The Lallantop

वो नदी जो बहती रहती है, कभी ज़मीन से ऊपर कभी पानी के भी नीचे

ये कहानी राकेश त्रिपाठी ने लिखी है.

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फोटो - thelallantop
नानू यानी नवीन जोशी उस रात बहुत रोया. ज़ोया उसे छोड़ गई थी. छोड़ने का ऐसा कोई ऐलान उसने नहीं किया था, लेकिन नानू के मुताबिक उसके रवैये ने आज वो सीमा रेखा खींच दी थी, जो उसे पिछले तीस बरस से दिखी ही नहीं. जिस रिश्ते को वो अखंड हिमालय जैसा मानता आया था, उसे भरभरा कर गिरते हुए भी उसी ने देखा. बकौल उसके, 51 बरस की उसकी ज़िंदगी में वैसी रात कभी नहीं आई थी. ये उसने मुझे खुद बताया. उसने ज़ोया को उस रात किसी और के साथ व्हाट्सएप पर देख लिया था. भला व्हाट्सएप पर कोई कैसे बता सकता है कि कोई ऑनलाइन है, तो किस के साथ है. किसी के साथ भी हो सकता है. किसी ऐसे के साथ भी जिसे आप जानते भी नहीं हैं, लेकिन वो जानती है. लेकिन यूपी पुलिस के बड़े अफसर जोशी की निगाहें गच्चा नहीं खा सकतीं. नानू जोशी ने उस रात मानव संबंधों के नए आयाम के बारे में जाना. नानू विवाहित थे और दो बड़े बच्चों के पिता भी. आईपीएस की रोब-दाब के अंदाज़ वाली नौकरी, लेकिन मन किसी बच्चे की तरह कोमल. ज़ोया भी दो बच्चों की मां थी, लेकिन नानू जोशी के साथ यूनिवर्सिटी में बिताए गए पल उसकी कमज़ोरी थे. दोनों एक दूसरे को इतना पसंद करते थे, तो शादी क्यों नहीं कर ली, इस सवाल का जवाब भी मज़ेदार है. जवाब ये कि दोनों एक-दूसरे को पसंद तो करते थे, लेकिन उन्होंने कभी एक दूसरे से बात तक नहीं की. लिहाज़ा ज़ोया ने नानू को और नानू ने ज़ोया को अहमक मानकर एक दूसरे के बारे में सोचा ही नहीं कभी. अब ये कैसी विडंबना है कि 30 बरस बाद दोनों एक बार फिर से 17 बरस के हो चले थे. दोनों परिवारों का एक दूसरे के घर आना-जाना शुरू हुआ और 30 बरस से मन के किसी कोने में दबा कुचला वो बीज पौधे की शक्ल लेने लगा.
कहते हैं कि इश्क और मुश्क दोनों छुपाए नहीं छुपते. शायद इसीलिए वो पौधा जल्दी ही लहलहाने भी लगा. नानू जोशी और जोया, मतलब एक शरीर दो जान. अजीब सी बात थी कि जब दोनों में से किसी एक के घर में कोई समस्या होती तो दूसरे के घर में भी वैसी ही या उससे मिलती-जुलती दिक्कत आ जाती.
