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दुनिया को तबाही से बचाने के लिए कॉप-26 की चर्चा क्यों अहम है?

क्या है IPCC की रिपोर्ट जो कहती है- तबाही निश्चित है.

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IPCC की रिपोर्ट में दर्ज़ रेकॉर्ड के मुताबिक हम इतिहास के सबसे गर्म मौसम में जी रहे हैं.
छठी शताब्दी की बात है. सेंट मुंगो नाम के एक पादरी स्कॉटलैंड आए. उन्होंने ग्लास कू नाम की जगह पर एक चर्च की स्थापना की. ग्लास कू का हिंदी में मतलब होता है - ख़ूबसूरत सी हरी-भरी जगह. कालांतर में इसी शहर को ग्लासगो के नाम से जाना गया. 2005 में WHO ने ग्लासगो को ‘यूरोप का मर्डल कैपिटल’ घोषित किया था. लेकिन, अब इसका चाल-चरित्र का सिक्का पूरी तरह पलट चुका है. फिलहाल, ग्लासगो स्कॉटलैंड का सबसे बड़ा शहर है. और, धरती को बचाने की आख़िरी उम्मीद भी. ऐसा कहने की वजह क्या है? दरअसल, ग्लासगो कॉन्फ़्रेंस ऑफ़ द पार्टीज़ (COP26) का मेज़बान शहर है. COP26 को कई बार ‘कॉप-26’ भी कहा जाता है. ग्लासगो में लगभग दो सौ देशों के नेता कॉप-26 में हिस्सा लेने के लिए जमा हुए हैं. उनके ऊपर दबाव है कि वो धरती के सामने मौजूद पर्यावरणीय चुनौतियों को लेकर ठोस और समावेशी प्लान पेश करें. अगस्त 2021 में आई IPCC की रिपोर्ट के बाद से चिंताओं का ग्राफ़ बहुत ऊपर जा चुका है. IPCC की रिपोर्ट में कहा गया था कि कॉप-26 में बात नहीं बनी तो तबाही निश्चित है. आज हम समझेंगे, IPCC की रिपोर्ट में क्या चेतावनी दी गई थी? कॉप-26 की पूरी कहानी क्या है? ग्लासगो में हो रहे ग्लोबल समिट से दुनिया को क्या उम्मीदें हैं? कॉप-26 की आशंकाएं क्या हैं? और, अगर ग्लासगो में बात नहीं बनी तो क्या होगा? सबसे पहले IPCC की रिपोर्ट की बात कर लेते हैं. IPCC का फ़ुल फ़ॉर्म है - इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज. ये यूनाइटेड नेशंस का एक पैनल है. इसकी रिपोर्ट को अधिकतर देश मान्यता देते हैं. IPCC की स्थापना 1988 में हुई थी. ये हर पांच-सात साल में जलवायु परिवर्तन से जुड़ा विश्लेषण पेश करती है. IPCC की पिछली विस्तृत रिपोर्ट अगस्त 2021 में आई थी. इस रिपोर्ट को 195 देशों ने मंज़ूरी दी थी. जब हमने कोयले, तेल और गैस का इस्तेमाल करना नहीं सीखा था, तब से अब तक धरती का तापमान औसतन 1.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है. वैज्ञानिकों ने एक लिमिट तय की थी. उनका कहना था कि डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोत्तरी को झेला जा सकता है. नया अनुमान कहता है कि 21वीं सदी खत्म होते-होते धरती का औसत तापमान तीन डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा. हम जिस रफ़्तार से आगे जा रहे हैं, वैसे में इस आंकड़े को बहुत पहले भी पार कर सकते हैं. IPCC की रिपोर्ट में और क्या कहा गया था? - दर्ज़ रेकॉर्ड के मुताबिक, हम इतिहास के सबसे गर्म मौसम में जी रहे हैं. - हालिया समय में, समंदर का जलस्तर बढ़ने की रफ़्तार तिगुनी हो गई है. हम कितनी भी कोशिश कर लें, इसे रोकना नामुमकिन है. इस सदी के अंत तक समंदर का जलस्तर दो मीटर तक बढ़ सकता है. साल 2150 तक ये स्तर पांच मीटर तक पहुंच जाएगा. - 1950 के बाद से हीटवेव्स