कल रात मैं दो घंटे तक रोती रही. क्यों? मैं भी नहीं जानती. अपने पति से मैं उन बातों की शिकायतें कर रही थी जो गलतियां उन्होंने की ही नहीं थीं. शायद उन शिकायतों को करते वक़्त मैं वो वजह ढूंढने की कोशिश कर रही थी जिसकी वजह से मुझे रोना आया. लेकिन बहुत सारी शिकायतों के बाद भी जब मुझे वजह नहीं मिली तो मेरा रोना धीरे-धीरे शांत हो गया. तब तक रात के 12 बज चुके थे और तेज़ भूख लगने लगी थी. मैंने रसोई खंगाली. कुछ खाने के सामान से प्लेट भरी. ढेर सारा खाया, पानी गटका और सो गई. अगली सुबह इंटरनेट पर अपनी तरह की उन बनती माओं को ढूंढने लगी जिन्हें इस दौरान बिना किसी वजह के रोना आ रहा है और तब मुझे मिला इस अजीब सी सिचुएशन का एक नाम “प्रेगनेंसी डिप्रेशन”. हां, वाक़ई. मुझे भी आश्चर्य हुआ था ये जानकर कि जब आप अपने आने वाली बच्चे के लिए ख़ुशी से भरे होते हैं. जब रोज़ पेट में लात-घूसे मारकर वो आपको रोमांचित कर रहा होता है. जब उसकी हलचल के सहारे आप बिना कुछ किए मुस्कुरा रहे होते हैं. तब भी आप डिप्रेशन की एक सिचुएशन में हो सकते हैं. ऐसी सिचुएशन जिसमें दिन में कई बार आपको अपने पेट से गले तक कोई तकलीफ खिंचती हुई महसूस होती है और गले में आकर वो रुआंसी हो जाती है. फिर आपको रोना आता है. लेकिन आंसू नहीं आते. आंसू क्यों नहीं आते? शायद इसलिए कि आपको पता ही नहीं कि आपको रोना क्यों आया. या शायद इसलिए कि आपको रोना अच्छा नहीं लगता. कभी बैठे-बैठे अचानक कोई ख़याल, आपको रोना दिला देता है. लेकिन वो ख़याल था क्या? ये खोजना बिल्कुल वैसा ही होता है जैसे ऑक्सफ़ोर्ड की डिक्शनरी में किसी ऐसे शब्द को ढूंढना जिसके बारे में कुछ भी नहीं पता. ये भी नहीं कि उसमें कितने अक्षर हैं. बस फिर भी ढूंढना है ताकि आपको तसल्ली मिल सके कि हां, इसी की वजह से तो रोना आया था. लेकिन थक-हारकर आप अपने ख़यालों की डिक्शनरी बंद कर देते हैं. क्योंकि आपको वो ख़याल कैसे मिलेगा जो है ही नहीं. तो फिर क्या है ये? क्यों आ रहा है ऐसे अचानक बेबात रोना? तब आप अपने आप से सवाल करते हैं. जैसे, क्या मैं इस प्रेगनेंसी से ख़ुश नहीं हूं? नहीं. मैं बेहद, बेइंतहा ख़ुश हूं. बल्कि मैं तो सातवें आसमान के भी ऊपर उड़ रही हूं. तो फिर क्या मेरे पति से मुझे कोई शिकायत है? नहीं. वे भी पिता बनने के इस दौर में पूरी तरह मेरे साथ हैं. तो क्या मैं उसके भविष्य को लेकर चिंतित हूं? पता नहीं. अगर हूं भी तो ये बहुत सामान्य सी बात है. अपने बच्चे के भविष्य के बारे में सोचना रोने की वजह तो नहीं. फिर क्या? उफ़ कितना कठिन है ये पता लगाना. है न? चलिए फिर मैं कुछ मदद करती हूं अपनी और आपकी दोनों की. अगर प्रेगनेंसी के दौरान आपको रोने या गुस्सा करने के दौरे पड़ने लगे हैं, तो इस अचानक से पैदा हुई आफत के लिए आप सबसे पहले अपने हॉर्मोन्स को ही ज़िम्मेदार ठहराइए. क्योंकि वही है जो बदलते रहने के चक्कर में आपको तंग करते हैं. प्रोजेस्टेरोन, एस्ट्रोजन, और रिलैक्सिन जैसे हॉर्मोन जिन्होंने अपने लेवल को बदल-बदलकर आपके शरीर के अन्दर हड़कंप मचाया हुआ है सबसे बड़े गुनाहगार हैं, आपके इस डिप्रेशन के. ये दूसरी तिमाही में परेशान करना शुरू करते हैं और तीसरी तिमाही के आते तक तो बहुत ही जीना दुश्वार कर देते हैं. रिसर्च करने वालों का मानना है कि लगभग 23 प्रतिशत महिलाएं प्रेगनेंसी डिप्रेशन से गुज़रती हैं. और अधिकतर शर्म या झिझक की वजह से इस डिप्रेशन का इलाज़ नहीं कराती. इलाज़ से मतलब यही नहीं है कि आप दवाइयां ही खाएं. और भी कई तरीके हैं ग़ालिब गम मिटाने के. तो चलो जानते हैं कारण और निवारण दोनों को. वैसे कारण में पूरी तरह हॉर्मोन को ही ज़िम्मेदार ठहराना ठीक नहीं है. कुछ बाहरी कारण भी हैं जो इसमें अपना रोल प्ले करते हैं. जैसे “प्रेगनेंसी ग्लो” जैसे मिथ. हमने अक्सर सुना होगा कि प्रेगनेंसी ग्लो के बारे में. मतलब कि प्रेगनेंसी के दौरान लड़कियां बेहद खूबसूरत हो जाती हैं. चेहरा दमकने लगता है. गाल लाली से भर जाते हैं वगैरह-वगैरह. लेकिन ये कथन सभी के मामले में सच नहीं हैं. मेरे मामले में भी नहीं. मेरी रंगत इन दिनों पहले से गहरी हो गई हैं. शरीर स्ट्रेच मार्क्स से भर गया है. गर्दन पर कालेपन की एक परत जम गई है जो रगड़ने से भी साफ़ नहीं होती. नाक फूलकर टेबल-टेनिस की बॉल हो गई है. गर्दन और पीठ दानों से भर गए हैं और चेहरा पहचान में आना बंद हो गया है. अब ऐसे में कई बार मुझे लगता है कि मैं कितनी बदसूरत दिखने लगी हूं. कहां गईं वो प्रेगनेंसी ग्लो की बातें? तो समझे. जिन्हें अपनी सुन्दरता से बेहद मोहब्बत हो उन्हें कुछ इस तरह के कारणों से भी डिप्रेशन हो जाता है. कुछ को लगता है कि अब उन्हें एक परफेक्ट बेटी, बहू और पत्नी का रोल अदा करने के बाद एक परफेक्ट मां का भी रोल अदा करना पड़ेगा. जिसके लिए उन्हें अपनी बची-कुची ख्वाहिशों को भी मारना होगा. क्योंकि अब नन्हे से बच्चे को छोड़कर तो आप यार-दोस्तों के साथ ट्रैकिंग पर जाने का प्लान नहीं बना सकते न. अभी तक आपने मूवी हॉल में दूसरे के रोते बच्चों पर ताने कसे. अब आपकी बारी आने वाली है. क्या करेंगे? बच्चे को घर छोड़कर मूवी देखने जाएंगे तो गिल्ट महसूस होगा और लेकर जाएंगे तो शांति से देख नहीं पाएंगे. इसी तरह के कई बदलाव हैं जो आपने बच्चा प्लान करते वक़्त शायद ना सोचे हों. लेकिन बढ़ते बेबी बंप के साथ वो आपके दिमाग पर हावी होने लगते हैं जो डिप्रेशन का दूसरा कारण बनते हैं. हम हिन्दुस्तानी पत्नियां कुछ इस वजह से भी डिप्रेशन में आ जाती हैं क्योंकि हमें पतियों से सपोर्ट की बहुत बड़ी शिकायत होती है. अभी तक उसका गीला तौलिया, गंदे मोज़े, जूठी प्लेट और उल्टा जींस ही समेटना पड़ता था. अब एक हाथ से बच्चे को संभालते हुए ये सब भी करना पड़ेगा ये सोच-सोचकर दिमाग की बैंड बजने लगती है. ये सब ऐसे कारण हैं जिनके बारे में खुलकर कह पाना या अपने आप में भी खुलकर सोचकर हमें गंवारा नहीं होता. और तब हमें रोना, गुस्सा करना, दुखी रहना, लोगों से कट जाना, बिस्तर में ही घुसे रहना एक उपाय लगता है. जिससे डिप्रेशन बढ़ने लगता है. इसके अलावा कुछ-एक कारण और भी हैं. जैसे यदि आपकी या आपके परिवार में किसी की डिप्रेशन हिस्ट्री रही हो. ज़िन्दगी में कुछ समस्याएं चल रही हों. प्रेगनेंसी के दौरान कुछ बड़ी मेडिकल प्रॉब्लम्स हों. थाईराइड की समस्या हो या आपको दिन-रात किसी तरह की पारिवारिक मानसिक यातना झेलनी पड़ रही हो. ये सभी कारण आपकी प्रेगनेंसी डिप्रेशन का कारण हो सकते हैं. लेकिन सिर्फ कारण जानने से कुछ नहीं होगा. ना ही ये सोचने से कि वक़्त के साथ ये अपने आप चला जाएगा. अगर आपने इसका समय पर इलाज़ नहीं किया तो यह प्री-टर्म डिलीवरी, कम वजन का बच्चा होना, मिस्केरिज, जेस्टेशनल डायबिटीज, डिलीवरी के बाद डिप्रेशन जैसी बड़ी समस्याओं को जन्म दे सकता है. तो क्या करें? कैसे सॉल्व करें इसे? हम्म. समस्या तो है लेकिन हल उतना मुश्किल नहीं.