इसका क्या इक्वेशन था, अल्लाताला जाने, लेकिन जोशी ने कसम खाकर मुझसे एक रात बताया था कि उसके और ज़ोया के बीच कुछ ऐसा ही था. दोनों वाकई दो शरीर एक जान थे. 60 और 70 के दशकों के गाने दोनों गुनगुनाते थे और प्रेमचंद और मक्सिम गोर्की दोनों के पसंदीदा साहित्यकार थे. जाने कैसे जोशी को पता था कि ज़ोया अगर नीले और सुफैद रंग का मिक्स्ड कुर्ता और सुफैद रंग की स्लैक्स पहनें तो दिलकश लगेंगी और गजब ढाएंगी. ज़ोया के पैरों को कौन सी चप्पल अच्छी लगेगी, इसके सबसे अच्छे जानकार नानू जोशी ही थे. वो क्या पहने तो अच्छी लगेगी, ये बात इस धरती पर सिर्फ और सिर्फ उन्हें मालूम थी. और राम जाने कैसे ज़ोया को ये बात मालूम थी कि नानू जोशी अगर बालों को कलर करते वक्त माथे पर आ रहे बालों की एक लट सफेद रहने दें, तो कहर ढाएं. सब अच्छा था लेकिन गड़बड़ उस रात शुरू हुई जब नानू जोशी को लगा कि ज़ोया कुछ बदल रही है. उसकी बातों का खज़ाना खत्म होने लगा है. पहले तो नज़रअंदाज़ किया लेकिन फिर दोनों के बीच बातचीत के मुद्दे खत्म होने लगे. अब मोबाइल पर सन्नाटा ज्यादा पसरा रहता. जोशी अपनी तरफ से बात बढ़ाते भी तो उधर से बस 'हूं' की आवाज़ आती. जल्दी ही इस 'हूं' की भी कमी होने लगी और फिर उस रात व्हाट्सएप वाला कांड हो गया. नानू जोशी को लगा कि उसे छोड़ जोया किसी और के साथ व्हाट्सएप पर चली गई और वो भी यूनिवर्सिटी का वो साथी जो अब डिग्री कॉलेज में हिंदी साहित्य पढ़ाने लगा था. नानू जोशी को ये बर्दाश्त नहीं था. गुस्से में जोशी भूल गए कि वो किस अधिकार से गुस्सा हो रहे थे. इत्ते बड़े पुलिस अफसर, रोज़ कानून को नया जामा पहनाने वाले शख्स, भूल गए कि कब वो लक्ष्मण रेखा लांघ गए, जो आमतौर पर आपसी संबंधों में खींची नहीं जाती. बस रात के दो बजे उन्होंने ज़ोया के व्हाट्सएप पर जो भी लिखा, वो उनकी शख्सियत से मैच नहीं करता था. रात भर सोए नहीं, 51 की उम्र में 17 बरस की ईर्ष्या में जलते-भुनते रहे. आचार्य रामचंद्र शुक्ल की लिखी चिंतामणि की लाइनें भी उन्होंने उस काली रात खूब याद कीं, जिनमें ईर्ष्या और द्वेष में अंतर बताया गया था. वो निबंध भी उन्होंने पढ़ डाला जिसमें श्रद्धा और प्रेम के बारीक अंतर पर लिखा गया था. जोशी की बेचैनी का आलम ये था कि सुबह होने का पता उन्हें कॉलबेल की आवाज़ से लगा. महकमें में खुर्राट अफसर माने जाने वाले नानू जोशी सुबह एक फॉलोवर के साथ दौड़ने और एक्सरसाइज़ करने जाते थे. दरवाज़े पर वही था. आमतौर पर फिटनेस के पीछे पागल रहने वाले नानू ने आज उसे देखते ही मना कर दिया. रात का गुस्सा आत्मविश्वास में बदल रहा था. उन्हें लग रहा था, रात को जो भी कुछ हुआ उसमें उनका कोई दोष नहीं था. पूरे केस की पेचीदगी को समझने में उन्होंने 28 बरस की नौकरी का पूरा अनुभव लगा दिया. मैंने जो कहा वो कहीं गलत तो नहीं था, उसने जो कहा उसके क्या-क्या मायने हो सकते हैं. रात 12 से डेढ़ तक कोई विवाहित महिला पति को छोड़कर किसी और के साथ व्हाट्सएप पर चैट करे तो उचित है? अनुचित है तो क्यों और ठीक है तो उसकी क्या वजहें हैं. जोशी रात भर इसी गणित में उलझे रहे.
दरवाज़े से फॉलोवर चला गया था. जोशी को पता था कि ज़ोया का फोन अब आया कि तब. आखिर फोन आया. नानू ने मोबाइल जैसे ही उठाया उधर से आवाज़ आई- ''हां नानू अब बताओ, क्या जानना चाहते हो."