की संख्या लगातार बढ़ी है. आनेवाले समय में इनका दायरा और बढ़ेगा. रिपोर्ट में ये भी कहा गया था कि इन सारी समस्याओं की इकलौती वजह इंसानों की दखलअंदाज़ी से जुड़ी है. वैज्ञानिकों ने साफ़-साफ़ कहा कि अब वापसी का कोई रास्ता नहीं है. Either you act on it or be ready to face the consequences. IPCC की रिपोर्ट से डर का कारण क्या है? इसकी वजह है, एक्सट्रीम वेदर कंडीशंस. दुनियाभर के मौसम में अप्रत्याशित बदलाव देखने को मिल रहा है. चीन में बाढ़ और रेतीले तूफ़ान. ऑस्ट्रेलिया, लेबनान, ग्रीस, इटली आदि देशों में बुशफ़ायर. ब्राज़ील के वर्षावनों में आगजनी. समंदर किनारे बसे कई शहरों पर डूबने का ख़तरा. अंटार्कटिका के ग्लेशियरों का पिघलना. ऐसी कई घटनाएं हैं, जो पिछले कुछ समय से आम हो गईं है. जैसे-जैसे कार्बन उत्सर्जन बढ़ेगा, वैसे-वैसे धरती के तापमान का ग्राफ़ भी ऊपर जाएगा. इस वजह से बाढ़, आगजनी, भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोत्तरी होगी. IPCC ने आगे का क्या रास्ता सुझाया गया था? रिपोर्ट में कहा गया था कि अगर 2030 तक कार्बन उत्सर्जन को आधे और 2050 तक शून्य पर ले आया जाए तो तापमान को अनियंत्रित होने से रोका जा सकता है. हमारे पास ऊर्ज़ा के नए और सुरक्षित विकल्प उपलब्ध हैं. जलवायु के बारे में वैज्ञानिकों की समझ लगातार विकसित हो रही है. हमारी कम्प्यूटर तकनीक का स्तर भी बढ़ा है. अब हम कहीं सटीक तरीके से मौसम का पूर्वानुमान लगा सकते हैं. जिस समय IPCC की रिपोर्ट बाहर आई, उसी समय कॉप-26 की चर्चा भी तेज़ हो गई थी. इसमें 2015 के पैरिस एग्रीमेंट की समीक्षा होनी थी. साथ ही आगे के रास्ते पर सहमति भी बनानी थी. अब वो समय आ चुका है. 31 अक्टूबर 2021 को कॉप-26 की शुरुआत हो गई. ये समिट 12 नवंबर तक चलेगा. कॉप की बैठकें यूनाइटेड नेशंस फ़्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCC) के तहत आयोजित होतीं है. UNFCC एक अंतरराष्ट्रीय संधि है. इस संधि पर 196 देशों और यूरोपियन यूनियन के दस्तख़त हैं. कॉप की पहली बैठक 1995 में बर्लिन में आयोजित हुई थी. इस साल ग्लासगो में कॉप की 26वीं बैठक हो रही है. ग्लासगो में किन बड़े मुद्दों पर फ़ोकस होगा? - पहला, कोयले के इस्तेमाल पर रोक. - दूसरा, जंगलों की कटाई पर बैन. - तीसरा, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा. - चौथा, रीन्यूएबल एनर्जी में निवेश. - और पांचवा, तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए कोस्टल-डिफ़ेंस सिस्टम का निर्माण. अगले दो हफ़्तों तक इसी को लेकर अलग-अलग देशों के नेगोशिएटर्स आपस में चर्चा करेंगे. फिर उनमें सहमति बनेगी. तब जाकर एक कॉमन पॉइंट पर एकमत होने की संभावना है. इन सभी मुद्दों का लिंक सीधे तौर पर आम जनजीवन से जुड़ा है. ग्लासगो में लिए गए फ़ैसले हमारी-आपकी ज़िंदगी को भी प्रभावित करने वाले हैं. कॉप-26 के अंत में एक घोषणा-पत्र का ऐलान होगा. बैठक में शामिल हर एक देश को इस पर साइन करना होगा और उन्हें समझौते के हिसाब से तय मॉडस ऑपरेंडी पर आगे बढ़ना होगा. पैरिस क्लाइमेट एग्रीमेंट के बाद ग्लासगो में इतनी गंभीर चर्चा की ज़रूरत क्यों पड़ी? पैरिस में तापमान की बढ़ोत्तरी की लिमिट को दो डिग्री पर रखा