1. सबसे पहले हमें ज़रुरत है अपनी झिझक मिटाकर इसके बारे में खुलकर बात करने की. जिसके लिए सही और परफेक्ट श्रोता आपके पति से बेहतर और कोई नहीं हो सकता. आप अपने पति को पास में बैठाएं और उसे बताएं कि आप आजकल किस दौर से गुज़र रही हैं. आपको बात-बात पर रोना या गुस्सा अगर आ रहा है आपको उसके क्या कारण लगते हैं. आपके रोने या गुस्से को सिर्फ प्रेगनेंसी चेंजेस मानकर हवा में ना उड़ाने दें. बल्कि उनके बारे में बात करें. अपनी भावनाओं को, अपनी सोच को अपने पार्टनर के साथ बाटें. 2. अगर आप हर वक़्त घर घुस्सू बनकर रहे हैं तो घर से बाहर निकलें. कुछ वक़्त दोस्तों या उन करीबियों के साथ बाटें जिनके साथ समय बिताना आपको अच्छा लगता है. 3. जितना हो सके अपने शरीर को आराम दें. उसे बेवजह थकने मत दें. ना कहना सीखें. अच्छी बहू/पत्नी का ठीकरा अपने सर पर मत फोड़ें. इससे आपको कुछ हासिल नहीं होने वाला. यदि कोई काम आपसे नहीं हो सकता या आपका मन उसे करने को साफ़ मना कर रहा है तो कहें. भूलें ना कि आपके मन की घुटन आपके होने वाले बच्चे पर बहुत ज्यादा बुरा असर डाल सकती है. 4. आने वाले बच्चे के लिए सारी परफेक्ट तैयारियों का बोझ अभी से अपने कन्धों पर मत उठाएं. उसके आने के बाद भी बहुत कुछ हो सकता है. अभी ज़रूरी है कि आप अपने आपको जितना शांत और ख़ुश रख सकती हों रखें. यही सबसे पहली ज़रूरी तैयारी है. 5. खाने का बेहद ध्यान रखें. क्रेविंग के चक्कर में कुछ भी, कैसा भी, कभी भी खाने के पीछे ना पड़ें. सोच समझकर, ज़रूरी और अच्छा खाएं. 6. ध्यान में बैठें. अपना एक हाथ अपने पेट यानी बच्चे के पास रखें और दूसरा हाथ अपने दिल पर और कुछ समय के लिए दीन-दुनिया को भुलाकर सिर्फ अपने बच्चे से बात करें. महसूस करें कि वो आपकी गोद में खेल रहा है. उससे जितना करीब हो सके होने की कोशिश करें. यह एक जादू की तरह काम करेगा. 7. व्यायाम, योगा या वॉक करें. रेगुलर. (अगर आपकी मेडिकल कंडीशन अलाऊ करती हो तो. कोई भी व्यायाम शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर से बात ज़रूर करें)प्रेगनेंसी योगा और इवनिंग वाक से मैंने अपने डिप्रेशन में कुछ फर्क महसूस किया है. ऐसा नहीं है कि मुझे अब रोना नहीं आ रहा है लेकिन अब मैं ख़ुद को कुछ हद तक संभाल पाती हूं. मेरी कोशिश जारी है आप भी कोशिश करके देखिए. यह ज़रूरी है. क्योंकि प्रेगनेंसी डिप्रेशन आपके बच्चे को चिड़चिड़ाऔर रोतलू भी बना सकता है. और मुझे यकीन है कि आप कतई नहीं चाहेंगे कि आपका बच्चा ऐसा हो. एक हंसमुख बच्चे के लिए आज से ही काम पर लग जाइए. उसके कपड़े-लत्ते-स्कूल की चिंता छोड़िए. उसकी हंसती मुस्कुराती ज़िन्दगी की परवाह पहले कीजिए. मेरी शुभकामनाएं.
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