मुख्यमंत्री तक के सामने सीना तानकर बात करने वाले ईमानदार पुलिस अफसर जोशी की घिग्घी बंध गई. रात भर इकट्ठे किए गए तर्कों के तीर भोथरे हो गए. ज़ोया ने आगे कहना शुरू किया- “तो जोशी जी, बताओ, किस अधिकार से तुम जानना चाहते हो कि मैं रात को किस-किस से बात करती हूं, तुम्हें बताऊं. बताओ, तुम मेरे पति हो? बेटे हो? बाप हो? क्या हो कि मैं तुम्हें सफाई दूं." वो बोलती रही और जोशी सन्न होकर सुनते रहे. वैसे भी जोशी ने ज़ोया की हर बात को पूरा सुनना अपनी ज़िंदगी का फलसफा बना लिया था. इश्क पर मानों डॉक्टरेट हासिल हो उन्हें. उन्हें मालूम था कि मोहब्बत किसी घटना की तरह नहीं होती कि बस किसी रोज़ हो जाए. वो एक प्रक्रिया होती है, जो सतत चलती रहती है... कई झंझावातों से होकर गुज़रती है... उसका कोई मकाम नहीं होता... वो बस होती जाती है... अनंत काल से जैसे नदियां चलती आई हैं... पहाड़ों के रास्ते ज़मीन पर उतरती हैं और फिर चलते-चलते एक दिन समंदर में विलीन हो जाती हैं. वहां भी वो चलती रहती हैं, पानी के भीतर रुकती कभी नहीं. ठीक वैसे ही, प्यार कभी रुकता नहीं, उसे कोई रोक सकता भी नहीं. तो... उसी मोहब्बत में यूपी पुलिस के आईजी नानू जोशी ने एक रात अपने पूरे होश-ओ-हवास में तय किया था कि अब से वो ज़ोया से कभी बहस नहीं करेंगे. इसकी भी बड़ी अजीब सी वजह थी पाठकों. आप सुनें तो शायद हंस पड़ें. जोशी जी का प्यार सीमाएं नहीं जानता था. जाने कब उनके प्रेम में एक पिता भी उतर आता. उस वक्त वो ज़ोया का इतना ख्याल करने लगते कि जैसे वो उसके पिता हों. यूरोप के दौरे से लौटते हुए एक बार नवीन जोशी ज़ोया के लिए खूबसूरत से ऊनी मोज़ों का एक सेट खरीद लाए थे. बोले- "तुम्हें ठंड बहुत लगती है न पैरों में... अब इसे पहना करो..." ज़ोया हंस पड़ी थी, लेकिन जोशी के भीतर के 'पापा जी' जग गए थे. उन्हें तो बस सनक सी लग गई थी. ज़ोया को ठंड न लग जाए पैरों में. मानों ज़ोया 50 की न होकर 5 बरस की बच्ची हों. ज़ोया के लिए भी जोशी का ऐसा बिहेवियर उसे कहीं 'पापा जी' के पास ले जाता था. जोशी ने कितनी ही बार ज़ोया के बाल खुद अपने हाथ से संवारे थे और ये उनका प्रिय शगल था. बचपन में जल्दबाज़ी में सारे बच्चे पापा जी को 'पापायी' कह जाते थे. तो पापायी की ज़िद्दी और बिग़ड़ैल बेटी, जिसके जीवन का सबसे बड़ा नुकसान पापायी का देह छोड़ जाना था, जोशी में 'पापायी' पाती तो खिल उठती थी. खिल उठने के बाद वो कुछ भी डिमांड कर सकती थी. लाड़ करती, बिना बात गुस्सा करती और किसी भी नाजायज़ बात को लेकर झगड़ा कर लेती. तीस बरस पहले की वही ज़िद्दी बेटी बन जाती और जोशी, स्नेह से भरपूर 'पापायी' हो जाते. जाने कितनी बार जोशी ने उसे तरह तरह के ब्रांडों वाली चॉकलेट्स भिजवाई थीं. वो ज़िद करती और जोशी उसे फ्लिपकार्ट पर आर्डर कर देते. लिहाज़ा नानू जोशी उसे सिर्फ सुनते, प्रतिक्रिया नहीं देते. क्योंकि प्रेम में प्रतिक्रिया के लिए जगह ही कहां? जोशी ने इसीलिए तय किया था कि जब-जब ज़ोया गुस्से में होगी, नाराज़ होगी, तंज़ कर रही होगी, वो मौन रह जाएंगे. उन्हें मौन की ताकत मालूम थी. मौन कैसे संबंधों को बिखरने से बचाता है, उन्हें पता था. फिर ज़ोया से उनका रिश्ता तो दैवीय था. एक सात फेरे ही तो नहीं लिए थे उन दोनों ने. बाकी तो सब वैसा ही था. कोई स्वार्थ नहीं, कोई लिप्सा नहीं. बस एक दूसरे को सुन लेने की उमंग, देख भर लेने की चाहत. हालांकि उस मौन पर भी नानू जोशी को सुनना पड़ता था- "क्यों? तुम्हारी आवाज़ को क्या हुआ नानू जोशी? आवाज़ क्यों नहीं निकल रही?" और जोशी सारे तंज़, सारी कटुक्तियां बटोरते जाते. बोलते कुछ नहीं.