गया. इसके लिए देशों को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम या ख़त्म करने को लेकर टारगेट दिए गए. इन्हें Nationally Determined Contributions (NDC) कहा जाता है. हालांकि, ये टारगेट तापमान वाले टारगेट को पूरा करने के लिए नाकाफ़ी था. अगर पैरिस समझौते वाले NDC टारगेट को पूरा कर दिया जाए तो भी इस सदी के अंत तक धरती का तापमान तीन डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाएगा. पैरिस में फ़्रेमवर्क तैयार करने वालों को ये बात पता थी. इसलिए, उन्होंने उसमें एक और क्लाउज़ जोड़ दिया. क्या? उन्होंने कहा कि अगले पांच साल में इसकी समीक्षा की जाएगी. ये पांच साल दिसंबर 2020 में ही पूरे हो गए. हालांकि, कोरोना महामारी की वजह से बैठक को एक साल के लिए पोस्टपोन करना पड़ा. ग्लासगो में ये देखा जाना है कि पैरिस वाले समझौते का कितना पालन हुआ और लक्ष्य पूरा करने के लिए और क्या करने की ज़रूरत है. कॉप-26 में लगभग दो सौ देश शामिल हैं. उन देशों के हालात में बेहिसाब असमानताएं हैं. सबके यहां अलग-अलग समस्याएं हैं. इस वजह से सहमति बना पाना बेहद मुश्किल होगा. कॉप-26 की सफ़लता के रास्ते में क्या बड़ी चुनौतियां हैं? - पहली चुनौती है, आर्थिक असमानता. विकसित देशों के पास पैसा है और संसाधन भी. वे अपने बचाव का रास्ता तैयार कर लेंगे. लेकिन विकासशील और अल्प-विकसित देशों के लिए स्थिति गंभीर है. विकसित देश उन पर कार्बन उत्सर्जन कम करने का दबाव डाल रहे हैं. जबकि कार्बन उत्सर्जन के मामले में विकसित देश बाकियों की तुलना में कहीं आगे हैं. विकासशील देश अभी नई तकनीकों के लिए रास्ता तैयार कर रहे हैं. उन्हें इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए भारी रकम की ज़रूरत है. इस खर्च के लिए वे विकसित देशों पर निर्भर हैं. 2009 में अमीर देशों ने इसके लिए लगभग सात लाख करोड़ रुपये की मदद का ऐलान किया था. हालांकि, अभी तक वो लक्ष्य पूरा नहीं हो सका है. - दूसरी वजह है, भरोसे और साख की कमी. 2015 के पैरिस समझौते के दौरान अमेरिका और चीन साथ आए थे. कुछ द्वीपीय देशों ने जलवायु परिवर्तन को लेकर संगठन बनाया था. इन्हीं वजहों से पैरिस समिट को सबसे सफ़ल बैठकों में से एक माना जाता है. छह साल बाद हालात पूरी तरह बदले हुए हैं. अमेरिका और चीन के बीच तनातनी चल रही है. पश्चिमी देश रूस से उलझे हुए हैं. द्वीपीय देशों का संगठन ध्वस्त हो चुका है. ग़रीब देशों को दी जाने वाली मदद का वादा भी लंबे समय से पूरा नहीं हो पाया है. इन वजहों से कॉप की साख को भट्टा लगा है. कॉप में शामिल कई देश ये मान चुके हैं कि यूएन का मंच औपचारिक होकर रह गया है. वहां बातें अधिक और काम की परिपाटी बन गई है. इसलिए भी कॉप-26 की सफ़लता का दावा संदिग्ध लग रहा है. - तीसरी वजह है, टालने की परंपरा. ग्लासगो में कॉप-26 की शुरुआत से ठीक पहले जी-20 देशों की बैठक हुई. रोम में आयोजित बैठक में अमेरिका, भारत, रूस और चीन जैसे देश शामिल हुए. जी-20 देश 75 फीसदी कार्बन उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार हैं. बैठक में पैरिस क्लाइमेट एग्रीमेंट की शर्तों का पालन करने को लेकर कोई आम सहमति नहीं बन सकी. पैरिस समझौते में तय हुआ था कि धरती के तापमान को दो डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ने नहीं दिया जाएगा. बैठक के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने रूस, सऊदी अरब और चीन पर आरोप लगा दिया. उन्होंने कहा कि हमने तो कदम उठा लिए हैं और आगे भी उठाने वाले हैं. लेकिन हमें इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि चीन, रूस और सऊदी अरब ऐसा क्यों नहीं कर रहे हैं. