ही पूरे स्कूल को एक बहुत ही कर्णभेदी फायर अलार्म का शोर सुनाई दिया. दो-तीन शिक्षक तो मेरे रूम में भागते हुए आए पूछने के लिए की क्या कोई फायर ड्रिल हो रही है. घंटी का स्पीकर मेरे कमरे के बगल में था, और उसका सबसे ज्यादा प्रभाव मेरे कानों पर ही हुआ. मैंने अपने कान सहलाते हुए उनसे कहा कि ये नई घंटी है, वे लोग इसके आदी होने के लिए तैयार हो जाएं और सब छात्रों में भी ये बात फैला दें. अगले कुछ दिनों तक मुझे भी स्कूल आना अजीब लगता था, लाला काका को देखने की आदत-सी हो गई थी, और हर घंटे उस घटिया आवाज को सुनना पड़ता था. स्कूल के छात्रों में ये बात धीरे-धीरे फैल गई थी कि लाला काका को निकाल दिया गया है. किसी भी शिक्षक ने ये बताना जरूरी नहीं समझा कि उनको ट्रस्ट के कहने पर निकाला गया है. पर किसी ने ये बताने में भी कोई कमी नहीं छोड़ी कि लाला काका को मैंने निकाला है. किसी भी स्कूल का प्रिंसिपल छात्रों में वैसे भी बहुत लोकप्रिय नहीं होता, और इस घटना के बाद तो ज्यादातर बच्चे मुझे एक अव्वल दर्जे के विलेन की नजर से देखते थे. एक दिन मैं स्कूल का राउंड ले रहा था, तब अचानक एक बच्चों के झुंड ने मुझे घेर लिया, ‘‘सर...’’ ‘‘हां बोलो...’’ ‘‘सर ये नई घंटी हमें पसंद नहीं है. सर, अचानक से बजती है और एकदम दिमाग में दर्द कर देती है.’’ ‘‘मैं... मैकनिक से बात करता हूं, शायद उसका साउंड बदला जा सके.’’ एक लड़की ने तीव्र स्वर में कहा, ‘‘सर घंटी ही नहीं बदली जा सकती?’’ ‘‘पर ये तो अभी नई लगी है...’’ ‘‘सर, हम लोगों को पुरानी वाली ही घंटी चाहिए.’’ ‘‘चुप बे... हम लोग को सिर्फ घंटी ही नहीं...’’ ‘‘माइंड योर लेंगुएज!’’ ‘‘सॉरी सर, मेरा मतलब हम लोगों को सिर्फ घंटी ही नहीं चाहिए... हम लोगों को... आपने लाला काका को क्यों निकाला?’’ मैंने एक गहरी सांस लेकर कहा, ‘‘मैंने उनको नहीं निकाला, वे रिटायर हो गए हैं.’’ ‘‘नहीं सर, हमने सुना कि आपका उनके साथ झगड़ा हुआ और उसके बाद आपने उनको तुरंत निकाल दिया.’’ ‘‘गलत सुना!’’ मैंने कठोरता से जवाब दिया, ‘‘और किसने कहा कि तुम लोगों से ये सब, बताओ?’’ बच्चे एक दूसरे का मुंह ताकने लगे, फिर उनमें से सबसे छोटा बोला, ‘‘सर, प्लीज सर, लाला काका को वापस बुला लीजिए, बस इस टर्म के खत्म होने तक, फिर हम आपसे नहीं कहेंगे सर.’’ ‘‘तुम लोगों को पुरानी घंटी चाहिए कि लाला काका?’’ सब बच्चों ने एक साथ कहा कि उनको लाला काका वापस चाहिए. ‘‘मैं मुट्ठी भर बच्चों की बात कैसे मान लूं, चलो ये नेतागिरी बंद करो और क्लास में वापस...’’ उनमें से एक बच्चा अचानक से आगे आया और मुझे एक कागज का पुलिंदा पकड़ा गया. मैंने देखा कि उसमें 12 पन्ने थे, पहली से लेकर 12वीं कक्षा के हर बच्चे के हस्ताक्षर थे उसमें. जो बहुत ही छोटे बच्चे थे उन्होंने सिर्फ अपना नाम टेढ़ी-मेढ़ी हैंडराइटिंग में, या फिर किसी चित्र के जरिए लिखा था, और बाकी हर क्लास के हर बच्चे ने एक पत्र के साथ अपना हस्ताक्षर दिया था. सबको लाला काका वापस चाहिए थे. मैं मन ही मन बहुत खुश हुआ, और मेरा दिल किया कि अपना हस्ताक्षर भी उस लिस्ट में डाल दूं. ‘‘चलो अच्छा, तुम लोग अभी के लिए क्लास जाओ, मैं वादा करता हूं कि तुम लोगों के लाला काका वापस आ जाएंगे.’’ ऑफिस वापस जाने से पहले मैंने एक प्यून को भेज कर बोला कि जा कर लाला काका को ढूंढ़े और उनको तुरंत स्कूल ले कर आए. अपने रूम में पहुंच कर मैंने मिस्टर शाह को कॉल किया और उनको बहुत ही सहज स्वर में बताया कि पूरा स्कूल चाहता है कि लाला काका वापस आएं, मैंने साथ में उनको ये भी चेतावनी दी कि बड़ौदा के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के संपादक से मेरी दोस्ती है और अगर उन्होंने ज्यादा अडंगा लगाने की कोशिश कि तो मैं इस 12 पेज के पत्र को अखबार में भेज दूंगा - इस कहानी के साथ कि छात्रों की चाह के बावजूद एक अमीर आदमी ने एक बुड्ढे और गरीब आदमी से उसकी नौकरी और हजारों बच्चों से उनका दोस्त छीन लिया. इससे पहले कि महोदय कुछ उत्तर दे पाते मैंने तुरंत अपना फोन काट कर उसको ऑफ कर दिया. फिर मैंने अपने ऑफिस में रखे एक पेपर वेट से उस अलार्म को तोड़ा. लाला काका के रहते हम लोगों को उस घटिया और कर्कश चीज की कोई जरूरत नहीं थी. उसी दिन की दोपहर से लाला काका फिर हमारे स्कूल का हिस्सा बन गए. ट्रस्ट बोर्ड ने अभी तक तो कुछ नहीं किया है, पर मुझे पता है कि मेरे सर पर डेमोक्लेस की तलवार लटकी हुई है. हो सकता है कि जल्दी ही मैं निकाल दिया जाऊं, मुझे उस बात का कोई डर नहीं है. मुझे इस बात की खुशी है कि जब तक मैं इस स्कूल का हिस्सा रहूंगा, लाला काका वहां से नहीं हटेंगे. कुछ भी हो जाए, मैं लाला काका को उनके अपने घर से हटाने का जिम्मेदार नहीं बनूंगा...
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