ख़ैर जोशी बुत की तरह ज़ोया को सुनते रहे. एकदम अवाक. जीभ जैसे तालू से चिपक सी गई हो. बोलना चाह रहे हों, लेकिन बोला न जा रहा हो. बड़ी देर बाद जब उधर से ज़ोया की आवाज़ आनी बंद हो गई तो बमुश्किल जोशी के गले से आवाज़ निकली- "तो क्या वो सब झूठ था?" "क्या झूठ था?" ज़ोया की सख़्त आवाज़ फोन पर गूंजी.
"वही इतने दिन जो सब चला. वो तुम्हारा पर्स में सिंदूर की डिबिया ले आना. मेरी बांहों का तकिया लगाकर सो जाना और गुस्से में मुझे मुक्कों से मारना. वो क्या था बेबी" "जोशी जी. वो सब सच था. इतनी कमज़ोर और स्वार्थी नहीं कि वो लम्हे झुठला दूं. वो सब सच था. लेकिन ये भी सच है कि तुम्हारी आज़ादी वहीं ख़त्म होती है, जहां से मेरी शुरू होती है. मैं कब किससे क्या बात करती हूं. इससे तुम्हें क्या मतलब. और क्या उसका एक ही मतलब निकाला जाए कि मैं अब किसी और के प्यार में पड़ गई हूं? लानत है नानू जोशी तुम्हारी पुलिसिया अकल पर. किसने बना दिया तुम्हें इत्ता बड़ा अफसर. इतने सेल्फिश बनोगे तो खाई में गिरोगे नानू जानू. तुम्हें मुझसे बेहतर कोई जान नहीं सकता. तुम सांस लेते हो तो मुझे पता चल जाता है कि तुम्हारा अगला वाक्य क्या होगा. इतना समझती हूं तुम्हें. क्रिमिनल्स से डील करते करते तुम कित्ते छोटे हो गए हो यार. संभालो अपने आप को. मुझे फिक्र है तुम्हारी. गुड बाय." नानू जोशी इससे ज़्यादा सुन नहीं पाए. फोन उन्होंने रखा या ज़ोया ने, नहीं पता. लेकिन यूपी पुलिस का ईमानदार और बड़े-बड़ों से भिड़ जाने वाला अफसर उस सुबह फूट-फूटकर रोया. मंत्रियों और डीजीपी तक के सामने बेबाकी से अपनी बात रखने वाला नानू जोशी ज़िंदगी के सबसे कड़वे अनुभव से गुज़र रहा था. पुलिस महकमें मे थाने के अंदर डर के मारे लोग कैसे रोते हैं, ट्रेनिंग के दिनों से वो देख रहा था. ताज्जुब है कि इतना मेच्योर्ड पुलिस अफसर फूट-फूटकर रो रहा था. थाने में बैठे आरोपी का चेहरा देखकर नानू जोशी बता सकता था कि आरोपों में कितने डिग्री की सच्चाई है. वो नानू जोशी रो रहा था. उस दिन उसे पता चला कि रोना ईमानदारी भी है. रोते-रोते नानू जोशी कब सो गए, उन्हें भी पता नहीं चला. जागे तो उनके ठीक सामने फर्श पर ही सीज़र, उनका प्यारा कुत्ता लेटा एकटक उनकी ओर देख रहा था. मानों उनसे सहानुभूति जता रहा हो. नानू जोशी धीरे से उठे और सीधे बाथरूम में मुंह धोने चले गए. लौटे तो बालकनी से आती हुई बयार ने जैसे ही उनका गाल सहलाया, उन्हें समझ मे आने लगा कि वो जिस में डूबते-उतराते थे वो दरअसल एक नशा था, जो अब धीरे-धीरे उतर रहा था. वो मोहब्बत, जो उनमें अब तक दुनिया भर से लड़ने का दम भरती थी, वो जाने क्या थी. और वो अगर मोहब्बत न थी, तो और क्या थी. क्या वो धोखा खा गए. ये बात उनका मन मानने को तैयार नहीं हो रहा था कि वो गच्चा खा गए.