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग बैठक में वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए शामिल हुए थे. उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि विकसित देशों को वित्तीय मदद मुहैया कराना चाहिए. जी-20 की बैठक में शामिल देश शून्य कार्बन उत्सर्जन को लेकर डेडलाइन तय करने में नाकाम रहे. चीन ग्रीन हाउस गैसों का सबसे बड़ा उत्सर्जक देश है. उसने 2060 तक कार्बन उत्सर्जन शून्य करने का लक्ष्य रखा है. भारत और रूस ने अभी तक कोई डेडलाइन नहीं बताई है. रोम से ग्लासगो आते हुए यूएन सेक्रेटरी-जनरल अंतोनियो गुतेरेस ने कहा,
I leave Rome with my hopes unfulfilled—but at least they are not buried रोम में मेरी रह गईं - लेकिन वे पूरी तरह ख़त्म नहीं हुईं है. उम्मीदें अधूरी
चीन, रूस और तुर्की ने सिर्फ़ अपना डेलिगेशन भेजा है. इन देशों के राष्ट्राध्यक्ष बैठक में नहीं आ रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े कोयला उत्पादक देशों में से एक है. ऑस्ट्रेलिया के पीएम ने पहले कहा था कि वो कॉप-26 में हिस्सा नहीं लेंगे. जब सहयोगी देशों ने दबाव बनाया, तब वो आने पर राज़ी हुए. ये सब देखकर क्लाइमेट चेंज़ के प्रति नेताओं की लापरवाही का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. वॉल स्ट्रीट जर्नल से बात करते हुए पॉलिसी एनालिस्ट ली शुओ ने कहा कि अगर जी-20 वाली लापरवाही ग्लासगो में भी कायम रही तो सब फ़ेल हो जाएगा. कॉप-26 के असफ़ल होने की आशंका बढ़ी हुई है. अगर सच में ऐसा हुआ तो क्या होगा? अगर कॉप-26 फ़ेल हुआ तो ग्लोबल वॉर्मिंग को रोकने के लिए ज़रूरी उपाय नहीं उठाए जा सकेंगे. समंदर के जलस्तर में वृद्धि जारी रहेगी. इससे तटीय शहरों के डूबने का ख़तरा बढ़ेगा. IPCC की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 12 शहरों पर डूबने का ख़तरा मंडरा रहा है. इस लिस्ट में भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई भी शामिल है. और क्या होगा? वाइल्डफ़ायर की घटनाएं बढ़ेंगी. कई प्रजातियां हमेशा के लिए धरती से लुप्त हो जाएंगी. फ़्लैश फ़्लड्स एक आम समस्या हो जाएगी. तूफ़ानों की तीव्रता और बढ़ जाएगी आदि आदि. इतना समझ लीजिए कि इंसान और प्रकृति के सह-अस्तित्व का स्वरूप हमेशा के लिए बदल जाएगा. इंसानों के लिए धरती पर रहना और मुश्किल हो जाएगा. अगर तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री पर रोक लिया गया तो क्या सब ठीक हो जाएगा? ऐसा नहीं कहा जा सकता. नुकसान तो तब भी होंगे, लेकिन उनका दायरा कम होगा. अगर कॉप-26 में सभी देश आम सहमति बना पाए, तभी हम एक बेहतर भविष्य की कल्पना कर सकते हैं. वरना हमें क़यामत के लिए तैयार रहना होगा.

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