"नहीं नानू जोशी, नहीं. वो प्रेम ही है. नदी की तरह. जो हमेशा बहती रहती है. कहीं ज़मीन के नीचे. कहीं ज़मीन के ऊपर. और कभी-कभी तो पानी के भीतर भी. क्या फर्क पड़ता है कि अगर वो बदल गई हो. प्रेम तो निराकार ब्रह्म की तरह है. है भी और नहीं भी. मैं उससे प्रेम करता हूं लेकिन इस बात का उससे क्या मतलब होना चाहिए?"
नानू आत्मा से ईमानदार थे, इसलिए बहुत से ऐसे सवाल उन्हें मथ रहे थे, जो उनके लिए असुविधाजनक थे. सवाल करना और उसका जवाब देना दोनों उनकी आत्मा के लिए तकलीफदेह थे. जाने क्या ज्ञान मिला इस पूरे एपीसोड से कि पाठकों, हमारे नानू जोशी ने व्हाट्सएप, फेसबुक और मेसेंजर की दुनिया को उसी दिन अलविदा कह दिया. उस आभासी दुनिया में क्या रहना, जिसने उनकी असल दुनिया का चैन छीन लिया हो. वो रात उस निरीह पुलिस अफसर ने कैसे काटी, ये तो केवल वही बता सकता है. लेकिन भोर होते ही उसे एक खास तरह की विरक्ति ने जैसे जकड़ लिया. मॉर्निंग वॉक करते हुए अचानक पुलिस लाइन्स की ओर मुड़ जाना नानू जोशी का खास शगल था. वहीं, सिपाहियों और रंगरूटों की पीटी देखते, कमियां निकालते और इंस्ट्रक्टर के साथ चाय पीकर वापस आ जाते. लेकिन अब जैसे कभी न खत्म होने वाले किसी नशे ने उन्हें खुद में जैसे डुबो दिया हो. पत्नी और बच्चे होमटाउन पिथौरागढ़ गए हुए थे, इसलिए घर भी काटने को दौड़ रहा था. नानू जोशी के दिमाग में पिछले तीस बरस किसी रील की तरह घूम रहे थे. यूनिवर्सिटी कैंपस की चहचहाहट, हंसी-मज़ाक, डिबेट, कविता प्रतियोगिता, क्रिकेट टीम में सेलेक्शन, सीनियर्स के फेयरवेल में उनका गज़ल गाना, फिर ज़ोया की एंट्री. माहौल का खुशनुमा होना. एक बीज का अंकुरित होना, बढ़ना, हरा होकर बढ़ते जाना. और ऊपर, और एक पेड़ का बनना. और फिर... सहसा अलग हो जाना. फिर कई साल बाद जाने कैसे मिल जाना. एक-दूसरे में बची हुई ज़िंदगी के मायने तलाशना. ज़ोया को पैम्पर करना और उसमें खुश होते जाना. अजीब सा नशा था वो सब और फिर यकायक एक झटके से अलग हो जाना. सब कुछ उसके सामने एक रील की तरह घूम रहा था. नानू जोशी बार-बार उसी शब्द पर आकर अटक जाते- 'अधिकार'. क्या होता है अधिकार? क्या सात फेरों से अधिकार जमाने का हक स्वत: आ जाता है और सात फेरे न ले तो कोई अधिकार नहीं मिलता? क्या आपसी रिश्तों में भी कर्तव्य बनाम अधिकार की रार होती है? ये सोचते-सोचते अचानक जोशी को लगा उनके शरीर में कुछ हो रहा है. एक तूफान सा उठ रहा है जो पैरों से उठकर सिर तक आ गया है और वहीं चक्कर लगा रहा है. वो उठकर बिस्तर पर बैठे तो उन्हें महसूस हुआ कि फरवरी के महीने में उन्हें ज़बरदस्त पसीना आ रहा है. उनकी फुल नाइट शर्ट पसीने में डूब गई. अचानक उन्हें लगा कि उन्हें सब कुछ धुंधला सा दिखने लगा है. बाहर बच्चों के खेलने की आवाज़ें जैसे म्यूट हो गईं. एक सन्नाटे ने जैसे जोशी को जकड़ लिया. सेकेंड भर में उन्होंने अंदाज़ा लगा लिया कि शायद उन्हें दिल का दौरा पड़ गया है. उनके मुंह से धीरे से एक ही आवाज़ निकली- "ज़ोया".
जोशी की आंख खुली तो खुद को उन्होंने अस्पताल में बेड पर पाया. फॉलोवर उनके पायताने खड़ा था. जिले के एसएसपी, एसपी और कलेक्टर अपने अमले के साथ मौजूद थे. फॉलोवर बोला- "कैसे हैं साब... पानी दूं क्या"
जोशी ने सिर हिलाया और फॉलोवर ने झट से ट्रे में गिलास रख उनकी ओर बढ़ाया. पास खड़े कलेक्टर की आवाज़ आई- " कोई चिंता की बात नहीं है जोशी सर. ईसीजी बिलकुल करेक्ट है. बस बीपी जाने कैसे आपका एकदम लो चला गया आज सुबह. वो तो भला हो आपके फॉलोवर का. आपको वॉक पर ले जाने के लिए आया और आपको बेहोश देखा तो तुरंत सबको इत्तिला की और आपको अस्पताल ले आया." फॉलोवर ने उसी समय जोशी के सामने फोन बढ़ाया- "साब, कोई फोन है. बड़ी देर से आ रहा है.." जोशी ने कांपते हाथों से फोन उठाया. फोन के उस पार से आवाज़ आई- "नानू जोशी. फोन क्यों नहीं उठा रहे हो. इक्यानवां फोन किया है तुम्हें. सबेरे-सबेरे लगा जैसे तुमने मुझे नाम लेकर पुकारा. तब से कॉल कर रही हूं. तुम ठीक तो हो नानू जानू. हेलो, हेलोsssssss. बोलते क्यों नहीं नानू जोशी. सुनो. मैं वैसी ही हूं. मेरी ज़िंदगी में मेरे मां-बाप के बाद अगर कोई है न, तो वो तुम हो. पति, बच्चे, कोई नहीं. तुम सुन रहे हो न नानू जोशी. मैंने बहुतों को देखा है. सब को देख लिया है. लेकिन तुम जैसा कोई नहीं. लेकिन देख, मैं वो नदी हूं, जो हमेशा बहती रहती है, ज़मीन पर, ज़मीन के भीतर. यहां तक कि समंदर के भी भीतर. तुम्हीं तो कहते थे न ये. मैं बहती हूं तुम्हारी नस-नस में. तुम्हारी शिराओं में माथे से लेकर पैरों के अंगूठे तक हर जगह मैं ही हूं, जो दौड़ती रहती हूं. मैं तुम्हें कॉल करूं न करूं. मैं तुमसे बेपनाह मोहब्बत करती हूं. और दुनिया की कोई ताकत इसे झुठला नहीं सकती नानू जोशी. हल्लो.. हलोsssssssss"
नानू जोशी की आंख की कोरों से दोनों ओर एक-एक बूंद ढलक गई. उन्होंने फोन फॉलोवर की ओर बढ़ा दिया. आवाज़ें फिर म्यूट हो गईं. उन्होंने इत्मीनान से आंखें मूंद लीं. जैसे बरसों के तप के बाद जीवन में आखिरकार बोधि की प्राप्ति हो गई हो.

( ये कहानी राकेश त्रिपाठी ने हमें भेजी है. राकेश पत्रकार हैं. उनकी ये कहानी कादंबिनी में प्रकाशित हो चुकी है. )
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